Monday, June 4, 2007

सुगंधित-कलंकित.. सोप.. एक ब्‍लॉगऑपेरा..

सस्ते ‍डिज़ाइनों वाली, घटिया सेट-सज्जित धड़धड़ाती रेल पता नहीं कहां जा रही है.. सज्‍जा की ही तरह साउंड एफेक्‍ट भी उतना ही पथेटिक है.. मगर रेल उलटी नहीं पटरी पर ही है.. कुछ लोग ऊंघ रहे हैं.. कुछ जगे भी हैं.. एक अधेड़ कंधे पर नैपकिन और टूथब्रश पर क्‍लोज़-अप की पेस्‍ट लिए बाथरुम जा रहा है. नज़र मिलने पर झेंपकर मुस्‍कराता है.. मुंह ढांप के फुसफुसाता है- एक्‍चुअली आई अम गोइंग इनसाइड फॉर अ फैग, वाइफ को बताना नहीं चाहता!.. झीनी रोशनी में पेपर में क्‍लासीफाइड का पेज देख रही एक लड़की बुदबुदाती है- आई थिंक आई फाउंड द लव ऑव माई लाइफ़!.. एक साथ नौ मर्दाना चेहरे लड़की की दिशा में पलटते हैं.. और पर्दे पर टाइटल्‍स शुरू हो जाते हैं..

पप्‍पू ने आजतक पूनम को कभी देखा नहीं, पूनम की कवितायें देखी हैं.. मगर पप्‍पू पूनम से प्‍यार करता है.. पूनम को पागल बना दें ऐसी कवितायें लिखना सीख रहा है.. लेकिन पूनम मन ही मन अपना सर्वस्‍व सुहैल को सौंप चुकी है (मन ही मन).. बार-बार कमलकांत के ब्‍लॉग पर वह पॉडकास्‍ट सुनती है जिसमें सुहैल मुर्गी और बिल्लियों से इंसानीयत से पेश आने की गुज़ारिश कर रहे हैं.. सुहैल जो भी गुज़ारिश करेंगे, पूनम शर्तिया जान रही है वह उसे पूरा करेगी.. सुहैल की गुज़ारिशों को पूरा करने और इस प्रेमभाव को शिद्दत से अपनी कविताओं में प्रकट करने से अलग पूनम के पास अब और चारा ही क्‍या है.. पूनम रोज़ कवितायें लिख रही है, सब कितनी तारीफ़ कर रहे हैं.. लेकिन जिसके आशीर्वचनों (प्रेमवचन कहना ज्‍यादा उपयुक्‍त होगा) को सुनने के लिए मन व तन इतना चंचल है वह सुहैल कमेंट का क लिखने भी नहीं आ रहे!.. दरअसल सुहैल इन दिनों कविता, मुर्गी, बिल्लियों या ऐसी किसी भी ब्‍लॉगगत सामाजिक सार्थकता पर सोच नहीं पा रहे.. निज की नीचता का पाप धोकर अपने टूटते दाम्‍पत्‍य को बचाने में नाक रगड़ रहे हैं.. और इस कसरत में वह बिल्‍ली का भला चाहनेवाले से एक कुत्‍ता ज्‍यादा बन रहे हैं.. जबकि उनके चरम-परम कमलकांत सुहैल की टूटती शादी से नहीं, अपने पॉडकास्‍ट के लिए अन्‍य आवाज़ों की चिंता में कहीं ज्‍यादा दुखी और दुबले हो रहे हैं.. रात-दिन भाव अब शब्‍दों में नहीं.. कशिश और मिठास में डूबी पॉडकास्‍टी आवाज़ों में गूंजते हैं! शायद जल्‍दी ही वह दिन आ जाए जब हिज्‍जे की ग़लतियों से भरे उनके पोस्‍ट्स के दिन पीछे छूट चुकें और हर तरफ (यानी रतलाम से लेकर लुधियाना तक) उनका दिलअज़ीज़ पॉडकास्‍ट सबके पोस्‍ट पर भारी पड़ रहा हो?..

हाथ के चार सौ पेजी सुरेंद्र मोहन पाठक को तकिये के नीचे छिपाते हुए चंदनजी उगलते हैं कि पंतजी के साहित्‍य को कूड़ा पुकारना किन्‍तु ग़लत है लेकिन!.. रानी मुखर्जी की लटकों, करीना के झटकों और रिया सेन की आह् व ओह् पे फिसलते हुए कुंदनजी फुफकारते हैं कि आप सब कहीं थूकते रहे हम चुप रहे.. परन्‍तु संस्‍कृति के राष्‍ट्रीय प्रतीक चिन्‍हों पर थूकें ये हमारे जीते-जी हाय, कदापि न होगा!.. हक़ के हिज्‍जे में दूसरी मरतबा लड़खड़ाये मर्दनजी कड़कड़ाते हैं हम हक्‍का-बक्‍का हैं कोई मजिस्‍टेक, दरोगा नहीं एक चिरकुट हमारी अभिव्‍यक्ति का हक़ छीन रहा है! घर्षणजी पिनपिनाते हैं यह कवि नहीं रवि समय है.. पीटते नहीं किन्‍तु पीटने की ही शैली में चीखते हैं कविता को हटाओ, केन्‍द्र में पॉलिटिक्‍स को लाओ!

नामी हैं सुनामी हैं खर हैं पतवार हैं. सल्‍लू की सड़हज और सुहैल की खाला भी हैं. हसन जमालों की छींक व जैनरायन की जीत है. मॉरीशस में हिन्‍दी और पलामू में ब्‍लॉगर्स मीट है.. हाथ की चुन्‍नी दांतों के बीच दबाये शबनम एक बार फिर मुस्‍कराती है, आई थिंक आई जस्‍ट फाउंड द लव ऑफ माई लाइफ़!

हाय, ये लड़की.. सॉरी, ये कहानी कितना छकाती और कितना रीझाती है!

कार्टून को ढंग से देखने के लिए उसपर चटका लगाएं..

कार्टून साभार: कार्टूनचर्चडॉटकॉम..

1 comment:

  1. हा हा। सही है।
    सच में कहां कहां से मुद्दे ले आते हो आप।

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