Friday, June 1, 2007

एक बुर्ज़ुग ब्‍लॉगर की डायरी के मार्मिक अंश..

हर रोज़ की तरह ये भी कोई उल्‍टा-सीधा-सा दिन..

लो, फिर एक पोस्‍ट चढ़ाओ! डाटर इन ला को चाय के लिए मिन्‍नत करने के बाद घंटे भर इंतज़ार करते हुए लाग इन करो.. सोचकर सुबह-सुबह दिमाग़ थकाओ कि आज आनंद का नक़ाब चढ़ाए कौन-सा फ़रेब लिखना है, झूठी खुशफ़हमियां फैलाओ, तस्‍वीरें खोजो, पोस्‍ट चढ़ाओ, फिर राह तकते बैठो- चाय की नहीं, वह तो कभी नहीं आएगी- कि पोस्‍ट नारद पर कब आता है.. और उसके बाद पहले कमेंट का इंतज़ार.. वह भूले-भटके आ ही गया तो नेक्‍स्‍ट कमेंट की बेचैनी!.. ओह्, सब कितना पेनफुल है.. कितनी तक़लीफ़ होती है! आज कंधे में भी हो रही है.. कौन वाली टेबलेट लूं?.. मेरी दवाइयों वाली डिब्‍बी कहां हैं? अभी तो यहीं थी.. माने रात को चौथी दफे जब आंख खुली तो यहीं फर्श पर लुढ़की पड़ी थी, फिर कहां गायब हो गई?.. अच्‍छी मुसीबत है! क्‍या करूं? बिना दवा खाए मैं कमोड पर भी नहीं बैठ सकता. मगर हो सकता है बैठने जाऊं और वहीं कमोड में डिब्‍बी तैरती मिल जाए.. पोते ने डिब्‍बी कमोड में डाल रखी हो? ही माइट हैव.. ही हैज़ डन इट बिफोर, ही फाइंड्स इट फनी.. उसकी मम्‍मी को भी यही लगता है. डिब्‍बी और मैं दोनों ही उसे फनी लगते हैं! जी में आता है किसी दिन (कल आठवीं बार पेशाब करने उठा था तब भी आया था) उस औरत का मुंह कमोड में डालकर तब तक फ्लश करता रहूं जब तक वह गिड़गिड़ाकर मुझसे अपने प्राणों की भीख न मांगने लगे!..

मगर मन के नेक और भले अरमान कभी पूरे होते हैं क्‍या? इस उमर में तो कुछ भी पूरा नहीं होता.. शायद ग़ालिब़ ने ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले..’ मेरी ही उमर की समझ हासिल करने के बाद लिखी हो.. या क्‍या मालूम उसे कोई समझ थी भी या नहीं.. मेरी तरह वह भी डाटर ईन ला, पोते और बेटे के मास मर्डर की नासमझी भरे ख़्वाब देखा करता था! पुवर मैन!.. इसका तो सचमुच ही अफ़सोस रह जाएगा कि मास मर्डर क्‍या.. मरने के पहले मैं एक मामूली हत्‍या तक न कर सका! बीवी- हमेशा बगल में लेटी रहने वाली एक अकेली बीमार, असहाय औरत- जिसकी वाकई गरदन घोंट सकता था वह भी करने की सोचता ही रहा, की नहीं, और वह धता बताते हुए मर भी गई! कितने ब्‍लॉगर थे जिनका नाम आते ही उनपर टिक ट्वेंटी छिड़ककर उन्‍हें खत्‍म कर देने की इच्‍छा होती मगर कहां छिड़क सका?.. डाटर ईन ला टिक ट्वेंटी क्‍या टिक टू लायक पैसे भी मेरे हाथ आने नहीं देती! जबकि दूसरे ब्‍लॉगर्स हैं जो अलग-अलग नामों से रोज़-रोज़ मुझे मारते रहे हैं.. और मैं रोज़ उस मुनि (किस मुनि?) की तरह ज़ि‍न्‍दा होकर वापस लौट आता रहा हूं.. नारद की नदी पर घूम-घूमकर बच्‍चों में बधाई, आशीष, शानधारम् बांटता रहा हूं.. कितनी नफ़रत और ग्‍लानि होती है खुद से.. कि मास मर्डर करने की बजाय मैं बकरी के लेंड़ों के बीच बधाई बांटता फिर रहा हूं! मगर न बाटूं तो क्‍या करूं? वह भी फिर आकर हमारी ब्‍लॉगनद में थूकेंगे, म्‍युनिसपाल्‍टी की कचड़ा गाड़ी का रूख हमारी ओर कर देंगे! खुद के कचड़ा रूप को ढोने में ही ऐसी जान छूटती रहती है, कहां से फिर समूची मुंसपाल्‍टी का ढोएंगे; फिर बकरी के लेंड़ों को मारना भी क्‍या मारना! हां, इसका दु:ख ज़रूर है कि झूठी सामाजिकता निबाहनी पड़ती है.. जिनकी आंख में मिर्ची भर देने की इच्‍छा होती है उन्‍हें ‘बड़ा अच्‍छा लिख रहे हो, बेटा!’ का आशीष देना पड़ता है..

देयर इज़ सो मच फॉर्जरी एंड फ़रेब टू लिव इन सोसायटी आई टेल यू.. आह्! सोचा था ब्‍लॉग में आकर अंतरंगता और आत्‍मा की गहराई में उतरेंगे.. चांदनी रातों के खुले सुलगते विस्‍तार को अपने बाउल जल से शीतल कर डालेंगे मगर देखिए, कहां कर पा रहे हैं? कहीं आत्‍मा नहीं है बस रोज़ सामाजिकता की बधाई, आशीर्वचन बांट रहे हैं! मन उचट गया है.. इसके पहले कि वह ऊपरवाला शैतानी करके उठा ले, चाहता हूं अपना गला घोंट लूं.. कम से कम एक हत्‍या का पुण्‍य तो अपने हाथ आए! मेरी चाय अभी भी नहीं आई है.. डाटर इन ला मुझे नहीं मेरे पोते को नहला रही है..

खोया, भटका.. किसी एक गुमनाम शहर का एक गुमनाम उम्‍बेर्तो डी..

12 comments:

  1. बधाई, आशीष, शानधारम..

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  2. बुढ़ौती में वीभत्स रस प्रबल हो जाता है ?

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  3. ये बुजुर्गवार बड़े ही सैडिस्ट किसम के आदमी हैं... खुद कचरा बने बैठे हैं ..और दुनिया को कोस रहे हैं ..कैसे रहते होगी वो बेचारी डाटर इन लॉ इनके साथ... इनको बोलो कि नारद की नदी में तनी नहा लें..

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  4. नारद की नदी पर घूम-घूमकर बच्‍चों में बधाई, आशीष, शानधारम् बांटता रहा हूं.. कितनी नफ़रत और ग्‍लानि होती है खुद से.. कि मास मर्डर करने की बजाय मैं बकरी के लेंड़ों के बीच बधाई बांटता फिर रहा हूं!
    बापरे! क्या सशक्त लेखन है और क्या नारकीय भविष्य का यथार्थ! क्या बढ़िया हॉरर स्टोरी का प्लॉट बन सकती है यह पोस्ट!

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  5. एक अकेले वृद्ध के मनोभावों का बहुत अच्छा वर्णन किया है आपने । मनुष्य अपनों के बीच भी कितना अकेला हो सकता है ।
    घुघूती बासूती

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  6. बुजुर्गजी की तो पता नहीं, पर अजदक साहब, हमें तो आपकी ही बहुत सुलगी हुई दिखायी पड़ रही है। पहले इसे ठंडा कीजिये। और आशीर्वाद दे न दें, गाली दे न दें, अब आपसे कुछ उखड़ेगा नहीं। गालिब ए खस्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं
    कीजिये हाय-हाय क्या, रोइये जार -जार क्यूं।

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  7. क्या भाई क्या इरादा है? बड़ा दमघोटू माहौल है बना दिया है आपने...आंख बंद करके लम्बी सांस लीजिए. बड़ा गर्मी चढ गया है. थोड़ा ठंढा लीजिये इ सब अभी मत लिखिये.मन गनगना जाता है.कुछ कहने की इच्छा भी नही हो रही.

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  8. ई बाइलिंगुअल बूढा तो कौनो थेथर किसम का जीव बुझाता है . या फिर 'गलतफ़ैमिली' , खमा कोरबेन गलतफ़हमी का शिकार . ईका साइको-नारको सब टेस्ट गुली करना पड़ेगा . कनाडा से कालाकांकर तक ससुरा सबको बेनकाब किए जा रहा है . इयें हम हियां सौजन्य-औजन्य कछु बच जाए बिलौग-जगत में इसका फ़िकिर में दुबलाय रहे हैं . ई ससुरा बुड़भस में घिन्ना फ़ैला रिया ऐ . कुफ़र बक रिया ऐ . फ़ैमिली-ओमली नुमा चीज़ कौनो बचने देगा कि नहीं . भरी दुपहरी दिमाग भिन्नाट कर दिया .

    हमसे कोरा कागद पर लिखवाय लीजिए कि ई बूढा के तो परम संत है अउर नाहीं तो परम हरामी . कौनो अइसन लिखता है दबी-ढकी सब खोल कर .

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  9. हां, इसका दु:ख ज़रूर है कि झूठी सामाजिकता निबाहनी पड़ती है.. जिनकी आंख में मिर्ची भर देने की इच्‍छा होती है उन्‍हें ‘बड़ा अच्‍छा लिख रहे हो, बेटा!’ का आशीष देना पड़ता है..
    ये आपका ही नहीं सबका ही दुख है। उसका भी जिसके बारें लगभग सभी एकमत होंगे कि वह कचरा लिखता है! :)

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  10. पोट्रेट
    उसकी नींद बेचैनियों की तितलियों के पीछे भागती थकती रहती थी । आँख खुलने पर उसकी

    साँसों से धुआँ निकलता दिखता था ; जागते ही उसे लगता के वक्त आज हड़ताल पर है

    फिर वो एक सिगरेट सुलगा कर खिड़की पर आता । अपनी उम्र की ओर देखते हुए उसे लगता

    के बरस बरस धड़कन की रफ्तार से दौड़े चले जा रहे हैं । ये दोनो साथ साथ होता के

    खिड़की के बाहर तो वक्त फास्ट फार्वड होता और भीतर हड़ताल पर । वो सिगरेट सुलगाकर

    लेट जाता और सोचता अब क्या करे ़़़़ ये सोचना सबसे बड़ा काम होता क्योंकि दुनिया

    भर के कामों के बारे में वो विचार चुका होता । दीवार पर तितली की तरह लड़की का ख़याल

    आकर बैठ जाता , ये ख़याल उसका नही होता पर अक्सर उसके सामने की दीवार पर होता

    था । उसके कमरे में एक कुपोषण का शिकार एक पेड़ होता था जो वटवृक्ष हो जाने का

    सपना देखता था । सूरज की रौशनी उसके कमरे में आने से हिचकिचाती थी इसलिये उसके

    कमरे में एक लालटेन होती ़़़़ लालटेन की रौशनी और अपनी समझ के अंधेरे के बीच

    उसका उठना बैठना छाया प्रकाश का खेल होता , ये खेल रचता / देखता वो वहाँ पर होता ।

    वो सोच के आठवें माले पर रहता था । उसके नीचे के कमरों में ऐसे परिवार रहते थे ,

    जिनके एक कोने में बच्चे पैदा होते और दुसरे में पलते रहते थे । वो ऐसी कल्पना में रहता

    के उसके कमरे के नीचे कोई मंजिल नही है , उसे डर होता के कल्पना में आते ही ये कमरे

    उसके कमरे से आ मिलेंगे । उसके कमरे के उपर एक छत होती जहाँ हमेशा ताला बंद होता

    क्योंकि कभी किसी ने वहाँ से कूदकर आत्महत्या की थी ़़़़ मगर ये छत बारिश में

    रिसती थी । नीचे आम ज़िंदगी की दौड़ भाग और काम पर आते जाते लोग उसकी नज़र के

    एंगल से बहुत छोटे दिखाई पड़ते थे ।
    वो एक किरदार था जो अपनी रचना का पता ढूँढ़ते हुए इस कमरे तक पहुँच गया था और

    तब से वहीं उसका इंतज़ार कर रहा था । कभी कभी वो अकबका कर बाहर निकलता था ,

    विचारों की ठेलम-पेल को पारकर महानगरीयता की भीड़ में , मगर उस भीड़ में वो गुम नही

    हो पाता था । उसके पास विकल्प की तरह एक दिशा थी जो वापस उसे इसी पते पर ले

    आती थी ।
    उसकी खिड़की के पार क्षितिज में ऐसी इमारतें होतीं जो झुग्गी होने की कुंठा लिये खड़ी होतीं

    , उन इमारतों के पीछे से झाँकता सहमा सा आकाश होता ़़़ उसे लगता आकाश में कुछ

    और रंग होने चाहिये ।
    यथार्थ का आकाश उसकी कल्पना की खिड़की पर फिट नही हो पाता था

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  11. सचमुच के बूढ़े के स्केच पर इतने कमेंट्स.कुछ मुझ जैसे बूढ़े होते नौजवानों के लिए भी कीजिए.

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