Monday, May 28, 2007

मुसीबत में किधर देखें?..

हाथ का पैसा चुक जाए और मन का उत्‍साह तब किधर देखें? दाल-भात का सवाल जब लातों की बरसात के रुपक में बदल जाए तब किस प्रभु के पैर पड़ें, किस अवतार की याद करें? या चंद्रमोहन की तरह प्रभुओं की मार्मिक चित्र उकेरना शुरू करें! वह सही ठहरेगा या प्रभु कहेंगे बच्‍चा ग़लत, पाप के मार्ग पर जा रहे हो? मगर क्‍या मालूम.. शायद प्रभु दो पैसे का भाव न दें लेकिन धरा के प्रभुपंथियों की भावनाएं ठेसित हो जाएं, लातों की बरसात का रुपक, रुपक ही न बना रहे, वास्‍तविकता में बदलकर तक़लीफ़ों के हमारे संज्ञान.. हमारी संवेदना को और पैना कर जाए! अब तक़लीफ़ों का एक नया झोला बढ़ाकर हम क्‍या करेंगे? जब भात-दाल ही न होगा उसका अचार भी न डाल सकेंगे!

फिर क्‍या करें? मुसीबत में किधर देखें? मंदिर से निकलते भक्‍तों को देखें या बैंक में घुसते अभ्‍यर्थियों को? कृपा किसकी तरफ से आएगी? पुलिसवाले को देखें या पुलिसवाला जिसके पीछे है उसको? 'जनसत्‍ता' देखें या 'नवभारत'? रवीश का मनमोहन के कहे पर व्‍यंग्य देखकर अपनी आंखें फोड़ लें? या फुरसतिया का आनं‍द देखकर हर्षित-उल्‍लसित लड़ि‍याने लगें? या ब्‍लॉक पर कोई नया ब्‍लॉग आया है जाकर उसकी झांकी लें और आत्‍मा शीतल करें या अपने यहां पॉडकास्‍ट चढ़ाकर कलेजा ठंडा कर लें, बताइये. या कंप्‍यूटर उठाकर ज़मीन पर पटक दें और अपनी फूटी तक़दीर के टूटे टूकड़े देखकर चैन पा जायें और हर्षातिरेक में झूमकर जय निर्मलानंद का जाप दोहराने लगें? हमारा माथा नहीं चल रहा! राह सुझाइए, कोई नज़रिया बताइए.. हमारी मदद कीजिए, प्‍लीज़?

चांद को देखें? या चांद पर लिखी बाबू सुमित्रानंदन की कविता! उससे फ़रक पड़ेगा या हमारी कूड़ास्थिति जस की तस बनी रहेगी? नामवर का ‘नए कविता के प्रतिमान’, उससे? वो कहीं ले जाएगी, या ऐसे ही यहां-वहां घुमाएगी? कहीं मुक्ति का मंत्र नहीं फूंका जा रहा? हटिया, दानापुर, कोडरमा, बांसडीह? किसी हाशिए पर उम्‍मीद की एक किरण बची हो कहीं? नहीं?..

फिर किधर देखें, यार?.. यार को देखें? यार की नज़र तो कटार है! वह हमें देख-देखकर थक गई है और अब हमें नहीं कहीं और देखना चाहती है! फिर क्‍या मालूम देखने-दिखाने से अलग यार की अपने रगड़े-लफड़े वाली मुसीबत का बटुआ भी हो? मुसीबतों का बारह सौ पेज़ी उपन्‍यास हो, फिर?..

बाप को देखें? मगर वहां से तो पहले ही से नज़रें फेरे हुए हैं कि हम क्‍या देखेंगे, बाप हमारी ओर देख रहा है. जितनी दफ़ा नज़रें चार होती हैं, बुदबुदाकर कहता है कुछ भेज नहीं रहे हो? कब भेजोगे, उठ जाऊंगा उस दिन भेजोगे?

टीवी पर बीएससी की ख़बरें देखने लगें? या आस्‍था चैनल पकड़कर झूल जायें? या एक्‍स्‍टोर्शन सेल में फ़ोन करके पता करें कि हमें भी कहीं लगवाओ, साठे साब.. कुछ कमाई-धमाई करवाओ, बाप? कि नागार्जुन की पंडा-बंडा कविता बांचने लगें और बुदबुदायें ओम् शांति: शांति:? उससे मुसीबत कम होगी? आप कह नहीं रहे मुसीबत में किधर देखें? कुछ बोलिए, माई-बाप?

9 comments:

  1. मुसीबत में इधर देखें... :) अज़दक पर उड़ रही हैं मक्खियां ही मक्खियां... देखें-देखें यहां देखें... :)

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  2. बधाई हो.. अब अगला कदम क्रांति.. अपनी एक तस्वीर खिँचवा के रख लीजिये.. काम आयेगी..

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  3. खुद के जीते जीत है,खुद के हारे हार
    क्या करेगा वो जग मे जो हर दम नोचे बार

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  4. सुना है गीदड पर जब मुसीबत आती है तो वो शाहर की तरफ़ भागता है... आप तो मानव है....और जिनसे आप मुखातिब है वो लिखने के सिवा कुछ कर सकते है क्या? कोई बताए भाई.

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  5. मोटे आदमी पर लिखने के बाद आप उखड़ी-उखड़ी सी बातें कर रहे हैं, किसी मोटे आदमी ने धमकाया हो, तो मोहल्ला वालों को बताया जाये। अविनाश से ठिकाने लगवाया जायेगा-वैसे मेरा योगदान इस मोटा विरोधी क्रांति में ये गालियां हैं- मोटे, प्रतिकांतिकारी, लुच्चे, शोषणकर्ता, समाजखाऊ, बाकी की गालियां अविनाश बतायेंगे।

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  6. दोस्त
    यह सिर्फ़ आपकी नहीं हम सबकी बेबसी है, किधर देखें का सवाल बहुत गहरा है. सिर्फ़ मुसीबत में ही नहीं, यूँ भी. ज़्यादातर लोगों के पास वक़्त नहीं है ग्लोबलाइजेशन की भागमभाग में इस पर सोचने का, सब अपने कोल्हू में जुते हैं,आँख पर पट्टी बंधी है. भाई आप तो रूदन से एक स्टेज आगे चले गए हैं, सोचना पड़ेगा कुछ उपाय.

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  7. आज जब हर कोई देख ही रहा है, आप 'देखने को कैसे देखें'का कहना चाहिये विमर्श शुरू कर रहे हैं--शुभ लक्षण.आइये पता लगाएं कि देखना एक आवश्यकता है? विवशता है? राजनीति है? या क्या है? देखने की राजनीति पर क्या भाई जॉन बर्जर ने कुछ रोशनी डाली थी.

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  8. इरफ़ान जी,
    आपने एक बड़ी सामान्‍य-सी रोज़-बरोज़ की तक़लीफ़ को जो ख़ामख्‍वाह जॉन बर्जर वाली ऊंचाई देने की कोशिश की है तो मुझे मालूम नहीं आप 'नेम ड्रॉपिंग' कर रहे हैं या कुछ ऐसा गूढ़ कह रहे हैं जो मेरी शैक्षिक पकड़ व समझ के परे है. अगर कुछ समझ आया तो जल्‍दी ही मैं आपके 'देखने' पर ज़रूर एक पोस्‍ट चढ़ाना चाहूंगा. क्‍योंकि बीच-बीच में औसत शैक्षिक पकड़ व समझ से बाहर जो आप बौद्धिकता की चित्र-विचित्र डुबकियां लगाते दिखते हैं मैं उसकी ज़रा, मनोरंजन के लिए ही सही, चीरफाड़ ज़रूर करना चाहूंगा. शुक्रिया.

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  9. जब तक कुछ समझ में आये तब तक आप हमारे पुराने लेख देख लें। :)

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