Wednesday, June 6, 2007

चिरकुट चाह.. और चाहने की ऊंचाई..

एक आदमी क्‍या चाहता है?.. निर्भर करता है आदमी गोरखपुर में चाह रहा है, या यह चाहना उसने दिल्‍ली या मुम्‍बई पहुंचकर पाई है.. दोनों चाहना फिर एक नहीं ही होगी. देश से बाहर निकलकर आदमी मलेशिया पहुंच जाए तब कुछ और चाहने लगेगा.. और मैसाचुसेट्स में ठिकाना सेट कर ले तो चाहने की प्रकृति का एक बार और नए सिरे से कायाकल्‍प हो लेगा..

एक ही आदमी के चाहने में इतना फर्क़ कैसे होता चलता है?.. आदमी का अंतर्मन कामना करता है?.. या जिस वैचारिक-सामाजिक भूगोल में वह अवस्थित है, वह उसकी कामना का रूप निर्धारित करती है?..

हिंदी ब्‍लॉगर पांच कमेंट पाकर सुखी और दस पाकर धन्‍य हो लेता है.. भले आदमी को लगता है ब्‍लॉग और पोस्‍ट सकारथ हुआ. वह अपनी ब्‍लॉग की मेंड़ पर खड़ा होकर अमित अग्रवालों व उन दूसरी दुनियाओं की तरफ देखकर अपना हाजमा नहीं बिगाड़ता जहां दस नहीं दो सौ कमेंट आते हैं.. और आते रहते हैं!..

हिंदी लेखक की ही तरह हिंदी ब्‍लॉगर भी अपने जैनरायन पुरस्‍कार और शील सम्‍मान की छतरी के नीचे गदगद रहता है.. बुकर क्‍यों नहीं मिला और नोबेल पर हमारा हक़ बने ऐसा साहित्‍य हम क्‍यों नहीं लिख पा रहे हैं- जैसी चिंताओं को पास फटकने देकर अपने जीवन के चिथड़े नहीं करता.. उसे उपनगर के किसी सम्‍मानजन एरिया में एमआईजी टाइप एक सम्‍मानजनक मकान, एक आल्‍टो या ज़ेन और एकाध प्रेमिका की संभावना दे दीजिए, देखिए, वह कितने मुग्‍धभाव से एक के बाद एक दनादन कविता ग्रंथ छापे जा रहा है!

हिंदी का लेखक चरम अराजक व असामाजिक होगा अगर वह भूले से भी यह जानने की कोशिश करे कि दुनिया के एटलस पर समसामयिक लेखन का मिज़ाज क्‍या है, और कहां के लेखक किस तरह के सवालों को एड्रेस कर रहे हैं.. नहीं, वह यह सब ज़हमत उठाकर अपना सिरदर्द नहीं बढ़ाएगा.. हां, नाइजीरिया या तुर्की का कोई लेखक विज्ञान भवन या इंडिया हैबिटाट सेंटर में चला आया तो जम्‍हाई लेता उसकी कवितायें सुनने ज़रूर पहुंच जाएगा.. मौका लहा तो लेखक के बगल में खड़ा होकर एक फ़ोटा भी उतरवा लेगा.. अंतर्राष्‍ट्रीय लेखन से इससे ज्‍यादा चाहना हिंदी लेखक की नहीं है..

अंतर्राष्‍ट्रीय से हिंदी के लेखक को यही समझ में आता है कि इस बार विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन में पूंछ बनकर वह किस राष्‍ट्र पहुंचने की जुगत भिड़ाये.. और पहुंच जाने के बाद उस राष्‍ट्र के किस चिरकुट प्‍लाज़ा के आगे अपनी एक चिरकुट फ़ोटो उतरवा के साथी लेखकों को धराशायी कर दे.

हम छोटे-छोटे सुखों में सुखी हो जाने वाले, सिर्फ़ भूगोल के स्‍तर पर ही, एक बड़े राष्‍ट्र हैं. चंद मसाला डोसा, गोवा का सैर-सपाटा, डेढ़ हज़ार के दो जूते और खुशवंत सिंह के दो जोकबुक हमारे एक वित्‍तीय वर्ष को चरम-परम आनंद में भरे रख सकते हैं. पुरातत्‍व, इतिहास, कला, स्‍थापत्‍य, हाउसिंग, जल-संकट, शहरों का भविष्‍य यह सब कुछ भी हमें हमारे चाहे की दुनिया नहीं लगती.. इनकी बात उठते ही लगता है, सामनेवाला बौद्धिकता पेल रहा है.. लात से ऐसी बौद्धिकता को एक ओर ठेल.. हम अपनी बंटी और बबली टाइप चिरकुट चाहनाओं की आइसक्रीम चुभलाने लगते हैं..

यह हम हैं?.. या हमारा वैचारिक-सामाजिक भूगोल है?.. ज़रा खुद से पूछिएगा, दिन में कितनी दफ़े आप इस भूगोल को हिलाने-छेड़ने की कसरत करते हैं!

6 comments:

  1. मेरे एक मित्र का कहना था ( अब उनका यह ओरिजिनल विचार था या किसी और से टीपा हुआ, ये मेँ नहीं कह सकता )

    ' जो चाहते हो, उसे पाने की कोशिश करो. वरना जो पा चुके हो उसी को चाहने लगोगे'

    कई लोग बिना सोचे विचारे बस "चाहना" शुरू कर देते हैँ.उन्हे मुहं की खानी पड सकती है.

    कुछ लोग "क्या चाहना है", इसी को सोचते सोचते समय गुजार देते है.

    कुछ हमेशा असमंजस मेँ ही रहते है: "चाहूँ कि ना चाहूँ".

    और शेष् कुछ हैं कि " चाहूंगा मेँ तुझे सांझ सवेरे...."


    बहर हाल, इस " चाह पुराण" मे मजा तो आया.
    अरविन्द चतुर्वेदी, भारतीयम.

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  2. बहुत सही सुर साधा है .पक्के राग के गायक से यही उम्मीद थी . पर महफ़िल गलत है . माफ़ कीजिएगा बाज़ारू समय में गलत शब्दावली का इस्तेमाल कर गया,सामने 'क्लाइंटेल' गलत है .

    निश्चित रूप से कामनाओं पर 'लोकैल' का असर ही नहीं होता बल्कि अब तो 'लोकैल' ही आपकी कामनाएं ,आपकी वासनाएं तय करता है .

    पर उनका क्या जो कामना के भूगोल में ही निवास करते हैं और हमेशा उसकी परिधि के भीतर ही विचरण करते हैं . कामना के जल में ही तैरते हैं और कामना के विस्तृत नभ में ही उड़ान भरते हैं . बाहर की दुनिया से उनका किसी किस्म का कोई साबका नहीं है . कोई वास्ता नहीं है .

    जब आप 'लोकेशनल एडवांटेज' के लिए अपना घर छोड़ देते हैं तो कामना ही आपका भूगोल हो जाती है और वासना ही आपका इतिहास . तब आप कामना के देश-काल में ही निवास करते हैं और कामनातुर होना ही आपकी नियति होती है.

    कामना के संसार की नागरिकता बहुत कुछ त्याग कर, अपने 'इमोशनल बैगेज' से मुक्ति पाने के बाद ही मिलती है .

    प्रमोद भाई! उसने सब कुछ छोड़कर, ऐम्नीज़िया के -- स्मृतिलोप के -- लम्बे अभ्यास के बाद यह आनंद पाया है . आप उसे कामना के मुक्त आकाश में अबाध किलोल क्यों नहीं करने देते ? क्यों उस पगहा तुड़ा चुकी स्वतंत्र आत्मा पर अपराधबोध लादना चाहते हैं ?

    आखिर आप तितली को मधुमक्खी क्यों बनाना चाहते हैं ?

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  3. सही सोच है गुरु जी..पर जो आप चिट्ठाकार से चाहने को कह रहे हैं..वो अभी नहीं चाहेगा... वैसा चाहने के लिये बड़ी सोच की जरूरत होती है और बड़ी सोच के लिये छोटी सोच का पूरा होना जरूरी है.. अभी हिन्दी वालों की छोटी सोच ही पूरी नहीं हुई बड़ा कहां से सोचें... आप तो फिर भी डेढ़ हजार के जूते और एम आइ जी फ्लैट का सोच सकते हैं ...इसलिये कुछ गड्ड्मड्ड आकृति उभरती तो है ..पर उनका क्या जो दो सौ के दो जूते पहनते हैं और किराये के मकान में रहते हैं...जैनारायन सम्मान ही नहीं मिलता नोबल की कौन सोचे... पेट भरा हो तो ही भगवान का भजन सुहाता है भाई...

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  4. आपने बहुत् अच्छा लिखा । यह और इसके पहले वाला दोनों लेख। बहुत खूबसूरत गद्य!

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  5. अभी शुक्ला जी का कॉमेंट देखा तो समझ आया कि खूबसूरत गद्य की भी प्रसंशा करनी होती है. अच्छा खूबसूरत गद्य है जी. वो तो आपके सारे ही होते हैं...एक आध अपवाद को छोड़कर...:-)

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  6. >...उसे उपनगर के किसी सम्‍मानजन एरिया में एमआईजी टाइप एक सम्‍मानजनक मकान, एक आल्‍टो या ज़ेन और एकाध प्रेमिका की संभावना दे दीजिए, देखिए, वह कितने मुग्‍धभाव से एक के बाद एक दनादन कविता ग्रंथ छापे जा रहा है!

    ये करिया मुण्डा की चाह है - कनस्तर भर आटा, एक बोतल कड़ुआ तेल और कुछ चावल. बस और क्या चाहिये जीवन में.
    हिन्दी वाला चिठेरा सच में आकांक्षाओं का आदिवासी है!

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