Wednesday, May 30, 2007

अइसा बानी बोल के हमरे हिरदय में चीरा मत लगाइए, परान-प्रानेस्‍सर!

नैहर से बेबी का पति रामजीत राय को पत्र..


पराननाथ, मोरे मन मंदिर के देबता, चरन इस्‍पर्श करें! देखिए, आपको झुठले लगता है कि सगरे संसार मौज-मजा कर रहा है अउर एक आपे अकेले हैं जो दुख का सागर में बूड़ रहे हैं! आप सोच कइसे लिए कि आप बिरह-बेदना में कलपेंगे-तड़पेंगे अउर हम हिंया दलपूड़ी अउर कटहल का तरकारी का आनंद लेंगे? आपका प्रति अइसा अनादर, एतना बड़ अन्‍याय हमसे जीते-जी होगा, जी? मन में अइसा ही गलत-सलत भाव सजाने का खातिर आप हमरा मां‍गी में सेनुर भरे थे? कोहबर में मन्‍नु मौसी का चांदी का गिलासी में हमरे हाथ से दूध पीके जलम-जलम साथ रहने का परन किये थे? आप केतना निरमोही, निरदयी पुरुस हैं? हिंया अइसे ही सबका टीका-टिप्‍पनी से करेजा जरता रहता है (कि बारह महीना निकल गया, बबुनी का पेट अभी ले वइसे ही सपाट लौक रहा है! पाहुन जी में कवनो ऐब-सैब नै न है? दीपनरायन का पतोहु- जौन सात साल का बियाह का बाद अबहीं तलक बांझ है- ऊहो लबर-सबर कर रही थी! मन त किया जाके झोंटा नोंच लें छिनाल का फिर आपका इज्‍जत का बात सोच के खून का घूंटि पीके पटाये रह गए!) अउर आप हैं कि अपना ब्‍यंग बान छोड़ के अलग से हमरा आत्‍मा मथ रहे हैं!

दूसरा बात, कटहल-सटहल कुच्‍छो नै बचा है ए हालि. हफ्ता भर बास्‍ते मन्‍नु मौसी का मझलकी बेटी आई थी. बतिया-पाकल सब कटहल कटवा के बोरा में भरवा के ले के गई कुलच्‍छि‍न! साथ में देवर लेके आई थी, दोनों बखत ओकरा बास्‍ते घी में चभोर-चभोर के परौठा बनाती थी, अउर हमलोगन का बास्‍ते छूच्‍छे सूखल रोटी! लाज न सरम, सबका आंखि का आगे देवर का संगे रिस्‍का में सिनेमो देख के संझा आठ बजे घरे आई! अउर मन्‍नु मौसी कुछ बोलबो नहीं कीं! एतना बेसरम छोकरी है कि आपो से कहते हुए हमको लाज लगती है! अउर अभी आगे का सुनिए! जौन दिन जा रही थी महरानी, हीं-हीं, ठीं-ठीं करके सूरन का अचार वाला दोनों बयामो रख ली! बोली, हिंया कौन खानेवाला है, हम लेके जाते हैं नहीं त खराब हो जाएगा! हम त माथा पीट लिए कि भगवानजी, कवनो महतारी का पेट से अइसा छौंड़ी मत जनना! सीताराम-सीताराम!

अउर आप समझ रहे हैं हम हिंया इन्‍नरसभा में बइठे हैं! छप्‍पन भोग खाय रहे हैं! अरे, घर में बचल होगा तब न सूरन का अचार अउर कटहल का तरकारी खायेंगे, जी? बगानी में साग-फागो नै है! अउर पीर मोहम्‍मत वाला मेला भी ए साल कैंसिल हो गया है! पिछलका दफा आए थे त चाची का पतोह सुनीता संगे हाट-बजार टहलियो आते थे, ए बार उहो दुभर हो गया है. (अब नदान बन के ई मत पूछिये कि काहे! सुनीता रानी छौ महीना का गरभ से है अउर काहे ला? भगवानजी सबका गरभ पूर रहे हैं, खाली एक हमहिं पापीन हैं जेकरा ऊपर उनका किरपा का दिरिस्टि नै जाय रहा है! अब इसको अपना ऊपर मत लीजिएगा, हं! हम अपना को दोस दे रहे हैं- आपका पुरसत्‍त का भेद गांव का कौनो छौंड़ी-मेहरारु से छुपल थोड़े है.. खाली हमहीं नहीं, इमिरिति, नैना, नेहा कुमारी सब आपका नामी उचरने पर आह छोड़ती है! त पुरसत्‍त का बारे में त आपको मुंह फुलाने का दरकार नहींये है).

बाकी ई रतजग्‍गा वाला आदत खतम करिये, आप नहीं सूत के अपना नीन नहीं हमरा जिन्‍नगी बरबाद कै रहे हैं!.. हमरा जिन्‍नगी से खिलवाड़ करे का आपको कौनो हक नै है, हां!.. अउर नवकरी का बारे में पांड़े जी का किये, हमको पूरा डिटेलिन से खबर कीजिए, जल्‍दी! ओकरा बास्‍ते हिंया हम माता का बरत किये हैं (गरभ बास्‍ते सेरपेटली कर रहे हैं!).

आपका चरनों का दासी और धूलि,
बेबी कुमारी राय

11 comments:

  1. बहुत आगे निकल गए । कटहले से काम फरिया जाए तो दूनों मेल का बोरा भर ले जाइए ।

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  2. ह ह ह ह ह ह गज़ब का लउ लेटर हौ..

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  3. आतमा काहे मथ रहे हैं रामजीत भाई. उनकी जिन्‍नगी से खिलवाड़ करे का आपको कौनो हक नै है. आ हो सके तो एक बार घूम आइए गांव, आम भी खूब फला है इस साल...सुनते हैं.

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  4. तो परमोद भईया जे चिठिया है तो भौजी की तुहारे नाय,पर तुम कोई और को नाय डार के पढाय रहे हो,हमरी मानो तनिक घरै घूमई आओ,बौजीउ खुश हुई जेहे,औ हमहू लोग कछु दिन रोज रोज को पढिबे ते बचि जाईहे

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  5. आज देखा ये प्रतिउत्तर ..अच्छा लगा.. सही में आप गाँव घूम ही आइये...

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  6. गजब...का लव लेटर है..:-)

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  7. बेबी कुमारी राय ने ठीक कहा है --- हमरा जिन्‍नगी से खिलवाड़ करे का आपको कौनो हक नै है, हां!.. उसकी जिंदगी से खिलवाड करने का हक किसी को नहीं है !

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  8. किरिपा दिरिस्टि डाला जाए पिरभू .

    जनाना की जान लेंगे क्या ? काहे ओकर जिन्नगी हलकान किए हैं ?

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  9. अय हय अह हय कितना जालिम कटार लिक्खै हैं, और पुरसत्त का तो क्या ही कहना,
    अब कमेंट क्या करें, एक हाथ हिरदय पर रखे बैठे हैं और दूसरे हाथ की उंगलियां मुंह में आटिकमैटिक चली गयी हैं,वैसी वाली स्टाइल की सीटी बजाने के लिए,कईसी वाली, ए ल्लो अब आपको बतानी पड़ेगी का कि कईसी वाली, आप तो हिरदय की सारी गहराइयां नापे बईठे हैं। एक बावन एपीसोड की सिटियामार बधाई ग्रहण करें,
    आलोक पुराणिक

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  10. क्या लेखन है भैया प्रमोदजी। धन्य हैं आप गजब की लेखनी है! नजर उतार रहे हैं माउस घुमा के! :)

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