Wednesday, May 16, 2007

बरसाती रिमझि‍म: एक संस्‍मरण

बरसाती रिमझिम की झड़ी लगते ही घर में अंधेरा भर जाता. कमर में चुन्नी खोंसे और हाथ में नारियल की झाड़ू लिए दीदी दिन भर खरड़-खरड़ पानी एक ओर से दूसरी ओर हटाने में बझी रहती. अम्मां अचारों के मर्तबान और गीले कपड़ों की साज-संभाल देखती. मुन्नी भाग-भागकर इस कमरे से उस कमरा किये रहती कि केंचुआ है! पिल्लू है! फिर उठंगी बैठकर घंटे-घंटे भर उनको निहारा करती, जबतक मनोज पीछे से आकर उसकी चोटी न खींचता और नारियल की झाड़ू की सींक से पिल्लुओं को उलटकर मुन्नी को दहशत और वितृष्‍णा से भर नहीं देता. अपने कमरे में बाबूजी साठ वॉट के पीले अंधेरे में तखत पर बैठे चिंता करते कि पता नहीं इस पानी में गांव के घर की क्या दशा हो रही होगी. रसोई की टुटही दरवाज़े के नीचे के ढर्र-ढर्र बहते पानी में चाय का भगोना मांजती अम्मां बुदबुदाती, 'हमारी यहां दस दशा हुई रहती है उसकी चिंता नहीं. बस गांवे का घर सूझता रहता है!'

मुन्नी चुपचाप सफेद स्कर्ट-ब्लाऊज पहनकर तैयार हो जाती मगर मनोज रोज़ नाटक करता कि इतनी बरसात में कोई स्कूल कैसे जाएगा. स्कूल जाके क्या फायदा जबकि स्कूल में कोई पढ़ाइये नहीं होगी. मिश्रा सर बरसात में गांव चले जाते हैं और झा सर का भरोसा नहीं ही रहता. लड़के टेबल पर कूदा-फांदी करते हैं या गलियारे में फिसला-फिसली खेलते हैं. हमको घर रहकर पढ़ाई करने दो, स्कूल भेजके हमारा टाईम वेस्टिंग मत कराओ! दीदी गीले कपड़ों को दरवाज़े, मशीन, ड्रम, रेंगनी, गोदरेज की अलमारी और गलियारे के साइकिल पर फैलाती हुई मुंह बनाती कि ऐसे थेथर और बेहया लड़के से मुंह लड़ाने का क्या फायदा. लातों के दूत बातों से नहीं मानते. अम्मां मनोज के पीछे चिरौरी करती घूमती कि वह लात खानेवाला काम न करे, अच्छे बेटे की तरह राजी-खुशी स्कूल चले जाये. मगर मनोज की नौटंकी तबतक चलती रहती जबतक भैया कहीं से भींजकर लौट नहीं आते, गाली देते कि साला, सब कपड़ा खराब हो गया और तब मनोज बिना तीन-पांच किए एकदम राजी-खुशी स्कूल चला जाता.

प्रीति और रंजु डेस्क पर बैठी जोड़-गुना खेलतीं, बाकी सब उधम में क्लास सिर पे उठाये रहते. बैनर्जी आंटी क्‍लास में घुसने पर हल्‍ला-गुल्‍ला देखकर कभी नाराज़ होतीं, बाकी आंटी या सर कुछ भी नहीं होते. अंगरेज़ी के परिडा सर अपनी कुर्सी पर बैठकर हमारी तरफ देखने की बजाय खिड़की से बाहर की झड़ी की तरफ देखते रहते और फिर पलटकर उदास होकर उड़ीया में बोलते ये क्‍लास में बैठने का नहीं घर में चदरी ओढ़ के चाय-पकौड़ी खाने का समय है. स्कूल में पढ़ाई सचमुच नहीं होती. मैं अपने क्लास में रहने की बजाय एक साल सीनियर तेजिंदर और श्‍ोखर के सेक्शन के दरवाज़े पर अड्डा जमाये रहता और हमलोग घंटों-घंटों भर देश और दुनिया के बारे में पता नहीं क्‍या-क्‍या बहस करते रहते. तेजिंदर कहता इस साल ज्यादा बारिश होगी. उसके जवाब में शेखर कहता 1961 में जैसी बारिश हुई वैसी पहले कभी नहीं हुई न बाद में होने का कभी चांस है. राजू भी बहस में शामिल होने चला आता मगर कनखियों से ध्यान उसका अंदर सहेलियों के बीच खड़ी हंसती हुई अंजलि में टंगा होता. अच्छी-खासी पिकनिक हो जाती. लगता ही नहीं स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं. इसीलिए भैया बाज मर्तबा मेरे किसी गलत काम पर फ़ैसला सुनाते कि स्कूल नहीं जाना है! देखता हूं आज स्कूल कैसे जाते हो! इस तरह की धमकियों से मैं सचमुच डर जाता. धीमी आवाज़ में अम्मां के आगे स्कूल न जाने के नुकसान गिनाता. अम्मां कहती अपने बाक-बखेड़ा में हमको मत उलझाओ. दीदी भैया के फ़ैसलों में यूं भी राय बनाने से बचती थी, दखल़अंदाज़ी का तो सवाल ही नहीं उठता था. सब कहीं से हारकर और भैया को दुनिया में अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानकर मैं इसकी तरकीब भिड़ाने में लग जाता कि कैसे भैया किसी दूसरी ज़िरह में फंसें और मैं उनकी नज़र बचाकर स्कूल भाग जाऊं. भागते में कभी दीदी की निगाह की पकड़ में आ जाता तो वह भैया से शिकायत नहीं करती. उल्टे मदद करती, फुसफुसा के बोलतीं, 'भाग, भाग! इधर नहीं देख रहे हैं, निकल जा!'

ऐसा भूल से भी नहीं होता कि मनोज साफ़-सुथरे कपड़ों में स्कूल जाकर साफ़-सुथरे कपड़ों में ही स्कूल से लौट आए! उसके स्कूल से लौटते ही दीदी माथा पीट लेती, 'देखो, हरामी को.. क्या गत करके लौटा है!' दीदी मनोज के बारे में नहीं उसके देह पर के कपड़ों पर टिप्पणी कर रही होतीं. दीदी का बोलने का हक बनता था क्योंकि घर के सारे कपड़े जो धोबी के यहां नहीं जाते थे, की सफ़ाई का भार दीदी के ही जिम्मे था. अम्मां बोलती जाने दे, बेटी, हरामी लड़का है, इससे मुंह क्या लड़ाना! मगर दीदी जाने नहीं देती थी, देर तक रसोई और अंदरवाले कमरे में झींकती रहती कि सबलोग उसे घर में नौकरानी समझते हैं! ऐसे मौकों पर मुन्नी चुपचाप जाकर दीदी के पास बैठ जाती और गुमसुम-गुमसुम दीदी को देखती रहती, मानो दीदी का अध्ययन करके अपने भविष्‍य का पाठ ले रही हो. जबकि मनोज चुप रहकर दीदी का दुख कम करने की बजाय ज़ोर-ज़ोर से मुंह बजाकर दीदी का दुख बढ़ाता रहता. दीदी को सुनाकर कहता हम बोले थे कीचड़-कादो है स्कूल मत भेजो तब कोई हमारा बात नहीं सुना! दीदी कहती चुप रह, हरामी, एक तुम्हीं दुनिया में स्कूल जाते हो? मुनिया नहीं जाती है? उसका कपड़ा काहे नहीं कीचड़-कादो होता? दीदी की बात सुनकर चुप लगा जाने की जगह मनोज पलटकर ज़िरह करता, 'तुमको क्या मालूम हमको कितना काम रहता है! भागादौड़ी करनी पड़ती है.. दास आंटी चॉक लाने स्टाफरूम भेज देती हैं! मुनिया जैसे एक जगह बैठे थोड़े रहते हैं? मालूम-सालूम कुछ नहीं, घर बैठे फलतुआ बकबक करती हैं!

जबकि सच्चाई यह होती कि अपने क्लास के लड़कों के साथ स्कूल से घर तक के रास्ते में सड़क के किनारे जमा हो गए भर्र-भर्र पानी में गोड़ डालकर छींटा उड़ाये बिना मनोज को चैन नहीं पड़ता था. या रिसेस के समय पानी के छींटें पड़ रहे हों तो वह अदबदाकर मैदान में दूसरों के पीछे-पीछे फुटबॉल खेलने उतरता और फुटबॉल पाने के चक्कर में दस दफा ज़मीन पर लोटे बिना उसे लगता ही नहीं कि वह फुटबॉल खेल रहा है! मनोज के लिए फुटबॉल खेलना और कीचड़ में लिसड़ाना एक ही बात थी.

जबकि मैं और श्‍ोखर शाम को पड़िया में फुटबॉल खेलते हुए कीचड़ से कपड़ा बचाकर फुटबॉल खेलते थे. राजू कहता यार, तुमलोग ठीक से खेल नहीं रहे हो! राजू और तेजिंदर का भी मानना था कि बिना कपड़ों को कीचड़ में लिसड़े फुटबॉल खेलने का तुक नहीं है. जबकि मेरा और श्‍ोखर दोनों का मानना था कि हम पैर के कमाल से फुटबॉल खेल लेंगे, हमें कीचड़ से कमाल करने की ज़रूरत नहीं. खेल के बीचोंबीच राजू अचानक पलटकर तेजिंदर या श्‍ोखर से कहता, 'जो मज़ा फुटबॉल में है वो मज़ा क्रिकेट में नहीं, सच्ची!' तेजिंदर तेज़ आवाज़ में सबको सुनाकर कहता कि क्रिकेट बकवास है! मगर बारिश के खत्म होते ही सबसे पहले तेजिंदर ही अपना विकेट और बैट बाहर निकालकर साफ़-सफ़ाई में जुटता. बहुत बार दूसरी ओर के लड़कों से हार जाने पर अलबत्ता राजू और तेजिंदर हमें उन्हीं नज़रों से देखते कि तुमलोगों का आधे मन से खेलना ही टीम की हार का कारण बना है. कभी-कभी ऐसा भी होता कि बारिश और कीचड़ की भागाभागी में मेरी नज़र जाती कि मनोज या भैया कम्युनिटी सेंटर की छत की ओट में खड़े हमलोगों का मैच देख रहे हैं तो ऐसे क्षणों में मुझमें एकदम-से जिम्मेदारी का भाव भर जाता, बेइंतहा जान लड़ाकर मैदान में यहां से वहां भागते हुए मैं अनावश्यक हल्ला मचाने लगता, 'अबे, तुमलोग ढंग से खेलोगे कि हीरोगिरी छांटने आए हो?' बॉल पर नियंत्रण की कोशिश में न केवल दसियों दफे भदभदाकर कीचड़ में गिरता, बल्कि बहुत बार तो घुटने या एड़ी में अच्छी-खासी चोट भी लग जाती.

शाम को खाना खाते में भैया मुझको सुनाकर मनोज से कहते, 'आज दिलिपवा फील्ड में कैसे भद्द- भद्द गिर रहा था रे, मनोज?'

मनोज उत्साह से सबको मेरे गिरने की नकल करके दिखाता. मुन्नी के साथ दीदी भी भात सना कौर बीच में रोककर हंसती और मैं सिर झुकाये मन ही मन तय करता कि अकेले में पकड़ आते ही मनोज बाबू को वो सबक सिखाऊंगा कि सारी ज़िंदगी हमारी नकल भूल जाएंगे!

मंगल की देर दोपहर बारिश शुरू होती तो बियफे रात तक मुसलाधार की झड़ी लगी रहती. रात में भद्द से धीमी आवाज़ होती तो भैया एकदम-से उठकर बत्ती जला देते. अम्मां नींद में कुनमुनाई बोलतीं का बात है, चूहा घुसा है? भैया थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद डंडा खोजकर निकालते और सबको अपनी जगह से न हिलने की हिदायत देके खबरदार करते कि चूहा नहीं, सांप है! सांप सुनते ही मुन्‍नी एकदम-से अम्‍मां से चिपट जाती. अम्‍मां मुन्‍नी को थप्‍पड़ मारकर अपने से अलग करती कि, 'क्‍या बुड़बक लइकी है, रे!.. गेंहुअन का कौनो बिष थोड़े होता है!' हालांकि असलियत यही होती कि सांप के पकड़ में आने तक सब कमोबेश मुन्‍नी वाली हालत में ही असहज, अस्थिर बने रहते.

शुक्रवार को आसमान एकदम-से साफ़ उजला हो जाता और लगता ही नहीं कि पिछले तीन दिनों ऐसी घनघोर बारिश हुई है. बाबूजी चबूतरे की धूप पर गुल की डिबिया लेकर अपना आसन जमाते और हंसते हुए सबको दिखाते कि देखो, गड़ही में कैसे बच्चा लोग खेला खेल रहा है! मुन्नी भागी हुई बाहर आकर बाबूजी के निकट खड़ी बच्चा लोगों का गड़ही में पानी उलीचने का खेल देखती. मगर खुद बच्चा लोगों के बीच जाकर पानी उलीचने का खेल खेल ले, ऐसा ख्याल उसे भूले से भी नहीं आता.

16 comments:

  1. सर जी
    एक बात बताइए, आप इतने शानदार फोटोज़ कहाँ से लाते हैं. आपकी हर पोस्ट में एक से एक बढ़कर नायाब फोटु दिखती है. कमाल है, रिमझिम अच्छी है. आप और अभय बाबू बचपन के संस्मरण दर्ज कर रहे हैं, मेरा मन भी मचल रहा है. प्री-ग्लोबलाइज़ेशन वर्ल्ड में बचपन कुछ और ही था, आज कुछ और ही है. मैं नाना के घर का असली फोन छूने से डरता था, मेरे ढाई साल के सुपुत्र मेरा नया नोकिया कमोड में डाल चुके हैं.
    अनामदास

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  2. उठंगी
    साठ वॉट के पीले अंधेरे में
    'हमारी यहां दस दशा हुई रहती है उसकी चिंता नहीं. बस गांवे का घर सूझता रहता है!'
    'स्कूल भेजके हमारा टाईम वेस्टिंग मत कराओ'
    कि वह लात खानेवाला काम न करे
    कीचड़-कादो
    पानी में गोड़ डालकर
    कीचड़ में लिसड़ाना
    बियफे रात तक
    अम्मां नींद में कुनमुनाई बोलतीं

    ...
    भई मज़ा आ गया. और आप कहते हैं हम सँभल के तारीफ़ करें? कमाल है.

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  3. आप ने एक अनोखी दुनिया देखी है.. अब हम भी देख रहे हैं..
    बढिया लिखा है..

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  4. बरसात की सोंधी मिट्टी की सी कुशबू आई आपके इस आलेख में !

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  5. दिल(जो पता नहीं कि अब है भी या नहीं) को छू लिया। प्रमोदजी बढ़िया है।
    आलोक पुराणिक

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  6. प्रमोद भाई, मानता हूं, आप के जैसा जिंदा गद्य या तो मैंने कभी नहीं पढ़ा, या कभी बहुत विरले ही पढ़ा है। आप जीवन से ज्यादा भाषा की याद दिलाते हो। ऐसा ही लिखते रहे तो आपका ठुड्डी पर कलम टिकाए वेद प्रकाश शर्मा जैसा अझेल फोटू देखने के लिए भी मैं तैयार हूं, हालांकि अच्छा यही रहेगा कि अपने ब्लॉग पर अपना फोटू डालने का नेक खयाल आपको कभी न आए।

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  7. आखिर कितना संभालेंगे खुद को, संभालने की भी तो सीमा है। सचमुच कमामामामामामामामामामामामामामामामामामामाल है।

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  8. आप भी गज़ब लिखते है,आपकी कहानी तो ओस से भीगी रहती है, ना जाने दिल के किन किन तारो को छू कर आन्नदित कर कर जाती है. पानी के आगे तो हम जैसे" भैस" हो जाते थे,जब कभी स्कूल जाने के समय बारिश हो जाती थी तो मन अपना मस्त हो जाया करता पर उसी समय बरिश रुकी तॊ दुखी मन से स्कूल जाना याद है. और रिमझिम पानी बरसे, इसके लिये हम नाच नाच के गाया करते "दो पैसा का हल्दी पानी बरसे जल्दी" आपकी कहानियो मे मुझे अपनी सी तासीर मिलती है .इधर आपकी कहानि्यो की लम्बाई हमारे पथनीय शक्ती के मुतबिक है तो हमारे लिये सोने मे सुहागा की तरह ही है.....लगे रहिये ज़िन्दाबाद

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  9. बेनाम बाला.. या बाहुबलि, ऐसा नहीं लगता कि आप कुछ ज्‍यादा ही बहक रही/रहे हैं.. शब्‍दों का अपव्‍यय मैं तो थोक में कर ही रहा हूं, आप अपने कृपया ज़रा किफ़ायत से किये रहतीं/रहते! बाकी मित्रो, आप सभी का धन्‍यवाद.. और चंद्रभूषण पंडीजी, आप चिंता न करें, हम स्‍टुडियो से वेदप्रकाश शर्मा वाला फोटु आलरेडी खिंचवा के लौट रहे हैं!..

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  10. की भालो......

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  11. बीस साल बाद की फंतासी से ये तीस साल पीछे की याद ज्यादा ठीक है।...अच्छा हो कि कमाल की प्रतिक्रियाओं से अपने होश न गंवाएं। विरले गद्य जैसा कुछ नहीं है, लेकिन ठीक है...
    संगम

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  12. भीनी भीनी सौंधी सौंधी .... चित्र भी अछे हैं

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  13. 'पडिया' बुझिले भल, न हेले नाही । पिलाबेळू मोर भी सम्पर्क ओडिशा सांगेरे अछी।
    भैया को भ्रम था कि गेहुँवन जहरीला नहीं होता है ।
    स्मृतियाँ जी उठीं। साधुवाद।

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  14. लेकिन ये बतायें कि मुन्नी खाली गुमसुम ही ताकती रहेगी ?

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  15. आपके सवाल का जवाब प्रत्‍यक्षा जी...
    खाली गुमसुम ताकती ही कहां रही है.. पिल्‍लुओं के पीछे इस कमरे से उस कमरे भागती भी रही है.. बीच-बीच में स्‍कूल भी गई है.. और बाबूजी के निकट खड़ी होकर बच्‍चा लोगों का पानी उलीचने का खेल भी देखती है.. मेरे ख्‍याल से मुन्‍नी होकर वह इतना कुछ कर रही है, बहुत है.

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