Tuesday, May 22, 2007

भैया की लड़कियां: एक संस्‍मरण

भैया के जलवे थे. हमलोगों के जीवन में एक छोर से दूसरे तक दलिद्दर का साम्राज्य था जबकि भैया का जीवन और दिल भरा-भरा रहता. एक भरपूर नज़र के मोह में हम भरी दोपहर साइकिलों पर आवारा भटकते खून जलाते जबकि भैया की घनेरी, शीतल छांहों में ऐश चल रही थी. हम दो जून की सूखी रोटी को तरस रहे थे और भैया छप्पन भोग की थाली वाली महफ़िल में बैठे थे. यकीन करना मुश्किल होता मगर सच्चाई यही थी कि भैया को लड़कियों की कमी नहीं थी.

चार नंबर या पंद्रह नंबर सेक्टर में हमारा झीरपानी सीनियर्स के अगेंस्ट सेमीफाईनल चल रहा होता. रंजन भौमिक के एक ओवर में तड़ातड़ दो विकेट लेने के बाद हमारे बॉलिंग की धुनाई चल रही होती और स्लिप, गली से लेकर थर्ड मैन तक समूचे फील्ड में एकदम-से घबराहट की हवा तन जाती. खोखोन मिड ऑन से भागा हुआ मेरी तरफ आकर चीखता, 'नेक्स्ट मैच में बापी को खिलाने की ज़रूरत नहीं. फोकट में तीन बाउंड्री दी, इससे अच्छा तो मेरे से बॉलिंग कराते!'.. और मैदान से बाहर सड़क से गुजरते साइकिल रिक्शे पर निगाह पड़ते ही खोखोन अपनी बात के बीच में अटक जाता... और फिर अचानक हड़बड़ाहट में छूटा खबर करता कि, 'देख, देख, तेरे भैया की हिरोइन जा रही है!' हड़बड़ में तेजी से भागकर मैं एक झलक ले पाता, फिर अगले कुछ पलों मैच-सैच सब भूलकर एकदम सन्न खड़ा रहता- यह भी?... कितनी लड़कियों का जीवन नष्‍ट किया है भैया ने?...

मुझसे एक क्लास सीनियर राजू जिस तरह अंजलि के पीछे दीवाना बना घूमता होता और अंजलि के पापा के रिटायरमेंट के बाद उनके महाराष्‍ट्र लौटने की बात आते ही गुमसुम हो जाता या दर्द में नहायी फुसफुसाहट में बात करता- भैया के साथ ऐसी तक़लीफ़ या चिंता नहीं थी. भैया चकाचक-मस्त रहते. क्योंकि उनकी एक नहीं जाने कितनी अंजलि थीं. फूफा की मझलकी लड़की की शादी के समय का क़िस्सा सुनिए. स्थान: बारिडीह, जमशेदपुर, समय: संध्याकाल. बारात अभी आई नहीं है मगर घर से लेकर गली तक में मारामारी और गदर मचा हुआ है. मैं और मेरा ममेरा भाई मोटुल बेहाल हैं कि नीले और हरे कपड़ों वाली किसी लड़की को अपनी चुटीली बात कहके प्रभावित कर लें. मगर अबतक न लड़की प्रभावित हुई है और न हम फुआ की आंख बचाकर भंडार से रसगुल्ला उड़ाके भकोसने का आनंदे पा पाए हैं. तबतक मोटुल मेरी कमीज़ खींचकर पंडाल के एक कोने गदर के एक नए तूफान की तरफ ध्यान आकर्षित कराता है. पहुंचकर देखते हैं हल्की हाथापाई वाली हवा के बीच शांति स्थापना की कोशिश चल रही है. हाथापाई को बेचैन हो रही पाल्टी में मोहल्ले के तीन-चार बड़ी उम्र के लड़के हैं और शांति स्थापना वाले दल के अकेले हीरो हैं आसमानी डॉग कॉलर पॉलिएस्टर शर्ट में अपने भैया जी. झगड़े की वजह ये है कि हाथापाई वाली पाल्टी भैया को आरोपों के कठघरे में खड़ा कर रही है कि वह भले मेहमान और घर के आदमी हों, लेकिन इससे उन्हें ये छूट नहीं मिल जाती कि मोहल्ले की लड़की के ऊपर बुरी नज़र रखें! जबकि भैया अपने सौहार्दपूर्ण पक्ष से समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन लोगों ने गलत समझा है, संगीता (मैं और मोटुल शाम से जिसे ज़ीनत अमान कह-कहके सिसकारी भर रहे थे) उन्हीं की नहीं, उनकी (भैया की) भी बहन जैसी है. और इलाहाबाद पॉलिटेकनीक के स्टूडेंट और भैया से उम्र में चार साल बड़े छोटके मामा की दखलंदाजी के बाद जब पाल्टियों के बीच हाथ मिलवाकर अंतत: शांति स्थापित हो जाती, उसके आधे घंटे भर बाद ही हम ज़ीनत अमान को भैया के मज़ाक पर मुंह पर हाथ धरे खिल-खिलकर हंसता और लजानेवाली अदा फेंकते देखते और बेतरह ताजुब्ब करते-करते बदहवाश बने रहते कि आखिर भैया के पास वह कौन-सी जादू की छड़ी है कि लड़कियां उनके पीछे लट्टू हो जाती हैं. जबकि हम इतनी कोशिशों के बावजूद हमेशा लड्डूलाल ही बने रहते हैं!

शादी की बारात हो, दुर्गापूजा का मेला हो, अस्पताल, स्कूल, सिनेमा हर कहीं भैया की लड़कियां फैली हुई थीं. बंगाली, बिहारी, सिंधी, मलयाली यहां तक कि एक आदिवासी लड़की तक से भैया का टांका भिड़ा हुआ था. एक क़िस्से का अभी अंत होता नहीं कि दूसरी गति पकड़ लेती. कभी-कभी तो भैया के रुपहले पर्दे पर दो नहीं तीन-तीन शो एक साथ चलते होते! और राजू या हमारी तरह कभी भी उनका मुंह लटका नहीं दिखता. चीप टाइप मार्केट के मॉडर्न टेलर के यहां से नई शर्ट-पैंट बनवाकर घर लौटते तो झट उनकी शोभा देखने के लिए पूरा परिवार उनके गिर्द घेरा बांधकर खड़ा हो जाता. दीदी भी कहे बिना रह नहीं पाती कि अच्छा है. मुन्नी तो ऐसे मचलने लगती मानो भैया का नया कपड़ा नहीं देख रही हो, राखी के दिन दीदी के हाथ में आया दस रुपये का नोट पा गई हो! जबकि मेरे और मनोज के नये कपड़े सिलने पर कभी घर में इस तरह का उत्सव नहीं होता. अम्मां बड़ी सुखाने में बझी होती और दीदी अपनी सहेली सपना मुखर्जी के घर चली गई होतीं. मुन्नी दरवाज़े से एक झांकी लेकर बोलती अच्छा नहीं है और इसके पहले कि मनोज उसे कूदकर पकड़ ले और कूटना शुरू करे, भाग जाती. हम तिरछा लगे आईने के अटपटेपन में थोड़ी देर तक अपने में जाने क्या-क्या अस्वाभाविक, असंभव देख लेने की कोशिश करते रहते, फिर हारकर पुराने कपड़ों में लौटकर नॉर्मल हो जाते. मैं तो समझदार होकर घर की बेरूखी का अभ्यस्त हो चला था, मगर मनोज बीच-बीच में घबरा जाता कि शायद कपड़े सचमुच अच्छे नहीं सिले, और बवाल करके घर इतना सिर पे उठा लेता कि अम्मां भी आज़िज आके कह देतीं कि जाने दे, बाबू, अगली दफा अच्छा सिलवा लेना!

भैया के सारे गुप्त भेद (जिसे वह दुनिया को पढ़वाना चाहते) एक पुरानी लार्सन एंड टूब्रो की डायरी में बंद थे, जिसके पहले पृष्‍ठ पर भैया के नाम के इनिशियल्स के बाद बड़े-बड़े अक्षरों में भैया का उपनाम- 'आवारा' दर्ज़ था. दीदी के प्रोत्साहन पर मैं बीच-बीच में भैया का डायरी चुराके ले आता और उसमें 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'सारिका', 'धर्मयुग' और जाने कहां-कहां से उड़ाकर टांकी शेरों को पढ़ते हुए मैं और दीदी ताजुब्ब करते कि ऐसी बेहया और गंदी चीज़ों से डायरी भर कर भैया आखिर साबित क्या करना चाहते थे! दीदी मुंह बनाकर कुछ और भी बोलना चाहतीं, फिर मेरी हैरानी ताड़कर एकदम-से चुपा जातीं, डायरी फेंककर कहतीं, 'इसको हटा यहां से!'

दीदी के गुस्से का भेद मैं कभी समझ नहीं सका. प्रेम और कामना के बारे में अगर दीदी के कोई विचार थे तो उसे हमतक ज़ाहिर करने के लिए दीदी ने अपनी कोई डायरी बनाकर नहीं रखी थी. दीदी का जो भी था वह लाल रंग की एक रेक्सीन की पेटी में था. सिलाई-कढ़ाई की चीज़ों से अलग बोरोसिल, बोरोप्लस के ट्यूब्स थे, 'मनोरमा' के दो कढ़ाई विशेषांक थे, डायरी कोई नहीं थी. हालांकि गांव में खाना बनाते ईया (दादी) की साड़ी में जब भक्क से आग लग गई और अफरातफरी में उन्हें गांव से लाकर बड़े अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट में रखा गया तब दीदी का जिम्मा बना था सारे दिन अस्पताल में उनकी देख-रेख का. एक दिन स्टैंड में साइकिल पर ताला चढ़ाकर मैं वॉर्ड में पहुंचा तो देखता हूं ऊपर से नीचे तक सफ़ेद बैंडेज में लिपटी ईया बेड पर अकेले पड़ी हैं, मगर दीदी का आसपास कहीं पता नहीं. थोड़ी देर में दीदी लौटीं तो हाथ में मुमताज के कवर वाला 'फ़िल्मफ़ेयर' था और मुझसे बात करने की बजाय देर तक वही उलटती-पुलटती रहीं. यह बात दो दिन बाद खुली कि तीन कमरे पार सांस की बीमारी से ग्रस्त रीज़नल इंजीनियरिंग कॉलेज का एक स्टूडेंट एडमिटेड है, और दीदी बीच-बीच में उसकी खोज-खबर लेने जाती है. एक बार हंसते हुए दीदी ने मुझे यह भी बताया कि बहुत ही अच्छा और शरीफ़ लड़का है, फिर थोड़ी देर बाद सोचकर बोलीं भैया या अम्मां से मुझको ये सब बकने की ज़रूरत नहीं है.

लगभग महीने भर की कोशिश के बावजूद ईया को बचाया नहीं जा सका. जबकि इंजीनियरिंग कॉलेज का स्टूडेंट सही-सलामत ही नहीं रहा, ठीक होकर अपने कॉलेज भी लौट गया. और उसके साथ-साथ 'फ़िल्मफ़ेयर' की वो सारी कापियां भी जो दीदी ने पढ़ने के लिए उससे मांग रखीं थीं, और जिसे भैया और अम्मां सबसे छिपाकर वह अकेले में पढ़ते हुए पता नहीं किस आनंद में भरी-भरी रहतीं..

10 comments:

  1. भैया "कन्हैया" जी को हमारा भी प्रणाम!

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  2. सुंदर. हमारी छवि भी आपके भैया जैसी रही है लेकिन उसका यथार्थ क्या है, जल्द ही किसी पोस्ट में लिखूँगा. उसके बाद शायद आप अपने भैया से नहीं जलेंगे.

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  3. दीदी ने अपनी कोई डायरी बनाकर नहीं रखी थी. दीदी का जो भी था वह लाल रंग की एक रेक्सीन की पेटी में था. सिलाई-कढ़ाई की चीज़ों से अलग बोरोसिल, बोरोप्लस के ट्यूब्स थे, 'मनोरमा' के दो कढ़ाई विशेषांक थे, डायरी कोई नहीं थी.
    पारिवारिक चित्रण बहुत ही उम्दा है.एक "भैया" को मै भी जानता हू, जो ऐसे शादी ब्याह के मौके पर एक कोना पक्ड लेते थे, और लगते थे किसी कन्या का हाथ देखने, और इस बीच हाथ देख्ते वख्त उनके चेहरे कि भन्गिमा अजीब किस्म से बदलती रह्ती.....और थोडी देर हम देखते कि कन्या उनसे कही कोने मे ले जाक्र्र कन्धे पर मुक्का मार कर पूछ रही है कि बताइये ना आपने क्या देखा? कुछ भी छुपाइये नही, और फ़िर भैया जैसे कुछ राज़ की बात दबाए..बाद मे बतन्गा वाले अन्दाज़ मे भई खडे रह्ते थे .. और भैया तो दर्द भरे मुकेश के नग्मे गा कर ही रिझा लेने को तय्यार रह्ते थे. बदिया कहानी के लिये बधाई...

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  4. bahut jabardast bhaiyaa hain!bahut achchha likha hai.
    ghughuti basuti

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  5. बहुत बढ़िया शब्द चित्र खींचा है आपने, बधाई!

    आवारा तो मैं भी कहलाता हूं पर अपने पीछे ऐसी लाईन नहीं। हे हे

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  6. भैया से प्रेरित हो कर आपने क्या क्या गुल खिलाये.. वो बताइये.. फ़ालतू में भैया को बदनाम कर रहे हैं..चेलों को अक्सर चीनी होते पाया जाता है..

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  7. बिल्‍कुल सही, मैं अभय से पूरी तरह सहमत हूं। ईमानदारी से अपने किस्‍से सुनाइए, भईया को न घसीटिए बीच में।
    म. कुमारी

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  8. बहुत बढ़िया शब्द चित्र खींचा है।बधाई।

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  9. सचमुच बहुत रोचक लिखा है.. भैया का प्रसंग जितना रोचक और सत्य है.. और साथ में आप्लोगों के भैया बनने की कोशिश भी..
    पर इन सबसे बढ्कर दिल को छूती है दीदी की कहानी.. उनकी मनःस्थिति का चित्रण..मनोरमा के अंक.. दादी की सेवा.. और college का वो बीमार लड़का...शायद यही सच है हर हिंदुस्तानी दीदी का..

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  10. मान्‍या, देखो, दीदी वाली बात तुमने उठाई.. बाकी किसी का ध्‍यान भी नहीं गया.. सब भैया की बहक में बहके रहे!.. सही कहती हो!

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