Thursday, June 7, 2007

सुखी श्रीमती पॉल का अकेलापन: एक

सोलह-सत्रह साल की थीं जभी से श्रीमती पॉल यह सपना देखती रहीं कि अपनी नानी की तरह वह भी किसी दिन टसर की साड़ी और हाथ में तानपुरा लिए ठुमरी और दादरा गाकर लोगों को मंत्रमुग्‍ध कर देंगी. मगर मन की सब इच्‍छाएं पूरी हो जाएं, जीवन इतना उदार होता कहां है! श्रीमती पॉल ने मन में कोमल मरोड़ जगानेवाली ढेरों कोमल कवितायें लिखीं, जल व तैल रंगों में शबीह और भीमताल में सूर्यास्‍त की दृश्‍यावलियां आंकीं, जल वितरण विभाग में सहकर्मियों के बीच सबकी प्रिय तथा पति सुकेतु व दोनों बच्‍चे- प्रांजल व अद्भुत- की दुलारी बनी रहीं लेकिन टसर की साड़ी व तानपुरे के साथ पचास लोगों की महफ़ि‍ल में ठुमरी व दादरा गाकर सबका मन जीत लें, श्रीमती पॉल का यह सपना, सपना ही रहा, यथार्थ में परिणत न हो सका.

राग पुरिया धनाश्री या राग यमन की कोई अच्‍छी प्रस्‍तुति सुन लेने पर श्रीमती पॉल को एक मीठी उदासी घेर लेती कि उनका मीठा सपना, सपना रह ही गया, लेकिन फिर अपनी कामकाजी प्रकृति के अनुकूल ऐसी उदासियों को झटककर जल्‍दी ही वे इस अनमनस्‍कता से बाहर भी निकल आतीं. माथे को हाथों में लिए बैठे-ठाले चिंता करने की प्रकृति श्रीमती पॉल को एकदम भी पसंद नहीं थी. दूसरी माएं अपने बच्‍चों को पेड़ पर चढ़ता देख घबराती होंगी जबकि श्रीमती पॉल प्रांजल या अद्भुत को पेड़ पर चढ़ा देख प्रोत्‍साहित करतीं कि वे उन्‍हें एकदम ऊपर की शाख छूकर दिखायें. इसी तरह जल वितरण विभाग की अन्‍य महिला सहकर्मियों की तरह श्रीमती पॉल न बालों को रंगने के सवाल पर चिंतित होतीं या न ही इस पर कि क्रेडिट कार्ड व लोन के लिए जब तब चले आनेवाले फ़ोन कॉल्‍स की मीठी बातों में क्‍यों और कितना उलझा जाए.

दरअसल श्रीमती पॉल ने शुरू से ही यह नीति बना रखी थी कि दफ़्तर में या मोबाइल पर इस तरह की किसी भी फालतू की बतकही को अपने जीवन से बाहर रखेंगी. अब तक इस नीति के पालन में उन्‍हें कभी दिक़्क़त हुई भी न थी. सुकेतु काम से शहर के बाहर व बच्‍चे खेलने में बझे होते तो श्रीमती पॉल मोबाइल पर एचएसबीसी व आईसीसीआई के कॉलरों के ऊटपटांग प्रश्‍नावलियों में नहीं फंसतीं, चैन से सोफे पर पसरी आंखें मूंदकर राशीद ख़ान व मंसूर साहब के संगीत का आनंद लेतीं.. ऐसा ही कोई चैन का शांत, निश्‍छल क्षण होगा जब श्रीमती पॉल के मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी थी.. कॉलर की यह प्रार्थना सुनते ही कि हर तीन मिनट के कॉल पर श्रीमती पॉल को सिर्फ़ एक रुपये अस्‍सी पैसे खर्चने होंगे, श्रीमती पॉल नाराज़गी में कॉलर को डांटकर तभी यह चर्चा खत्‍म कर देना चाहती थीं, लेकिन जब उसने कहा कि वह अच्‍छा बांसुरी वादक है, और संरक्षण के अभाव में शास्‍त्रीय संगीत सब कहीं धीरे-धीरे खत्‍म हो रहा है, और अपने जीवन का महज़ तीन मिनट व एक रुपये अस्‍सी पैसे खर्च करके श्रीमती पॉल पे आफ़त नहीं टूट पड़ेगी, मुसीबत में फंसे एक गरीब कलाकार का भला ज़रूर हो जाएगा- तो श्रीमती पॉल अंतत: पसीज कर एक रुपये अस्‍सी पैसे के रेट पर तीन मिनट के लिए बंसीधर घोषाल का बांसुरी वादन सुनने को तैयार हो गईं.

बंसीधर घोषाल ने कहा था इसलिए नहीं, श्रीमती पॉल खुद भी आश्‍वस्‍त थीं कि तीन मिनट फंसाकर उन पर आफ़त नहीं टूट पड़ेगी.. मगर हुआ ठीक इसके उल्‍टा.. संघर्षरत कलाकार की बांसुरी के राग हंसध्‍वनि में पता नहीं ऐसी क्‍या कशिश थी कि श्रीमती पॉल ने सुना तो सुनती चली गईं.. तीन मिनट नहीं कुल तैंतीस मिनट सुना.. और तब भी राग हंसध्‍वनि का सुरीलापन उनके मन को पूरी तरह तृप्‍त नहीं ही कर सका.

इसके बाद तो श्रीमती पॉल के जीवन का चैन, शांति सब छिन गई हो जैसे.. दफ़्तर, घर हर कहीं रहते-रहते उनका मन एकदम उचट-सा जाता और कानों में राग हंसध्‍वनि का अभाव उनकी आत्‍मा में भारी छटपटाहट भर देती.. जब तब दिन में दसियों मर्तबा वह बंसीधर घोषाल को फ़ोन कर-करके राग हंसध्‍वनि का जादू सुनतीं तब कहीं जाकर किसी तरह चैन पातीं.. मगर फ़ोन के समाप्‍त होते ही वापस बेचैन होने लगतीं.

बेचैनी का यह स्‍वभाव श्रीमती पॉल की प्रकृति नहीं थी. उन्‍हें इस बात से बेतरह तक़लीफ़ होने लगी कि बांसुरी की एक धुन ने उन्‍हें इतना बेबस व अपने नियंत्रण में कर लिया है.. बंसीधर घोषाल किसी अन्‍य काम में बझे हों, या किसी संगीत सभा में भागीदारी के लिए शहर के बाहर गए हों, तो श्रीमती पॉल की उद्वि‍ग्‍नता एकदम-से बढ़ जाती.. उन्‍हें लगता उनकी जीवनी बूटि छीन गई हो जैसे.. घर में बच्‍चों की कोई मामूली मांग व सुकेतु की सहज हंसी भी श्रीमती पॉल में चिढ़ भर देती मानो सब मिलकर उनका उपहास कर रहे हों जैसे.. बदहवाशी में फिर वह बंसीधर घोषाल को रिंग पर रिंग किये जातीं जब तक कि मुसीबत में फंसा वह कलाकार हाथ जोड़कर उनसे विनती नहीं करता कि इस वक़्त किसी भी सूरत में उसके लिए बांसुरी बजा सकना असंभव है!.. बंसीधर घोषाल से ऐसे जवाब सुनकर श्रीमती पॉल हतप्रभ रह जातीं.. उन्‍हें लगता उनके प्रेम व श्रद्धा का उन्‍हें उचित पुरस्‍कार नहीं मिल रहा.. घायल व छटपटाई वह अंदर ही अंदर अपने में कूढ़ती रहतीं.. और यह दर्द जब बेतरह बढ़ जाता तो हारकर वापस बंसीधर घोषाल को फ़ोन करतीं.. और जब तक राग हंसध्‍वनि सुन न लेतीं, उनकी आत्‍मा का चैन नहीं लौटता.

जारी..

11 comments:

  1. रचनाशीलता के आयाम खुलते जा रहे हैं। अद्भुत...आज की जमीन पर कल के कैरेक्टर का द्वंद्व किन मोड़ों से गुजरता है, इंतजार रहेगा।

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  2. वाह परमोद भाई अंत तक टूटने नहीं दी तारतम्‍यता । दिलखुश हुआ । साधुवाद

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  3. मन की गाठें खुल रही हैं मगर चिरकुट चाह और चाहने की ऊँचाई के पार ये कथा ले जाए तो आम पाठक भी जाने की अंतता‍‍िट्रयता की हिन्दी वाली ऊँचाई क्या होती है वो भी परिभाषा में नही यर्थाथ में ।

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  4. मिसेज़ पॉल और वंसीधर का द्वंद अच्छी तरह उभरता दीख रहा है, देखें ,मध्यांतर के बाद होता क्या है?अगली कड़ी का इतज़ार है!!!!

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  5. सूक्ष्म और विकट मनोविज्ञान का महीन और सुरीला आख्यान. और निकालिए, जल्दी.

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  6. "शान धारम" ??? आलोक पुराणिक ने निर्मल आनंद की नक़ल की ह

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  7. ati sundar , madhur.. taartamay... man ki dabi ichhayen.. kab sar uthakar haawi ho jayen .. aur niyamon ka dhata bata den..in par koi jor nahi...good..

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  8. भाई साब ये किस राग की बंदिश है.. बड़ी कशिश. एक अजीब सा समां.. लगता है धचका लगने से इसका धैवत उतर कर कोमल हो गया है..

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  9. संगीतमय प्रस्तुति! :)

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