Thursday, May 3, 2007

मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये!..

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: अड़तीस

फ्लड-लाइट के गोल रोशनी के दायरे में अब तक मुझे कैद नहीं किया गया था, बस, नहीं तो समूह से अलग करने व लिंचिंग के बाकी जो साज-सामान हैं, माहौल तेजी से उसमें रंग गया था. बैकग्राउंड में सिडनी बिशे के ट्रंपेट की एक मार्मिक धुन मेरी भावी त्रासदी का उचित बिल्‍ड-अप बनाने लगी. हमेशा का घबराया मैं अब गिड़गिड़ाने लगा. रवीश के सामने पड़ते ही हाथ जोड़कर बोला- यह सब क्‍या हो रहा है, रवीश?.. इंस्‍ट्रूमेंट ही बजाना था, बेनी गुडमेन बजाते, सिडनी को बजाके क्‍यों डरा रहे हैं? सुख के दिनों में भी इसे सुनने में तकलीफ होती थी.. प्‍लीज़, बंद करवाइये, मालिक!

रघुराज ने हाथ बढ़ाकर सिगार बॉक्‍स सामने किया. रवीश ने एक उठाकर नाक के नीचे से गुजारा, दांत से कतरा और होंठों में लिया. बोले- आपको लगता है आपकी शान में बजा रहे हैं, तो ये गलतफहमी मन से निकाल दीजिये! आपकी शान के पीछे यहां किसी के पास टाईम खराब करने को नहीं है.. हां, आप तब से सबका टाईम ज़रूर खराब कर रहे हैं.. और इससे कोई भी खुश नहीं है. सुना ही आपने लड़की क्‍या कह रही थी.. सबका जीवन नर्क बना दिये हैं!

मैं आपा खो रहा था- प्‍लीज़, यार, पहले ये बंद करवाइये! रफी का ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए ओ जाने तमन्‍ना कहां जा रहे हो’ चलवा दीजिये!

- क्‍यूं बंद करें? कौन हो आप?.. लाट साहब हो हुक्‍म दोगे और हम मानते रहेंगे? थोड़ी इज्‍जत दी तो सिर पे चढ़के पेशाब कर रहे हो! अच्‍छा तमाशा है, यार!- मैंने नज़र ऊपर की तो देखा अविनाश था, गुस्‍से और नफ़रत में भरा सीढ़ि‍यां उतरता. साठ के दशक में गांव का विलेन ज़मींदार प्राण जैसे अपने हंटर गेटअप में हाथ में हंटर लिये हवेली की सीढ़ि‍यां उतरा करता था.

एक बीस साल की मोरक्‍कन लड़की भागी हुई आई और रवीश के कान में मुंह लगाकर फुसफुसाई- सर, मैं एक कैबरे करुं? इस तरह के मोमेंट के लिए मेरे पास एक अच्‍छा आइटम है!

रवीश ने सिगार को होंठों में एक से दूसरी ओर घुमाते हुए लड़की को इशारा किया कि नहीं, आज वह छुट्टी करे. और उसी कंटिन्‍युटी में दूसरा इशारा अविनाश को किया कि ज्‍यादा प्राण बनने की ज़रूरत नहीं. हंटर के कॉस्‍ट्यूम वाला विलेन अब आउटडेटेड है. बच्‍चे उसका वीडियो गेम भी नहीं खेलते. फिर सिगार होंठों के बीच में लाकर स्थिर करते हुए मुझे इशारा करने लगे कि एक समय के बाद हर संबंध का अंत होता है, और ज़रूरी नहीं हमेशा वह अच्‍छा ही हो.

प्रकट में मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले- आपने कितना हमारा समय, हमारी ऊर्जा खराब की है, कुछ अंदाज़ है आपको? सार्वजनिक जीवन में हमारी छवि बिगाड़कर रख दी है! पब्लिक रिलेशन में जाते हैं तो पता चलता है हमसे पहले हमारी छवि पहुंची हुई है- खराब. बैडली पेंटेड! और आप यहां, स्‍साला, एक म्‍यूजिक को लेकर दुखी हो रहे हैं?..

पीछे से किसी ने मेरी कमर पर एक जोरदार लात लगाई. संगमरमर की एक सजावट पर मुंह के बल गिरते-गिरते बचा. सभा में हंसी की लहर दौड़ गई. राक्षसी अट्टहास भरते हुए अविनाश ने रघुराज को धन्‍यवाद ज्ञापन दिया- सही है, सर! एक और लगाते!.. प्रत्‍यक्षा तक मुंह पर रुमाल दाबे हंस रही थी! प्रियंकर ने मुंह किताब के अंदर छिपा लिया, मानो बुद्धिजीवी का यही उचित फर्ज़ बनता हो कि अत्‍याचार का साक्षी होने की बजाय किताब में मुंह छिपा ले. हाथ में पर्पल रेन की गिलास थामे अनामदास उद्वि‍ग्‍न पहले डिविज़न की बालकनी पर टहल रहे थे, कि यह बेमतलब का प्रहसन खत्‍म हो तो वह कोई काम की बात करें.

रवीश धीमी चाल चलकर मेरे नज़दीक आए. हाथ बढ़ाया. मुझे लगा छोड़ेंगे मगर वह सहारा दे रहे थे. लेकर मैं उठ गया तो वह फिर चालू हो गए- मैं हमेशा आपको अपना समझता रहा और आप..? बट व्‍हाई? कुत्‍ता काटे अनजान के अउरी बनिया काटे पहचान के? मगर आप तो अपने को बाबू साहब लगाते थे फिर ये बनियागिरी क्‍यों करने लगे? एक गलत शब्‍द आपके मुंह से छूटा और लोग यहां आपकी बोटी-बोटी करके खा जाएंगे! मेरी वजह से चुप हैं. रक्षा कवच बना हुआ हूं! अविनाश इज़ गोइंग बर्सर्क. ही वांटेड टू हैंग यू!.. क्‍यों? आप एकदम चुप्‍प लगा गए? डिफेंस ही नहीं कर रहे!

मैंने कहा- रवीश, आप क्‍या कह रहे हैं मेरे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा! मेरे जीवन में बहुत झमेले हैं, साहब.. बिजली का बिल, घर का मेनटेनेंस बकाया पड़ा है.. किताब खरीदने को पैसे नहीं रहते.. प्रेम संबंधी दुख हैं सो अलग.. बाबू साहबी का कोई गुमान नहीं.. आपको लगता है तो ठीक है.. बनिया हूं, बांगड़ हूं, बुड़बक हूं जो बनाना है, बनाइये.. बस एक विनती है हमारा ब्‍लॉग हमारे हाथ में धरिये, हम घर जायें, बात खतम!

मसिजीवी नया कोट पहनकर टहल रहे थे, बार-बार एम्‍फासाइज़ करके शशि सिंह को करेक्‍ट कर रहे थे कि उनको लेक्‍चरर नहीं, प्रोफ़ेसर ही बुलाया जाए. नीरिजा की तरह जबरजस्‍ती उनके पद की टेक्निकैलटी समझने की ज़ि‍द न करें, उनकी ही तरह उनसे अभिभूत रहें. रवीश ने हाथ के इशारे से उन्‍हें चुप कराया और आर्मी के मेजर कर्नल की तरह आवाज़ ऊंची करके चायनीज़ में बोले- भई, आपलोग बताइये क्‍या करें इस अज़दक का? दे के छुट्टी करें? दिस मैन थिंक्‍स इट टू बी प्रिटी सिंपल!..

अबकी मुंह अनामदास ने खोला- इनकी भाषा पर गौर किया है आपने? शब्‍द-प्रयोग देखा है? फ्रतेल्‍लो रवीश, जिम्‍मेदार पद पर रहकर आप ऐसी गैर-जिम्‍मेदार बात कैसे कर सकते हैं! शब्‍दों का अशुद्ध प्रयोग दोष ही नहीं, आत्मिक पतन का भी कारण होता है (अच्‍छी हिंदी, रामचंद्र वर्म्‍मा, साहित्‍य रत्‍न-माला कार्यालय, वाराणसी). आप चाहते हैं ब्‍लॉग वापस करके हम प्रमोद जी के आत्मिक पतन का सहभागी होते रहें? क्षमा करें किंतु मैं स्‍वयं ऐसे पाप का हिस्‍सा होना नहीं चाहता!

(जारी...)

4 comments:

  1. मारक क्षमता ३००० किलोमीटर..

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  2. नहीं और भी ज़्यादा.. लंदन तक मार करेगा..

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  3. बहुत मन है टिपियाने पर क्या करे नही तिपिया सकते कही लोग अन्यथा ले गये तो

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  4. बिबाद का तो नही मालूम पर गजब लिखे हो ।
    हमारा तो सामग्री नही इश्टाएल देख रहे है लिखे का बाबू ।:)

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