Monday, May 28, 2007

गांव: एक संस्मरण

अम्मा के चेहरे से लगता बाबूजी उनको गांव नहीं काला पानी भेज रहे हैं. जबकि बाबूजी घूम-घूमकर सबके बीच इस तरह इत्तिला करते मानो गांव भेजकर फैमिली में इनाम बांट रहे हों. बाबू रिपुदमन सिंह जी से कहते, 'अरे, महीना-डेढ़ हुंवा ज़रा सपर के रहेगा सब, एहंवा शहर में कौनो जिन्नगी है, जी?' बाबू रिपुदमन सिंह आंख बचाकर पंजे पर तड़-तड़ खैनी ठोंकते और बाबूजी की हर बात स्वीकारते हुए मुंडी डोलाते. दो दिन तक अपने सारे तर्कवाणों के इस्तेमाल के बाद अन्तत: अम्मा मुरझाये मन से अपना पक्ष हार जातीं और तय हो जाता कि बाईस तारीख को हम गांव जा रहे हैं. दीदी तक से बिना कुछ बताये अम्मा चुपचाप अपनी क्‍लोज़ेस्‍ट सहेली रिनू की मां से मिलने चली जातीं और लौटकर इस तरह गुमसुम सिर झुकाये पड़ी रहतीं मानों उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी गई हो. ऐसे क्षणों में दीदी भी अम्मा का मुंह लगने की कोशिश नहीं करती. घंटा आध निकल जाता तो मां के घुटने के पास आकर ख़ामोशी से बैठ जातीं मानो अम्मा के सिर पर दु:ख का जो पहाड़ गिरा है दीदी ज़ाहिर कर रही हों, वह उसमें अम्मा के साथ बराबर की साझीदार हैं. अम्मा चेहरे पर आंचल खींचकर चोट खाई आवाज़ में फट पड़तीं कि इस आदमी से व्याह कर नाना ने उनको नरक भेज दिया. दीदी धीमे से बुदबुदातीं कि बाबूजी से बहस करके कभी कुछ हासिल हुआ है? अम्मा आंचल हटाकर रोने लगतीं कि हमेशा अपनी मन की करते हैं, इनको ज़रा भी अपने परिवार की चिंता नहीं है. दीदी कहती कि केवल दो हफ़्ते की बात है और इस बार पिछले साल जितनी गर्मी भी नहीं है. घर के सारे कामों को आधे में छोड़ दीदी-अम्‍मा का गोलमेज़ कांफरेंस तबतक ज़ारी रहता जबतक रो-गाकर अम्‍मा आख़ि‍रकार‍ गांव जाने का मन नहीं बना लेतीं.

अम्मा के मनते ही दीदी सबसे पहले मनोज को रोमा स्टोर भेजकर हिमालय पावडर का चार सौ ग्राम वाला डिब्बा और कियो कारपिन की नई शीशी मंगवा लेती. मैं शेखर, बापी, खोखोन, राजू, तेजिंदर सबको दु:खी मन से खब़र करता कि यार, तुमलोग `काला सोना` अकेले देख लेना, अपन फैमिली के साथ गांव जा रहे हैं.

गांव जाने की बात भैया ऐसे सुनते जैसे किसी और परिवार के गांव जाने की बात सुन रहे हों और उनके चेहरे पर गांव जानेवाले मुसाफ़िर की रेल के धकमपेल वाली कोई भी संभावित तस्वीर नहीं बनती. लाल टीन वाली पेटी और अम्मा के अगड़म-बगड़म बक्से की सारी तैयारी देखते हुए भैया इतमिनान से बोलते कि सब गांव चले जाएंगे तो यहां घर कौन देखेगा? घर अगोरने के लिए किसी का यहां रहना रहना ज़रूरी है कि नहीं?..

दरअसल भैया को गांव जाने में कोई तुक ही नहीं लगता. गांव में उनका इस्त्री किये हुए कपड़ों में घर से बाहर निकलना गांववालों से ज्यादा खुद भैया को बेमतलब और हास्यास्पद लगता. फिर गांव में ऐसा कोई बाज़ार भी नहीं था जहां भैया अदा से गुजर सकें और आसपास गुजरती लड़कियां उनकी अदाओं पर रीझकर आपस में बेचैन होकर फुसफुसाने लगें. दरअसल गांव में सिर्फ़ बच्चे थे. खैनी और हुक्का गुड़गुड़ाते बूढ़े, मेहनत करती औरतें, गप्प लड़ाते और ईख व कचरी चुराते स्कूल के मोर्चे पर पूरी तरह फेलियर हो चुके लौंडे थे; धूल उड़ाती सड़क, कांसे के बरतन और खरबूजे का मोलभाव करते बाबा थे- लड़कियां नहीं थीं. कुएं का वह पानी था जिसके करियाये, चिपटे बाल्टी में बाहर निकलते ही मुन्नी घबराकर एक कदम पीछे हट जाती कि हम अंदर बेंग फांदते देखे थे, हम ये वाला पानी नहीं पियेंगे! मनोज हाथ में पेड़ की कोई टहनी लिए कुएं के मुहाने की ईंटोंवाली फिसलन पर बेबात इसपे और उसपे हंसता रहता जबतक कि अचानक गीली मिट्टी से कोई बिच्छू न निकल जाए. बिच्छू दिखते ही मनोज मियां की सारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती और फिर वह शरीफ बच्चे की तरह जाकर बाबा के पैताने खटिया के ओरचन पर बैठ जाते. कुएं पर पानी भरने आई औरतें आपस में बात करतीं कि फलाने के घर के बच्चे हैं, शहर से आए हैं और इनके बड़ मज़ा है.

मनोज और मुन्नी को सचमुच बड़ा मज़ा रहता. ईया बाबा से छिपाकर मनोज को झोले में और मुन्नी को फ्रॉक के आंचल में अनाज भर-भर कर ठेलकर उन्हें पीछे वाले दरवाज़े से रमेसर के दुकान भेज देती. रमेसर की दुकान से अनाज के एवज़ में लकठो, सूखे हुए लड्डू और इमली की मिठाई, घटिया लेमनचूस पाकर मनोज और मुन्नी ऐसे उड़ते रहते मानो चिरकुट मिठाई नहीं पाए हों, खज़ाना जीत लिया हो. ईया रात में मुन्नी को अपने बगल लिटाकर फुसफुसाकर कहतीं कल बाबा जब खरहाटार बैदजी के यहां जाएंगे तू अनाज के लिए हमसे याद दिलाना! मुन्नी मुंह पर उंगली रखे हिसाब करती कि कितने अनाज से वह कितने लेमनचूस पाएगी. जबकि मनोज कितना भी अनाज पाये हो ज़मीन पर पैर फेंकता ज़िद किये रहता कि ईया, इतने अनाज में रमेसर कुछ नहीं देगा!

सकल नरायन चाचा का नौकर और सुनरकी फुआ की पतोहु का भाई झोला भर-भर आम छोड़ जाते. इतना आम चला आता कि मुन्नी परेशान होने लगती कि इतने आम को बाल्टी में बुड़ोयेंगे कैसे. मुन्नी के भोलेपन से ईया ही नहीं बाबा को भी हंसी छूट जाती और फिर मुन्नी को समझाया जाता कि हिंयां राक्षस थोड़ी बैठा है कि एक्के हाली सारा आम खा जाएगा, जितना बाल्टी में आएगा उतना भिगा दे, जा! इतने सारे आमों के बीच बाबूजी की ज़रूरत की संगत में बाबूजी से कहीं ज्यादा मुन्नी प्रसन्न रहती. बाबूजी जबतक मन भर खाकर हाथ खड़े नहीं कर देते मुन्नी उनके माथे चढ़ी रहती थी कि वह इशारा करें और वह भागकर कांसे की थाली में चार आम और ले आए! गांव में चाकू से काटने की बजाय पैर के नीचे पाया दबाकर हंसुए से आम के फांके कटते. मुन्नी हाथ से ऐसे दूरी बनाकर हंसुआ लाकर दीदी को देती मानो पाया पकड़ने से भी उसे लोहे से कट जाने का डर हो! जबकि दीदी को डर नहीं होता, वह हंसुए से कटहल, भतुआ, लौकी ऐसे काटती मानो सारा जीवन हंसुए से ही तरकारी काटती रही हो.

लकड़ीवाले चूल्हे से जूझते हुए हालांकि दीदी बीच-बीच में हार जाती और भुनभुनाकर शिकायत करती कि पता नहीं लोग इसमें खाना कैसे बनाते हैं... हमसे ये सब नहीं होगा, हां! और फिर थोड़ी देर में अम्मा के रसोई में घुसते ही दीदी हल्ला करने लगतीं कि अम्मा आखिऱ साबित क्या करना चाहती हैं. और फिर इतना अच्छा खाना बनता कि ईया भी गांव की औरतों के बीच दीदी की तारीफ़ किये बिना नहीं रह पातीं कि एकदम्मे सुघड़ छौंड़ी है और जौन घरे जाएगी सकल सकारथ कर देगी. जबकि अम्मा के बारे में सकल सकारथ करने की बात ईया कभी नहीं करतीं. हां, औरतों के बीच अम्मा कभी शहर के दुखों की चर्चा छेड़ दें तो ईया टोके बिना नहीं रह पातीं कि बड़ पुरनियन के बीच ज्यादा बड़र-बड़र करे के दरकार नहीं है. अम्मा एकदम्मे चुप लगाकर उठ जातीं और उस दिन रात में कभी कोई उनके मुंह से दबी आवाज़ में ज़रूर सुनता कि पांच बच्चा पैदा करके इस घर को दे दिया तब्बो बुढ़िया को सन्तोख नहीं है!

दीदी को जैसे ही दो घड़ी की फुरसत मिलती, पड़ोस के ओझाजी की बेटी सुनीता और जेवनचा की लड़की फुलमति उसे घेर लेतीं और फुसफुस करके पता नहीं क्या-क्या सवाल करके दीदी को हलकान किये रहतीं. फिर दीदी रमेसर की दुकान से एक सस्ता कापी मंगवाकर फुलमति से गवा-गवा कर वो सारे गाने नोट करतीं जो अलग-अलग मौकों पर गांव-बिरादरी की औरतें समूह में गातीं और जो गाने लाख चाहने के बावजूद दीदी के मुंह पर कभी स्वाभावित तरीके से चढ़ नहीं पाते. और उन्हें आजतक ठीक से सीख नहीं पाने की खीझ में बेमतलब दीदी का पारा चढ़ता रहता.

दोपहर के खाने के बाद नीम के पेड़ के नीचे खुली हवा में बाबा और बाबूजी के साथ बैठते ही मुक़दमे और पेशी की बात छिड़ जाती. ये ऐसी पेशियां और ऐसे मुकदमे होते जो आजीवन काल से चले आ रहे होते और आजीवन काल तक चलते जाने वाले थे. इनका रहस्य बाबा और बाबूजी के सिवा और किसी के पल्ले थोड़ा-सा भी नहीं पड़ता. भैया तक ने उन्हें समझने से हार मानकर माथा पीट लिया था.

दोपहर के सन्नाटे में जब दीदी से ढील दिखवाने के बाद अम्मा झपकी ले रही होती और ईया मनोज और मुन्नी को अपने मां के ज़माने का दस रुपये का दस इंची वाला बड़ा नोट दिखाकर लगभग पागल बना रही होतीं, मैं सबसे नज़र बचाकर ईया की लकड़ीवाली बड़ी पेटी खोलकर सारा अगड़म-बगड़म उलट पुलट करता चकित होता रहता. संदूक में पता नहीं किस ज़माने की एक गोटेवाली चुनरी थी, एक नक्काशीदार सरौता था. तकिये के बसाते खोल और एक जूते की जोड़ी थी जिसके पहने जा सकने की कल्पना किसी के भी लिए अकल्पनीय होती. फिर कुछ बहुत ही पुराने टाइप प्रेस वाले अक्षरों में छपे जासूसी उपन्यास और चाचा के स्कूल की किताबें थीं. अंकगणित व नगर-विज्ञान की किताबों को इधर-उधर खंगालने पर उनके बीच स्कूल से भागकर सिनेमा गए चाचा की दुष्‍टताओं की कहानी खोलता सिनेमा के टिकट का आधा टुकड़ा ज़रूर मिल जाता.

बीच रात मसहरी हटाकर मैं पेशाब करने के लिए उठता और खटिये से बाहर के खुलेपन की निबिड़ वीरान सन्नाटे में चौंककर खड़ा एकटक चारों ओर तकने लगता. लगता सारी आवाज़ें बंद हो गई हों और सिर्फ बहती हवा की आवाज़ सुन पड़ रही हो. इतनी प्रचुरता में सब कहीं सब तरफ हवा होती कि लगता चाहें तो उसे छू, सूंघ सकते हैं. आसमान का नीला रंग और तारों की झर्र-झर्र रोशनी सब कहीं सब तरफ गिरती होती. कभी भावुकता की मदहोशी में इच्छा होती भागकर सबकुछ अपने हाथों में भर लें! और तभी चार हाथ की दूरी पर बाबा की खटिया से बरर्र-ठां पाद की आवाज़ गूंजती और सारा जादू तहस-नहस हो जाता...

7 comments:

  1. संस्मरण पढ़ के बहुत अच्छा लगा. आपबीती को बातबीती बनाना सबके बस की बात नहीं. स्थानीय बोली और मुज़लो के प्रयोग से वर्णन ज्यादा प्रभावी लग रहा है

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  2. गजब. बाबा ने जादू तोड़कर अच्छा नहीं किया.

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  3. बहुत अच्छा लिखा है आपने, बस ऐसा लगा कि आपके साथ हम भी गांव का चक्कर लगा आये हैं ।

    ऐसा ही लिखता रहें,

    साभार,
    नीरज

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  4. बहुत सुन्दर लिखा है प्रमोद भाई.. आखिरी पैरा में सचमुच जादू है..

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  5. अद्भुत ! गजब !
    बस , 'बरर्र ठा' से स्पष्ट न हुआ कि फाड़ा जा रहा थान कितने अर्ज का था ।

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  6. खांटी गंवठी मे जो आप लिखते हैं गज़ब का समां बांध देते हैं,साथी, हमारे आस-पास जो भी लोग है उनका गांव से दूर दूर का सम्बन्ध नही है..पर एक मज़ेदार बात है यहां मुम्बई मे दूसरे शहर जाने को बाहरगांव जाना कहते है.आपके संस्मरण से ये जान पाना मुश्किल है कि कहानी है या यर्थाथ. ऐसा ही लिखते रहे..

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  7. गांव का चित्र्ण .. आपकी भाषा तो लाजवाब है ही.. पर उस से भी अच्छा है..शहर से गां व जाने की कशम्कश में उलझी अम्मां,., बड़ी होती दीदी,,, मां के दर्द को समझने की कोशीश करती बेटी.. ईया का पोते-पोतियों से दुलार.. बचपन का जिग्यासु मन.. बाप-बेटे के बीच के अन्सुलझे मसले.. सास बहू का अन्सुलझा अन्समझा रिश्ता.. गांव की शहरी जीवन के प्रति जिग्यासा.. आकर्षण.. कोई पक्ष नहीं भूले आप..

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