Saturday, May 26, 2007

शूटआउट एट लोखंडवाला

लोहा नहीं मिलता लोखंडवाला में. सभ्‍यता के कादो में फंसा छूटा रहा गया हो कोई इमारती बेड़ा जैसे. पानी, बताशे, रंगीन झंडियां, सस्‍ती चूड़ी और गुड़ की भेली नहीं मिलते. कॉफ़ी, करिश्‍मा, कूल और महंगी गाड़ि‍यों की कतारें मिलती हैं. प्रेमियों के आंसू और टूटते सपनों की क़ागज़ी फूल-पत्तियां मिलती हैं.

कपड़ों के लाल पीले नीले हृदयहीन सजावटी बंजर में खोजती है एक लड़की अपना खोया वर्त्‍तमान. एक मुर्गी अपने समूचेपने में फड़फड़ाती है गरदन मरोड़े जाने के पहले आख़ि‍री बार चीखकर बताती है कि वह अपने मारे जाने का विरोध कर रही है. दो बिल्‍डर गुफ़्तगू करते हैं कि दुनिया से भरोसा उठ गया है. काला चश्‍मा लगाये एक बुढ़ि‍या खरीदती है आइसक्रीम. दिन पिघलता है क़ागज़ों में कोन में बारिस्‍ता के नशीले आलस्‍य में एक लड़की खिलखिलाकर हंसती है. एक हत्‍यारा हंसकर फ़ोन पर बताता है उसने पढ़ी किताब. झींकता है करोड़पति पुलिसवाला कि इस शहर में ज़ि‍न्‍दा रहना कितना मुश्किल हो गया है. एक चालू कवि और असफल कलाकार खोजता है सस्‍ती चाय की दुकान. स्‍कूल से लौटते दो बच्‍चे रहस्‍य भेदते हैं आपस में परतें खोलते हैं आग, इच्‍छा और प्रियंका चोपड़ा के देह की.

फट गया है माथा या गोली से घायल है आवारा है आतंकवादी है जाने कौन है, आंख खुलते बुदबुदाता है आदमी- ओ मां की आंख, एक सिगरेट पिलाना, बे!

3 comments:

  1. tippani via laal saheb "एक सिगरेट पिलाना बे!"
    waah kya khoob likha hai ... badhayi !!

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  2. Hmmm.ek dum movie style mein likha hai..kaafee kuchh kah gaye sabki maansiktaaaon ke baare mien..har umar aur har warg ki..

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  3. सांकेतिक शब्दों मे अपनी बात बखूबी कही है। पढ कर अच्छा लगा।आज यही सब देखने को मिल रहा है।

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