Thursday, May 31, 2007

शब्‍द गाढ़ा एक प्‍यार..

चिलचिलाती धूप में बीचोंबीच सड़क के निपट नंगा खड़ा हूं. पसीने में तरबतर धड़धड़ाती रेल गुजरती है सामने. और रेल के बाद लोगों का रेला चीरता है उत्‍कट घमासान युद्ध हो जैसे. एक लड़की का हाथ रिक्‍शे से बाहर निकल खरीदता है चमेलियों का गजरा पीछे जलता है शहर.

मेरे अवचेतन में चिटकता है शब्‍द गाढ़ा एक प्‍यार और फिर पैसे की कर्णभेदी चीख़ में डूब जाता है. कोई हूक-सी उठती है मैं फुसफुसाकर कहता हूं धीमे एक-एक अक्षर दोहराता- दोस्‍त. हवा में दूर ऊपर तक ढेरों चिंगारियां उड़ती हैं. चिटक-चिटक कर लपटों में झुलसता चुकता जाता है शहर.

मेरे साथ मेरी बेबसी की एक हाथगाड़ी है भिखारी का पुराना अल्‍युमिनियम का कटोरा हो जैसे. कुछ किताबें कुछ चिट्ठि‍यां. एक लड़की के आंसू और चिथड़े हुए थोड़े स्‍वप्‍न. हाथगाड़ी मेरे होने को खींचती भीड़ में चरर्र-मरर्र निश्‍शब्‍द. तैरती झिलमिलाती जलती छवियों के बीच गिनता मैं अपने दिन.

3 comments:

  1. मुक्त गद्य - काव्य !

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  2. कई बार पढ़ा. सोचता रहा. कुछ ऐसे ही बीत रही है अपनी भी. चलिए आपने कविता जैसा कुछ लिखा.

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