Tuesday, June 5, 2007

दिखते फ़ोटो का अधूरा सच..

कल चिट्ठाकार सम्‍मेलन ने दिल्‍ली के कुछेक ब्‍लॉगरों की बैठक की एक रपट छापी. रपट के साथ नीचे वहीं उतारी कुछ फ़ोटो भी छापीं. उपस्थित ब्‍लॉगरों में मैं व्‍यक्तिगत रूप से अविनाश से अलग किसी से परिचित नहीं. कुछ लोगों के लिखने तक से परिचय नहीं है. मगर उन छपे तस्‍वीरों को देखते हुए तस्‍वीरों के बारे में फिर से ज़ेहन में ये बात आई कि तस्‍वीर कितना सच बोलती है.. और कितना नहीं बोल पाती..

फैबइंडिया के कुरते से लगभग मैच करती-सी प्‍लेट हाथ में लिए अफ़लातून भाई को देखकर थोड़ा ताजुब्‍ब हुआ. उनको भी निजी तौर पर जानता नहीं लेकिन उनके लगावों, जुड़ावों का थोड़ा अंदाज़ा है.. फ़ोटो देखकर उनका कार्यक्षेत्र बनारस की बजाय दिल्‍ली का वसंत विहार हो, ऐसी अनुभूति ज्‍यादा होती रही. थोड़े वक़्त तक जेन्‍युनली इस उधेड़बुन में फंसा रहा कि समाजवादी जनपरिषद में सबके भले की सोचनेवाले शख्‍स असली अफ़लातून हैं या नीले लहराते कुर्ते में जो सुखी-संतुष्‍ट दिख रहे हैं वह उनकी असली पहचान है. कुछ वैसा ही असमंजस अरुण और पंगेबाज को आपस में मिलाते हुए हो रहा था. सोचता रहा आदमी की बात उसका सच बोलती है.. या उसका चेहरा?..

तकरीबन डेढ़-दो साल के अंतराल पर अविनाश को देखते हुए जो झटका महसूस हुआ वह ज्‍यादा बड़ा था. वह सिदो हैम्‍ब्रम की वक़ालत करने व भूखे-नंगों के बारे में हमें लगातार चिंता करवाते रहनेवाले की बनिस्‍बत- चमकते शर्ट और चमकते बेल्‍ट में- और भात-दाल नहीं, चिकन और मटन की परम संतुष्टि में- लाजपत नगर के किसी ताज़ा-ताज़ा सफल होते व्‍यापारी की छवि ज्‍यादा पेश करते दीख रहे थे!

यहां मैं अपने पर्सनल इम्‍प्रेसन की बात कर रहा हूं.. और लोगों के और इम्‍प्रेसन बने होंगे.. मगर खिंची हुई तस्‍वीरों के साथ हमेशा यह दिक़्क़त रहती है. अपनी फ़ोटो में हम हंसते हुए कैमरा की तरफ देखते दिखते हैं.. या हाथ बांधे अचानक गंभीर दिखने के एक आधे-अधूरे प्रयास का आयोजन करते.. या फिर बहुत बार ‘हमें अपने कैमरे की लेंसिंग से बख्‍शो, भाईसाब!’ वाली याचना में कातर होते.. इन तमाम सायास-अनायास की मुद्राओं के एक विशिष्‍ट क्षण को कैमरे का एक क्लिक अचानक-से कैप्‍चर कर लेता है.. एक सच्‍चाई हमेशा-हमेशा के लिए गिरफ़्तार हो जाती है!

लेकिन क्षण विशेष की यह सच्‍चाई हमेशा आंशिक होती है.. फ्रेम में समय व रोशनी विशेष में दिखते मुखड़े से बाहर मुखड़े का ढेर सारा अप्रकट यथार्थ अनछुआ रह जाता है. बहुत बार पुरानी, अजानी घरेलू तस्‍वीरों को देखते हुए हम उसमें अपने स्‍नेह व भावना का आरोपण करके इसी न पकड़ में आई रिक्‍तता की पूर्ति करके तस्‍वीर की अपने लिए एक होलसम कहानी बनाते हैं.. और इसीलिए बहुत मरतबा एक ख़ास उमर बीतने के बाद बचपन की तस्‍वीरें बहुत मार्मिक हो उठती है.. या पूरी तरह बेमतलब हो जाती हैं.. क्‍योंकि बहुत बार फ़ोटो में कहानियों-मनोनुकूल स्‍मृतियों का आरोपण करके उन्‍हें अपने लिए जीवंत बनाना हमें बड़ा सिडक्टिव लगता है.. तो बहुत बार स्‍मृतियों के प्रति निर्मम रहते हुए वही फ़ोटो हमारे लिए उसी तरह बेमतलब भी हो जाती हैं!

मतलब यह कि एक फ़ोटो में यथार्थ का एक अंश ही होता है.. समूचा यथार्थ नहीं. फ़ोटो में दीख रहा सच फ़ोटो का सच होता है, पूरे यथार्थ का सच नहीं.. मैं जानता हूं स्‍मृतियों के भावुक मोह में आप मेरी बात मानने से गुरेज़ करेंगे.. करिये गुरेज़.. वह आपकी भावुकता का सच होगा.. जीवन में यह होता ही है कि भावुकता का सच यथार्थ के पथरीले सच को ढेरों समय तक अपनी छतरी से छुपाये रखे.. सामने आने न दे!.. मैं भी अपनी एक पुरानी फ़ोटो देखकर भावुक हो रहा हूं.. और आपकी मजबूरी समझ सकता हूं.

5 comments:

  1. अच्छा विश्लेषण किया आपने. एक फोटो अपने पूरे सन्दर्भों के साथ यदि प्रस्तुत की जाय तो काफी हद तक एक कहानी कह ही जाती है.लेकिन फोटो तो फ़ोटो है उसे यथार्थ की तरह देखना गैरलाजमी है.वैसे अविनाश जी को देखकर जो प्रतिक्रिया आपके मन में हुई ठीक वैसे ही मेरे मन में भी हुई.. लेकिन ये जरूरी तो नहीं कि भूखे नंगों की बात करने के लिये खुद भी भूखा नंगा होना पड़ेगा.. लेकिन फोटो देखकर भावुक होना ..ये तो सभी के साथ ही होता होगा..फिर आप क्यों चिंतित हैं.

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  2. susan sontag की एक क़िताब आई थी कभी on photography. मैने नहीं पढ़ी है. लेकिन सुना है या कहीं उसके बारे में पढ़ा है. अब स्मृतियां कुछ वैसी ही बची हैं जैसे नशे की हालत में कोई कविता सोची हो. कुल मिलाकर इम्प्रैशन ये है कि फोटो इंसान की संवेदनाओं को कई बार भौंथरा भी कर देती है. अगर बार-बार देखा जाए तो वो एक ऐसे सत्य का आभास कराती हैं जो स्थाई है. पल-पल बदलते यथार्थ को पकड़ने में वो नाकाम है. photography के इस semiotics पर भी कुछ प्रकाश डालकर हमारा अज्ञान मिटाइये.

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  3. " सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर ।
    देखन में छोटे लगें घाव करैं गम्भीर ॥ "

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  4. Bhaaee bahut badhiya.bahut dinon baad ek jatil anubhav ko saral taane-baane me aapne prastut kiya hai,ek behad ghair-azdakeey abhivyakti.bhupen jee kee tarah main bhee apne agyaan kee marammat ke liye ise aapko saunpataa hoon.guru john burger ne zaroor photokaaritaa par pate kee baatein kahee hain.

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  5. भाई साहब मैं शत प्रतिशत सहमत हूं आपकी बात से । ना तो स्टिल फोटो और ना ही वीडियो हमारी शख्सियत को पूरा पूरा उतार पाता है । कुल मिलाकर एक जीते जागते आदमी को तो किसी भी मीडियम में क़ैद नहीं किया जा सकता, शब्दों में भी नहीं । आपने व्‍यक्ति के लिखे हुए की तुलना उसकी चेहरे मोहरे से की, तो एक बाद याद आ गयी, आवाज़ की दुनिया में बड़े धोखे होते हैं । बोलने वाले की आवाज़ अच्‍छी लगे तो व्‍यक्ति सोचता है कि ये कोई स्‍मार्ट सा अमिताभ या शाहरूख़ जैसा व्‍यक्ति होगा । जबकि असल में ऐसा होता नहीं है । क़रीब आठ साल पहले की बात है । ऐसे ही जबलपुर शहर से एक लड़का मेरी आवाज़ सुनकर घर से भाग आया और विविध भारती आकर कहने लगा कि यूनुस जी से मिलवा दो, वो मेरे ही शहर के हैं । कोई सहकर्मी आया और परिचय करवा दिया उसने । फिर क्‍या था, मेरी दुबली पतली लंबी काया और चश्‍मे को देखकर उसे यक़ीन ही नहीं हुआ कि भारी भरकम आवाज़ वाला शख्‍स ऐसा भी हो सकता है, बस फौरन उसने कहा कि जी अब तो मुझे कमल शर्मा से मिलवा दो । उसका मक़सद था उस समय टी0 वी0 पर चल रहे सोनू निगम के म्‍यूजिकल शो में शामिल होना, कमल जी और मैंने किसी तरह उसे समझा बुझाकर कुछ पैसे देकर जबलपुर वापस जाने को कहा । पता नहीं वो वापस गया या फिर आज भी मुंबई में स्‍ट्रगल कर रहा है, कामयाब हो गया होता तो आज हम उसे पहचान जाते ना । पर आवाज़ और शख्सियत के विरोधाभास की ये घटना मेरे लिए यादगार बन गयी है । आपके लिखे से आपकी एक तस्‍वीर बन गयी है मन में । आप तो मुंबई में ही हैं, किसी दिन धोखे से मिलेंगे और उस दिन हो सकता है वो तस्‍वीर धराशायी हो जाये । मैं तैयार हूं इस बात के लिए । आप भी मेरे संबंध में ऐसे ही अहसास के लिए तैयार रहिए ।

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