Saturday, May 12, 2007

सेवा में विनम्र निवेदन है..

भाइओ, दुलरुओ, साथियो व सखिनियो,

यह सूचना उन्‍हीं तप्‍त, दग्‍ध व उद्वि‍ग्‍न हृदय-स्‍वामियों के लिए है जो रात के खाने से रात के खाने के बाद पढ़े जानेवाले मोटे ग्रंथों की ज्‍यादा चिंता करते हैं. सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए दूसरा व निजी कंसंप्‍शन के लिए ‘तीसरा’ साहित्‍य रखते हैं, जिसे अपने को लगानेवाले चिरकुट साहित्यिकों के बीच ‘जासूसी’ के बदनाम नाम से जाना जाता है. ब्राउन पेपर व अख़बारी ज़ि‍ल्‍द में, किताबों के बीच व किताबों के पीछे और तकिये के नीचे अपना गुप्‍त ख़ज़ाना संजोकर रखते हैं. और रात के खाने के बाद पत्‍नी दिन का झमेला और शाम का चुटकुला सुनाने की कोशिश करे तो उसे डांटकर चुप कराते हैं कि अभी अपनी बकवास मत करो, देख नहीं रही साहित्‍य पढ़ रहे हैं? पत्‍नी साहित्‍य देखती होती तो फिर वह पत्‍नी कहां होती. चूंकि उसे पत्‍नी हुए रहना है, वह बुदबुदाती, मुंह फुलाती, मुंह फेरकर धीमे-धीमे नाक बजाने लगती है, और आप वास्‍तविक रसिक जनाब लंबी सांस और सिगरेट का धुआं छोड़कर ख़ून और खात्‍मों के अंधेरों में उतरते हैं..

ठीक महीना भर पहले हमने ‘एच की मौत’ का जासूसी सिलसिला शुरू किया था. हजारी (और हिंदी) की मौत के रहस्‍य के बीच बंधुवर दामोदर दास का पड़ताली सफ़र शुरू होना ही चाहता था.. कि हम लंबे ‘पॉज़ मोड’ में चले गए.. कहानी सिगनल पर अटके ट्रैफिक की तरह अटक गई.. अभी तक वहीं अटकी पड़ी है.. इसलिए अटकी पड़ी नहीं है कि हम आलसी हो रहे हैं, या दामोदर दास को थप्‍पड़ मारकर हमने अपने जीवन से बाहर कर दिया है.. नहीं, प्रिय रसिक सखा और सखी, अड़चन यह हुई है कि हमारे दुलारे दामोदर दास भयानक मानसिक दुविधा और द्वंद्व से गुजर रहे हैं. सो अपनी तरफ से हमने उचित यही समझा कि उन्‍हें सुविधा और सहूलियत से ज़रा यह मुश्किल फ़ेज़ फरिया लेने दें, फिर घेरें उन्‍हें और तरो-ताज़गी में हजारी और हिंदी के गहरे भेदों में उतरें. थोड़े वक्‍त की बात है. तबतक के लिए धीरज धरें. बस एक विनम्र निवेदन है कि इस दरमियान ऐसा न करें कि मित्र-पत्‍नी के बहकावे में आकर गंभीर साहित्‍य का चार पन्‍ना पलटें, और मन मारकर उसकी आदत पकड़ लें! ऐसा करके आप तो नहीं टूटियेगा लेकिन दामोदर दास ज़रूर टूट जाएगा. बेचारे डीडी को अच्‍छा नहीं लगेगा. हमें भी नहीं लगेगा. मगर हमारे लगने- न लगने की आपने चिंता कब की है?

3 comments:

  1. हमें आपकी भी चिंता है.. दामोदर की भी और हिंदी की भी.. आप परोसिये हम मस्तक के भूखे पेट में अम्ल संचार करके बैठे हैं..

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  2. सुंदर बैनर के लिये बधाई

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