Friday, May 25, 2007

गरमी: एक संस्‍मरण

तपते चेहरे के साथ मनोज घर में ऐसे दाखिल होता मानो बेहोश होकर गिर पड़ेगा. दांत के बीच जीभ दाबे बाबूजी भी लकड़ी वाला काला छाता बंद करके ऐसे अंदर आते जैसे युद्ध से लौट रहे हों. मुन्नी भागकर सुराही से लोटा भर पानी लेकर लौटती. दीदी मुन्नी को बरजतीं कि अभी पानी मत दे, सर्दी लग जाएगी. बाबूजी पंखे के नीचे हारे हुए निढाल पड़ जाते और सिर झुकाए फुसफुसाते कि थोड़ा बेल वाला शरबत मिल जाता तो शांति हो जाती. अम्मा जूटवाले झोले में तरकारी भरे लौटतीं और पंखे के नीचे बैठने की बजाय नंगे फ़र्श पर चित्त लेट जातीं. मनोज हें-हें करता अम्मा के बगल लेट छेड़खानी करता कि अब बुझाया न, केतना गर्मी है बाहर! अम्मा मनोज की थेथरई का जवाब देने की बजाय फटी आंखों से उसे देखतीं कि उन्हीं के पेट का जना उनसे कैसा निर्मोही मज़ाक कर रहा है, फिर चेहरा घुमाकर पल्लू से खुद को हवा करते बुदबुदातीं कि आग लगे ऐसे घर में जहां थोड़ी सी हवा नहीं है. मुन्नी भागी हुई बेना लाकर इतनी जिम्मेदारी से अम्मा को हवा करने लगती कि इतनी गर्मी के बावजूद भी अम्मा का मन ऐंठ जाता और वह भावुक होकर मुन्नी का गाल चूम लेतीं. यह नज़ारा देखकर बाबूजी से कहे बिना रहा नहीं जाता कि देख लो, महारानीजी का ठाठ! गांव चलके रहना पड़े तब खुलेगी इनकी बुद्धि!

बाबूजी की ऐसी टिप्पणी से अम्मा ही नहीं दीदी का भी मन खराब हो जाता. सब जानते थे गांव के नाम से अम्मा को बुखार चढ़ता है फिर भी गांव की बात कहे बिना बाबूजी का मन नहीं मानता था. दरअसल ऐसी चुस्की लेकर बाबूजी को मज़ा मिलता. वह गांव की बात छेड़कर अम्मा का चेहरा देखते कि देखें कैसा असर पड़ा है. अम्मा भी जानती थी कि बात बोलकर ये चेहरा देखेंगे इसलिए गांव की चर्चा होते ही वह आंचल खींचकर चेहरा ढंक लेतीं. बाबूजी के उकसावे पे मनोज हरमपना करता और चुपके से सरककर अम्मा के चेहरे से तड़ से साड़ी खींच लेता. अम्मा तमककर बोलती एकदम हरामी छोकड़ा हो गया है और मनोज को गाली देकर बाबूजी से अपना बदला चुका लेतीं. बाबूजी बुरा मानने की बजाय मुस्कराते हुए पंजे से नाक का छोर सहलाते-सहलाते अपने कमरे लौट जाते.

अभी सुबह का नाश्ता खतम भी नहीं हुआ होता कि आठ बजे बिजली चली जाती. मनोज कहता अच्छा हुआ, अब हम एक ही बार सीधे दुपहरिया में नहायेंगे! दीदी कहतीं फिर लात खानेवाला काम न करे, चुपचाप चलके नहाये, वो दिन भर कपड़ा-लत्ता के फेर में बैठी नहीं रहनेवाली. मनोज फिर भी तबतक महटियाये रहता जबतक भैया सचमुच उसे एक लात लगाकर नहानघर में ले जाके खड़ा न कर आते. सिर पर दो लोटा पानी गिरा दिये जाने के बावजूद मनोज नहानघर में चुपचाप खड़ा रहता मगर प्रतिवाद में नहाता नहीं. मुन्नी एक नज़र देखकर आती और फुसफुसाकर सबको खब़र करती कि नहाया नहीं है. दीदी कहतीं कि बिना चार लात खाए हरामी का कोई काम थोड़े होता है. मगर प्रतिवाद में पांच मिनट तक गुमसुम खड़े रहने के बाद मनोज थक-हारकर नहा लेता और लजाया-लजाया सबसे छिपता तेजी से भागकर अंदरवाले कमरे में घुस जाता. दीदी मुन्नी का हाथ खींचकर उसे एक ओर कर देतीं कि अब तुम दांत मत दिखाना, हां! मगर मुंह पर हाथ ढके खी-खी किये बिना मुन्नी का जी नहीं मानता.

दिन भर पंखा, कूलर और बाबूजी का भुनभुनाना चलता रहता कि बिजली का बिल लालमोहर सिंह आके नहीं भरेंगे! अम्मा चुप पटाये रहतीं, फिर बाबूजी का बुदबुदाना तब भी बंद नहीं होता तो कहे बिना रह नहीं पातीं कि अजीब आदमी हैं इनसे किसी का सुख नहीं देखा जाता. बाबूजी कहते बिजली आसमान से नहीं गिरती, उसका बिल भरना पड़ता है. अम्मा चिढ़कर कहतीं कि तब क्या करें, आपके बिल के पीछे आगी में झोंक दे अपने को? बाबूजी कहते आदमी को सर्दी गर्मी हर चीज़ का आदत होना चाहिये और चुपके से पंखे का स्विच बंद करके बाहर निकल जाते.

मनोज कूलर से जाके ऐसे सट जाता मानो कूलर के अंदर घुसना चाहता हो. कूलर में पानी भरने की भी सबसे ज्यादा उसीको उतावली रहती. मुन्नी के सिर पे थप्पड़ जमाके बोलता देख नहीं रही है पानी खतम हो रहा है! मुन्नी कहती कि नहीं अभी पानी है तो मनोज चीखकर कहता बहस मत कर, बदमाश, चुपचाप बाल्टी में पानी ला, जा! शायद यही उतावली होगी कि हर दूसरे महीने कूलर खराब हो जाता, फिर भरी दुपहरी में भैया गंजी निकालकर पसीने में तरबतर स्क्रूड्राइवर और सोल्ड्रिंग लिए पप्पू इलेक्ट्रिशियन के साथ कूलर पे भिड़े रहते. मनोज उछलता-कूदता यहां से वहां ऐसे भागता मानो कूलर भैया और पप्पू नहीं उसकी वजह से ठीक होनेवाला हो. गर्मी से ओट लिए अपने कमरे में पंखा झलते बाबूजी रिपुदमन सिंह और चंद्रमा सिंह को भैया की तरफ देखकर इशारा करते कि बड़ा ही लायक लड़का है. कल ही चार किलो केसर लेके आया कि बाबूजी, बहुत गर्मी है, खाइए आम. जबकि सच्चाई यह होती कि भैया नहीं बाबूजी केसर लेकर आए होते और चार नहीं दो किलो जिसे शाम को बाल्टी के पानी में बुड़ो के बाबूजी के सामने सजाकर रख देने का जिम्मा मुन्नी के ऊपर होता. बाल्टी में बुड़े आम को बाबूजी चुपचाप निहारते रहते, फिर धीरे-धीरे सारा आम अकेले चट कर जाते. जब मन भर जाता तो कहते अरे, सब हम अकेले थोड़े खायेंगे? लो, तुम लोग भी चख लो.

आम के मामले में बाबूजी राखी के पैसोंवाली दीदी से भी गए गुजरे थे.

शाम के कुछ घंटों से अलग सुबह दस के बाद सड़कों पर एकदम वीरानी छा जाती. लगता कोई भयानक दुर्घटना हुई है और लोग शहर छोड़कर भाग गए हैं. मैं आग बरसाती गर्म दुपहरी में चुपचाप साइकिल लेकर शेखर के घर निकल जाता. फिर हम उसके गेट के बाहर गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़े बात करते कि हमारी तरफ बहुत गर्मी है जबकि सेक्टर फाइव और सेक्टर टू में इतने छांहदार पेड़ हैं वहां के लोगों की मस्ती है. इधर-उधर की बकवास के बाद थककर हम राजू के घर का रुख करते और रेडियो पाकिस्तान सुनते हुए कैरम खेलकर गर्म दोपहरों का मुंह बंद कर देते. कभी तेजिंदर अचानक उत्साह में भरके बोर्ड की सारी गोटियां गड़बड़ कर देता और चीखकर कहता यार, क्यों हमलोग इस तरह से दिन खराब कर रहे हैं, सेक्टर टू चलते हैं, मज़ा आएगा!

तीन साइकिल पर पांच लोग लदे हम चिलचिलाती धूप में हांफते-कांखते सेक्टर टू पहुंचते और मज़ा एकदम नहीं आता. शेखर, राजू, बापी, मैं सब शिकायत करते कि तेजिंदर पागल है और हमारी इस मुसीबत की सज़ा उसे हम सारे लोगों को एक फ़िल्म दिखाकर उतारनी चाहिए. तेजिंदर एकदम-से साइकिल से उतरकर पागलों की तरह हमलोगों को देखने लगता. फिर हम सेक्टर फाइव में किसी घने पेड़ की छांह में खड़े होकर आइसक्रीम खाते और आइसक्रीम वाले से दिल्लगी करते कि वह सेक्टर फाइव की लड़कियों को ज़रूर आइसक्रीम मुफ़्त में देता होगा. उसके बाद साइकिलों पर घिसटते हुए हम सेक्टर फाइव की सड़कों पर दीवाना बने यहां-वहां भटकते होते. दीपक और कोणार्क सिनेमा की दीवारों पर आनेवाली फ़िल्मों का पोस्टर देखने और उनके अच्छे-बुरे होने का फ़ैसला सुनाने के बाद तेजिंदर के पागलपने से भरे ज़िद पर हम कोर्णाक सिनेमा की पीछे वाली पहाड़ियों पर चढ़ जाते. पहाड़ी की अद्भुत नीरव शांति पर खड़े होकर ऊंचाई से नीचे अपने शहर को देखते रहते.

इतने दूर से अपने शहर को देखना अनोखे, विस्मयकारी अनुभव में बदल जाता. लगता हम पराक्रमी देवदूत हैं जो नीचे झुलसते अपने गांवनुमा शहर को किसी तरह ज़रूर बचा लेंगे.

3 comments:

  1. हैट नहीं माथे पर गीला गमछा, जेब में तपिश सोखने वाला प्याज़, लस्सी नहीं बल्कि दही का शरबत, आम का पना नहीं बल्कि अमझोरा, 42 डिग्री में तेज़ गेंदबाज़ी, धूल उड़ने से रोकने के लिए पानी छिड़कर झाड़ू लगाना, रेत के ऊपर इस उम्मीद में घड़ा रखना कि फ्रिज वाले मामा के घर जैसा पानी मिलेगा, क्या दिन थे जब फ्रिज और एसी के बिना जीना खलता नहीं था. बहुत अच्छा, आप विवाल्डी के फ़ोर सीज़न्स लिखिए, बरसात का कादो केचका भी लिखिए न.

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  2. इस पर क्या बोलें आप बिल्कुल ख़ामोश कर देते हैं. एक सवाल पूछने की धृष्टता फिर कर रहा हूं. ऐसी नॉस्टेल्जिक टिप्पणियां लिखकर आप कैसा महसूस करते हैं? ये मत सोचिए कि इस लेखन से मेरी कोई आपत्ति है.

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