Sunday, May 20, 2007

छूटी हुई किताब.. या मन पर चढ़ती धूल..

युवान गोयतिसोलो (स्‍पेन) के बारे में जानने पर एकदम-से उसे पढ़ लेने की क्‍या हुमस चढ़ी थी. पीटर बुश वाला अनुवाद ‘द मार्क्‍स फैमिली सागा’ बंबई की दुकानों में हाथ नहीं लगी तो रोते-गाते, पैसा बहाते किताब को बाहर से मंगवाया. उसकी महक ली, दस एंगल से देखकर उसे बहकते रहे. सोचा कवर और अच्‍छा हो सकता था. अंदर की छपाई और सुधड़ हो सकती थी. मगर सिटी लाइट्स बुक्‍स, सैन फ्रांसिस्‍को के बूते शायद यही इतनी ही उत्‍पादकता थी. बहरहाल, करीने की जिल्‍द चढ़ाकर निहारते रहने और अब और तब करके बीस पन्‍ने पढ़ने के बाद- छै महीने से ऊपर हो चले, किताब धूल खाकर पुरानी हो रही है.. मगर अभीतक पढ़ी नहीं गई है!

यह नई बीमारी है, अदा है, जाने क्‍या है, मगर जीवन में धीरे-धीरे धंस रही है. उत्‍साह में किताबें बटोर कर लाई जाती हैं, फिर इस और उस कोने छूटी रहती हैं. सही समय की आस तकती कि उनकी साज-संभाल भर नहीं होगी, अच्‍छे फल की तरह उन्‍हें चखा भी जाएगा! उनसे दोस्‍ती गांठी जाएगी, मन में उन्‍हें गुना जाएगा. पता नहीं यह क्‍या है- समय की किल्‍लत, मन के डिस्‍ट्रैक्‍शंस, या बेवजह की बेचैनी जो कहीं भी, किसी भी चीज़ में तरतीब से उतरने और पूरी तरह डूब जाना असंभव बनाये रखती है. और सीधे-सादे सहज तरीके से एक वक़्त में एक काम करना तो ऐसी गांठ पैदा करता है, मानो इसे करते हुए जो बाकी सब छोड़ा हुआ है (जिसको कर ही लेके जाने क्‍या गजब हो जाएगा, लेकिन नहीं करते हुए उसके नहीं करने की भारी तक़लीफ़ का बिल्‍ड-अप होता चलता है) उसे छोड़े रखना जाने कैसा संगीन अपराध हो जाएगा! यह संकट महानगरीय निजी पेंच है या हमारे समय-सभ्‍यता का संकट, इसे चार काम साथ-साथ करते हुए समझने की कोशिश कर रहा हूं, और जहां तक युवान गोयतिसोलो के लेखन और ‘द मार्क्‍स फैमिली सागा’ का लुत्‍फ उठाने की बात है, वह अभी भी सुदूर भविष्‍य की किसी बिंदु के लिए स्‍थगित छोड़ दी गई है. इंशाअल्‍लाह, किसी दिन सचमुच पढ़ ली जाएगी.

पढ़ी जा पाएगी?

6 comments:

  1. हां जरूर पढ़ी जायेगी! हमारे पास भी तमाम किताबें हैं जो पढ़ी जाने के इंतजार में हैं! लेकिन विश्वास है कि पढ़ लेंगे उनको!

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  2. प्रमोद जी,आपने जो प्रश्न उठाया वह आज हम सभी को कभी ना कभी पकड़ लेता है। इस का उत्तर ढूंढ्ना कठिन होता जा रहा है।लेकिन कोई समाधान नजर नही आता।

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  3. सही लिखा है आपने प्रमोद जी।
    जैसे कि लंबे समय से मन में चाह थी कि फ़णीश्वर नाथ रेणु की " परती परिकथा" पढ़ना है पर……अब जाकर शुरू किया है पढ़ना, और अब बिना खत्म किए चैन नहीं मिलेगा।

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  4. उपभोक्तावादी समय में हैं हम..खरीद लेने भर से अन्दर का तत्व हासिल कर लेने का भ्रम होने लगता है.. इस मर्ज़ का बीमार मैं भी हूँ..माङ कर पढ़ने वाले दिनों की याद कीजिये.. कैसे भले दिन थे.. किताब आप की सम्पत्ति नहीं होती थी.. बस कुछ दिन की मेहमान होती थी.. ले लो बीच के समय में.. जितना रस ले सकते हो..

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  5. ये बैचेनी तो अपनी भी है गुरुवर (मतलब हम खुद को आपका चेला बता/बना रहे हैं) ..नयी किताब को देखना बहुत सुखद लगता है ..फिर एक बार पलट कर पूरी किताब देखी जाती है.. फिर शुरु भी होती है..लेकिन फिर छूट भी जाती है..आपको कोई समाधान मिले तो बतलाना.

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  6. अब पढ ही डालिये वरना वाकई संगीन अपराध हो जायेगा ।

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