Friday, May 4, 2007

धायं देना गोली!..

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: उनचालीस

रवीश हंसने लगे. धीमे शुरु किया, फिर पिच पर ऊपर जाने लगे. गब्‍बर सिंह से ज्‍यादा सेर्ज्‍यो लियोने की ‘फॉर अ फ्यू डॉलर्स मोर’ के जान मारिया वोलांते की तरह हंस रहे थे जहां से सलीम-जावेद ने गब्‍बर की हंसी का आइडिया उड़ाया था. धीरे-धीरे सारे ब्‍लॉगरों की हंसी का कोरस बजने लगा. सिडनी बिशे के दबे हुए ट्रंपेट की ही तरह मेरी मुक्ति की संभावना भी अट्टाहासी अट्टालिका के नीचे कहीं दब गई. शायद अचानक रवीश हंसना रोकते, पलटकर फुर्ती से गोली दागते और मैं गली के कुत्‍ते की तरह वहीं ढेर हो जाता. फ़ि‍ल्‍म में यही हुआ था फिर जीवन में ऐसा क्‍यों न होता. इसीलिए मैं रवीश पर फोकस किये हुए था. कि वो हंसी रोककर फुर्ती से पलटकर गोली दागें और मैं उसी फुर्ती से बगल में छलांग मारकर क्लिंट ईस्‍टवुड की तरह खुद को बचा लूं! हालांकि अपनी देह के वजन का ख्‍याल करके क्लिंट की फुर्तीवाला आत्‍मविश्‍वास मैनेज करने में दिक्‍कत हो रही थी.

इससे और घबराहट हो रही थी कि सेर्ज्‍यो लियोने को सबने भले न देखा हो, रमेश सिप्‍पी से सब वाकिफ थे, हंसी की नाटकीयता का अंत किस मार्मिक दुर्घटना से होनेवाला है की सबको जानकारी थी, फिर भी हंसे जा रहे थे. मान्‍या, नीलू, सूज़ी, प्रैट्स, बुकवर्म (मसिजीवी), सिंबी (सिंबल, प्रतीक), नैस्‍टी (नोयेडा) सब हंसके दोहरे हो रहे थे. मसिजीवी ने आंख मारकर कहा उन्‍हें मज़ा आ रहा है; अपने ब्‍लॉग पे चढ़ाने के लिए तीन पोस्‍ट का मटिरियल पा गए! प्रियंकर हंसते हुए दुखी हो रहे थे कि उन्‍हें पिंट्स या एनचैंटिंग जैसा नाम क्‍यों नहीं दिया जा रहा. फिर भागते हुए रवीश के पास आए कि इस मौके पर पढ़ने के लिए उनके पास दो अच्‍छी बांग्‍ला नहीं, मणिपुरी कविताएं हैं, सभा उन्‍हें इज़ाजत दे. सभा ने दे दी लेकिन रवीश ने वापस ले लिया कि हिन्‍दी में कविताएं बहुत होती रहती हैं आज ज़रा ढंग से हंसी हो जाए. रघुराज ताली बजाने लगे. अविनाश हंसते हुए सीढ़ि‍यां ऊपर-नीचे चढ़ने लगा. बोडी सबके बीच घूम-घूमकर अपनी नई ओमेगा की सुनहली घड़ी दिखा रहे थे, और बीच-बीच में फुसफुसाकर पता कर रहे थे कि सभा में किसी को ख़बर हो तो उन्‍हें बताये कि किसने उनके स्‍वागत में निर्मल-आनंद पर चढ़ाये पोस्‍ट में गंदी टिप्‍पणियां की थीं. वह कायदे से आज गंदा सुलूक करने के लिए तैयार होकर आए हैं. चैंडी (चंदू) ने कहा मैं गंदे नहीं, अच्‍छे सुलूक में यकीन रखता हूं मगर कविता के संबंध में रवीश भाई की राय से फ़र्ज नहीं रखता. जिसके जवाब में सैंडी ने कहा यार, ऐसी ज़बान बोलो जिसे सब समझ सकें. अपने को तीसमार खां ही बताना है तो बीवी और बॉस के आगे बताओ. हमको खूब मालूम है वहां तुम्‍हारे कैसे छक्‍के छूटते हैं! तभी..

हां, तभी गोली दगी! केदारनाथ अग्रवाल की कविता वाली नहीं, बंदूक की असल गोली! और रवीश ने नहीं दागी थी! रवीश ने डरकर हंसना बंद कर दिया और भागकर रघुराज के पीछे छुप गए. रघुराज सोच रहे थे किसके पीछे छिपें तबतक आततायी गोलीबाज बंदूक लहराता पर्दे के पीछे से प्रकट हुआ! नीलू, सूज़ी, प्रैट्स और मान्‍या ने समवेत कोरस में ‘ओह माई गॉड!’ का गाना गाया और भय में इधर-उधर भागने लगीं.

नहीं, रेहाना नहीं थी, फैबइंडिया के कुरते में अभय था- एक हाथ में सैकेंड हैंड राइफल और दूसरी में एक मांगपत्र लहरा रहा था. मैं डरा हुआ ज़मीन पर गिरा था, अब फैलकर गुलज़ार की पहली फ़ि‍ल्‍म ‘मेरे अपने’ का दिनेश ठाकुर होने लगा!..

(जारी...)

2 comments:

  1. भाई वाह यह है तरीका लिखने का मुझ्रे ज्ञात नहीं था…सुंदर!!!बधाई!!

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