Saturday, June 2, 2007

अच्‍छा बच्‍चा बने रहने का अभिशाप..

मैं हमेशा से एक अच्‍छा बच्‍चा था, और बड़े ताजुब्‍ब की बात है कि बड़ा होकर भले बड़े आदमी में बदल गया, मगर अच्‍छाई बनी रही. हमेशा क्‍लास में आगेवाली बेंच पर क्‍लास में आगे रहनेवाले शाहिद अतहर के साथ बैठा करता. शाहिद मियां किताब में आंखें गड़ाये रहकर क्‍लास में फ़र्स्‍ट आ जाते जबकि मैं फिज़ि‍क्‍स की टीचर लक्ष्‍मी आंटी में आंखें गड़ाये रहकर किसी तरह खींच-खांचकर अगली क्‍लास में भेज दिया जाता. दरअसल लक्ष्‍मी आंटी नहीं चाहती होंगी कि मैं ताउम्र उनपर आंखें गड़ाये उन्‍हें ज़मीन में गड़ जाने को मजबूर कर दूं, इसीलिए मजबूरी में वह मुझे खींचकर अगली क्‍लास में भेज देती थीं. अगली क्‍लास में भी पहुंचते ही मैं अच्‍छा होने को ललकने लगता.. माने धीरे-धीरे अच्‍छा बच्‍चा बन ही जाता.. माने शाहिद मियां जबकि किताब में आंखें गाड़े रहते मैं ज़ि‍म्‍मेदारी से अंग्रेजी की टीचर दास आंटी की धज में आंखें गाड़ने की प्रेक्टिस शुरू कर देता.

इस तरह अच्‍छा बच्‍चा होने के दो प्रत्‍यक्ष फ़ायदे हुए. एक तो यह कि आंख नीची करने की कभी नौबत नहीं आई, दूसरे, इस और उस आंटी की मदद से, मैं बड़ी सहजता से एक के बाद दूसरे क्‍लासों में फुदक-फुदककर, आगे पहुंचता गया. अच्‍छा बच्‍चा बना रहा.

जबकि शाहिद मियां नज़रें नीची किये हमेशा सिर्फ़ फ़र्स्‍ट होते हुए मामूली मियां बने रहे, मैं ग़ैर-मामूलीपने के जाने कितने रिकॉर्ड बनाता रहा. ओह, अच्‍छा. बच्‍चा.

हालांकि अंदर ही अंदर कहीं इस बात का अफ़सोस भी रहा ही कि काश मैं भी कभी फ़र्स्‍ट आ जाता और स्‍कूल के सालाना जलसे में सस्‍ती दरी पर टिल्‍लु और बिल्‍लु की संगत में अंड़सा बैठा, लाउड स्‍पीकर पर अपना नाम पुकारा जाना सुनता.. और शाहिद मियां की जगह मैं भागा-भागा मंच तक जाता, नज़रें नीची किये मुख्‍य अतिथि से हाथ मिलाकर इनाम का एटलस या डेढ़ सौ पेजी घटिया छपाई वाला एनसाइकलॉपीडिया लिए वापस साथियों के बीच लौटता और किसी माई के लाल को उसे हाथ नहीं लगाने देता!.. मगर ऐसी क्षुद्र आकांक्षाएं भी मुझे उतनी ही देर तक पीड़ि‍त किये रहतीं जबतक कि सालाना जलसे का मंच सजता-फजता और झंडियां-संडियां टांगी जा रही होतीं, और लाउड स्‍पीकर पर ‘ऐ वतन, ऐ वतन, तुझको मेरी कसम..’ जैसे ऊटपटांग गाने बज रहे होते.. और दास आंटी संबलपुरिया इकाट और लक्ष्‍मी आंटी अपने कांजीवरम में हेडमास्‍टर पाणिग्रही सर के साथ लड़ि‍‍याती हुई मुख्‍य अतिथि की स्‍वागत में ढेर होती रहतीं.. मगर कार्यक्रम के एक बार रंग में आ जाने के बाद मैं फिर झटके से अच्‍छे बच्‍चे में बदल जाता, और बाकी लोग जबकि मुख्‍य अतिथि किससे कैसे हाथ मिला रहे हैं, और किसको क्‍या किताब इनाम में दिया जा रहा है की बेवकूफियों में आंख गड़ाये रहते- मैं अपनी आंखें रंजु, संजु और फ़रहत की तरफ ले जाता और फिर उन्‍हें वहीं गाड़े छोड़ देता.

इस तरह आंखें गाड़ने के मैंने काफी सारे रिकॉर्ड तोड़े.. मगर फ़र्स्‍ट आने की कमज़ोरी से छूटा रह गया. बेदाग़ अच्‍छा बच्‍चा बने रहने की बात कभी-कभी अस्‍वाभाविक और डरावनी लगती. लगता कहीं ऐसा न हो इस तरह मैं मिथकीय नायक और लोककथा के चरित्र में बदल जाऊं.. और असल के वास्‍तविक बच्‍चा बने रहने से रह जाऊं! इस असमंजस में ढेरों वर्ष निकल गए और मैं अच्‍छा और सिर्फ़ अच्‍छा ही बच्‍चा बना रहा. फिर अचानक.. जैसे ढेरों दु:ख के बाद जीवन में कभी-कभी ग़लती से सुख भी चला आता है- इस कमज़ोरी से उबरने का एक वास्‍तविक मौक़ा उपस्थित हुआ.. कॉलेज की पढ़ाई के दौरान हुआ! लगा इस बार अगली कक्षा तक खींचकर भेजे जाने की बजाय शायद मैं सचमुच फ़र्स्‍ट डिविज़न पा जाऊं. पता नहीं क्‍या बात रही होगी कि मन में ज़ि‍द-सी बैठ गई.. कि लगा यही मौक़ा है फ़र्स्‍ट डिविज़न पाकर अच्‍छे बच्‍चे वाले दाग़ से हमेशा के लिए छुटकारा पा जाने का!..

इम्‍तहान के दरमियान पहली बार हुआ कि मैं सुबह पांच बजे जगकर सरसरी तौर पर किस कोर्स की क्‍या किताबें हैं जैसी बेवकूफियों पर ध्‍यान देने लगा. पाव भर दूध पहुंचाने के लिए दूधवाले को फिक्‍स कर दिया और शिवजी के कैलेंडर पर इतनी-इतनी देर तक आंख गड़ाने लगा कि उन जैसा नंगा आदमी तक आंखें नीची करने पर मजबूर हो गया.

सारे जतन किए मैंने मगर पता नहीं क्‍यों अपने दाग़दार होने का आत्‍मविश्‍वास नहीं बना पा रहा था.. यही वजह रही होगी कि आखिरी क्षणों में मैं अचानक घबरा गया.. सेनगुप्‍ता मैम के आगे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा कि मैम, प्‍लीज़, मुझे इस बार फ़र्स्‍ट डिविज़न दिलवा दीजिए, मैं आपको फिर एक भी लव लेटर नहीं लिखूंगा, प्रॉमिस?..

मगर औरत की जात.. और वह भी बंगालन.. कैसे भला लव लेटर्स पाने की संभावनाओं को खारिज़ करके मुझे फ़र्स्‍ट डिविज़न दिलवा देती? नहीं दिलवाया.. मुझे अच्‍छे बच्‍चे के अभिशाप से बाहर कहां निकलने दीं!.. ओह, आप अच्‍छे बच्‍चे होते तो जानते अच्‍छा बच्‍चा होने का दु:ख कितना गहरा है!

7 comments:

  1. "अच्‍छा बच्‍चा बने रहने का अभिशाप.." लगता है सबका टेन्डर आपको ही दे दिया गया है.किसी को छोड़ेंगे कि नही? वैसे ये ज़रुर है आपकी या यूं कहें कि नारद जी कि वजह से बहुत ही कम समय मे बहुत ज़्यादा कहानी पढ्ने का मेरा रेकार्ड टूट चुका है. इसके लिये आप और नारद जी को मेरा शुक्रिया. वैसे जिस बच्चे की आप बात कर रहे है वो तो मै हूं,इतना डिटेलिंग से कभी मैने आपको बताया है क्या? अपने पास पडोस के बारे मे तो आपका टेन्डर तो पास ही हो गया है. दबा के लिखिये. आप तो तबियत हरी कर देते हैं.

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  2. बड़े अच्छे बच्चे थे आप! फोटो भी अच्छा है.

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  3. यथार्थ और विभ्रम को गड्डमड्ड न करें, भइया भूपेन.. बच्‍चा तो अच्‍छा मैं था ही मगर जो फोटो अच्‍छा है वो मेरा नहीं है.. फोटो मेरे भी हैं.. मगर वो मेरी भयानकताओं से भरे पड़े हैं.. मेरी मार्मिक अच्‍छाइयों से नहीं.

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  4. अच्‍छे बच्‍चे की पोल खुल गई...........

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  5. बड़े अच्छे बच्चे थे आप !! फ़ोटो भी अच्छा है ...

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  6. बाजारवाला ने भूपेन के कमेंट की नकल की...........

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  7. भाई बेनाम .. एक बात बताइए , इसी एक वाक्य के कितने अर्थ निकलते हैं ? हो सकता है भूपेन ने कुछ और सोचा हो और बाज़ारवाले ने कुछ और . बाज़ारवाले की नक़ल पर इतनी आपत्ति और जो बाक़ी के नक़लची हैं उन्हे ऐसे ही छोड़ दिया आपने. ख़ैर मुझे नक़ल पर कोई बहस नही करनी और वैसे भी मेरे कमेंट मे दो बिंदिया ज़्यादा हैं

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