Tuesday, May 29, 2007

नाक में उंगली का राष्‍ट्रीय हितवाद: एक अप्रगतिशील श्रद्धा

पूरी तरह से लोकतांत्रिक और सर्वदेशीय चीज़ है ये. कन्‍याकुमारी से कोहिमा चले जाइए (कश्‍मीर मत जाइए, ना. क्‍यों विवाद खड़ा करेंगे, प्‍लीज़), अहमदाबाद से आसनसोल- सर्वत्र आपको यह लुभावनी झांकी देखने को मिलेगी. प्रचुर मात्रा में मिलेगी. सड़क, रेल, खेत-खलिहान, बाज़ार, मंदिर, दफ़्तर, सिनेमा, अदालत, बेडरूम आप कहीं भी घुसकर चेक कर लीजिए, शर्तिया उपस्थिति मिलेगी. बात करते-करते आदमी ने अचानक कान में उंगली डाल ली और ज़ोर-ज़ोर से हिलाने लगा! या फिर नाक में. अब ज़ोर-ज़ोर से नहीं हिला रहा (उसमें खतरा है) मगर इस बार प्रवृत्ति खोजी है. नाक में उंगली घुमाते हुए जैसे कुछ खोया हुआ हो, साहब बहुत देर तक खोज रहे हैं. फिर वह प्राप्‍त भी होता है. तो तर्जनी पर सजाकर भावावेश से उसका अवलोकन भी करते हैं, कि अरे, इस अनोखे रत्‍न के हम ही जनक हैं? बहुत बार अनोखा रत्‍न नहीं मिलता, मगर उसकी खोज जारी रहती है. खोज के दरमियान अचानक अवरोध उत्‍पन्‍न हो गया, माने मित्र, पत्‍नी, पिता चले आए तो फट से उंगली नाक से छूटकर बाहर चली आती है और खोजकार्य तात्‍कालिक तौर पर स्‍थगनावस्‍था में चला जाता है.

आख़ि‍र ये ऐसा क्‍या विशेष रत्‍न है जिसके अनुसंधान में आदमी इतनी एकाग्र गंभीरता से जुटा रहता है? और उसे पाने के बाद तर्जनी और अंगूठे के बीच दाबे देर तक स्‍पर्श सुख लेता रहता है, और अंत में इस अनोखे रत्‍न का संचय करने की बजाय उसे परदे, पुराना अख़बार, दराज़ के कोने कहीं चिपकाकर मुक्‍त भी हो लेता है? नाक में उंगली डालकर खोजते हुए और अंतत: उस खोजे को प्राप्‍त करके आदमी के मन में जिन भावों का संचार होता है, उस भावदशा की ठीक-ठीक संज्ञा क्‍या है? इस खोज से प्राप्‍त होनेवाले सुख की प्रकृति संसारी, शरीरी है या आध्‍यात्मिक? क्‍या बुद्ध ने अपनी जातक कथाओं में कहीं इसका ज़ि‍क्र किया है? या सेंट भरता या मिस्‍टर कालिदास ने? इस सहज, स्‍वास्‍थ्‍यकारी, सुशोभनीय प्रवृत्ति का अपने जातीय इतिहास में हम कब से परिचय पाते हैं? यह विशिष्‍ट सांस्‍कृतिक उत्‍पाद हमारी अपनी खुद की रचना है.. या ह्वेन सांग और अलबेरुनी के साथ चीन और अरब से होते हुए हमारे मुल्‍क में आई? मैक्‍समूलर या रोम्‍यां रोला इस विषय पर प्रकाश डालकर गए हैं या अभी तक यह अंधेरे में पड़ा हुआ है. विज्ञजन जो इंदिरा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय व मानव संसाधन विकास मंत्रालय से इस और उस चिरकुट विषय पर सेमीनार सजाकर मुफ़्ति‍या डिनर जीमते रहते हैं, उनको इस महत्‍वपूर्ण सवाल पर भी चिंता करनी चाहिए. क्‍योंकि मलेच्‍छों से लेकर मैडागास्‍कर तक जहां कहीं भारतीय संस्‍कृति की चर्चा होगी, नाक में उंगली के इस विरले सांस्‍कृतिक, स्‍वास्‍थ्‍यकारी उपादान व धरोहर को हम अनदेखा नहीं कर सकेंगे. हम कर भी दें, बाकी दुनिया न कर सकेगी. इस मोहक राष्‍ट्रीय पहचान में हम हिन्‍दु हैं न मुसलमां. स्‍त्री हैं न पुरुष. हम विशुद्ध-अशुद्ध भारतीय हैं.

तो आइए, इस अनूठे राष्‍ट्रीय विरासत के स्‍मरण में हम सभी सुबह-सुबह अपनी-अपनी नाकों में उंगली डालें और अनोखे खोज में जुट जाएं. बड़ा लालित्‍यमय अनुभव बनेगा. एक ही क्षण समूचा राष्‍ट्र सुर में धीमे-धीमे साथ-साथ हिलोरे भरेगा. अहाहा!

15 comments:

  1. हद है..! कितना पतित हो चुके हैं आप..? इसी तरह खोजकर यह विषय निकाला गया है..? और बजाय परदे पर चिपकाने के अपने ब्लॉग पर चिपका दिया गया है?

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  2. वैसे चाहे जो कहें इस बारे में कोई बात भी करना नही चाहता..पर जब आपने सर्वजनिक कर ही दिया है तो ये बताइये इसपर नियम कानून बनना चाहिये कि नही.प्रमोद जी लेख तो आपने लिख ही दिया जिस पर कोई लिखना भी नही चाहता..पर एक आदमी को मैने देखा...सबकी नज़रे चुराकर झट्के से आपने नाक के बाल तोडता और साथ ये भी देखता कि कोई देख तो नही रहा ..इसमे भी उसे आनन्द ही मिल रहा हो? लेकिन लिखा अपने सटीक है. वैसे टिप्पणी लिखते समय ज़रुर असमंजस मे था कि लिखू कि ना लिखूं या मटिया दूं. मेरे लिये ये विषय बहुत कठिन हो जाता क्योकि मेरी आदत नाक मे उंगली करने की है हि नही...हेहेहे हेहे ....हा हा हा हा..... !!!!

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  3. वाकई हद है ! कुछ फाईनर सेंसिबिलिटीज़ की बात नहीं लिख सकते आप ?

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  4. आनंद स्वरूप वर्मा द्वारा अनूदित-प्रकाशित एक अफ्रीकी कहानी संग्रह में पढ़ा था कि नाइजीरिया, मोजांबीक आदि देशों में औरतों को शादी के वक्त मायके की तरफ से भेंट किए जाने जाने वाले ज्वेलरी बॉक्स में सोने या चांदी की एक नकखोदनी (नोज़-पिक) भी शामिल रहती है। अफ्रीका के सब-सहारन इलाके भारत से ज्यादा गर्म हैं और वहां धूल भी ज्यादा उड़ती है लिहाजा नाक से नकटी निकालना वहां इतनी शर्मिंदगी वाली बात नहीं है। आशा की जानी चाहिए कि ग्लोबल वार्मिंग के जमाने में भारत में भी धीरे-धीरे नाक खोदने पर शर्माने की प्रथा जाती रहेगी और तब यहां महिलाओं को वेडिंग गिफ्ट के रूप में ही नहीं, पुरुषों को भी बर्थडे गिफ्ट आदि के रूप में नाक खोदने के महीन औजार बाकायदा भेंट किए जाएंगे। अलबत्ता उंगली से निकालकर दीवार या पर्दे पर माल चिपकाने की सांस्कृतिक परंपरा तब भारत भूमि से विदा ही हो जाएगी, इस बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता।

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  5. प्रत्यक्षाजी, जिंदगी ससुरी फाइन है ही कहां, जो फाइनर सेंसिबिलिटीज की बात की जाये।

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  6. कमेंट बाद में करेंगे, अबहीं नाक खोद रहे हैं। हे हे हे.......

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  7. प्रभो, विषय कहां से लाते हैं, किस साधना के तहत इतनी वैराइटी के विषय मिलते हैं। इस पर भी लिखिये, इंतजार में सन्नद्ध
    आलोक पुराणिक

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  8. लगता है कि हमेशा कुछ नया लिखने की ज़िद कई कलमकारों को नाक में अंगूली करवा रही है। बेहतर है कि सीमा यही हो कहीं खिसक कर और नीचे ना चाहिए। पतनशील साहित्य का सचमुच ये बदतरीन नमूना है। बेशक ये ब्लाग की दुनिया है...पर वत्स, कुछ प्रोटक्टिव लिखो तो सराहे जाओगे। अब तक मिली अधिकांश टिप्पणियों से भी यही ज़ाहिर हो रहा है। सिर्फ लिखने के लिए मत लिखो। ना हिट होने के लिए।

    धन्यवाद

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  9. भइया उमाशंकर,
    आपके ज्ञानदान के लिए धन्‍यवाद. प्रोटक्टिव कहके आप शायद प्रोडक्टिव कहना चाह रहे हैं. हमें खेद है हमारा प्रोडक्‍ट आपको जमा नहीं. आप लगता है हाथ में चप्‍पल लेकर हमारी पतनशीलता झाड़ने आए थे, फिर इरादा बदलकर 'वत्‍स' का हाइयर पैडस्‍टलवाला वात्‍सल्‍य थूककर निकल गए.. पता नहीं आपकी सामाजिकता में व्‍यवहार का यह बेहतरीन नमूना है या इसे भी बदतरीन की श्रेणी में रखना चाहिए. वैसे आप ज्‍यादा चिंता न करें. हिट हमें भी अच्‍छा लगता है मगर यहां हिट वाला लेखन नहीं हो रहा. जिसमें मन रमता है उसे लिखते हैं.. आप अपने मनवाला लिखें, हम उसे इतना व्‍यग्र होकर श्रेणीबद्ध नहीं करेंगे.

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  10. उमाशंकर जी, पहले बात करने की तमीज सीखिए, फिर बात कीजिए। लेखन के आयामों की भी समझ पैदा कीजिए। इस वक्‍त आपकी जैसी समझ है, उसके हिसाब से हरिशंकर परसाई का एक चौथाई, शरद जोशी का तीन चौथाई, किट्टू का आधा और प्रमोद सिंह का पूरा लेखन कूड़ा लगेगा। बेहतर हो, जो रचनाएं आपकी समझ में आती है, उसी पर टिप्‍पणी कीजिए। अपनी ज्ञानवर्षा भी वहीं कीजिए। धन्‍यवाद।

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  11. मान्यवर ,
    आप हिन्दुस्तानियों की रहस्यवादिता को नही समझ रहे । यहाँ चक्षु लंदन की ओर हो तो चर्चा टोकियो की हुआ करती ह‍ै , हम इसी तरह द्वैत को अद्वैत में घोलकर काकटेल पान करते हैं । बानगी के बतौर बच्चे अधिक क्यों ह‍ैं का हमारा सीधा साधा रहस्यवादी उत्तर ये ह‍ै के अगर चारों ओर से परेशानियाँ नाक आदि में उँगली कर रही हैं तो इसका मतलब यह थोड़ी ना है के स्वयं को तात्कालिक आनंद से मुक्त रखा जाए । दरअसल नाक में उँगली डाल कर हम नाक के बाल सहलाते हैं ; अब नाक के बाल का महात्तम आपको क्या समझाएँ , जहाँ खड़े हैं वहीं से आसपास नज़र दौड़ाइये भतेरे एेसे लोग मिल जाएँगे जिनके नाक नही है पर नाक के बाल बहुत हैं । जिसकी नाक में जितने बाल लहलहाते हैं वो समाज में उतना ही स्थापित है , बड़के सरकार जब ऊ ़ पी ़ में करते हैं चुनाव परचार तो वो नाक के बाल सहला रहे होते हैं रहस्वादी तरीके से ।
    बाकी रही खुजलाहट की बात तो वो मुफ्त पाए , बाई प्रोडक्ट का मज़ा देती है और खुजलाते टटोटलते कुछ मिल गया तो यूरेका -यूरेका का अनिर्वचनीय आनंद अलग ।
    सो आप भी सही जाति के बाल नाक में पालिये , उन्हे सहेजते सहलाते रहिये वरना ब्लाग के ज़रिये समाज की नाक में उँगली ही करते रह जाइयेगा

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  12. प्रमोद जी, आप जो भी हैं जैसे भी हैं मैं आपको नहीं जानता। इसे मेरी एक और नादानी समझें। आपके प्रोफाईल में इतनी सूचना नहीं कि आपके कद और काठी के बारे में जाना जा सके। आपका लिखा पढ़ा और टिप्पणी कर दी। आपने उसे सुधार के पढ़ा इसके लिए शुक्रिया। आपको बुरा लगा बेशर्त माफ़ी मानता हूं। मना कर दिया तो आपकी लेखनी की तरफ आंख उठा भी नहीं देखूंगा। टिप्पणी की बात तो दूर।

    पर हमें नहीं पता था कि आपने एक ऐसा भाषाई लठैत भी पाल रखा है (अगर फिर कुछ ग़लत लिख रहा हूं तो आप अपना बड़प्पन दिखाईगा... हो सकता है वो खुद ही पल रहा हो आपने न पाला हो) जो लठ्ठ लेकर मेरे पीछे ही पड़ गया। दूसरों से तमीज़ की ख्वाहिश रखने वाले को इतनी तमीज़ होनी चाहिए कि जब संवाद दो लोगों के बीच का हो तो बीच में बिचौलियागिरी नहीं करनी चाहिए। मेरी तरफ से बात यहीं ख़त्म हुई।

    धन्यवाद

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  13. jisko patansheel saahitya ke is episode se boo aati ho wo kripya apni naak me unglee daal len. gajab dhaa rahe hain guru ji aajkal aap , prempatra aur naak me ungli, koi record banane ka irada hai kya ? soojhati kiase hai itni hari hari ?

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  14. aur haan , patansheel lekhak manch kee agli meeting kab hai ?

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  15. प्रमोद जी
    नाक के इस अनादरित उत्पाद पर उत्तम पतनशील साहित्य लिखने के लिए धन्यवाद। आखिर आपने यह बता दिया कि जिस नाक की शान के लिए हमारे पुरखों और कभी कभी हम भी जान दे देते हैं उसके ठीक नीचे क्या रहता है। और हां नाक के ऊपरी शान से ज्यादा सुख मिलता है या उसकी काली कोठरी के उत्पाद के स्पर्श से। इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर की चर्चा होनी चाहिए। कोई नैतिक पुलिस न आ जाए इसलिए उमाशंकर और अविनाश को तैनात कर देंगे। उमाशंकर से कहेंगे कि वे इस पतनशील सम्मेलन के जवाब में एक प्रगतिशील सम्मेलन का आयोजन कर डाले। कोई है जो आंख की किचमिच के बारे में लिख सकता है?

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