Saturday, June 30, 2007

बंबई में बारिश..

चीत्‍कार भरती तीन दिनों से अनवरत हो रही मुसलाधार नहीं थी, कुछेक घंटों के झमाझम का मामला था, फिर अटक-अटक कर चलती झड़ी थी, लेकिन महानगर लाचार होकर टूटने लगा था जगह-जगह डूबने लगा था. सत्‍तर हज़ार करोड़ का डायरेक्‍ट टैक्‍स भरने वाले शहर को शहर चलानेवाले बेचकर खा गए थे. कोई पूछनेवाला नहीं था. जो बतानेवाले थे वे एक अदद तेलगी की गिरफ़्तारी पर ताली बजाकर विजयगान गा रहे थे.

पानी के गिर्द बसे सात टापुओं वाले शहर में अब नदियां कहां थीं, कॉरपोरेट प्रॉपर्टी व हाउसिंग थी. पानी की निकासी नहीं थी. वर्ष भर चलनेवाली सड़कों की मरम्‍मत का काम था जो एक तेज़ बौछार पर गड्ढों में बदलकर फिर वही कहानी कहने लगता. भ्रष्‍टाचार की अंतहीन बदज़ुबानी बनकर बहने लगता. कुछेक घंटे नहीं ग़र कुछेक दिन चली बारिश तब बंद नदियों का जल कहां टूटेगा. घरों में पानी घुसेगा फिर लोग कहां घुसेंगे?

ज्‍यादा वर्ष नहीं हुए शहर के कर्णधार इसे शंघाई बना रहे थे. गड्ढों के मुहानों पर खड़े इंद्रधनुष की झांकियां सजा रहे थे. इंद्रधनुष का पोस्‍टर अभी भी जीवित है, जैसे हम जीवित हैं, और गरजन और बरसन ने जिसके चिथड़े किए हैं खींचकर पानी में बहा नहीं दिया है.

अभी तो अंगड़ाई है आगे जाने कितनी बरसाती लड़ाई है. कितना जाएगा क्‍या रहेगा और क्‍या-क्‍या बिलायेगा. शायद बड़ी मुश्किलों में ही यह ब्‍लॉग अपने को बचा पाएगा.

सुकुमारी प्‍यारी हिन्‍दी की सुहानी सवारी..



कभी हड़बड़ाकर चीखता था कोई
या कहीं मौत की ख़बर आती थी
वर्ना शांति थी ऋषि-गुनीजन थे
पर्वत-कंदराओं के गहरे सोफों में धंसे
जिलेबी खाते गुदगुदियाते आशीर्वचन देते
ऊंघते सुनते लोग या इकबारगी
चौंकते जग जाते फुसफुसाने लगते
रांची का कोई पत्र अचानक रीतिकाल
रोने लगता, दिल्‍ली जाकर छपवा लेता
नई प्रगतिशीलता के सात सौ पोस्‍टर
अख़बार के चौथे पृष्‍ठ पर जो चौदह पंक्तियों की
टिल्‍ली ख़बर बनकर उसी दिन बासी हो जाती
अलबत्‍ता बहाना बन लेता उत्‍साही कार्यकर्ता
जश्‍न मना लेते थोड़े पी लेते कुछ लुढ़क जाते
फिर अगली बैठक तक तसल्‍ली बन जाती
मज़े में खींच लेते चादर सोये रहते लम्‍बी.

कुछ आवारा थे बेचारे थे कि समाज में हारे थे
हाथ-पैर फेंककर बुन रहे थे रात
जिसकी करनी थी उन्‍हें टेढ़ी-उलझी बात
शब्‍द टटोलते अंधेरे में अभिव्‍यक्तियां जो अभी तक
बरती नहीं गईं, चिन्‍ताएं चूने के पीछे ढकी दबी रहीं
आंसू जो रोया नहीं गया, टपटपाती बजती बरसाती
रात में कोई घायल घोड़ा दीवानगी में भागता रहे जैसे
जंगल में मदहोश गोली दाग़कर गिरा न दिया जाए जब तक.

ज्‍यादा काम से घर लौट रहे थे थके थे
साहित्‍य व समाज पपड़ि‍यों की तरह झरकर
गिर रही थी उनके चेहरों से, नहीं थी कोई
कविता या कवि का ध्‍यान अवचेतन में
टुकड़ों में किसी सस्‍ते गाने की याद या
कटोरी भर रसेदार तरकारी का स्‍वाद
टीवी का टुकड़ा बीवी का मुखड़ा
सपने में सपना कहीं
अनछपी रचना का छपना
चौंधियाई नींद खुलने पर फिर अदा थी
सुखसागर के तकिये पर हिन्‍दी का दुख था
अचक्‍के में तीन बार नागार्जुन और
दो मर्तबा त्रिलोचन का मुख था
कचर-मचर शब्‍दों से गंजी सत्रह पत्रिकाएं थीं
मगन शंभु शास्‍त्री, गौरीनाथ व सीताकांत थे
धंधा था फंदा था छुक-छुक की झांकी थी
हिन्‍दी की हरर्र-हरर्र सुहानी सवारी थी
कितना हारी थी फिर भी सुकुमारी-प्‍यारी थी.

Friday, June 29, 2007

छाते से बाहर आदमी..

बारिश के धुंधले अंधेरे में एक कमज़ोर को घेरकर छाता छीन लेना बायें हाथ का खेल होता. यूं भी तापस मइती चुहल और हरामीपने के पुराने खिलाड़ी थे. यही सोचकर वह बांस की गिल्लियों पर टंगे तिरपाल, काली पोलिथीन के आड़े-तिरछे मकड़जाल से बाहर गली के छप्‍प-छप्‍प के नंगेपने में कूदे आए. देह पर कांटों-सी बरसतीं बूंदों की चोट की ज़द में आते ही तापस ने जाना उनसे गलती हो गई है. छातेवाला कमज़ोर नहीं था. उससे बढ़कर गली अकेले की जगह छातेवालों से टपटपाती गंजी पड़ी थी. बारिश के कुहरीलेपन में एक छातेवाला दूसरे से छाता बचाता लयबद्ध क्रम में आ-जा रहे थे. धुंधला अंधियारा ऐसा कि समय का अंदाज़ करना असंभव. शायद दिन ढलकर अब सांझ हो रही थी. शायद ऊपर कोने के खंभे पर बिजली के लट्टू की टिमटिमाहट काफी देर पहले जल चुकने के बाद कोहरे के अंधेरे में नहाकर अब ऑलरेडी बेमतलब हो रही हो? तापस ने ऊपर खंभे की दिशा में देखने की कोशिश की लेकिन मोटी बरसाती बूंदों की मार ने उतनी ही तेजी से उनके देखने को निरर्थक भी बना दिया.

बीच गली बरसात में भींजते हुए तापस को अचानक अपनी समूची रणनीति- रोज़-रोज़ के अपने भागदौड़ की यह नाटकीयता- निहायत हास्‍यास्‍पद लगी. एक छोटे दायरे की सुरक्षा प्रदान करता क्‍या छाता कोई इतनी बड़ी चीज़ थी? नहीं. सोचने का मौका बनते ही तापस और कितने तो सवालों की चिंता में दीवाना होने लगते. छाते का लेकिन पहले कभी उनको ख़्याल भी न आता. आंखों पर काला चश्‍मा चढ़ाये वह तेज़ धूप को चीरते हुए निकल जाते. सूरज की दिशा में पादकर फिर उन्‍हें लगता उन्‍होंने धूप को जीत लिया है. तेज़ बरसाती थपेड़ों में भी वह ऐसे ही दौड़कर गंतव्‍य तक पहुंच जाते. भीगे बालों का पानी पीछे उछालकर, पंजे से धुले चेहरे को पोंछकर धीमे-धीमे मुस्‍कराते हुए वह दुनिया भर के छातेवालों को उसी नज़र से देखते जैसे वेस्‍टर्न फ़ि‍ल्‍म के अंत में घुड़सवार नायक क्षितिज की तरफ दौड़ लगाने के पहले पीछे छोड़ रही दुनिया को आख़ि‍री बार मेलंकॅली से देखता है.

मगर देह और कपड़ों से भर्र-भर्र चूते पानी के अहसास में अब तापस का हीरोपना घुस गया है! वह दुनिया की ओर देख नहीं रहे, जेब के गीले टैबलेट्स व अवश्‍यसंभावी सर्दी की संभावना पर सोचकर कातर हो रहे हैं.

कंटीले बौछारों के बेसहारेपन में अचानक तापस ने पलटकर पीछे देखा. शायद किसी ने उन्‍हें आवाज़ दी थी. या सनसनाती हवा में नाम गूंजा ऐसा बस उन्‍हें भरम हुआ था. जैसे खंभे पर बिजली के लट्टू के जलने या गली में कमज़ोर छातेवाले को अकेले पा लेने का भरम?..

तापस के जीवन में इन दिनों जिस एक छतरी की सुरक्षा प्रचुर मात्रा में है, वह यही भरम है. भरम के इसी घोड़े पर सवार तापस दिन में रात और रात में दिन की गड्ड-मड्ड सवारी करते रहते हैं. अतीत से लल्‍ली को चुराकर बरसाती फिसलन की सीढ़ि‍यां हंसते हुए पार कर जाते हैं. रजनीगंधा की महक फैलाकर सीलन भरे अंधेरे कमरे को दूधिया उजाले में भरकर एकदम-से भावुक होने लगते हैं.

रात के तीन बजे लल्‍ली को उठाकर तापस कविता पढ़ने लगे. लल्‍ली ने आंचल चेहरे तक खींचकर कहा- एकदम पागल हो, अभी सो रही हूं न.. बच्‍चे साथ में हैं, क्‍या करते हो? तो तापस हुमसकर आंचल के नीचे चेहरा कर लिए, और दांत के काटे से लल्‍ली को तब तक दिक् करते रहे जब तक वह खीझकर इन्‍हें थप्‍पड़ मारकर, हारी उठ कर बैठ नहीं गई!

सलिल चौधुरी की धुन गुनगुनाते हुए स्‍टोव पर दो कप चाय तैयार करने के बाद ख़्याल आया कि आसपास लल्‍ली या कोई भी नहीं.. सूने कमरे में वह नितांत अकेले हैं, और रेंगनी पर सूखने को डाली लल्‍ली की फूलदार सूती की साड़ी नहीं, उनका सस्‍ता गमछा है जो रह-रहकर कांप रहा है.

बारिश में नहाया एक साइकिल सवार तापस मइती को छूता गुजर गया. रिक्‍शे के तिरपाल के संकरेपने में खुद को समेटे-सहेजे पीछे बारिश में तैरता चला जाता एक लघु परिवार. स्‍त्री के माथे की बड़ी लाल बिंदी पानी में घुलकर फैल गई थी. भौं के नीचे बड़ी विस्मित आंखें. गोद में टंगा-अटका एक बच्‍चा. स्‍त्री के स्‍वामी ने चेहरे पर बांह फैलाकर खीझ की झिड़क में कहा- आरे, लाल्‍ली, देखछो ना कि? सब गीला हो रहा है तुम्‍हारी तरफ! अतो बार बॅला जाय किंतु कखोनो बुझो ना!

क्‍या कुहरीले अंधेरे में तैरती गुजरी वह सचमुच लल्‍ली ही थी? मगर लल्‍ली कैसे हो सकती है? यहां कैसे हो सकती है जब वह काठगोदाम में रहती है? फिर पलटकर थप्‍पड़ जमाने की जगह चुपचाप स्‍वामी की बात झेलनेवाली लल्‍ली के बारे में किसी ने सुना है कभी?.. हमशक़्ल होना लल्‍ली होना नहीं!

टपटपाती सड़क पर देर तक तापस मइती के पैर भटकते रहे. देर तक उनके कपड़ों व आत्‍मा से पानी टपक-टपक कर गली की तक़लीफ़ों पर बजता रहा. या शायद यह भी तापस का भरम ही था. शायद उस दिन वास्‍तविक तौर पर नहीं, बरसात का अंदेशा मात्र था. याकि तापस मइती उस दिन घर से बाहर निकले ही न थे.

एक संभावना यह भी है कि लल्‍ली जैसी कोई स्‍त्री इस दुनिया में कभी हुई ही नहीं. छाते के अभाव वाली बात तो निरी कपोल कल्‍पना है..

Thursday, June 28, 2007

जातिवाचक संज्ञा की सहूलियत

लड़का घर से भागा हो ऐसी बात नहीं थी. घर से भागा होता तो तैयारी करके भागता. देह पर साफ़ कपड़े व जेब में चार पैसे होते. अजाने-अपरिचित संसार में फिर वह फूंक-फूंककर कदम रखता, सावधानी से आसपास को ताड़ने की कोशिश करता. मगर ऐसा कोई चौंकन्‍नापन उसके व्‍यवहार में नहीं था. बाहर से देखने पर यही लगता जैसे मेले में घूम रहा हो. दीदी, पारुल, बुनाकी यहीं नज़दीक कहीं हों, और उनकी एक आवाज़ पर वह भागा उनके साथ जा मिलेगा. मगर ऐसी बात नहीं थी. था वह भागा हुआ ही. घर से नहीं. ना ना. लेकिन उसके घिसे, पुराने चप्‍पल में फंसी उंगलियां धूल सनी थीं. भले इससे वह लापरवाह लगता दिखे. लापरवाह तो वह दिख ही रहा था. लेकिन पैरों की वह धूल सफर में ही बटोरी गई हो सकती थी. तो वह पैसेंजर ट्रेन के किसी डिब्‍बे से लटका यहां तक पहुंचा था? कि लोहे की पुरानी कोई खड़ख‍ड़ि‍या बस थी जो उसे यहां तक लेकर आई थी? शायद सवाल के जवाब में पूछने पर वह हैरानी से देखता, या फिर क्‍या मालूम शरारत में मुस्‍कराने लगता और उसके धुले, चमकते गाल पर गड्ढे पड़ जाते!

मगर मैं भी कैसी भोली बातें कर रहा हूं, जैसे स्‍वभाव ही इकलौती वजह हो जिसके असर में लड़का जवाब देने से कतराये! यह भी तो हो सकता है कि वह पूछनेवाले की ज़बान ही न समझे? इतने तक का उत्‍तर न दे सके कि उसका नाम क्‍या है? चुप और खोया-खोया दिमाग में गुनता रहे.. कि कौन व कैसे लोग हैं और क्‍या तो पूछ रहे हैं. क्‍यों पूछ रहे हैं?..

क्‍या सीधा-सीधा सवाल उतना ही सीधा होता है कि उसका सीधा जवाब दिया जा सके? क्‍या सीधा जवाब पाकर जवाब पानेवाले की जिज्ञासा शांत हो जाती है, या फिर उसके बाद नए व उलझे सवाल दिमाग में अपना सिर उठाना शुरू करते हैं? और फिर उन उलझे सवालों की चर्चा के बाद सब शांत, स्‍वच्‍छ और निर्मल हो जाता है?..

लड़का एक पेड़ के तने से ठिठोली करता भागकर एक दूसरे पेड़ को छू लेता है. मैं जिस तरह लड़के को नहीं पहचानता, उसी तरह इन पेड़ों को भी नहीं पहचानता. शहर में जिये जीवन की स्‍मृति में पेड़ों के नाम दर्ज़ हैं, पेड़ नहीं दर्ज़ हैं. महुआ, कदंब हैं? क्‍या पेड़ है ये? आपने देखा है इन पेड़ों को.. आप बता सकते हैं इनकी पहचान? या लड़के को लड़के की तरह इन पेड़ों को भी मैं बस पेड़ पुकारूं? हमारी सामूहिक अज्ञानता में इतना ज्ञान काफी होगा? सब तसल्‍ली कर सकेंगे? पेड़ कह दिया तो आप पेड़ समझ लो जैसे लड़का कह देने से लड़का समझ लिए. अछूत माने अछूत जैसे मुसलमान कहकर एक साथ सभी मुसलमानों को समझ लेने का संतोष हो जाए. जैसे सब ब्‍लॉगर्स एक हों और नाला, पुल, बाज़ार, गली कहीं भी एक-दूसरे को पाकर गला भेंटने को बेचैन होने लगें, और फ़ोन के कैमरे से सटर-सटर तस्‍वीरें उतार मीट की मीठी पोस्‍ट जब तक चढ़ा न लें, चैन न पाएं?

मैं यही सब ऊटपटांग सोच रहा था जब लड़के ने ऐसे ही अनायास मेरा शर्ट छूकर मुझसे अपना नाम कहा.

का से का हो गया, भेवफा, तोरे प्‍यार में..

रामजीत राय का नैहर गई पत्‍नी बेबी को पत्र..


ओ मरे दिल के चइन, डारलिन, सोहाना सफर अऊर ई मवसम हसीन! कैसी हो, जान-तमन्‍ना, जान-जिकर? हमरा याद रहा कि नै रहा? कि अगला मरतबा मिलेंगे तो मुकेस का गाना का छांव में मुलाकात होगा- दोस्‍त दोस्‍त ना रहा, प्‍यार प्‍यार ना रहा, जिन्‍नगी तेरा ऐतबार ना रहा. गले लगी सहम सहम भरा गले से बोलती वो तुम न थी तो कौन था? तुम्‍ही तो थी! सफर का बकत पलक पे मोतियों को तौलती, वो तुम न थी तो कौन था? तुम्‍हीं तो थी! नसा का रात ढल गई, अब खुमार ना रहा, ओ हो, जिन्‍नगी हमें तोहरा ऐतबार ना रहा! ओ हो, डारलिन, केतना मारमिक अऊर टेरजिक सांग है! साला, जेतना हाली सुनते हैं, भर्र-भर्र आंखी से लोर चूने लगता है! जौन गति प्रभु जी करवाना हो, करवा दें मगर जिन्‍नगी में ई गाना गवाने का सौभाग न दें! प्रेम का नसा का रात ढल गया त् लाइफ में घेंवड़ा, बचबे का करेगा, जी?

हम एतना टर्र-टर्र बोल रहे हैं अऊर तुम, जाने-जिकर, कुछ बोले नै रही हो? हमरा बास्‍ते गाओगी नै कि बेदरदी बालमा, तुझे मन याद करता है? आ जा, आई बहार, दिल हय बेकरार? कि ऊ वाला गाओगी तू जहां-जहां रहेगा मेरा साया साथ होगा? पेटीकोट वाला साया नै, बुड़बक! साया माने सेडो, बुझाया?.. इंगलिस है कहां ले बूझोगी! चिन्‍ता नै करो, अगला मरतबा हम तुमको इंगलिस का पूरा टरेनिन दे देंगे, फिर देखना, कौमनिसेसन में कवनो टरबले नै होगा! फिर देखना, हमरा इंगलिस लेटर का तुम्‍मो इंगलिस में जबाब देना सीख जाओगी, मनोरमा मौसी अऊर मम्‍मीजी को बुझैबे नै करेगा कि साला, मियां-बीबी का बीच ई सैसपियर का जबान में बाती का हो रहा है! बड़ आनन्‍न रहेगा, शिटहार्ट. पंचवा में फेल हुए थे जब्‍बे से अरमान है कि एक दिन इंगलिस में लेटर लिखके दुनिया को दन्‍न कै देंगे! चाइलहुट का लड़कपना था, बड़-बड़ सोचै में का उबरता है, मगर अपना इंगलिस से एक दिन तुमको दंग कै दें, ओ चैलेंजिन त् अभी ले पाकिट में लेके टहलिये रहे हैं!.. हम इंगलिस में फर्र-फर्र गिटपिट बोलेंगे अऊर तू आंख-मुंह फाड़े अबिस्‍सास से बेहोस होते-होते बचोगी, फिर दउड़ के हमरा छाती से चिपट के हगने लगोगी! एम्‍भ्रैस वाला हग-हगिन, बुड़बक? तुम्‍मो कभी जो है एकदम मनोरमे मौसी का जेरास्‍स कापी हो जाती हो.. अइसा मारमिक दिरिस्‍य में दिसा-मैदान वाला हगिन कहंवा से आ जाएगा, जी? मनोरमा मौसी रहती तब अलग बात था! होइए सकता है कि हमरा इंगलिस सुनके ऊ चिरकुट लेटी भग्‍ग-भग्‍ग हग दे! हा-हा-हा, केतना त् सानदार दिरिस्‍य होगा, नै?..

हंसी-मजाक एक ओर, लाइफ में बड़ दुसवारी चल रहा है, बेबिया! दु‍पहरिया में त् नीन्‍द नहिंये आता है, रातो वाला जो है सो उड़ गिया है! ऊ पंड़वा ससुर को त् जब हाली थूरेंगे नै, हमरा नीन्‍द-चैन सब हराम है! फिर पापा जी का टंटा अलग से? दिन में दस मरतबा नीच, नलायक बोल-बोल के एनभैरेनमेंट बसाइन करते रहते हैं.. बड़ दुर्दिन चल रहा है, डारलिन, एगो लम्‍मा चिट्ठी भेजते हैं तुमको! मगर उसका पहिले तुम अपना तरफ से भेजो! अऊर क्‍या, वहिये, बूझाया न? हमरा आगे एतना भोला-नदान जिन बनो. अऊर जल्‍दी, राह तकते-तकते अइसा नै हो कि हमरा आंखी जरने लगे?

का से का हो गया, भेवफा, तोरे प्‍यार में..

तुम्‍हारा हिरदय सम्राट रामजीत

Wednesday, June 27, 2007

नया ज्ञानोदय की चिरकुटइयों के पक्ष में..

हिन्‍दी की एक राष्‍ट्रीय स्‍तर की पत्रिका है? नहीं है. जो हैं (दरअसल दो हैं) अंग्रेज़ी से अनुदित हैं, ख़बर पत्रिका हैं, और उनका हिन्‍दी के मनोलोक से बहुत सम्‍बन्‍ध नहीं है. अख़बारों का प्रसार बढ़ा है, बिक्री बढ़ी है (स्‍तरीयता नहीं बढ़ी है. मगर वह हिन्‍दी अख़बारों की गंभीर चिंता का शायद कभी विषय भी नहीं रहा!). पत्रिकाएं नहीं बढ़ी हैं. न जितनी थीं उससे बड़ी हुई हैं. हिन्‍दी की अपनी नाम गिनाने लायक ख़बर-विश्‍लेषण पत्रिका एक भी नहीं है. जो हैं, साहित्यिक हैं, और ज़ि‍न्‍दा बची हैं इसी में मुदित, मुग्‍ध व चकित होती रहती हैं कि क्‍या तो मैदान मार लिया. हर कोई अपनी पीठ ठोंक रहा है. बहुत अच्‍छी तस्‍वीर नहीं है. लेकिन ऐसी नयी भी नहीं है. पिछले बीसेक वर्ष में हिन्‍दी नीचे गई है, गर्व से अपनी उपलब्धियां गिनाए, इस पर गिनाने को शायद उसके पास एक भी चीज़ न होगी. एक बड़ी व क्रूर सच्‍चाई यह है कि आज़ादी के बाद, रधुवीर सहाय के संपादन में ‘दिनमान’ से अलग उसके स्‍तर का, पत्रकारिता का वैसा कीर्तिमान स्‍थापित करनेवाला हिन्‍दी के पास एक भी दूसरा पत्र नहीं.

पत्रकारिता से बाहर पुस्‍तकों की दुनिया में क्‍या नज़ारा है? जिन प्रकाशनों के शीर्षकों की थोड़ी शाख व इज़्ज़त थी- लोकभारती, राधाकृष्‍ण, राजकमल- अब सब एक परिवार के एकाधिकार में हैं, और पहले कब क्‍या छपा था के मोह व आह्लाद से बाहर आकर आज की वास्‍तविकता देखें तो जैसे टाइटल्‍स वहां छप रहे हैं, शर्म का विषय ज्‍यादा है, गर्व का कम. हिन्‍दी किताबों के विक्रेता सुखी व्‍यवसायी नहीं हैं. हिन्‍दी किताबें पाठकों के खरीद के आसरे प्रकाशकों के घर पैसे नहीं ला रहीं. नहीं, हिन्‍दी किताबों की खरीद-फ़रोख्‍त एक निहायत अमूर्तन के संसार में घटित होता है. सरकारी व पुस्‍तकालयों वाली खरीद में सेटिंग, जोड़-तोड़ आदि-इत्‍यादि के बाद भी पुस्‍तकों की छपाई संख्‍या है कितनी? हिन्‍दी का एक चर्चित व चर्चा में ‘बेस्‍टसेलर’ कितना छपता है? पांच हज़ार, छह हज़ार- आठ हज़ार? मैक्सिमम! यह है हिन्‍दी के बेस्‍टसेलर की सच्‍चाई. कविताओं की किताब दो हज़ार निकल गई तो कवि अपने को धन्‍य समझे.

इससे बाहर के संसार की क्‍या ख़बर है? लघु पत्रिकाओं की गुरिल्‍ला गतिविधियां हैं. एक हज़ार से पांच हज़ार वाले खेल हैं. ढेरों बंद होती रहती हैं, तो ढेरों शुरू भी हो जाती हैं. अंबेदकर व ग्‍लोबल-वॉर्मिंग पर रायपुर की पत्रिका में भले विमर्श न हो रहा हो, कविताओं व कहानियों का जगर-मगर गुलज़ार बना रहता है. बेगुसराय के कवि को कटिहार का पाठक जान लेता है, और गुना के कहानीकार को मुगलसराय की पाठिका पत्र लिखकर सूचित करती है कि कैसे वह उनकी रचना पढ़कर परम-चरम धन्‍य हुई!

इन लघुतम उद्यमों से ज़रा और ऊपर, थोड़ा ज्‍यादा प्रसार संख्‍या वाली दुनिया की तस्‍वीर गढ़ती ‘वागर्थ’, ‘तद्भव', ‘हंस’, ‘कथादेश’ और ‘नया ज्ञानोदय’ टाइप पत्रिकाएं हैं (ज्ञानरंजन का ‘पहल’ अलग परिस्थितियों में पैदा हुआ, व अपवाद है). साहित्यिक सुरापान किए भाई-बहिनी लोग जिसकी चर्चा से विशेष लड़ि‍याते रहते हैं. मैं पूछता हूं बहुत सर्कुलेशन है इनका? कितना सर्कुलेशन है? पच्‍चीस हज़ार? पचास हज़ार? एक लाख? शायद इनमें एक भी ऐसी पत्रिका नहीं जो इतनी संख्‍या में वितरित व बिक रही होगी! क्‍यों है ऐसा? चालीस करोड़ से ऊपर की आबादी वाले हिन्‍दी भाषी भूगोल में एक लाख की लघु साहित्यिकता पचाने का बूता नहीं?

नहीं है. वह माल ‘मनोहर कहानियां’, ‘सत्‍यकथा’, ‘सरिता’, ‘मुक्‍ता’ के प्रकाशक खा रहे हैं. हिन्‍दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के हिस्‍से वह नहीं आने वाला. क्‍यों नहीं आने वाला? क्‍योंकि इस तथाकथिक साहित्‍य का अपने समाज से कोई जीवंत संवाद नहीं. यह संवाद ज़माने से टूटा व छूटा हुआ है. वह संवाद कैसे बने या उसके बनने में क्‍या रूकावटें हैं इसकी कोई बड़ी व्‍यापक चिंता हिन्‍दी की सार्वजनिकता में दिखती है? नहीं, चार किताब छपवाये व तीन पुरस्‍कार पाये साहित्यिकगण अपने-अपने लघु संसार में सुखी, कृतार्थ जीवन जीते रहते हैं! जो सुखी नहीं हैं, वे इन सवालों की चिंता में नहीं, पुरस्‍कार न पाने के दुख में दुखी हो रहे हैं. सपना भी समाज नहीं, आनेवाले वर्षों में पुरस्‍कार पाकर धन्‍य हो लेने की वह अकुलाहट ही है.

तो यह तो है हिन्‍दी का सुहाना साहित्यिक संसार. अब मुझे ताजुब्‍ब इस बात पर होता है कि अगर कोई पत्रिका इस निहायत, उबाऊ परिदृश्‍य में थोड़ा रंग भरने, दो हज़ार और पाठक बटोरने के लिए- चिरकुटई के चार काम करे तो अचानक इस दुनिया में ऐसी हाय-तौबा क्‍यों मचने लगती है? कि ओह, ये क्‍या हो गया.. न पहले कभी देखा न सुना! जनाब, सच्‍चाई तो यह है कि आपने कुछ देखा ही नहीं है! देखने व पढ़ने और पाठ के आपके संस्‍कार ही नहीं हैं! बनी-बनायी परिपाटी व लीक से कोई चीज़ ज़रा-सी अलग हुई कि आपको पैर के नीचे गड्ढा व सिर्फ़ गड्ढा ही दिखता रहता है! हद है! महाराज, किसने कहा कि यह शास्‍त्रीय संगीत की बैठक है और सब वही राग गाएंगे जैसा आज तक राग के नाम पर आप समझते रहे थे? अलग गाना शुरू किए तो क्‍या करेंगे, अछूत घोषित कर देंगे? कमाल है, भई? आपको नहीं जमता तो आप रहिए महफ़ि‍ल से बाहर, जबरजस्‍ती नहीं है. महफ़ि‍ल रद्दी हुई तो यूं भी कुछ वक़्त के बाद लोग हाथ-फाथ झाड़ के उसे बेमतलब बना देंगे. लेकिन नहीं, गांव में कोई साइकिल चली आई तो आपका बताना ज़रूरी है कि साइकिल हो तो एटलस व हर्क्‍यूलिस ही हो.. बाकी की कोई है तो ज़रूर गड़बड़ी के उदेश्‍य से लाई गई है! माहौल गंदा करेगी! गांव का तौर-तरीका बिगाड़ देगी!

भर्र-भर्र की ज़ि‍रह चलने लगेगी कि नवलेखन ये अच्‍छा वाला है, सौदेश्‍य है, और वो वाला जो है वह तो सिर्फ़ अदा है. मैं तो कहता हूं, भइया, सब चिरकुट है, दो कौड़ी का है. आपके बिलासपुर व बेगुसराय से बाहर उसका कोई पुछवैया नहीं. बीस साल बाद तक भी आपका यह हिन्‍दी साहित्‍य बचा रहा तो देखिएगा, आपका नवलेखन आपको किस नाली में पड़ा मिलेगा!

इतना लहकने की ज़रूरत नहीं है. हिन्‍दी के इस अवसादी समय में कोई अगर थोड़ा बहकने को मचल रहा है तो बहक जाने दीजिए. कुछ पाठक बढ़ेंगे, हिन्‍दी का भला ही होगा. आपसे नहीं हो रहा. आज़ादी के बाद इतनी लंबी अवधि की आपकी साहित्‍यक अदाओं में नहीं ही हुआ. तो जिनसे, जिस-जिस तरह से- उल्‍टे-सीधे, नष्‍ट-भ्रष्‍ट जिन-जिन तरीकों से हो सकता है, हिन्‍दी की गाड़ी आगे चलने दीजिए. लंगी मत लगाइए.

मोहल्‍ले पर नया ज्ञानोदय विवाद के नाम पर छपी टिप्‍पणियों की प्रतिक्रिया में.

(ऊपर की तस्‍वीर रेडियोवाणी ब्‍लॉग से साभार)

Tuesday, June 26, 2007

किताबों का मर्सिया..

काली-सफ़ेद तस्‍वीरों से भरी एक महंगी किताब हाथ लगी है, उसी में खोया हुआ हूं. तस्‍वीरों वाली किताब के साथ फ़ायदा है कि उसमें तॉल्‍सतॉय और दॉस्‍तोव्‍स्‍की के पोथों की तरह हफ़्तों सिर नहीं मारना पड़ता. मन की बहक में जब जिधर से चाहें उलट-पुलट लें, विशेष फर्क़ नहीं पड़ता, और लोगों के देखने के साथ-साथ, मैं भी सुखी रहता हूं कि किताबों की संगत बनी हुई है.

पोस्‍ट-ग्‍लोबलाइज़्ड फेज़ में यह एक संकट तो है. कम से कम मैं तो महसूस करता ही हूं. बचपन, समाज का जो एक बोध प्री-ग्‍लोबलाइज़्ड दौर में हम चालीस-पार लोग लेकर बड़े हुए थे, उसे पोस्‍ट-ग्‍लोबलाइज़ेशन ने अपनी जगमग की चकमक में जैसे बेमतलब व हास्‍यास्‍पद बना दिया है. उसमें दूसरी ढेरों चीज़ों के अर्थहीन हो जाने की तरह एक भय यह भी है कि किताबों का अंतरंग आस्‍वाद छिन जाएगा. संभवत: उनकी संख्‍या बढ़ती रहे, पैकेजिंग, मार्केटिंग में नाटकीय इजाफ़ा हो; ढेरों लल्‍लू-टल्‍लुओं के लिए घर बैठे प्रकाशन खोलकर कंप्‍यूटर से किताब छाप लेना तक सहज-सुगम हो जाए- लेकिन अच्‍छी शराब की तरह किताबें जैसे पहले हमारी आत्‍मा में ताप भर देती थीं, अंतर्लोक को भव्‍यता में नहला डालती थीं, वह प्रभावी, ओवरह्वेल्मिंग एफ़ेक्‍ट किताबों की दुनिया से जैसे- लगता है, लुट गया है. बड़े से बड़ा लेखक भी आत्‍मविश्‍वास से अब यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी किताब महीनों लोगों का दिमाग जकड़े रही, उनके अवचेतन में तैरती रही. प्री-ग्‍लोबलाइज़्ड फेज़ की तरह अब अवचेतन को फ़ुरसत ही नहीं. दो हफ़्ते पुरानी फ़िल्म के पोस्टर बरसों से देखे जा रहे बासीपने में बदल जाते हैं. गाने ठीक से मुँह पर चढ़ते नहीं कि आलरेडी फ़ीके पड़ने लगते हैं. किताबों के बारे में सुन कर याद आता है कि हाँ, शायद हमने भी पढ़ा है. एक बड़ा-सा कारखाना है जो लगातार 'माल' फेंकता रहता है और विस्मृति उसे लीलती रहती है.

कहीं भी, और किसी में रमने-धंसने का उसे अवकाश नहीं. छवियों व इम्‍प्रेशंस की बीहड़ बहुलता में डिस्‍ट्रैक्‍शन ही उसका प्रभावी सुर है. सहेजकर हाथ में धरी तस्‍वीरों की आकर्षक किताब भी थोड़े समय में मन में अस्थिरता जगाने लगाती है. ठीक है, अच्‍छा है, देख लिए, अब? अब की अस्थिरता एक कंटिनुअस फांस है. मन एकाग्रचित्‍त होने की बजाय हर घड़ी दायें-बायें होता रहता है!

कार, लोन, बैंक, क्रेडिट कार्ड्स, घर व समाज की मांगों के बाह्य दबाव नहीं हैं जो मन का दुचित्‍तापन बुनते-गढ़ते रहते हैं. नहीं. सबसे ज्‍यादा वह खुद के भीतर खुद का डिसप्‍लेसमेंट है. खुद से अलगाव है. हमारी आत्‍मा में बाज़ार का धावा और वस्‍तुवाद की घेरेबंदी का चरम है.

काली-सफ़ेद तस्‍वीरों से भरी महंगी किताब देखते-पलटते अब मन उकता गया है. मन अब फिर कुछ नया चाहता है. कुछ भी. इस पोस्‍ट-ग्‍लोबलाइज़्ड दौर में बस उसका नया होना ही उसके अनोखेपन की गारंटी हो चलेगा. नहीं?..

आप इन दिनों क्‍या नया ट्राई कर रहे हैं?..

Monday, June 25, 2007

मीठ मीठ नीमन नीमन..



मीठ मीठ नीमन नीमन हमरी सुगनिया
हाथ में खाजा अऊर ओंठ पे बुनिया
एहर आव, बबुनी, हो मोर मुनिया

लबर-झबर फराकी के डेढ़ गो फांकी
हरियर रिबना में चिरई के झांकी
टूटल चटाकी अऊर गोड़ में पांकी

न बोले के न चाले के
खाली मुंह में डाले के
गप्‍प गप्‍प दाबि के
चुपाइल जइसन पुरनिया
एहर आव, बबुनी, हो मोर मुनिया

मीठ मीठ नीमन नीमन हमरी सुगनिया.

सिलुएट राइटिंग से एक साक्षात्‍कार..

एक मित्र ने नए-नए परिचय के स्‍नेह में हमें ज़मीन से उठाकर फुट भर ऊपर खड़ा कर दिया. हाथ पर तारीफ़ की मीठी गोलियां धरने लगे. हम हें-हें करके न सिर्फ़ उन्‍हें लेते रहे, उत्‍साह में आत्‍मा व जीभ के नीचे दाबे प्रेम से चुभलाने भी लगे. प्रत्‍यक्षा की तरह ऊबकाई में कुछ भी नहीं उगला. एक शब्‍द तक नहीं. मित्र ने भावुक होकर कहना शुरू किया हमारे लिखे में उन्‍हें सिलुएट राइटिंग की छायाएं दिख रही हैं. दो-तीन समशिल्‍पी बड़ी हस्तियों का नेम ड्रॉप करके मुझे आहिस्‍ता-आहिस्‍ता मीठी छुरी से ज़ि‍बह करते रहे. मैं गरदन आगे बढ़ाकर होता भी रहा. ओह्, इसी को मीठी मौत मरना कहते हैं?

इसके बाद मित्र अपने व्‍यस्‍त जीवन के काम-धाम में लौट गए. बझ गए. बिना काम का मैं- ख़ामख्‍वाह की उलझन में उलझा, उलझता रहा. बुनने की बजाय बस उधड़ता, और उधड़ता रहा. सिलुएट राइटिंग! कैन दैट बी ट्रू? एम आई रीयली सम लकी वन?..

तेज़ रोशनी में भी आंखों के आगे छायाओं के परदे तनने लगे. बंबई के गड्ढे और संजय दत्‍त, सलमानों की ज़बान भूल- मैं दिल्‍ली की बरसाती के दरवाज़े पर ताला चढ़ाकर जाने कब पहाड़ों की ओर निकल गया. मिस अनीता की संगत में कितनी सारी शेरी पी डाली, पुराने धूल चढ़े अलबम की काली-सफ़ेद तस्‍वीरें देखता रहा.

शाम की कुहरीली ख़ामोशी में फ़ायरप्‍लेस में हाथ तापते हुए मेजर नय्यर ने आगे झुक कर लोहे की छड़ी से आंच हिंड़ोरा, फिर असहज, कांपते स्‍वर में बोले- मौजूदा सभ्‍यता के बारे में आप क्‍या सोचते हैं? शायद मिस अनीता तब फिफ्थ स्‍टैंडर्ड में रही होंगी, तभी का वह पीला पड़ रहा फ़ोटो था जिसे देखते हुए मेरे होंठों पर एक फीक़ी मुस्‍कान फैल गई थी. थोड़ी ग्‍लानि हुई कि मैं मेजर की बातों पर ध्‍यान नहीं दे रहा था. आवाज़ में बेवजह की चहक भर मैंने मेजर से सवाल किया- डिड यू से एनीथिंग, सर?..

लेदर की पुरानी, कोनों पर कटती पेटी में ज्‍यादा सामान नहीं था. पेंग्विन का एक पुराना शॉपनआवर के लेखों का संकलन होगा, दद्दा की लिखी कुछ पुरानी कविताएं थीं जिन्‍हें वह जला देना चाहते थे, मगर मैं चुराकर अपने साथ लिए आया था. सस्‍ते होटल के वॉल पेपर को देखकर जब बेचैनी होने लगी तो मैं दरवाज़ा भेंड़कर बाहर निकल आया. कॉरीडोर में एक बुज़ूर्ग कपल हाथ में हाथ लिए, आपस में फुसफुसाता मेरी बगल से गुजरा. शायद औरत बाख़ की फिफ़्थ सिम्‍फ़नी की प्रशंसा में अपनी राय रख रही थी. इतने अकेलेपन में भी ढलती उम्र के दुलार ने मुझे जैसे हल्‍का कर दिया.

कॉर्डरॉय का जैकेट, पैरों में पुराना कैनवस जूता डाटे- व एक झीनी उदासी में नहाये आत्‍मा को जेब में छिपाये मैं प्राग, पैरिस या लंदन के किसी सस्‍ते बार के स्‍टूल पर बैठा हुआ था. बाहर जाने कब से बारिश हो रही थी. धुंध में छायाएं गुजरतीं और फिर सब कहीं एक सन्‍नाटा पसर जाता. बार में सात-आठ लोग थे मगर कोई किसी से बात नहीं कर रहा था. दसेक वर्ष पहले किसी सूने दोपहर देखी अंतोनियोनी की एक फि‍ल्‍म की याद हो आई. ला नोत्‍ते, शायद यही नाम था. हवा में घूंसा चलाते, एक-दूसरे को चींथते लोग. आनेवाले वर्षों में हमारी सभ्‍यता किधर का रुख करेगी, सोचना सचमुच तक़लीफ़देह है. वेट्रेस हाइनेकर का मग लिए सामने थी, मैंने अधमुंदी आंखों से उसका शुक्रिया अदा किया और बीयर के झाग में अपने दुखों को भूलने की कोशिश करने लगा. इतना सारा लिखने के बावजूद ये कैसा असंतोष है जो अंदर ही अंदर कुछ तोड़ता रहता है! एक लेखक आखिर अपनी कलम से क्‍या, कैसी अपेक्षाएं करता है? कितना जायज़ होती हैं उसके अंतर्मन की निष्‍पाप कामनाएं?..

कितनी सारी तो छायाएं थीं. कुछ ख़ामोशी से हवा में तैरती मेरे हाथ की उंगलियों पर आकर पसर गई थीं. मैं रेस्‍टलेस होने लगा, मानो छायाएं नहीं, मक्खियां हों.. और ज्‍यादा देर तक बैठा रहा तो कान और नाक पर भी आकर बैठने लगेंगी. और क्‍या मालूम तब वह मक्खियां न रहें, बालदार चूहों में बदल जाएं! मैं घबराकर खड़ा हो गया.

सिलुएट राइटिंग के लेखक को वहीं स्‍टूल पर गिलास (और मन) खाली करता छोड़ मैं मित्र की खोज में बाहर निकल आया. काफ़ी देर तक उनका नंबर आजमाता रहा. मगर शायद वह मेरी खीझ और झुंझलाहट ताड़ गए थे.. बार-बार की हमारी कोशिश के थोड़ी देर बाद बंदे ने अपना फ़ोन स्विच ऑफ़ कर दिया था!

Saturday, June 23, 2007

द नेम ड्रॉपर..

वह ऐसा क्‍यों करता था? और ऐसा नहीं कि वह ये पूर्णिमा के उजाले या अमावस्‍या की अंधियारे के असर में- एक ज़ुनूनी-मदहोशी, चोट खाये पागलपने में करता था.. नहीं!

बरसाती छींटों के बाद ‘ओ सजना, बरखा बहार आई..’, ‘रिमझिम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन..’ जैसे गाने वातावरण को अक्‍सर जैसे दिल छीलनेवाली बेचैनियों में नहलाने लगते हैं. जैसे एक ख़ास तरह का नीमउजाला, या नीमअंधेरा किसी सीरियल किलर को वहशी, दीवाना बनाकर, शिकार की खोज में, महानगरीय जगर-मगर के अंधेरों में पटक देती है- कुछ उसी तरह, एक माहौल विशेष में, हमारा वह ऐसा या वैसा करने लगता हो, जैसी बात नहीं थी. वह (चलिए उसे जयराज का एक कामचलाऊ नाम दे देते हैं) हमेशा ऐसा करता था! जयराज वॉज़ ऑल्‍वेज़ ड्रॉपिंग नेम्‍स.. ही वॉज़ अ नेम ड्रॉपर!

जयराज को बहुत दफे ध्‍यान भी न होता चर्चा किस विषय पर हो रही है.. सिर्फ़ इतना ध्‍यान रहता कि नेम ड्रॉप करना है. एक हड़बड़ी व तक़लीफ़ की छतरी-सी तनी रहती, और जयराज घात लगाए बेचैन कसमसाता रहता कि कब ज़ि‍रह में सेंघ लगाने का उसका मौका बने कि वह नाम चुवाकर चैन की सांस ले सके. ऐसे मौके के आने तक वह एकदम उखड़ा-उखड़ा टंगा रहता. बहुत बार कहवैये आवेश में बातचीत को कहीं से कहीं लिए जाते, और कोई उपयुक्‍त अवसर ही न बन पाता कि जयराज गांठ के संभाले हुए नेम्‍स ड्रॉप कर सके, तो ऐसे मौकों पर जयराज की सांस उखड़ जाती, दिल भन्‍ना उठता, और फिर कुंठा से भरा हुआ वह यार-दोस्‍तों को भर्र-भर्र ‘तिलकुट-चिरकुट’ जैसी गालियों से नवाजता मन की भंड़ास निकालता. लेकिन तब भी सच्‍चाई यही होती कि नेम ड्रॉपिंग का अगला उपयुक्‍त अवसर आने तक मन की भंड़ास निकलती नहीं!

बिना नेम ड्रॉप किये जयराज की आंखों के आगे अंधेरा छाया रहता. बच्‍चा रात को बिछावन गीला करने के बाद जैसे कुनमुनाने लगता है, जयराज नेम ड्रॉप करने के पहले वैसा ही कुछ कुनमुनाता अस्थिर व उद्वि‍ग्‍न बना रहता. शॉपेनआवर, कालिदास, गांधी, गुर्ज्‍येफ, मोदिल्‍यानी, त्रॉत्‍स्‍की, डॉन किहोते, लेर्मेंतोव, पास्‍काल, वॉल्‍तेयर उसके झोले में छटपटाते- बाहर चूने को आतुर आपस में पट्-पट् बजते होते. और वाजिब मौके की राह तकता वह तना-तना बैठा होता. काली चाय की बेस्‍वाद चुस्कियां लेता मरोड़ में इधर-उधर मरुड़ता होता. कभी ऊबकर तो कभी हारकर स्‍वास्‍थ्‍य की ज़ि‍रह में वॉल्‍टर बेन्‍यामिन को ठेल देता, तो कभी आधुनिक पर्यटन की चर्चा में पियेर पाऑलो पज़ोलिनी को पेल देता! ओह्, कैसा तो अनोखा वह नेम ड्रॉपर था!

मगर इसके बारे में ठीक-ठीक अभी भी जानकारी नहीं कि वह ऐसा क्‍यों करता था. अडिक्टिव था.. अडिक्टिव-कंपल्सिव था? मालूम नहीं! मगर आप एक मनोनुकूल माहौल तैयार कर दें, और फिर देखते, कैसे पलक झपकते में, वह बकरी की लेंड़ि‍यों की मानिंद नामों की लेंड़ सजा देता! एक बरती, आजमायी, बरसों की हासिल सिद्धहस्‍तता थी. उसके नाम चुवाने के साथ लोग आंख और मुंह खोल देते थे, फिर बगल में झुककर बगलें झांकने लगते थे. लेकिन कभी-कभी यह भी होता कि यह सधी सारंगी थोड़ा अनियंत्रित होकर फैल जाती.. बकरी की लेंड़ी की पट्-पट् की जगह- गाय के छेरने के कड़क-पड़ाक-ठां-डिड़ि‍क-ठेर्र का सुर प्रभावी सुर हो जाता.. और माहौल फिर तो एकदम ही बसाइन हो उठता.. लोग चौंकन्‍ना होकर जयराज को गालियां देने लगते.. तब उसे भी अंदाज़ हो जाता कि आज नेम ड्रॉपिंग थोड़ी ज्‍यादा हो गई.. ऐसे में जयराज गिरगिट की तरह रंग बदलकर एकदम मासूम बच्‍चे में बदल जाता.. जिम्‍मेदारी से बड़ों की बात सुनने लगता.. और अगली मर्तबा की आस में उदास होता रहता जब वह कायदे व करीने से बकरी की लेंड़ि‍यों की तरह नेम ड्रॉप कर सके!

सरलता के विरोध में..

आख़ि‍र लोग सरलता का इतना बाजा क्‍यों पीटते रहते हैं? सरल होना आसान है? रोज़मर्रा के आपके जीवन में सरलता है?.. शायद होगी, मेरे में नहीं है. उसके आग्रह में हम आह भी नहीं भरते. अनामदास सरल हैं? अनामदास के लिखने में एक सफ़ाई है, तरल लिखाई है, सरल नहीं है. रवीश सीधा-सरल लिखता दिखते हैं- मगर उस सीधाई में काफी टेढ़ापन छिपा है. अभय के यहां, कह सकते हैं, एक सरलता है, लेकिन वह मन की एक विशेष निर्मलता से हासिल हुई है, उन्‍हें हुई है इसका यह मतलब नहीं आपके-हमारे हिस्‍से भी इतनी सरलता से चली आएगी.. या चली ही आएगी!

हमारे और अरमान हैं. सरलता की निर्मलता को प्राप्‍त होना उसमें नहीं है. जीवन में कभी हमने थोड़ी-बहुत पेंटिंग की थी. लैंडस्‍कैप कभी पेंट किया हो ऐसा याद नहीं पड़ता. रंगों व आकृतियों में लोगों की घसर-पसर कैप्‍चर करने का आग्रह ज्‍यादा रहता था. लेखनी में भी वह परतदारपना खोजते रहते हैं. बात से बात से बात का ताना-बाना. कहानी में कहानी. फोरग्राउंड के साथ सिर्फ़ बैकग्राउंड ही नहीं, बियोंड विज़ि‍बल के भी इमेज़ेस, इम्‍प्रेशंस. राम खुश था, और बकरी घास चर रही थी जैसे वाक्‍य हमने कभी लिखे भी हों तो ऐसे वाक्‍यों से अमूमन अपना काम नहीं ही चलता. सतह पर जीवन की गतिविधियां सरल दिखती हों, जीवन अक्‍सर सरल नहीं होता. फिर उस जीवन की चर्चा वाली लिखाई में सरलता का इतना आग्रह क्‍यों?

सरल या तो महाज्ञानियों की बातें होती हैं या फिर पटरे पर चाय पिलानेवाले छोकरे की. दो कप या तीन? सादा कि स्‍पेशल? खुल्‍ला देना, साब, चिल्‍लर का बौत तंगी है!.. मैं- मेरे समझदार, सुधी पाठक- आपको दोनों में से किसी श्रेणी में नहीं रखता. आजकल बच्‍चे तक तो सीधे-सरल होते नहीं, फिर मैं तो अब बच्‍चा भी नहीं रहा! आप भी नहीं हैं.. फिर सरलता का आपका इतना आग्रह कहां तक जायज़ है भला?..

नीचे स्‍प्‍लैश कास्‍ट के नए ट्रैक्‍स पर एक नज़र मारी या नहीं?..

Friday, June 22, 2007

बंबईया बरसाती ब्‍लूज़..

इंटरनेट पर तो जो धूम-धड़क्‍का होगा सो होगा ही.. ब्‍लॉग पर भी ढेरों कशीदाकारी होगी. ऑडियो- और सीमित स्‍तर पर वीडियो का इस्‍तेमाल शुरू हो ही गया है. हिंदी में अभी उतना प्रचलन में नहीं है.. मगर हिंदी में अभी लोग ही कितना हैं, और हिंदी वैसे भी आगे चलने में कहां विश्‍वास करती है.. लेकिन धीरे-धीरे वह सारी अदायें, नखरे, सुरूर हिंदी में भी आएगा ही. हो सकता है ज्ञानदत्‍तजी दो सौवां पोस्‍ट ऑडियो पर नेहरुजी की आवाज़ की नकल में सुनावें. शुकुल पंडिजी भी लंबे-लंबे पोस्‍ट लिखने की बजाय, हो सकता है अगले वर्ष इसी समय- सीधे वीडियो छापना शुरू करें.. मोहल्‍ले के होनहार बच्‍चों की पल्‍टन उनकी सेवा में जुटी पड़ी हो.. उत्‍साह में सबकी बांछें व अंग-प्रत्‍यंग खिला पड़ रहा हो..

यूनुस मियां, देबाशीष, शशि सिंह और काकेश जैसे कल्‍पनाशील लोगों ने छोटी बैटरी वाले टॉर्च जलाने शुरू कर ही दिए हैं.. जल्‍दी ही वह बैटरी व रोशनी दोनों बड़ी होगी (हो सकता है आलोक पुराणिक जैसा व्‍यक्ति अख़बारों में फ़ोन करके उन्‍हें सीधे रिकॉर्डेड सीडी एक्‍सेप्‍ट करने का सजेशन देता फिरे.. अख़बार वाले लेते भी फिरें!).. सांवरे को उलाहना देनेवाली कविताएं मान्‍या काला चश्‍मा पहनकर वीडियो पर गा रही हो.. प्रत्‍यक्षा, बेजी, मसिजीवी सब.. क्‍या तो कचर-मचर का अद्भुत नज़ारा होगा! (अनामदास आप कब तक गुमनामदास बने रहिएगा? इरफ़ान मियां आलरेडी सोच रहे हैं कि किसी भी क़ीमत पर इस दौड़ में उन्‍हें सबसे आगे रहना है)..

ऐसा नहीं है कि मैं पुराना हूं, और इस सबके खिलाफ़ हूं. शशि सिंह के उम्र प्रकाशित कर देने के बाद पुराना तो हो ही गया हूं (ब्‍लॉग के फ़ोटो पर दिखते मेरे सफ़ेद बाल वास्‍तविक नहीं हैं, पेंटेट हैं.. शक़ हो तो ज्ञानोदय के नए अंक में हमारी सच्‍चाई पढ़ लें) लेकिन इसके खिलाफ़ नहीं.. भई, मैं तो वैसे भी सलीमा वाला आदमी हूं ऑडियो-वीडियो से कहां तक बचता चलूंगा.. मगर यह भी सच है कि शब्‍दों से विशेष स्‍नेह है, उनकी सत्‍ता सुसंगत और विवेकी लगती है.. लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि ऑडियो या वीडियो.. ओह्, इस ज़ि‍रह का भला कहीं अंत है..? एक पोस्‍ट में तो नहीं ही है! आनेवाले दिनों में इस पर बातें होती रहेंगी. दूसरों के साथ-साथ मैं भी कुछ राय रखूंगा ही..

लेकिन आज इस पर आज मुंह खोलने और बात छेड़ने की सीधी वजह यह है कि हमने अपने ब्‍लॉग के नीचे की तरफ एक विजिट डालकर प्‍लेयर पर कुछ गाने चढ़ाये हैं.. मामला जमा तो आगे कुछ अपनी पसंद की चीज़ों का खेल करते रहेंगे.. हिंदुस्‍तानी खेल शायद कम होगा.. उसके लिए यूनुस मियां हैं ही.. हम थोड़ा अ-हिन्‍दुस्‍तानी रंग घोलेंगे.. एक नज़र मार लीजिए.. एकदम नीचे की तरफ स्‍प्‍लै‍श कास्‍ट के स्‍टार्ट पर चटका लगाइए..

कुल सात ट्रैक्‍स हैं.. ब्‍लूज़ की अलग-अलग ध्‍वनियों का प्रतिनिधित्‍व करते.. ज्‍यादातर पिछली सदी के पांचवे दशक के पहले की रचनाएं हैं. पहली दो कृतियां चार्ली पारकर कीं, तीसरी पूर्वी यूरोप के फ्रांस में यायावरी में जीवन काटते ज़ांगो राइनहार्ट, फिर क्‍लैरिनेट के अनोखे जादूगर सिडनी बिशे, और अंत के दो ट्रैक माली के तोमानी दयाबते. इनमें से हरेक का संगीत ही नहीं, उनका निजी जीवन भी उतना ही मार्मिक रहा है..

थोड़ा सुनिए.. मज़ा न आए तो धीरे से निकल लीजिए.. और मज़ा आए तो हमसे कहिए.. ऐसे माल में हम सिर से पैर तक गंजे-बसे हैं!

(ऊपर चार्ली 'बर्ड' पारकर का एक तैलचित्र)

Thursday, June 21, 2007

बीच खेल में..

काम से लौटती लड़की सोचती खोयी-सी उसके बाबत जो पीछे छोड़ आई अधूरा-अनसुलझा.
सोसायटी के अहाते में अधखेल अटक गया बच्‍चा ताज़्ज़ुब करता अभी तो कहीं घायल भी न हुआ फिर यह कैसी थकान क्या अंधेरा है.

दिन भर की टूट नहीं, लड़की है हारी मन से
बच्‍चा थककर ध्‍वस्‍त-निढाल अपनी ही मचलन से.

सामने पड़ने पर दोनों देखते हैं एक-दूसरे को. आंख मूंदने से पहले जैसे अलसाया देखता है सूरज आख़ि‍री बार दुनिया को.

लड़की व बच्‍चा जाते हैं दोनों अलग अपने रस्‍ते.
बच्‍चा हिलगता लंगड़ाता है लड़की जाती गुनगुनाती है तीन शब्‍द विलम्बित.

सोसायटी की सीढ़ि‍यों के नीमअंधेरे में डोलती कोई एक छाया
जलाती है शाम की पहली बत्‍ती.

Tuesday, June 19, 2007

आभासी लोक में जिसकी मुझे तलाश है..

आत्‍मा जुड़ा जाये, दिल खिल जाये ऐसे ढेरों अंतरंग अभिव्‍यक्तियों व अनगढ़ शब्‍दों, शब्‍द-श्रृंखलाओं की खोज, पुनर्विन्‍यास- मानकीय हिंदी जिनकी इजाज़त नहीं देता. उन इफ़रात, अनगिन बिम्‍बों की टोह, रचनाओं में गड्ड-मड्ड उन्‍हें सजाने-चिपकाने का मोह- परिपाटियों में पिटी संसारी सामाजिकता जिन तक पहुंचने, छूने व छापने की अनुमति नहीं देती. आह्, सच अमेज़िंग, फ़ैंटास्टिकली मार्वलस फ़न टू फिडल विद ब्‍लॉग! (अनामदास सुन रहे हैं? नशीले झाग में घुला, मन को उन्‍मत्‍त और दीवाना कर देनेवाला नगपुरिया गद्यगान आप कब कर रहे हैं?)..

एक ऐसी अंतरंग सामाजिकता जिसकी संगत में दिमाग़ जगा रहे.. मन बहका रहे. जहां खुलकर हंस सकें.. तो खुलकर उदास भी हो सकें.. और हंसना शर्म से आत्‍मा छिपाना व सिर गड़ाना न हो!.. थोड़े ऐसे मित्र मिल जाएं जिनका विवेक और चमकीला परतदारपन नित नए अचरज जगाए.. चौंकाए, गुदगुदाए.. मार्मिक व गजब के मीठे संगीत की तरह अंदर दूर तक कहीं तोड़ जाए.. और फिर एक नई बुनावट में जोड़ जाए?..

आभासी लोक में कितना तो चाहता हूं.. कितना कितना कितना तो चाहता हूं!

(प्रत्‍यक्षा के आज दाखिल पोस्‍ट आखिर है किस चीज़ की तलाश आपको? के असर में..)

शीतलता के आनंद..

पहली झड़ी के बाद गरमी वाली हवा बदल गई है. सुबह आंख खोलकर बाहर देखें तो मन शीतल होता है. मैं इस शीतलता का आनंद लेना चाहता हूं. फिर से किताबों और अपने संगीत की ओर लौटना चाहता हूं. एक चिरकुट विवाद के पीछे जो इतना समय व ऊर्जा जाती रही है, उसके लिए सबसे ज्‍यादा मैं खुद से क्षमाप्रार्थी हूं. नासिर मियां आपसे एक मर्तबा मिला हूं, आपकी बातों से बड़ा प्रभावित हुआ था, मगर यह जो भावुक वाद-विवाद का नाला खुल गया है, उससे माफ़ कीजिएगा- आपकी तक़लीफ़ समझ सकता हूं- लेकिन पर्सनली मुझे बड़ी कोफ़्त हो रही है. हमेशा होती रही है. फिर क्रांतिकारी क्‍या मैं आंदोलनकारी भी नहीं.. जीवनकारी होने की कोशिश करता हूं.. थोड़ी समझदारी से फ्लर्ट करता हूं.. लेकिन बीच-बीच में उसे लात भी लगाता रहता हूं.. तो आपकी भावुकता से लबरेज़ पोस्‍ट पर क्‍यों कहीं से क्षमायाचना नहीं हुई, इसका अब ताजुब्‍ब भले न हो- शर्म थोड़ी अब भी बची ही हुई है. मगर क्‍या कीजिएगा.. समाज अशिक्षित व असहिष्‍णु है.. तो ब्‍लॉग पर चढ़ाए चार पैरा कहां से सहनशीलता की गंगा बहाने लगेंगे! नहीं बहायेंगे! आप झूठे मुग़ालते मत पालिए.. और उसकी वजह से अपने.. और हमारे दुख मत बढ़ाइए! एक छोटे, देहाती टाइप चौपाल को हम कुछ ज़रूरत से ज्‍यादा ही भाव दे रहे हैं.. आपका काम मिसालें बनाना है, न कि इन दो कौड़ी के मिसालों से अपनी समझ कुंद करना?.. आप ढेरों अर्थपूर्ण काम कर सकते हैं, समाज व अपने ब्‍लॉग पर उसमें एनर्जी झोंकिए, ‘खुब लीखी’ व ‘गिदड़ भप्‍की’ जैसी लिखाई व मधु मुस्‍कानी समझ को दिल पर लेकर मन छोटा मत कीजिए!

मुझे सचमुच समझ में नहीं आ रहा कि आखिर ये असग़र वज़ाहत को नहीं पढ़नेवाले और ओमप्रकाश शर्माओं को पढ़कर इतरानेवाले हैं कौन जिन्‍हें हम इतना भाव दे रहे हैं? क्‍यों दे रहे हैं? इसीलिए दे रहे हैं कि इन्‍होंने एक दूकान खोली है जहां बीस वैसी ही ‘खुब लीखी’ पल्‍टन इकट्ठा होती है, जहां एक चिरकुट दूसरे चिरकुट के गरदन में हाथ डाले आह-आह और वाह-वाह करता है? हिंदी के आभासी लोक को पीटकर और फींचकर हम इतना ही छोटा कर देना चाहते हैं? नासिर मियां, हौसला रखिए कि हिंदी का आभासी लोक इस ‘छटांकी’ मानसिकता से- संख्‍या व स्‍वर दोनों में- थोड़ा बड़प्‍पन की तरफ बढ़ेगा. मैं भी इसी उम्‍मीद पर रोज़ की-बोर्ड की रगड़ाई करता हूं कि कल को पतनशील से अलग सृजनशील लेखनी करुंगा तो उसके भी बीस-तीस पढ़नेवाले मिलेंगे, ज्ञानदत्‍त जी की तरह हांफकर बुलके नहीं चुआवेंगे कि कांख-कांखकर पढ़ना पड़ता है! हिंदी की यह तुतलाती, देहाती मधु मुस्‍कानी दुनिया ही हिंदी की पहचान न बने, उसमें वैश्विक विवेक व सबलता का सामर्थ्‍य आए, आइए, हम इस दिशा में मेहनत करें. दो कौड़ी के रगड़ों व उनके सिरजनहारों के लेमनचूसी ज्ञान पर अपनी एनर्जी न ज़ाया करें!

रविजी समेत कुछ अन्‍य मित्रों का शुक्रगुज़ार हूं जिनकी लेखनी ने आज मन की खिन्‍नता पर थोड़ा पानी का छिड़काव किया. आप भी फ़ुरसत में एक नज़र मार लें: स्‍ट्राइसैंड प्रभाव, माफ़ करें ये धर्मयुद्ध नहीं है. धन्‍यवाद विनय, धन्‍यवाद समर. आप पढ़ि‍ए.. तब तक मैं ज़रा बाहर की शीतलता का आनंद लेकर आता हूं.

Monday, June 18, 2007

जासूस जसबीर और मिशन नारद..

मेज पर उचका बैठा कुख्‍यात, लंगोट-लथेड़ जासूस जसबीर सामने था.. और मैं पता नहीं क्‍यों, खुश होने की जगह टेंस हो रहा था.. पूछना कुछ चाह रहा था, बात मुंह से कुछ और निकली- अबे, जस्‍सी, तेरी फंडिंग कौन कर रहा है, यार?..

जसबीर न मेरा जस्‍सी है न अबे-तबे वाला यार.. मगर हवा में लातों की ऐसी बहार फैली हुई है कि ज़बान जब ज़रूरत न हो तब भी पतनशील हुई जाती है! ट्वीड और बोनेत्‍ती के इटैलियन शूज़ पहने आदमी तक के सामने अदब और तहजीब भूल रहा हूं!.. लेकिन जस्‍सी ने ज्‍यादा दुनिया और हमसे ज्‍यादा लातें देखी हैं.. हमारे कहे को दिल पर लेने की बजाय मुंह में सिगार डालकर धुंआ छोड़ने लगा. कहा- पूछोगे नहीं क्‍या ख़बर लाया हूं?..

मैं सकते और सिगार के असर में चुप रहा. शायद चुप रहने पर जसबीर मुझे एक सिगार ऑफर करे.. चलते-चलते शायद हज़ार-हज़ार के दस-बीस नोट भी? बेहतर हो मैं फंडिंग-संडिंग की जिज्ञासा में ज्‍यादा नाक न घुसेड़ूं, और जस्‍सी को जसबीर भ्रा कहके ही बुलाऊं! मगर, साली, ज़ि‍न्‍दगी ऐसी टेंशनियाई हुई है कि मुंह से क्‍या ख़बर है, जसबीर भ्रा की जगह ‘ब्रा’ निकल गया.. लेकिन अच्‍छा है बंदे ने बुरा नहीं माना.. आंख मारकर जेब से न्‍यूज़ निकालने लगा..

न्‍यूज़ के निकलने तक मैं बरबराता रहा- बड़ा गंदा हो रहा है सबकुछ लेकिन! धुरविरोधी के जाने का असर नहीं, मसिजीवी के चिट्ठाचर्चा को गालियां.. पंडित ने निर्मलानंद के सवाल का जवाब तक नहीं दिया? विदा होने के पहले ही उनके पोस्‍ट को नारद का एग्रीगेटर खा गया! प्रत्‍यक्षा भी प्रत्‍यक्ष जान गईं कि फेंस के उधर जाने का क्‍या मतलब है!.. यही मतलब है कि आप अपने को इतना छुईमुई न समझें, नारद आपको भी खा-चबा सकता है! बड़े-बड़े खेल हो रहे हैं, गुरु?.. आज अविनाश ने अपना विदा गीत लिखा है, पता नहीं वह भी नारद तक पहुंचेगा या भाई लोग रास्‍ते में ही लंगी देकर रोक लेंगे? नारद-नारद! पतनशीलता का चरम है, बॉस!..

जसबीर जॉनी हाथ की चिप्पियों को ऐसे पलटते रहे मानो मेरी चिंताओं के भभुआ इंटर कॉलेज के सलाना चुनाव वाले स्‍तर से दुखी हो रहे हों.. उम्‍मीद कर रहे हों कि मैं भी उन्‍हीं के ट्वीड और इटैलियन शूज़ वाले स्‍तर तक उठ जाऊं.. मैंने आह भरी और अपना गोल्‍ड फ्लैक जलाकर उनके सिगार के स्‍तर तक उठने के लिए छटपटाने लगा..

- ये हो क्‍या रहा है, गुरु? टोयोटा फॉर्च्‍यूनर और लैपटॉप वाले जीतू हैं कहां? इतने समय तक, घंटा, एयरबॉर्न हैं कि सारा डायलॉग ठप्‍प हो गया है?- उसी छटपटाहट में मैंने अपना सवाल किया! आगे- और ये शुकुल जी, नरसिंहा राव वाली अदायें क्‍यों खेल रहे हैं.. कि ओह, आप बड़े मार्मिक हैं, आह, मगर हम थोड़े धार्मिक हैं? माजरा क्‍या है, जस्‍सी?

मेरे इतना सवालों को ठेलने पर जसबीर जम्‍हाई लेने लगा.. तो मैंने सिगरेट का जलता सिरा मुंह में डालकर खुद को चुप कराया और अच्‍छे बच्‍चे की तरह जसबीर के जवाब पर कंसन्‍ट्रेट करने लगा.. आप भी कीजिए!

जसबीर जॉनी के खुलासे: जीतू हवा नहीं ज़मीन पर ही है.. कानपुर के आसपास ही है.. मैंने लास्‍ट देखा था तो चेहरे पर रूमाल डाले छोटेमल चाट भंडार के घटिया टिकिये खा रहे थे.. फ़ोन पर गुस्‍सा हो रहे थे कि दिल्‍ली में एनडीटीवी से इंटरव्‍यू वाला सारा खेल बिगाड़ दिया! मैंने पास जाकर कान में फुसफुसाया कि अविनाश अभी भी उन्‍हें लेने एयरपोर्ट जाएगा मगर फूलों के नहीं.. चिट्ठा-चिथड़ों के हार के साथ!..

इसी कन्‍फ्यूज़न में वह रवीश के ताज़ा पोस्‍टों पर टिप्‍पणी भी नहीं कर पा रहे कि जाने ऊंट टुमौरो किस करवट बैठे?.. मगर सबसे ज्‍यादा पंडित बौखलाए हुए हैं कि तुमने चाट के चक्‍कर में प्रत्‍यक्षा तक के कल का पोस्‍ट नारद से उड़वा दिया! संस्‍कृति और नारी सम्‍मान करते रहते हो? फिर प्रत्‍यक्षा मुसलिम भी नहीं!..

जीतू वाला रूमाल ले‍कर मैंने चेहरे का पसीना पोंछा.. फिर थोड़ा कांपते और कुछ हांफते हुए जस्‍सी को लपेटा- क्‍या बात करते हो, बॉस.. जीतू यहीं- माने कानपुर-धानपुर में ही है?..

- जीतू-देबू सब यहीं हैं.. जीतू एक फ़ोन की और देबू एक ई-मेल की दूरी पर..

- तो फिर? शुक्‍ला तो अंतत: ब्राह्मण ठहरे.. मगर ये लोग कोई स्‍टैंड क्‍यों नहीं ले रहे?

- क्‍या और कहां से स्‍टैंड लेंगे? जीतू ने मुझे पहले ही दिन कह दिया कि निर्मलानंद टाइप चिट्ठों के सवाल-जवाब वाली अपनी बुद्धि नहीं है! अपन यार, आओ, मिल बैठें हम दो और मॅकडावल टाइप आदमी हैं!.. ये सब पंडित जी हैंडल करें!.. तो कर रहे हैं पंडित जी.. अपनी बुद्धि और अहमदाबाद के हॉटलाईन से जैसा इंस्‍ट्रक्‍शन मिल रहा है, उसी में सुर मिलाकर हर जगह दो-दो पेज वाली टिप्‍पणी कर रहे हैं.. जिसमें बात कोई नहीं होती, सिर्फ़ यही दोहराया जाता है कि नारद की मूंछ नीची नहीं होगी!.. और देबू ठहरे बंगाली आदमी.. वह भी बनारस के.. ऐसी मारामारी में अखाड़े में उतरें इतना जवान में कलेजा नहीं..

- मगर नारद की मूंछ को लेकर इतना हाय-तौबा क्‍यों, जस्‍सी? नारद तो वैसे भी क्‍लीन शेव्‍ड था, यार?..

- अहमदाबाद पेटी-पुटी मॉब ने उसे मूंछे दे दी हैं.. और अब कनपुरिया पंडित को चैलेंज कर रहे हैं कि काटने का दम है तो काटके दिखाओ!

- तो?.. पंडित जी दम के चपेटे में आकर बेचारी प्रत्‍यक्षा तक जैसी पर का अत्‍याचार झेल रहे हैं?.. कुछ तो दम होगा, जस्‍सी?..

- तुमने अभी दुनिया देखी नहीं है, परमोद हिंग!.. अपने लिखे को एडिट करने का तो दम है नहीं, मूंछ काटने का दम कहां से लाएंगे?.. दिल्‍ली मीट के बहाने सारे मामले पर पानी डालने की कोशिश करेंगे.. और थोड़ा संभव हुआ तो अभी निर्मलानंद को गाली देनेवाला एक पोस्‍ट चढ़ाने की सोचेंगे.. मगर ज्‍यादा संभावना है कि एक ज़र्देवाला पान खाकर उस कड़वाहट के स्‍वाद को भी बस भूल जाने की ही कोशिश करें..

दुनिया बदलती जैसी दिखनी चाहिए, बदलनी तो किसी सूरत में नहीं चाहिए!

अधपियी सिगार टूटे एशट्रे में दबाकर जसबीर बसाइन बाथरूम की ओर बढ़ गया.. मैं न चाहते हुए भी गोल्‍ड फ्लैक फूं‍कता बड़ी-बड़ी चिंताओं में पड़ गया..

आओ आओ लात लगाएं..



आओ आओ घात लगाएं
घेर घेर के लात लगाएं

किसने कहा हम चिरकुट हैं
कहवैये की तो बाट लगाएं

मुक्‍ता सरिता के बड़ पहुंचे ज्ञानी
हमसे न टकराना ओ अभिमानी

न हमसे दुष्‍ट तुम खेल करो
सपनों में हमारे न ठेल करो

हुर्र हुर्र चंद्रलोक तक जाना है
हुर्र हुर्र मंदिर वहीं बनाना है

बेबात बात बहुत कर ली
दिन में रात बहुत कर ली

अब तो पटरी पर आना है
जो न आएं उन्‍हें लतियाना है

टिल्‍लू हिल्‍लू मत घबराना
तेरे पीछे सारा चिठघराना

अरे आओ आओ न घात लगाएं
घेर घेर के हुर्र हुर्र लात लगाएं

Sunday, June 17, 2007

ठाकुर का कुंआ के गबरू होनहार बच्‍चे और पंडीजी..

मैंने ठाकुर का कुंआ कहानी नहीं पढ़ी है. पढ़ी भी होती तो क्‍या फ़र्क पड़ता, यहां ढेरों ‘चड्डी पहनकर फूल खिला है’ टाइप गबरू पढ़ाका बच्‍चे हैं, एक सुर में रेंकने लगते कि बहुत अपने को पढ़वैया मत लगाओ! फ़ारसी नहीं, हिंदी वाली कहानी लाओ!.. इन चड्डी पहने बच्‍चों से हिंदी, हिंदू किसी भी मसले पर बात करना वैसा ही है जैसे गोविंदा के मुंह से ‘डिस्‍कवरी ऑफ इंडिया’ की सूक्ष्‍म समीक्षा सुनना! हो सकता है इस पंक्ति तक पहुंचते ही तीन बालक अपनी कुर्सी पर खड़े भी हो गए हों- डिस्‍कवरी ऑफ इंडिया का अनुवाद कीजिए, सर? इन पंक्तियों के लिखे जाने के दरमियान- हो सकता है कोई बालक आज के पोस्‍ट पर अनामदास के लिखे के जवाब में यह पूछने के लिए उद्धत भी हो रहा हो कि ‘आर्गुमेंटेटिव इंडियन’ बोलकर आप कैसी छूट लेना चाह रहे हैं, साफ़ कीजिए, मास्‍साब? ज़ाहिर है ये होनहार बालक अमर्त्‍य सेन तो नहीं ही पढ़ेंगे, उनकी किताब का बैक कवर भी नहीं पढ़ेंगे.. मगर अपनी ज़हीन व महीन बुद्धि से आर्गुमेंट का बायां और दायां समझ-समझाकर- उसे खींचकर व फींचकर- रामलीला के गत्‍ते वाले पेड़ से टंगे आम व अमरूद खाकर हाय-हाय और आह्-ओह् का गान ज़रूर करने लगेंगे! वह हाथी वाली कहानी है न.. कि एक आदमी पैर छूकर.. तो दूसरा सूंड़ थामकर हाथी की पहचान व्‍याख्‍यायित कर रहा है? तो रामलीला के इस टूटी चौकियों वाले तिरपाल ढंके मंच पर बातचीत भी कुछ उसी शैली व स्‍तर पर चल रही है! ज्‍यादातर छौंड़ा मन इतने ही ज्ञानी हैं कि रामलीला से बाहर के किसी दूसरे किस्‍म के संवाद के बुलते ही फैलने लगते हैं.. तिलमिलाकर नाक व देह के अन्‍य स्‍थानों से धुंआ छोड़ने लगते हैं! इन्‍हें लगता है हिंदी को इनका अपूर्व दान व अनुदान इसीमें निहित है कि सारे संवाद रामलीला वाले स्‍तर पर ही चलें! कोई चवन्‍नी छाप नौटंकी से अलग किस्‍म के डायलॉग करे तो इनका सिर पिराने लगता है.. बात-बात में पानी और दूध पीने लगते हैं.. दस दफे चड्डी बदलते हैं मगर फिर भी चैन नहीं पड़ता! भारतीयता के होनहार सपूत व हिंदी का कल ज़मीन पर लोटकर बिलबिलाने लगते हैं कि हमारा रामलीला वाला डायलॉग लौटाओ- नहीं तो हम चड्डी में पेशाब कर देंगे?

मैंने ठाकुर का कुंआ से क्‍यों बात शुरू की थी? दरअसल गांव में एक कुंआ होता है और ठाकुर का ही होता है.. वहां वही पानी पीते हैं जिन्‍हें ठाकुर अपना पानी पीने और छूने लायक समझता है.. बाकी पानी नहीं पीते- ठाकुर के लठैतों की लाठी खाते हैं. लाठियां भांजनेवाले लठैत ही नहीं, लात और लाठियां खाते मलेच्‍छ, चमार, दुसाध भी हाथ जोड़े पंडीजी की तरफ देखते हैं.. और पंडीजी जो हैं मुस्‍कराकर ठाकुर की तरफ देखते हैं और वही जपते हैं जिससे आजतक रामलीला सार्थक होती चली आई है- कि प्रभो, न्‍यायमार्ग से विचलित होनेवालों की यही उचित व न्‍यायोचित दंड है!.. फिर पता नहीं पंडीजी गांठ में कितना छंटाक चावल और गुड़ बांधकर प्रभु की सेवा और अपना जीवन सार्थक करने लगते हैं!..

जानता हूं आप हंसिएगा.. बोलिएगा कितनी डेटेड कहानी है! साली, दुनिया कहां से कहां निकल गई और आप जो हो अभी तक मुरली-बजैया-किसन-कन्‍हैया गा रहे हो! मगर आपकी आत्‍मा हिंदी के आर्गुमेंटेटिव मर्मस्‍थलों को पहचानती है तो आप हसेंगे नहीं.. आपका मन उखड़ जाएगा, आंख से भर्र-भर्र आंसू छूटेंगे.. क्‍योंकि ताज़ा-ताज़ा आसमान छूने की हसरत पाल रहे- कमसकम हिंदी के आभासी लोक का- अग्र और पृष्‍ठ यही है! सिर से पैर तक रामलीला के भजन ही हैं.. बाकी जो है राम-राम है!..

नहीं, मैं नारद से निकलने की यह अरजी नहीं भेज रहा हूं.. वह साहस दो-चार दिन ठहरकर जुटाऊंगा.. फ़ि‍लहाल ढेर सारा पतनशील साहित्‍य रचने को मन कुलबुला रहा है.. सोचता हूं सबके सामने जाकर ठाकुर का कुंआ गंदा कर आऊं.. मगर पता नहीं क्‍यों वह भी दो कौड़ी के रामलीला वाला काम लग रहा है!..

रवीश कुमार, अनामदास के साथ-साथ आज अभय और प्रत्‍यक्षा ने भी अपनी बेचैनी दर्शायी है.. मजे़दार बात है सुबह से ये पोस्‍ट की गई हैं मगर अभी तक नारद पर नज़र नहीं आ रहीं.. हमारा पतनशील और रवीश का भूत पहुंच गया मगर ये समाज-सापेक्ष चिंताएं नहीं पहुंच पा रहीं.. इन पोस्‍टों के नारद पर न दिख पाने की ज़रूर ही कोई तकनीकी वजह ही होगी!.. ख़ैर, सबपर एक नज़र मार लीजिए.. फिर अपनी समझ व बुद्धि के अनुरूप सिर पीटिये.. या जाकर गबरू बच्‍चों की पीठ थपथपाइए.

Saturday, June 16, 2007

मुम्‍बई ब्‍लॉगर्स मीट: कुछ छूटे टूटे तार..

ब्‍लॉगर्स मीट पर आमंत्रित न होकर ढेरों लोग क्षुब्‍ध हो रहे हैं. सबसे पूछ-पूछकर हमारी जीभ दुखने लगी है कि हमारा नंबर किसने दिया?.. या यह बताते हुए कि गुरु, हमने ऑर्गनाइज़ नहीं किया था, आप कृपया यूनुस मियां को फ़ोन करके उन्‍हें गरियायें.. उन्‍हें वैसे भी गाली सुनने का बचपन से अभ्‍यास है.. मगर आधे घंटे बाद फिर वही क़ि‍स्‍सा!- हमको क्‍यों नहीं बुलाया?- हद है, यार! मैं बुलानेवाला कौन.. मीट-सीट तो क्‍या, अपने पास चाय-नाश्‍ता तक के इंतज़ाम की तो सेटिंग नहीं.. फिर जबरिया काहे मज़ाक बना रहे हो, प्‍यारे!.. पर कोई सुननेवाला नहीं. बड़ा गुस्‍सा आ रहा है उस पर जिस किसी ने भी हमारा नंबर लीक किया है. और किसने.. शशि सिंह ने ही किया होगा.. बड़ा ही नष्‍ट आदमी है, यार! करें क्‍या लेकिन.. शशिया का नवका मोबाइल सेट मार लें? कि पीछे पंगेबाज को छोड़ दें?..

सोचकर कन्‍फ्यूज़ हो रहे थे कि फिर फ़ोन आ गया. अनिल रघुराज का था. और नंबर शशि ने नहीं, हमारा ही दिया हुआ था. फ़ोन पर बरसने लगे. कहा, बड़े चिरकुट आदमी हो, बैठ गए, हमें ख़बर तक नहीं की? दो साल से दिमाग फटा जा रहा है कि सभा-अभा में कहीं भाषण दें, तुमने हाथ आया मौक़ा खींच लिया!.. मैं हूं-हूं करके उनका गुस्‍सा लेता रहा.. अब क्‍या बताता कि बैठकी तो संजय, शशि और अभय की थी, हमारा होना तो वहां अपेक्षित भी नहीं था.. पता चलने पर एक क्षण तो ऐसा भी आया कि मैंने खड़े होकर घोषणा की- अरे, जब मैं आमंत्रित ही नहीं हूं तो शायद चला ही जाऊं, मेरा रुकना नैतिक रूप से सही प्रतीत नहीं हो रहा!.. एकदम साहित्‍यकारों वाली अदा में तीर छोड़ा और मान-मनौव्‍वल के बाद साहित्‍यकारों की तरह मान भी गया.. लेकिन रघुराज को इन महीन तथ्‍यों को जानने की फ़ुरसत थोड़ी है! दो महीने से सुबह पांच बजे अखाड़ा जाकर और आधा सेर ताज़ा दूध पीकर दिमाग तेज़ करने की कसरत में लगे हुए हैं; उन्‍हें इन दिनों अपने सिवा हर कोई दो कौड़ी की समझ वाला आदमी लगता है. वही समझ दीखाकर एक बार फिर डांटे- हमको बुलाकर क्‍या फ़ायदा होता, इसका अंदाज़ करने की तो अक़ल रखते? दो मिनट में हम संजय लाल को पटरी पर कर देते, हां?..

मैंने मरी आवाज़ में प्रतिवाद किया- वही तो दिक़्क़त है, ठाकुर साहेब.. संजय लाल को लगता है वही पटरी पर हैं, बाकी बे-पटरी के हैं.. हमको भी आधे घंटे तक वह पटरी पर ही लाने की कोशिश करते रहे.. एकदम्‍मे डिमोरलाइजिंग, गोन केस है, सर!.. मगर संजय तक ने हमारी नहीं सुनी, तो रघुराज काहे सुनते? अपनी ठेले रहे, बर्र-बर्र, ठों-ठों.. एक हाथ में फ़ोन और दूसरे में मनोहर कहानियां लेकर हम थोड़ी देर टाईम पास करते रहे, फिर डिसकनेक्‍ट कर दिया..

सोच रहे थे पूरा मामला पंगेबाज को शिफ्ट कर दें कि तभी दूसरा फ़ोन आ गया. ये आयम विकास कुमार एंड दिज़ इज़ माई वर्ल्‍ड वाले विकास कुमार थे. मैं कहना चाह रहा था, दोस्‍त, अपने ही वर्ल्‍ड में रहो, हमारे वाले में बड़ा टेंशन है.. मगर हमें बिना कहने का मौका दिये ये फैलने लगे कि हमको नहीं बुलाया, एक चाय और दो समोसे बचा लिए, वो तो ठीक है, मगर हमारे ई-उपन्‍यास के बारे में किसी ने बात क्‍यों नहीं की? कविता-सविता से ही, अगर वह ऑपोज़ि‍ट सेक्‍स की संज्ञा न हो, हमें टेंशन होने लगता है, तो यहां तो मिस्‍टर डेवलपमेंट सीधे नॉभेल का बम खोल रहे थे.. हमने घबराकर रॉंग नंबर कहा और फ़ोन डिसकनेक्‍ट कर दिए..

मनोहर कहानियां की रुबीना की दर्दभरी दास्‍तां एकदम मनोहारी टर्न पर पहुंच ही रही थी कि फ़ोन फिर से टिन्‍न्-टिन्‍न् होने लगा. विकास के बाद अबकी विमल थे. हर चौथे दिन नया पोस्‍ट डालने की धमकी देते रहते हैं, मेरे यहां से बीस कुत्‍तों की तस्‍वीरें सीडी पर छापकर ले गए हैं कि हर पोस्‍ट एक कुत्‍ते की फ़ोटो के साथ छापूंगा!.. लेकिन फिर उन्‍हें संशय होने लगता है कि ऐसा न हो तैयारी से पोस्‍ट लिखें और वह रजिस्‍टर होने के पहले ही नारद पर बैन हो जाए! इसीलिए लिखना रूका हुआ है.. फ़ोन पर भी उनकी वही चिंता थी.. पूछा- बैन-वैन की बात की तुमने? क्राइटेरिया क्‍या है एटसेट्रा?.. मैं कुछ कहूं इसके पहले वही बड़बड़ाने लगे- यार, तुम्‍हारे यहां के कुत्‍ते सब, साले, बड़े शरीफ़ लगते हैं, टोटल अनयूजेबल हैं.. मैं अपने ब्‍लॉग को थोड़ा रियलिस्टिक लुक देना चाहता हूं.. समझ रहे हो?.. चाइना वाली हमारे पास पिंक, पर्पल, ब्‍लू ढेरों चड्डि‍यां हैं, उनकी फ़ोटो चढ़ा सकता हूं कि नहीं? या बिंदू, फरियाल, पद्मा खन्‍ना, हेलेन की कैबरे वाली फ़ोटो जो मैं सातवीं क्‍लास से कलेक्‍ट कर रहा हूं, वो? या एमएमएस वाला भी थोड़ा कलरफुल मटिरियल है, उसको चढ़ाने से ये अनूप-टनूप बुरा मान जाएंगे, क्‍या बोलते हो, परमोद?..

मैं बोल नहीं रहा था, मन ही मन अभय को गालियां दे रहा था.. जिसकी वजह से इन द फ़र्स्‍ट प्‍लेस यह सारा टंटा खड़ा हुआ!..

चिरकुट प्रसाद का गद्यगान..

चिरकुट प्रसाद दुखी थे. चिरकुट नौकरी से जीवन नरक हो रहा हो जैसी कोई बात नहीं थी. दरअसल नौकरी के चिरकुट होने का तो चिरकुट प्रसाद को बोध भी नहीं था. नौकरी तो नौकरी होती है, अच्‍छी और चिरकुट क्‍या. साहब, साहब की वाईफ और उनके लॉन के गुलाब के पौधे पर बीच-बीच में पोयम लिखकर चिरकुट प्रसाद सुख में लहालोट भी हो लेते. साहब कभी कान खोदते हुए उन्‍हें कविजी बुला लें तो खुशी में चिरकुट प्रसाद की आंखें मुंद जातीं, फुदकने लगते. भय होता कहीं मदहोशी में गिर न पड़ें.. तो चिरकुट प्रसाद सुख की नदी में ही बूड़े हुए थे. मगर कभी-कभी जी करता कि एक डुबकी नदी से बाहर, सुख के सागर में भी लगा लें.. और सागर की तरफ रुख करते ही चारों ओर उनकी चिरकुटई का उजियारा फैलने लगता!..

अभी कल ही बात लीजिए.. दिल्‍ली से आए एक परिचित को चिरकुट प्रसाद ने उत्‍साह में अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं, और परिचित जो हैं एकदम उखड़कर इनको डांटने लगे- अबे, ये कविता है? कविता का जानते हो? ज़ि‍न्‍दगी में पढ़ी है कभी कविता?.. हटाओ सामने से नहीं तो अभी चप्‍पल निकाल के पीटने लगेंगे, सारा साहित्‍य पजामे से बहकर बाहर निकल जाएगा! चिरकुट प्रसाद की आत्‍मा रो रही थी, लेकिन ऊपर हंसते हुए बोले- परिचितजी आप कितना जोकिंग हैं! कि जोकफुल हैं? कि जोकियल कहना चाहिए?..

परिचित ने अबकी मर्तबा मुंह से नहीं लात से बात की.. खींचकर एक चिरकुट प्रसाद के कमर पर जमाई.. और चिरकुट प्रसाद मय अपने साहित्‍य के हास्‍य-चपल होने की जगह हास्‍यास्‍पद होकर सड़क के बाजू एक अधकटे ड्रम के खदकते कोलतार में गिरते-गिरते बचे!

देह को गिरने से बचाकर आत्‍मा और अपनी समझ को भी गिरने से बचा गए हैं- की चतुराई में खिले-लहलहाते चिरकुट प्रसाद घर लौटे तो पत्‍नी ने हाथ का साहित्‍य खींचकर बोरे पर सूखते अचार के मसाले पर फेंक दिया और गरजने लगीं.. साहित्‍य पर नहीं, सास पर गरज रही थीं. गुस्‍से में सॉस की शीशी तोड़ दी. चूंकि उनके पैर पर नहीं टूटी थी, चिरकुट प्रसाद के मन में कविता आकार लेने लगी. वही लिख रहे थे जब पत्‍नी ने पीछे से आकर एक और लात लगाई. कुर्सी से उछलकर चिरकुट प्रसाद मुंह के बल गिरते-गिरते बच गए, लेकिन इस बार चिरकुटई की साक्षात प्रतिमूर्ति हो रहे थे. पत्‍नी फटी आवाज़ में चीख़ीं कि फिर कविता लिखते देखा तो पेट में कलम घोंप दूंगी!..

हालांकि चिरकुट प्रसाद कलम से नहीं की-बोर्ड के की पर कविता जोड़ रहे थे लेकिन पत्‍नी की धमकी से मन मलिन और भाव मार्मिक होने लगे! आज तक पत्‍नी पीछे से आकर ही लात लगाती रही थी, पेट में कलम घोंपने की बात का ज़ि‍क्र नहीं किया था.. और पेट क्‍या, चिरकुट प्रसाद कहीं भी कलम घोंपवाना नहीं चाहते थे!.. मगर आज तक यह भी नहीं हुआ था कि रात के खाने के आधे घंटे पहले नियम से उन्‍होंने एक कविता की रचना नहीं की हो!.. रिकॉर्ड था. और चिरकुट प्रसाद अपना रिकॉर्ड नहीं तोड़ना चाहते थे.. मगर चूंकि चिरकुट थे, आसन्‍न मुसीबत का उन्‍होंने एक आसान रास्‍ता खोज निकाला.. कविता की बजाय, गद्य में समाज का प्रशस्ति-गान गाने लगे.. दीवार की धूल और ज़मीन की मिट्टी चूमने लगे!

अभी प्रशस्ति का गलत हिज्‍जा दुरुस्‍त भी नहीं किया था कि ऊपर चप्‍पलों की बारिश होने लगी.. और यह बीवी नहीं थी!.. वही सुदूर के परिचित थे जिन्‍होंने पहली लात लगाई थी.. और अब खोजते-खोजते घर के भीतर कंप्‍यूटर तक चले आए थे!..

कशमकश व तनाव की अजब संगते खिंचने लगी.. चप्‍पल व गालियों की बड़ी महीन जुगलबंदी सजने लगी! एक झलक लीजिए: आह्!.. ओह्?.. अरे!.. अच्‍छा?.. अबे!.. मानोगे नहीं?.. फिर लगाऊं एक?.. थानेदार!.. चमार!.. व्‍यापार?.. धक्‍का.. चोर!.. सीनाजोर?.. गली.. गाली?.. कहां?.. कौन?.. हाथ टूट रहा है, साले!..

हद है.. आपकी जानकारी के लिए साफ कर दें, ये सारी मार्मिक अभिव्‍यक्तियां साहित्‍य और समाज के चिंतार्थ प्रकट हो रही थीं.. ओर इसमें चिरकुट प्रसाद की आत्‍मा गहरे तक धंसी हुई थी, अलबत्‍ता चिरकुटई कहीं थी तो उन्‍हें नहीं दिख रही थी!..

Friday, June 15, 2007

इंगलिस सीख रहे हैं..

रामजीत राय का नैहर गई पत्‍नी बेबी को पत्र..


डारलिन, शिटहार्ट, छौ दिन बारह घंटा गुजर गया, तुम कौनो लेटरे नै पठा रही हो? कौन बात है? देह, मन, दिल, जिकर सब ठीक पोजीसन में है न, जी?.. ऊपर से जमाना भले धरमेंदर बूझे, भीतरे मन कइसा त डेरायल-डेरायल रहता है! संझा-सकालि मने मुकेस का गाना गोनगोनाते रहते हैं- दिल धरक-धरक के कह रहा है आ भी जा... तू हमको अउर ना सता.. एतना बिनती-गोजारिस करते हैं, रिकेस्‍ट पे रिकेस्‍ट मारते रहते हैं कि पूजा-आरती, बरत-उपबास से जादा इनपोरेंट-पबित्‍तर कारज है मन-देबता को लभ-लेटर पठाना.. लेकिन तुमको बुझइते नै है! आपका लभ-लेटर का अभाव में जिकर पीपल का पत्‍ता माफिक खरखराता रहता है, डारलिन.. अइसा दरद मत दो कि तुमरे पराननाथ का पराने छूट जाए?

मम्‍मीजी का एतना चिरौरी-बिनती किए, गोड़ दाबे, मुक्कियो मारे.. उनका मन रक्‍खे का बास्‍ते पहारी चढ के फूलदेबी का मंदिर में फूलो चरहाये.. लेकिन हमरा मोबाइल अबहीं तलक नै किनाया है! जबकि जयकिसन यादौ अउर बिसनाथ ए बीच कीन लिए हैं.. सेकिन हैंड वाला है लेकिन गरदन में टांगके सगरे घूमते रहते हैं अउर हमरा छाती पे सांप लोटाते रहते हैं! ए महीना का आखिर तलक हमरा मोबाइल नै किनाया त मम्‍मीयो जी से नफरत करने लगेंगे, सच्‍चो में!..

अउर ऊ पांड़े ससुर हैं कि बारह हजार का हरियर-हरियर पत्‍ता दाबके चुप्‍पे पटायल पड़ल है.. अबहीं तलक हमरा नवकरी का फरंट पर कौनो पोरगरेसिन नै हुआ है! रोज जाके चरन छूके असीस लेते हैं अउर रोज बभना वहिये मंतर छोड़ता है कि अभी ले नूज़ नै आया है!.. महीना भर इनका तिरिया चलित्‍तर देख लें फिर ऊ चप्‍पल-चप्‍पल पीटेंगे कि सब बभनई झर जाएगा!.. संकर जी का दरबार में भी न्‍याय नै है! हमको नवकरी दे रहे हैं न मोबाइल अउर ऊ जैकिसना छरछरा के घूम रहा है.. मउगी भी बड़ गोर अउर नमकीन पाइस है हरमखोर!..

पंड़वा के हिंया रोज-रोज चरन छू के अब मन घिन्‍नाता है लेकिन.. तुमरा पाती पाके करेजा सीतल होता त तुम पाती नहिंये भेज रही हो.. गालिप का सेर गाके गम बहाते रहते हैं- लगता नै है दिल मेरा उजरे दियार में.. अउर गाते-गाते बीच-बीच में पवने तीन रुपिया वाला टिकिस का मेटनी सो सलीमा देख आते हैं! अब का करें, डारलिन, घरे बइठे रहते हैं त तोहरा खयाल में करेजा में आगी जरने लगता है.. फिर पापाजी का लेच्‍चर अलग! त दरद भरा औंजाइन मन का सांति बास्‍ते सलीमा का अंधेरा में जाके तीन घंटा चैन पाते हैं. मगर दू दिन पहिले बड़ गडबड हो गया.. ‘क्रेझी लभ’ का माल-मसाला वाला फोटू देखके टिकिस लिए, सलीमा का अंदर घुसे.. घंटा भर निकल गया एक्‍को गो मसाला नै लउका.. इंटरभेल का रोसनी हुआ तो मन जइसे गोड़ का टूटही चप्‍पल.. अउर तबहीं बगल का कुरसी में, बूझो, किसको देखते हैं? बूझो, बूझो!.. पापाजी को!.. दिमागे संट हो गया! मुंहे खुल गया! आंखि तो खुलले था! पूछे तुम हिंया क्‍या कर रहे हो त जबाबे नै सूझा- घंटा बोलें का? अरबराके बोले इंगलिस सीखने बास्‍ते आये थे!.. अउर वहिंये सगरे पबलिक का सामने पापाजी हाथ छोड़ दिए!.. टाइम, सिचैसन का ई आदमी को सच्‍चो कब्‍बो खयाल नै रहता है! टोटल संधा खराब कर दिए! अउर तुम जो है कि लभ-लेटर नहिंये पठाई हो?..

कल पोखरी में नहाने गए थे त रमजतना बहुतै चोन्‍हा-चोन्‍हाके तुमरे गांव के परेम परकास का जिकिर कर रहा था.. बात का है?.. परकसवा मरा-सरा त नै न है, जी?

पल-छिन रात दिन तुमरा लभ-लेटर का वेटिन में..

तुम्‍हारा हिरदय सम्राट रामजीत

Thursday, June 14, 2007

मुंबई ब्‍लॉगर्स मीट की प्रामाणिक व वास्‍तविक रपट..

संजय ने सब गलत-सलत लिखा है. कमल शर्मा और शशि सिंह से मिलने की बातों तक शायद सही भी हो, आगे का हाल मिथ्‍या है. मेरी तस्‍वीर भी गलत छापी है, अभय की तो गलत है ही. अभय वास्‍तव में पेंटल की तरह दिखते हैं, बेंगाणी असरानी की तरह, शशि सिंह राजेंदर नाथ की तरह.. और मैं जो है, नैचुरली, जॉर्ज़ क्‍लूनी की तरह दिखता हूं. इतने दिनों बाद जाकर एक बार फिर पता चला कि फ़ोटो फ़ोटो होता है, यथार्थ नहीं! अपनी गलत झांकी दिखाने के लिए मैं संजय पर दावा ठोंकने की भी सोच रहा हूं. इससे हो सकता है कोर्ट उनकी मल्‍टीमीडिया वाला दफ़्तर मेरे नाम कर दे और अब तक जो वो काट रहे थे उनकी जगह अब मैं नोट काटना शुरू कर दूं! बुरा आइडिया नहीं है.. फिर सुनीता शन्‍नू मुझे फ़ि‍ल्‍म प्रोड्यूसर बुलाएंगी तो मुझे बुरा भी नहीं लगेगा!.. एनीवे, इन सब बकवासी असाइड्स को साइड में रखकर आइए, मुम्‍बई ब्‍लॉगर्स मीट की रियलिस्टिक तस्‍वीर से रूबरू हों..

अखाड़े में संजय को पटकने के पहले, आइए, काकेश को निपटा लें. इस फ़ॉर्मल ब्‍लॉगर्स मीट के दो दिन पहले काकेश से इनफ़ॉर्मली, अंधेरी स्‍टेशन के किचिर-मिचिर से लगे एक सस्‍ते होटल के सस्‍ते-से लाउंज में- मुलाकात हुई थी. जगर-मगर ट्रैफिक वाली सड़क पर हैंडिल में हैलमेट फंसाकर बाइक पार्क करके- इसका पूरा रिस्‍क उठाते हुए कि मैं होटल के अंदर जाऊं, और बाहर टोल गाड़ी हमारी बाइक टोलिया कर निकल ले- मैं लाउंज के अंदर काकेश से भिड़ने की मानसिकता लिए पहुंचा, और अंदर पहुंचते वहां का दृश्‍य देखकर मेरे दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए. काकेश की दिमाग में तस्‍वीर कुछ राजा बाबू टाइप थी जो डिग्री कॉलेज के गेट के बाहर यार लोगों के गरदन में हाथ डाले लड़ि‍याते रहते व गेट के सामने से गुजरनेवाली लड़कियों के रिक्‍शों की ज़ि‍न्‍दगी हराम किए रहते हैं. यहां उसकी बजाय कोई डुप्‍लीकेट अपने को काकेश बताता बैठा था, और लड़कियों की रिक्‍शे की बजाय, जिम्‍मेदारी से अभय के प्रवचन सुनता हमें टेंशन दे रहा था! मैंने कहा यार, तुम तो बड़े बोरिंग निकले, असली काकेश कहां है? तो ये जनाब शराफ़त की झूठी हंसी दिखाकर बोलने लगे वही तो इतने वर्षों से खोज रहा हूं!..

दारू न मटन, कुछ भी हाथ नहीं आया.. कोई सनसनीखेज़ गॉसिप तक नहीं.. छूछे चाय से किसी तरह घंटा भर काटा.. अभय ऊटपटांग बातें करते रहे, काकेश शिष्‍यत्‍वभाव से सुनते रहे, मैं भयानक तरीके से बोर होता सब बर्दाश्‍त करता रहा.. और फिर उस रात नींद भी नहीं आई!.. तो इस तरह मिलना हुआ काकेश नामधारी एक झूठ और फ़रेबी तस्‍वीर से..

आगे का सुनिए. माने एक दिन आगे. यूनुस मियां का हमारे यहां मेल आता है- संजय शहर में आ रहे हैं, ब्‍लॉगर्स मीट करनी है टाइप बकवास. मैं यूनुस को कहता हूं, यार, तुमने ज्ञानदत्‍त जी का मीटवाला पोस्‍ट पढ़ा या नहीं?.. फिर?.. वैसे भी संजय और हम बात क्‍या करेंगे?.. सामने बैठकर एक-दूसरे को टेंशन देंगे.. तो इस मीट-सीट से मुझे दूर रखो, वैसे भी आजकल मैं दूसरे मीट की सोच रहा हूं! चूंकि मैं डांट-डांटकर बात कर रहा था, यूनुस मियां को जल्‍दी ही सारी बातें समझ आ गईं, और मैं एक खामख्‍वाह के टंटे में फंसने से बच गया..

मगर अभी चौबीस घंटे भी बीते नहीं थे कि फ़ोन पर अभय जी का न्‍यौता आया कि बड़ा मस्‍त पकवान सेट किये हैं, आधे घंटे में पहुंचिए. हम पहले ही पहुंचे तो पहुंचकर पकवान की सच्‍चाई खुली. गुस्‍सा तो बड़ा आया मगर पकवान न सही चाय-नाश्‍ते के मोह में ही अटके रहे. अटके हुए, मन ही मन अभय को गालियां बकते, संजय, शशि और यूनुस मियां की राह तकते रहे..

और जैसा स्‍वाभाविक था, संजय के भय में यूनुस मियां पहुंचने में देरी करते रहे, मगर अभय और मुझे सेट करने की नीयत से संजय और शशि वक़्त से पहले ही पहुंच गए. फिर झटका लगा. संजय गेरुआ वस्‍त्र की बजाय नॉर्मल शर्ट और काले बेल्‍ट से पैंट संभालते आए (मगर नोटों वाला केस साथ में था जिसे देखकर मन के पूर्वाग्रह को संतुष्टि मिली); फिर शशि सिंह की एक बड़ी गंदी आदत है- आपकी (यानी मेरी) आलोचना कर रहे हों तो भी जवान हंसते-हंसते बात करता रहता है- इस गंदी आदत पर मैं झिड़कने ही वाला था कि तब तक दूसरा झटका लगा! इसकी ख़बर लगते ही मेरा वास्‍तविक परिचय क्‍या है, संजय बेंगाणी खड़े हो गए! मुझे लगा पिस्‍तौल या बंदूक जैसी कोई चीज़ बाहर करेंगे मगर इसकी बजाय गुस्‍सा बाहर करने लगे!.. इतने प्‍यार से अपने ब्‍लॉग पर मैंने डानियेल क्‍लाउस और रॉबर्ट क्रंब का हेडर चढ़ाया है, उसे दो कौड़ी का बताकर नाक से धुंआ छोड़ने लगे.. कहा अज़दक देखते नहीं क्‍योंकि हेडर के विद्रूप से ही मन घिन्‍ना जाता है! मैं किस तरह का घिनाइन जीव हूं जो ऐसी चीज़ सजा रखी है?..

जोगलिखी पर संजय ने जो रिपोर्ट लिखी है वह सब ग़लत है कि भेजे में घुसने लायक लिखो तो आकर पढ़ें भी. ऐसी बात लिखी होती तो मैं तो तभी माफ़ी मांग लेता कि गुरु, भेजे में कभी-कभी तो अपने भी नहीं घुसता इसीलिए तो अनामदास से दोस्‍ती गांठ रहे हैं कि बात लिखने का गुर सीखकर लंदन वाली नौकरी (और वहीं की छोकरी!) सेट कर लें, मगर मन के ये मार्मिक दुख कह सकने का संजय ने कोई मौका ही नहीं दिया, हेडर की बात छेड़कर वैसे ही मेरा दिल तोड़ दिया था.. मगर उसके बाद मैंने बुद्धिमानी दिखाई. मोहल्‍ला और अविनाश की बात छेड़कर महफ़ि‍ल को रंगदार बना दिया. सब मिलकर अविनाश को गाली देने और सुखी होने लगे. अभय जी को इससे थोड़ी तक़लीफ़ होने लगी तो मैंने उनको डांटकर पेंटल कह दिया और वे एकदम चुप हो गए.

शशि ने फिर हंसते-हंसते चुपके से अपना नया मोबाइल सेट और अपने बच्‍चे की तस्‍वीर भी दिखा दी, और हंसते-हंसते मेरी भाषा का अच्‍छा मज़ाक उड़ाते रहे. मैं उनको डांटने की सोच ही रहा था कि संजय फिर पैसा बनाने के कुछ मज़ेदार टिप्‍स देने लगे.. और मैं सीरियस होकर सुनने लगा.. अभय भी अपना सारा स्‍वामित्‍व भूलकर डायरी में संजय के नोट्स लेने लगे..

बड़ा मज़ा आ रहा था लेकिन संजय की ट्रेन का वक़्त होने लगा सो पैसों का ज्ञानदान बीच में ही रोकना पड़ा.. संजय की विदाई हुई.. नीचे हैलमेट के अंदर मुंह छिपाये डरे-डरे-से यूनुस मियां खड़े मिले.. संजय के अस्‍सलाम वलेकुम कहने से यूनुस को गहरा धक्‍का पहुंचा, क्‍योंकि वह रास्‍ते भर प्रणाम वाला रिहर्सल करते रहे थे..

ख़ैर, संजय के जाने के बाद अभय ने दारु की सारी बोतलें बाहर निकाल लीं, और ठंडी-ठंडी चुस्‍की लेते हुए हमने ब्‍लॉग-स्‍लॉग के क़ि‍स्‍से एकदम दरकिनार कर दिया, और युनूस मियां से फ़ि‍ल्‍मी दुनिया की ढेरों रसीली कहानियां सुनीं.. एडल्‍ट टाइप कहानियां हैं आपको नहीं बता सकते.. या फिर नारद ज़रा और उदार हो जाए तो वह भी बताएंगे किसी दिन.. धीरज रखिए.. तब तक अज़दक आकर हमारा हेडर निहारते ठंडी-ठंडी सांसें भरा कीजिए!

(सबसे ऊपर मेरी असल, वास्‍तविक फ़ोटो; नीचे संजय अपने असल रूप मे.. अभय व शशि सिंह की तस्‍वीरें बहुत फूहड़ प्रतीत हो रही थीं इसलिए उन्‍हें चढ़ाकर हम अपने ब्‍लॉग का लुक गंदा नहीं करना चाहते.. )

बकरी की लेंड़ी..



कैसी गुमसुम निर्दोष चुप्‍पे रही खड़ी
डोली, हिली-डुली हटी तो दीखी पड़ी
चोथा नहीं लोथा नहीं जी, लिटिल लेंड़ी
बकरी की लेंड़ी, जी, बकरी की

काम के न काज के लोक के न लाज के
व्‍यवहारहीन सारहीन भारहीन विचारहीन
जाने कैसा मद है याकि अपच का दस्‍त है
रहते-रहते नियम से पट पट पट बजाती है
आंगन दुआर कठवत परात सब्‍बे सजाती है
बकरी की लेंड़ी, जी, बकरी की

अजी कोई बात हुई ऐसा कोई करता है
सबका भरोसा भला ऐसे कहीं हरता है
नन्‍हकू नगीना नरमदा बताय रहे
लल्‍लन लालमोहन सबहीं सुझाय रहे
हमीं थे हंस दिये ज़ि‍द में झटक दिये
तिल का जबरिये ताड़ करो कहके फटक दिये
क्‍या थी ख़बर कि अचक्‍के चली आती है
गमछा दुशाला लिटिल लेंड़ी सजाती है

जिनको हिलगना हो हिलगें हिलाएं
छाती से साटें कि माथे मुकुट सजाएं
अजी, रहेगी तो वही बिवाय फटल एड़ी
लिटिल बकरी की लिटिल लिटिल लेंड़ी.

Wednesday, June 13, 2007

किस ख़्वाहिश पे दम निकले..

एक बच्‍चा खाली गुलेल लिए छटपटाया यहां से वहां अपनी खोज में बेकल है. रोककर उसके हाथ में चार कंकड़ रख दीजिए, फिर देखिए क्‍या उसका चेहरा खिल उठता है!.. इस बड़े व्‍यापक संसार में कंकड़ की एक भूमिका है. जैसे कहां-कहां की नकारा नामालुम, ग़ुमनाम सब चीज़ों की कुछ न कुछ, कभी न कभी भूमिका होती ही है, भले वह हमेशा प्रत्‍यक्ष, साफ़-साफ़ न दिखे. हमारी-आपकी भी है. होती है. एक ख़ास सुर, एक रवानी, एक थिरकन होती है जो हमें हमारी मार्मिकता में सबसे बेहतर ढंग से प्रकट करती है. बहुत बार हमारा यह विशिष्‍ट हमारा ख़ासमख़ास निजीपना आसानी से हमारी पहचान व पकड़ में आकर हमारे जीवन का सहज अंग हो लेता है.. तो बहुत बार ऐसा भी होता है कि हम अपना समूचा जीवन जी ले, और हमारे जीवन का जो यह ख़ास दुलर्भ विशिष्‍ट तत्‍व है, उसके बाहर आने, उसके अभिव्‍यक्‍त होने का मौका ही न बने.. या हम बना पाएं! बाहर आना दूर की बात हुई, उसकी सही शिनाख़्त करने तक की समझ खड़ी न कर सकें..

बाज मर्तबा यह भी होता है कि जीवन में ऐसी परिस्थिति नहीं बनती कि आदमी अपने मन का कर पाए. आजीविका के दबाव और मालिक की हुक़्मउदूली में जीवन के सबसे अच्‍छे वर्ष बीते जाते हैं. तो यह तो है ही कि हमारे विषम, गरीबी व परेशानियों में लदे वर्गीय समाज में किसको कितना खुलने, खुलकर खेलने व अपने मन का करने का मौका मिलता है- कदम-कदम पर उसकी सीमाएं बनी-खड़ी ही रहती हैं. परिवेश की व्‍यापकता व बाज़ार के विस्‍तार में बीच-बीच में उसका अपवाद भी बनता है. मगर यहां काम की असल चीज़ वह नहीं.. मुद्दा है इस समूचे परिदृश्‍य में आदमी को इसका कितना अहसास है कि वह उसका अपना ख़ास ठीक-ठीक है क्‍या. उसके पा जाने जितना ज़रूरी न हो मगर उसकी सही पहचान कर लेना भी आम समझवाले व्‍यक्ति की ही नहीं, कभी-कभी अच्‍छे-अच्‍छों तक की पकड़ में नहीं आ पाती. इसमें और उसमें लोग हाथ लगाये रहते हैं.. और वर्षों बाद एक दिन पता चलता है कि अपनी यह कैसी मज़ि‍ल बनाई.. सब ग़लत-सलत खड़ा कर लिया!.. मगर तब तक यूं भी बहुत देर हो चुकी होती है. मगर मैं फिर भी उन्‍हें भाग्‍यशाली ही कहूंगा.. कि हुज़ूर, पहचान तो हुई!.. भई, इस बड़े, जटिल, अबूझ संसार के जगर-मगर में अपनी मनोवांछित भूमिका ढूंढ़ निकालना हंसी-खेल है क्‍या!?..

संसार में ऐसे लोग पच्‍चानबे प्रतिशत से ज्‍यादा होंगे जो सायास-अनायास जिस भी वजह से अपने मन का काम नहीं करते, कर पा रहे. कर रहे हैं रो-गाकर बेमन से कर रहे हैं.. बकिया के दो प्रतिशत में ऐसे लोग होंगे जो अपना मन का न मिलने से कोई काम ही नहीं कर रहे.. निपट आवारापने में ज़ि‍न्‍दगी काट रहे हैं.. तो इससे एक तस्‍वीर बनती है न्‍यूनतम संख्‍या वाले उन चंद भाग्‍यशालियों की.. जिन्‍हें अपने समय व संसार में होने की समझ भर ही नहीं है, बल्कि वे ठीक-ठीक अपने तबीयत का भी कर पा रहे हैं..

हाथ में डाब, मट्ठे की शरबत या सुराही का पानी पीते हुए आज एक बार इस पर भी सोचिएगा.. आप आजीविका ढो रहे हैं.. या आपने अपने मन का काम खोज लिया है..

आपकी गरमी में हरे हारे हुए..

तापमान रहने दीजिए कितना है जितना है भीषण है और हम सह रहे हैं. आंखों में आंच ताप उगलती हवा और चीकट, मुरझाये उमसभरे पल-छिन समूचा-समूचा दिन सह रहे हैं. पंखे के नीचे पानी के पीछे थोड़ी बयार एक अलसायी कोई फुहार दीवाना कर रही है, हम इस बेमतलब के दीवानेपन में बह रहे हैं.

यही है जो है एक छोटा-सा तो जीवन है बचपन का खदेड़ापन शिक्षा की व्‍यर्थता और समाज की अमानवीयताओं से सजा-गंजा, हज़ारों तक़लीफ़ों व लाखों शर्म में अड़ा-गड़ा ओह यह सिर. क्‍या तो सीखाया आपने और क्‍या-क्‍या जो सीखा हमने. कभी तो यह भी होता है, जनाब कि सोचते हैं सोचते हैं सोचते हैं और ज़बान से बात नहीं निकलती मन कैसा तो मरोड़ा रहता है रात नहीं निकलती. सोचते हैं आप आदमी हैं क्‍या हैं कैसा तो यह समय है और हमदम हमवतन हैं या कौन हैं जो तब से अंधेरे का अलौकिक आख्‍यान गा रहे हैं. भूखे को खाना नहीं गाने से जगा रहे हैं जो जगे हैं उन्‍हें पीटकर सुला रहे हैं. हृदय की मार्मिकता होती मन निश्‍छल निश्‍कलुष होता तो आप जान नहीं रहे हैं क्‍या-क्‍या तो हम कर गुजर गए होते, फूंक देते फुंक गए होते. कायरता और तहजीब में नहाये हुए लेकिन जो है भीड़ में सिर झुकाये खड़े हैं, कितना तो सहा अभी और सह रहे हैं.

आपके कहने की देर है, बोलिए तो हम वंदना भी गाएंगे. हंसेंगे तालियां बजाएंगे. या कहिए तो रो भी सकते हैं वह तो यूं भी बड़ा स्‍वाभाविक होगा. या फिर रेडियो पर बुलवा लीजिए कि अहा, कैसा तो सुहाना समय है और हुज़ूर की तो कहें ही क्‍या कभी ऐसा देखा न सुना. सब झुलसा ही तो है यहां वहां जाने कहां-कहां मगर हम हैं लस्‍त हैं लहक रहे हैं. यकीं न हो तो आइए देख लीजिए न कैसी चियराई चिलबिलाई मस्‍ती में महक रहे हैं.

Monday, June 11, 2007

नहीं समझने के पक्ष में...

अविनाश ने कल कहा ये ब्‍लॉगिंस-स्‍लॉगिंग के आन्‍तरिक ज़ि‍रहों में ज्‍यादा न उलझूं, देश-समाज की ऊंचाइयों वाले लेखन की तरफ उड़ निकलूं.. मैं एकदम उखड़ गया.. कहा, हद करते हो, यार! मैं यहां फंसा हुआ हूं और तुम्‍हें दिल्‍लगी सूझ रही है! बात क्‍या कर रहे हो.. उड़ने का हममें अरमान नहीं है?.. तुमने तो, ससुर, जनता और हमारे समय का वास्‍तविक प्रश्‍न वाला हल्‍ला मचाते हुए चुप्‍पे-चुप्‍पे घर भी खरीद लिया.. सेटिया लिए.. हम यहां सत्‍तर सवालों की मार्मिक गड़ही में गिरे हुए हैं और अनूप शुक्‍ला जैसे जिम्‍मेदार लोग स्‍माइली वाले कमेंट उछाल रहे हैं.. सहानुभूति तो कोई नहीं ही दे रहा है! प्रत्‍यक्षा से कहा तो वह कहती है आपके यहां एकनॉलेज नहीं होता, देकर फ़ायदा क्‍या?.. मान्‍या ही बेचारी अब तक इकलौती हमदर्द बनी हुई है (हमारा बस चलता तो रिलायंस से स्‍पॉन्‍सर करवा कर बेचारी दुलारी बच्‍ची को बेस्‍ट हमदर्द ऑन द ब्‍लॉग का एक अवॉर्ड तो दिलवा ही देते).. किनारा वो हमसे किए जा रहे हैं का गाना हम सुनाना चाह रहे थे, तो देख रहे हैं रघुराजजी ने पहले ही उसका रेकॅर्ड सुनाके ताली ले ली है! गर्मी पर हम उबलना चाह रहे थे तो वो काम भी रवीश ने फट से कविता एक ओर रख के निपटा लिया और हमसे बाजी मारके रिले रेस में आगे निकल चुके हैं! और हम हैं कि अभी तलक जान लें, समझ लें वाली ज़ि‍द पर अड़े हुए हैं.. क्‍या समझ क्‍या लेंगे? है क्‍या समझने को?..

पिछली दफा बाबूजी से मिले तो मुंह से धुंआ छोड़ते हुए फैलने लगे, बोले- दुनिया छोड़ के निकल जाएंगे लेकिन तुमको समझ नहीं सकेंगे! मुंह में च्‍युइंग गम घुमाते हुए मैंने जवाब दिया था, इट्स सेम स्‍टफ़ हियर, डैड.. वुडंट अंडरस्‍टैंड यू एवर, आईम टेलिंग यू! दो दिन पहले चार लोगों की संगत में अभय के यहां से निकलते हुए, लोगों के बीच शर्मिंदगी से बचने के लिए मैंने स्‍वामीजी के कान में फुसफुसाकर कहा, महाराज, दो सौ का नोट दीजिए, फटफटिया में तेल नहीं है.. तो अभय जी का जवाब सुनकर यही लगा कि हम उनको जानते नहीं, जानने की बस ग़लतफ़हमी ही थी. मुंह उतारे हम सी‍ढ़ि‍यां उतर आए, किसी भी क्षण गीली हो सकनेवाली आंखों को छिपाने के लिए रूमाल खोज रहे थे कि तबतक स्‍वामीजी ऊपर से भागे-भागे आए और हमारी जेब में कुछ हरा-सा चमकता खोंस दिया! हमारी अभी तक गीली न हो सकी आंखें अब गीली होने की बजाय फट गईं, और प्रकट में हमने कहा नहीं मगर मन में यही वाक्‍य दुहराया- स्‍वामी जी, हम आपको कभी समझ सकेंगे?

दो दिन पहले- स्‍वामी जी की ही कुटिया की बात है. दर्शन लेने अन्‍य भक्‍तों के साथ-साथ संजय बेंगाणी भी पहुंचे थे. अच्‍छे-भले स्‍वस्‍थ व प्रसन्‍न लग रहे थे.. और हमारे बगल में बैठे-बैठे लग रहे थे!.. मगर दस मिनट बाद जाकर जैसे ही उन्‍हें हमारी असली पहचान का पता चला, एकदम-से खड़े हो गए.. जोर-जोर से बताने लगे समझने में कितनी बड़ी भूल हुई थी!.. मैंने कहा ठीक है, ठीक है, बैठ जाइए.. इसमें शरमाने की बात नहीं है.. बीच-बीच में गलती हो ही जाती है.. हमारी तरह रोज तो नहीं हो रही?..

आज सुबह उठते ही मन में एक निर्दोष-सा ख़्याल आया.. कि चलकर पड़ोस का बैंक लूट आएं.. फिर लगा अकेले हमसे तो होने से रहा.. ऐसा न हो हम बैंक के बाहर ही इस जानलेवा गर्मी में धराशायी हो जाएं.. पड़ोस के मालवलकर साहब चाय पी रहे थे.. मैंने हंसते हुए बैंक वाले मामले में उनसे मदद की गुजारिश की!.. तो साहब का एकदम चेहरा उतर गया, बोले- आप एकदम समझ में नहीं आते हो.. कब मज़ाक कर रहे हो कब सीरियस हो?.. मैं सीरियस था लेकिन मालवलकर साहब को समझाने बैठकर क्‍यों भला गरीब आदमी की चाय खराब करता!.. फिर वह समझ ही जाते इसकी भी क्‍या गारंटी है.. आप ही ने इतना समझकर कौन हमें दार्जीलिंग या श्रीनगर के टुअर पर आमंत्रित कर लिया है?.. समझने-वमझने की बात बकवास है..

Sunday, June 10, 2007

ज्ञानहरण...

बहुत ज्ञान ठिल चुका.. हमारा ही ठेला हुआ है.. आस-पास इतना इकट्ठा हो गया है कि इच्‍छा हो रही है ब्‍लॉग का नाम बदलकर ज्ञानदान कर लें.. या ज्ञान पान चूना भंडार टाइप जैसा कुछ.. हद है!.. सच बताऊं, बड़ी शर्म महसूस हो रही है.. हमारे इस ज्ञान ठेलने के चक्‍कर में काकेश जैसा पहुंचा हुआ खिलाड़ी भी ‘दो रास्‍ते’ के बलराज साहनी वाली विनम्रता की मूर्ति होकर गलत दोहों के चक्‍कर में पड़ रहा है.. इक बंगला बने न्‍यारा बोलने की जगह ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी..’ जैसा गलत भजन गा रहा है.. हद है, काकेश, इस तरह ये चिठेरी दुनिया जाएगी कहां?.. फिर पुराणिक का कहना सही ही है कि जिंदगी छोटी है, बहुतों से मुलाकात के चक्‍कर में पड़े तो ऐसा न हो मुलाकाती भर होकर रह जाएं. सही है, आलोक, आपकी दीप्ति.. रह क्‍या जाएं, रह ही गए हैं! इतने वर्षों से इसी उलझन में पड़े हैं कि वह कौन आत्‍म व बाह्यजगत है जिसका ठीक-ठीक परिचय पाना है. पीठ पीछे दसियों साथियों ने इस बीच मकान और गाड़ी ठोंक लिया और हम जो हैं अभी तक अपने में उलझियाए हुए हैं.. क्‍या फ़ायदा ऐसे ज्ञान पान का?.. एचएसबीसी ने भी ऐसे किसी ज्ञान के डिपो‍ज़ि‍ट पर लोन दे सकने में असमर्थता जताई है.. रामजीत बाबू और बेबी की भी कोई खबर नहीं.. रवीश कुमार पतनशील साहित्‍य में हमारा हाथ बंटाने की बजाय खुद कविताई बांटने में पिले पड़े हैं.. बड़ा अंधेरा-अंधेरा-सा लग रहा है.. हद है!

छोड़ि‍ए, हटाइए ये सब.. रघुवीर सहाय की ‘सीढ़ि‍यों पर धूप’ में से इन पंक्तियों का आनंद लीजिए. ये खास तौर पर प्रियंकर भाई के लिए हैं जो इन दिनों हमारे ज्ञानदान से उखड़े हुए हैं. तो, लीजिए, प्रियंकर भाई, अर्ज़ है:

दिन यदि चले गए वैभव के
तृष्‍णा के तो नहीं गए
साधन सुख के गए हमारे
रचना के तो नहीं गए.
रघुवीर जी की ही एक और कविता है, ‘आत्‍महत्‍या के विरूद्ध’ से. ज्ञानदान नहीं है, ‘मेरा मींजा दिल’ है, आनंद लीजिए:

एक शोर में अगली सीट पे था
दुनिया का सबसे मीठा गाना
एक हाथ में मींजा दिल था मेरा
एक हाथ में था दिन का खाना.

इस डर से कि बस रुक जाएगी
आवाज जहां मैं दे दूंगा
मैं सुनता था. कोई छू ले कहीं
मेरी पीठ नहीं- आना जाना लोगों का
हंसना गन्‍धाना- सीने में भरे साबूदाना
दांतों की चमक सुथरी नाकें- वह रोज-रोज
इस रोज आज कल भी मुझ पर झुक जाएगी
सूखी लड़की. चेहरा चेहरे चेहरों के मुंह
गाढ़े गोरे पक्‍के खुश चुप. अनजाने बेमन मुस्‍काना

मोटे बुजदिल. घुप. शहरों के.
तब मैं समझा
वह अनिता थी
अनिता? वह सीधी सलोतरी अपनी अनिता थी
रोजाना
जब तेज हुई बस
मैंने अंग्रेजी में कहा
ला कबाना

कोई सुन न सका.
मेरी खुशहाली के दिन में
मुझसे दो आने ले न सका. मैं हो न सका
मैं सो न सका. मैं रो न सका. मैं पों न सका
पों क्‍या माने?

Saturday, June 9, 2007

चोट, गहराई व व्‍यावहारिकता

पिछले दिनों दो छोटे ऐसे अनुभव हुए जिसने मेरी एक पुरानी कमज़ोरी की ओर फिर से मेरा ध्‍यान आकृष्‍ट कराया; इसकी नसीहत दी कि राय बनाने की जल्‍दी व कुएं के मेंढक वाले व्यवहार में विशेष फर्क़ नहीं है. जीवन की वृहत्‍तरता से हमारा गहरा संवेदनात्‍मक लगाव है तो अपनी समझ बनाने की हड़बड़ी के विशिष्‍ट आचरण से हम सामनेवाले का कम, अपना व अपनी समझ का ज्‍यादा नुकसान करते रहते हैं. मन में कुछ यही सब चिंताएं उल्‍टे-सीधे तरीके से तैर रही थीं जिस पर कल मैंने यह छोटा-सा नोट लिखा. पांच प्रतिक्रियाएं आईं. प्रत्‍यक्षा का स्‍वर सादे चुहल का था (उसकी संक्षिप्‍तता में जितना मैं कह सकता हूं मुझे समझ में आया), तो संजीव की ‘बहुत सही!’ हमारी चिंता की कढ़ी में साथ खड़े होने की नमक की तरह थी. बकिया की तीनों टिप्‍पणियां ज्‍यादा मार्मिक और मन के गहरे, घनेरे अंधेरे पगडंडियों से होती-गुजरती बाहर आती हैं, और समाज को मार्मिकता में जी रहे लोगों की ‘समझने’ की चिंता का फिर एक दूसरा ही ताना-बाना हमारे सामने रखती हैं..

भूपेन के कहने में समझने की बनिस्‍बत समझने की कोशिशों के तहत खायी तक़लीफ़ों की कड़वाहट का स्‍वर ज्‍यादा है. शायद यह तक़लीफ़ का स्‍मरण ही है जो उनके कुछ अच्‍छा समझ लेने के साथ-साथ बुरे की स्‍मृति पर ‘ओवरलैप’ करती चलती है. वे कहते हैं, “..वैसे कौन किसको जानता है इस दुनिया में. सब कुछ पारे की तरह तरल है यहां. भले ही हम सबकुछ स्थाई होने का भ्रम पाल लें. सेल्फ पिटी अकेले में तो अच्छी है सार्वजनिक तौर पर शायद नहीं. वैसे जो आपने लिखा है वैसी ही कुछ यंत्रणा में भी झेलता हूं. यंत्रणा से असहमति नहीं. लेकिन जिगर के ज़ख्मों को चौराहे पर दिखाने पर लोग आपको या मुझे भी भिखारी से ज़्यादा कुछ नहीं समझ सकते. अपने-अपने खोल में इतने मस्त हैं लोग कि उन्हें ज़्यादा कुछ जानने की ज़रूरत ही क्या है. सबकी परिभाषित किस्म की जिंदगी और नैतिकताएं इतनी बलवान हैं कि वर्चुवल डायलॉग भले ही संभव हो यथार्थ यहां किसी धर्म, परिवार या स्थापित एथिक्स की चाहरदीवारी में ही आपको कैद मिलेगा. ”.. अनिल रघुराज की समझ को सुनिए.. और गुनिए, “मानवी अंतर्कथाएं बहुत गहरी हैं. लेकिन हर कोई इतनी परतों में, इतने परदों में घिरा है कि बाहर झांकने पर भी दूसरों को अपनी बनाई सीमाओं में ही देख पाता है. मुक्तिबोध ने बहुत पहले दरमियानी फासलों की बात की थी. मुझे लगता है कि हम अपने समय को समझ लें तो औरों से लेकर खुद को भी समझ सकते हैं.”

अब काकेश बाबू की समझ-सीख सुनिए. समाज को लेकर मार्मिक वह भी हैं.. लेकिन उनका कहना है जब अपना आत्‍मबोध ही ऐसा भारी रहस्‍यलोक बना हुआ है, फिर खामखा परायेपन के उलझावों पर सिर फोड़ने में समय ज़ाया क्‍यों करें. उनकी सीख प्रैगमैटिक है, “खुद को जानना ही जब इतना कठिन है तो दूसरो को कैसे जानें ..और फिर ऊर्जा भी क्यों लगायें जानने की..!! एक व्यक्ति को कई एंगिल से देखा, जाना और परखा जा सकता है ..और हर व्यक्ति अपनी अपनी समझ और रुचि के हिसाब से किसी को जानता है तो फिर आप इतना व्यथित हो लरबरायें नहीं, बस करते रहें जो आपको अच्छा लगे ..बिना ये सोचे कि किसने जाना, कैसे जाना, कितना जाना... ” काकेश का यह व्‍यवहारजन्‍य अर्जित जीवन-ज्ञान है. शायद आज के व्‍यावहारिक समय के सरवाइबल किट के लिए ज्‍यादा उपयोगी भी.

मगर मैं लरबराता हुआ अभी भी ‘समझने’ की उसकी व्‍यापकताओं में चिंता कर रहा हूं. ज्‍यादा-ज्‍यादा कर रहा हूं.. आप, स्‍वाभाविक है, अपनी समझ का निजी रास्‍ता चुनने को स्‍वतंत्र हैं!

Friday, June 8, 2007

आप मुझे जानते हैं?..

वास्‍तविकता क्‍या है?.. क्‍या वह एक और इकहरी है.. वही जो सामने प्रत्‍यक्ष दिख रही है?.. या उससे परे न दिखते धुंधलके में छिपे ढेरों तत्‍वों के कुल समुच्‍चय से घुलमिल कर वास्‍तविकता अपनी पहचान पाती है?.. और तब भी कुछ समझने को छूटा रह ही जाता है?..

आप मुझे जानते हैं?.. कितना जान रहे हैं?.. कि मैं सामाजिक चिंता में सिर थामे दिन भर लरबराता रहता हूं?.. थोड़ी साहित्‍य व सिनेमा की दिलचस्‍पी रखता हूं.. बीच-बीच में व्‍यंग्‍य के नशे में टुन्नियाया रहता हूं.. भोजपुरी, बंगला, उड़ि‍या के प्रभाव में एक अजीब- अमानकीय, उल्‍टी-सीधी हिंदी लिखता हूं?.. यही जानते हैं न आप?.. कि इससे अलग कुछ और एंगल्‍स भी उभरते हैं?.. पैसे, जीवन, समझ का रोना.. मन की उदासी लिए शहर में भटकता मैं?.. लगभग ऐसा-वैसा ही कुछ, यही न?.. इससे एक वाजिब तस्‍वीर बन जाती है?.. बन जाता है मेरे आदमी का एक कमोबेश खाक़ा? अपने मानसिक फ्रेम में इस पहचान को फीड करके आप निश्चित हो लेते हैं?.. जान गए, पहचान लिए, धो दिया, खंगाल चुके, समझ लिए टाइप?..

यह समझ लेने की अदा आपकी नज़र में मुझी को छोटा नहीं बनाती.. खुद आपकी नज़रों में भी आपको छोटा बनायेगी. ऐसी समझाइयां कुछ वैसे ही बेमतलब हैं जैसे बाइस्‍कोप के गोल फांक से आठ तस्‍वीरें देखकर एक बच्‍चा भरम पाल ले कि वह दुनिया देख चुका. समझ चुका. बहुत बार ये भरम कुछ दूर तक सही भी होते हैं.. मगर उसके बाद बहुत दूर तक एक न समझ में आ रहा झीना-झीना अमूर्तन का मैदान होता है.. सिर्फ़ देखनेवाले की नज़र में ही नहीं.. जो जी रहा है खुद उसकी अनुभूति में भी.. बाज मर्तबा ऐसे मौक़े बनते हैं कि यह झीनापन साफ़ हो जाए.. तो बहुत दफे यह भी होता है कि इस धुंधलेपन को लिए-लिए ही हम यह संसार छोड़ देते हैं.

यह झीना धुंधलापन पिता, पुत्र, मित्र, पत्‍नी, परिचित, अपरिचित सबके जीवन में किसी न किसी रूप में उपस्थित रहता ही है.. कितना आपके और उनके लिए वह धीरे-धीरे उजाले में आए यह एक-दो नहीं, उन ढेरों कारकों के आपसी अंतर्संबंध पर निर्भर करता है जो एक व्‍यक्ति के आत्‍मज्ञान व संसार में उसके अवस्थित होने की मार्मिक समझ बनाते हैं. स्‍वयं उसके बारे में ही नहीं, उसके समूचे वृहत्‍तर कॉन्‍टेक्‍स्‍ट के स्‍थूल व गूढ़ रहस्‍यों को परत दर परत खोलते-समझवाते कितना सतह पर चले आते हैं, उसपर भी यह सफ़ाई निर्भर करती है.

ऐसे मौक़ों पर यह बात हमेशा मायने रखती है कि देखनेवाली की नज़र कितनी मार्मिक व हृदय कितना उदार है.. साथ ही दिखानेवाले की लेयरिंग कितनी गुंफित और पेंच कितने उलझे हैं.. कहने का मतलब जानने की ऐसी खोजी यात्राएं दिलचस्‍प तो हमेशा ही होती हैं.. मगर उसका स्‍वाद तब सचमुच अनूठा हो जाता है जब देखने और दिखानेवाले- दोनों ही तरफ के लोग पक्‍के गूदेदार आदमी हों!..

जीवन छोटा ज़रूर है.. मगर आदमी की गरिमा अभी भी थोड़ी बच रही है.. सोलह आने न सही दो कौड़ी तो बची ही है.. उस सघन-उलझे जीव के बारे में तड़फड़ राय बनाने की हड़बड़ झटपटी से बचिये.. आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ेंगे.. हां, अपनी समझ की थोड़ी भलाई ज़रूर करेंगे!.. मनुष्‍यता का मर्म ही महत्‍तर नहीं होगा, समय व समाज भी आपके इस देखने में गरिमा पाएगी.

सुखी श्रीमती पॉल का अकेलापन: दो

अपनी अनवरत की इच्‍छा, कामनाओं में थकीं श्रीमती पॉल अकेले में कभी समझने की कोशिश करतीं कि राग हंसध्‍वनि में आख़ि‍र ऐसी वह क्‍या चीज़ है जिसकी इस तरह अघोषित दास होकर वह अपने भरे-पूरे सुखी परिवार के बीच निपट अकेली पड़ती जा रही हैं?.. कहीं इस उम्र में आकर दुबारा उन्‍हें प्रेम तो नहीं हो गया?.. और किससे हुआ है.. सुमधुर बांसुरी से.. या उसके बजानेवाले बंसीधर घोषाल से?.. ऐसा सोचते ही श्रीमती पॉल के समूचे देह में एकबारगी बिजली दौड़ जाती और चेहरा शर्म से लाल और आंखें ज़मीन में गड़ जातीं.. देर तक कांपती-सिहरतीं इस उधेड़बुन को दिमाग में साफ़ करने का यत्‍न करतीं.. फिर हारकर खेलते बच्‍चों के बीच निढाल पड़ जातीं.

दफ़्तर में सहकर्मियों ने इस बात को नोट भले किया हो कि हमेशा की किफ़ायतपसंद श्रीमती पॉल इन दिनों हर वक़्त फ़ोन कान से लगाये रहती हैं, मगर उनके सीधे-सादगीपने में उनकी यह नई व्‍यस्‍तता शंका और फुसफुसाहटों का सबब कभी नहीं बनी. न ही सुकेतु कभी पूछने बैठे कि फ़ोन पर चौबीसों घंटे का जुड़ाव आख़ि‍र किसके साथ.. आफ़त का असल पहाड़ तब टूटा जब अगले महीने की शुरुआत में फ़ोन का बिल आया!..

श्रीमती पॉल कुछ समय तक तो सकते में रहीं मानो यह उनका निजी नहीं किसी के दफ़्तर का बिल हो.. या फ़ोन कंपनी से बिलिंग में गलती हुई हो जैसे. सुकेतु भी शुरू में यही माने बैठे रहे.. फिर जैसे-जैसे वास्‍तविकता सामने व सबकी समझ में आने लगी, श्रीमती पॉल को एक दूसरे किस्‍म की घबराहट व बेचैनी ने जकड़ लिया.. सुकेतु के किसी सवाल का ठीक-ठीक उन्‍हें उत्‍तर देते नहीं बन रहा था.. कभी वह राग हंसध्‍वनि के अतिशय माधुर्य के बारे में बातें करने लगतीं.. और फिर अचानक हड़बड़ाकर बंसीधर घोषाल के अनोखेपन का गीत गाना शुरू कर देतीं.. सुकेतु सिर हाथों में लिए चुपचाप सब सुनते रहे.. क्‍या और कितना उनकी समझ में आया उसे ठीक-ठीक शब्‍दों में बताना वैसे ही मुश्किल है जैसे श्रीमती पॉल की मन:स्थिति का वास्‍तविक बयान करना.

फ़ोन के बड़े, भीमकाय बिल को चुकता करने के चक्‍कर में खाते-पीते सुखी परिवार में अचानक कंगाली घर कर के बैठ गई. बच्‍चों के स्‍कूल का फ़ीस देने तक को पैसे न रहे. बस की बजाय बच्‍चे पैदल चलकर स्‍कूल जाने लगे. आलू के सिवा घर में दूसरी सब्जियां आनी बंद हो गईं. छोटा अद्भुत शिकायत करता कि वह पाखाना में बैठता है मगर पेट से बाहर कुछ नहीं आता. प्रांजल भाई को समझाता कि पेट में कुछ होगा तभी तो बाहर आएगा. हमेशा बच्‍चों के बीच तहज़ीब की शिक्षा देने वाले सुकेतु ऐसी टिप्‍पणियां सुनते.. मगर पहले की तरह बच्‍चों को सुधारने की जगह अब उन्‍हें अनसुना कर जाते.

अच्‍छे-भले सुखी परिवार में उदासी की धूसर चांदनी तन गई. श्रीमती पॉल हर वक़्त और हर चीज़ से इस कदर नर्वस रहने लगीं कि उन्‍हें दफ़्तर से लीव लेकर घर बैठने पर मजबूर होना पड़ा. सुकेतु पत्‍नी पर गुस्‍सा करने की जगह खुद गुमसुम और चुप्‍पा जीव में बदल गए. बिला वजह हंसने लगते.. या देर रात उठकर रसोई के डिब्‍बा-बरतन की तांक-झांक करने लगते कि क्‍या बचा है क्‍या खतम हुआ..

हथौड़े से पीट-पीटकर मोबाइल नष्‍ट-ध्‍वस्‍त करके भी श्रीमती पॉल आश्‍वस्‍त नहीं हो सकीं.. राशिद ख़ान, मल्लिकार्जुन मंसूर, सिद्धेश्‍वरी देवी, गिरिजा देवी सबके संगीत को कूड़ेदानी में डालकर जला चुकने के बाद भी श्रीमती पॉल को लगता कोई अदृश्‍य ताक़त है जो उनका पीछा कर रही है, भारी बोझ लिए उनके ऊपर जमी हुई है.. करवटें बदलती वह सारी-सारी रात गुजार देतीं.. और सारा दिन थकी-थकी दीवार का सहारा लिए बुदबुदाती यहां और वहां खड़ी रहतीं.. अद्भुत और प्रांजल इस लगातार बने रहने वाले सन्‍नाटे से भारी भय में रहते.. उन्‍हें लगता उनकी मम्‍मी और पापा पर किसी जादूगर ने जादू की छड़ी फेर दी है.. और वे सभी अरक्षित, असहाय प्राणियों में बदल गए हैं.

ऐसा ही कोई उचटा दिवस रहा होगा जब बाहर के दरवाज़े पर दस्‍तक हुई. स्‍नानघर में बच्‍चों का कपड़ा फटकारते, उसे बीच में ही छोड़ सुकेतु बाहर आए. दरवाज़े पर जो अपहचाना अजनबी खड़ा था वह खुद को उनकी पत्‍नी श्रीमती पॉल का दोस्‍त बता रहा था.. उन्‍हीं को ढूंढ़ता-खोजता उनके घर तक पहुंचा था. अपने को बंसीधर घोषाल कहनेवाले इस अजनबी ने आगे सूचना दी कि वह और श्रीमती पॉल एक-दूसरे को बेहद अंतरंगता से जानते हैं.. वह उसकी पुरानी ग्राहक हैं.. और हमेशा उसकी सर्विस से पूरी तरह संतुष्‍ट होती रही थीं.. मगर पता नहीं पिछले कुछ अर्से से क्‍या कारण है कि वह उन्‍हें फ़ोन कर रहा है, उनका नंबर रिंग होता है मगर वह फ़ोन उठा नहीं रहीं..

बरामदे के अंधेरे की अपनी नीमबेहोशी में श्रीमती पॉल ने इतने दिनों के अंतराल पर- आज पहली दफा फ़ोन नहीं, प्रकट में अपने घर के दरवाज़े के बाहर- जानी-पहचानी, उन्‍हें बेसुध और पागल कर देनेवाली वह आवाज़ सुनी.. बंसीधर घोषाल को अपना परिचय देते सुना.. और अचानक अवश फिर उसी उद्दाम कामना में जकड़ गईं जो उनके विवेक, परिवार व समाज सबकी समझ को बेमतलब करता- उनके अंतर्मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ राग हंसध्‍वनि का संगीत बचाये रखता था.. अपने उस प्रिय राग के जनक, अपने प्रिय-प्रिय प्रियतम की मात्र एक झलक भर के लिए श्रीमती पॉल आज सबकुछ फूंककर निर्विघ्‍न, एकदम बेशर्म होकर बाहर भागे चली आना चाहती थीं.. शायद सिर्फ़ इतना भर देखने के लिए कि उनके अपने बंसीधर घोषाल का रूप क्‍या है कैसा है.. या कुछ और पता नहीं क्‍या.. मन की जाने किस-किस तरह की सब-सारी बेकली का ठीक-ठीक जवाब श्रीमती पॉल स्‍वंय भी समझ रही थीं कहना मुश्किल है.. लेकिन उन शुरुआती तप्‍त क्षणों के पागलपन के बाद फिर वह सांस रोके बरामदे की खिड़की के सींखचों को थामे जड़ खड़ी रहीं.. कुछ देर में जाने क्‍या कह कर सुकेतु ने जब बाहर का दरवाज़ा वापस बंद कर दिया.. चेहरे पर एक फीक़ी मुस्‍कान के साथ श्रीमती पॉल धीमे-धीमे अपनी सामान्‍य परिचित, घरेलू स्थिति में लौटती चली गईं.