Friday, June 8, 2007

सुखी श्रीमती पॉल का अकेलापन: दो

अपनी अनवरत की इच्‍छा, कामनाओं में थकीं श्रीमती पॉल अकेले में कभी समझने की कोशिश करतीं कि राग हंसध्‍वनि में आख़ि‍र ऐसी वह क्‍या चीज़ है जिसकी इस तरह अघोषित दास होकर वह अपने भरे-पूरे सुखी परिवार के बीच निपट अकेली पड़ती जा रही हैं?.. कहीं इस उम्र में आकर दुबारा उन्‍हें प्रेम तो नहीं हो गया?.. और किससे हुआ है.. सुमधुर बांसुरी से.. या उसके बजानेवाले बंसीधर घोषाल से?.. ऐसा सोचते ही श्रीमती पॉल के समूचे देह में एकबारगी बिजली दौड़ जाती और चेहरा शर्म से लाल और आंखें ज़मीन में गड़ जातीं.. देर तक कांपती-सिहरतीं इस उधेड़बुन को दिमाग में साफ़ करने का यत्‍न करतीं.. फिर हारकर खेलते बच्‍चों के बीच निढाल पड़ जातीं.

दफ़्तर में सहकर्मियों ने इस बात को नोट भले किया हो कि हमेशा की किफ़ायतपसंद श्रीमती पॉल इन दिनों हर वक़्त फ़ोन कान से लगाये रहती हैं, मगर उनके सीधे-सादगीपने में उनकी यह नई व्‍यस्‍तता शंका और फुसफुसाहटों का सबब कभी नहीं बनी. न ही सुकेतु कभी पूछने बैठे कि फ़ोन पर चौबीसों घंटे का जुड़ाव आख़ि‍र किसके साथ.. आफ़त का असल पहाड़ तब टूटा जब अगले महीने की शुरुआत में फ़ोन का बिल आया!..

श्रीमती पॉल कुछ समय तक तो सकते में रहीं मानो यह उनका निजी नहीं किसी के दफ़्तर का बिल हो.. या फ़ोन कंपनी से बिलिंग में गलती हुई हो जैसे. सुकेतु भी शुरू में यही माने बैठे रहे.. फिर जैसे-जैसे वास्‍तविकता सामने व सबकी समझ में आने लगी, श्रीमती पॉल को एक दूसरे किस्‍म की घबराहट व बेचैनी ने जकड़ लिया.. सुकेतु के किसी सवाल का ठीक-ठीक उन्‍हें उत्‍तर देते नहीं बन रहा था.. कभी वह राग हंसध्‍वनि के अतिशय माधुर्य के बारे में बातें करने लगतीं.. और फिर अचानक हड़बड़ाकर बंसीधर घोषाल के अनोखेपन का गीत गाना शुरू कर देतीं.. सुकेतु सिर हाथों में लिए चुपचाप सब सुनते रहे.. क्‍या और कितना उनकी समझ में आया उसे ठीक-ठीक शब्‍दों में बताना वैसे ही मुश्किल है जैसे श्रीमती पॉल की मन:स्थिति का वास्‍तविक बयान करना.

फ़ोन के बड़े, भीमकाय बिल को चुकता करने के चक्‍कर में खाते-पीते सुखी परिवार में अचानक कंगाली घर कर के बैठ गई. बच्‍चों के स्‍कूल का फ़ीस देने तक को पैसे न रहे. बस की बजाय बच्‍चे पैदल चलकर स्‍कूल जाने लगे. आलू के सिवा घर में दूसरी सब्जियां आनी बंद हो गईं. छोटा अद्भुत शिकायत करता कि वह पाखाना में बैठता है मगर पेट से बाहर कुछ नहीं आता. प्रांजल भाई को समझाता कि पेट में कुछ होगा तभी तो बाहर आएगा. हमेशा बच्‍चों के बीच तहज़ीब की शिक्षा देने वाले सुकेतु ऐसी टिप्‍पणियां सुनते.. मगर पहले की तरह बच्‍चों को सुधारने की जगह अब उन्‍हें अनसुना कर जाते.

अच्‍छे-भले सुखी परिवार में उदासी की धूसर चांदनी तन गई. श्रीमती पॉल हर वक़्त और हर चीज़ से इस कदर नर्वस रहने लगीं कि उन्‍हें दफ़्तर से लीव लेकर घर बैठने पर मजबूर होना पड़ा. सुकेतु पत्‍नी पर गुस्‍सा करने की जगह खुद गुमसुम और चुप्‍पा जीव में बदल गए. बिला वजह हंसने लगते.. या देर रात उठकर रसोई के डिब्‍बा-बरतन की तांक-झांक करने लगते कि क्‍या बचा है क्‍या खतम हुआ..

हथौड़े से पीट-पीटकर मोबाइल नष्‍ट-ध्‍वस्‍त करके भी श्रीमती पॉल आश्‍वस्‍त नहीं हो सकीं.. राशिद ख़ान, मल्लिकार्जुन मंसूर, सिद्धेश्‍वरी देवी, गिरिजा देवी सबके संगीत को कूड़ेदानी में डालकर जला चुकने के बाद भी श्रीमती पॉल को लगता कोई अदृश्‍य ताक़त है जो उनका पीछा कर रही है, भारी बोझ लिए उनके ऊपर जमी हुई है.. करवटें बदलती वह सारी-सारी रात गुजार देतीं.. और सारा दिन थकी-थकी दीवार का सहारा लिए बुदबुदाती यहां और वहां खड़ी रहतीं.. अद्भुत और प्रांजल इस लगातार बने रहने वाले सन्‍नाटे से भारी भय में रहते.. उन्‍हें लगता उनकी मम्‍मी और पापा पर किसी जादूगर ने जादू की छड़ी फेर दी है.. और वे सभी अरक्षित, असहाय प्राणियों में बदल गए हैं.

ऐसा ही कोई उचटा दिवस रहा होगा जब बाहर के दरवाज़े पर दस्‍तक हुई. स्‍नानघर में बच्‍चों का कपड़ा फटकारते, उसे बीच में ही छोड़ सुकेतु बाहर आए. दरवाज़े पर जो अपहचाना अजनबी खड़ा था वह खुद को उनकी पत्‍नी श्रीमती पॉल का दोस्‍त बता रहा था.. उन्‍हीं को ढूंढ़ता-खोजता उनके घर तक पहुंचा था. अपने को बंसीधर घोषाल कहनेवाले इस अजनबी ने आगे सूचना दी कि वह और श्रीमती पॉल एक-दूसरे को बेहद अंतरंगता से जानते हैं.. वह उसकी पुरानी ग्राहक हैं.. और हमेशा उसकी सर्विस से पूरी तरह संतुष्‍ट होती रही थीं.. मगर पता नहीं पिछले कुछ अर्से से क्‍या कारण है कि वह उन्‍हें फ़ोन कर रहा है, उनका नंबर रिंग होता है मगर वह फ़ोन उठा नहीं रहीं..

बरामदे के अंधेरे की अपनी नीमबेहोशी में श्रीमती पॉल ने इतने दिनों के अंतराल पर- आज पहली दफा फ़ोन नहीं, प्रकट में अपने घर के दरवाज़े के बाहर- जानी-पहचानी, उन्‍हें बेसुध और पागल कर देनेवाली वह आवाज़ सुनी.. बंसीधर घोषाल को अपना परिचय देते सुना.. और अचानक अवश फिर उसी उद्दाम कामना में जकड़ गईं जो उनके विवेक, परिवार व समाज सबकी समझ को बेमतलब करता- उनके अंतर्मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ राग हंसध्‍वनि का संगीत बचाये रखता था.. अपने उस प्रिय राग के जनक, अपने प्रिय-प्रिय प्रियतम की मात्र एक झलक भर के लिए श्रीमती पॉल आज सबकुछ फूंककर निर्विघ्‍न, एकदम बेशर्म होकर बाहर भागे चली आना चाहती थीं.. शायद सिर्फ़ इतना भर देखने के लिए कि उनके अपने बंसीधर घोषाल का रूप क्‍या है कैसा है.. या कुछ और पता नहीं क्‍या.. मन की जाने किस-किस तरह की सब-सारी बेकली का ठीक-ठीक जवाब श्रीमती पॉल स्‍वंय भी समझ रही थीं कहना मुश्किल है.. लेकिन उन शुरुआती तप्‍त क्षणों के पागलपन के बाद फिर वह सांस रोके बरामदे की खिड़की के सींखचों को थामे जड़ खड़ी रहीं.. कुछ देर में जाने क्‍या कह कर सुकेतु ने जब बाहर का दरवाज़ा वापस बंद कर दिया.. चेहरे पर एक फीक़ी मुस्‍कान के साथ श्रीमती पॉल धीमे-धीमे अपनी सामान्‍य परिचित, घरेलू स्थिति में लौटती चली गईं.

7 comments:

  1. इतना मार्मिक चित्रण श्रीमती पॉल का कैसे कर लिया आपने ? लेखनी का जादू है , कि कल्पना की उडान है कि सचमुच की कोई श्रीमती पॉल के जानकार हैं आप ?

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  2. श्रीमती पॉल, सुकेतु, घोषाल बाबू, घोषाल बाबू की बांसुरी, सब अपनी जगह पर सही लग रहे हैं कहानी भी सचमुच अच्छी लगी पर मोबाइल फोन का इतना ज़्यादा बिल और उससे हैरान श्रीमती पॉल. इस किरदार पर ये "फोन बिल "वाला प्रसंग थोपा सा लगता है.

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  3. इस हिस्से में पहले वाले जैसी ग्रैविटी नहीं है। कहानी को बड़ा स्वीप देने के लिए जिस धीरज की जरूरत है,वह या तो यहां है ही नहीं, या फिर आपके जेहन में अक्सर आदतन पैदा हो जाने वाली व्यंग्य की कुकुरौंछी ने काट-काटकर इसकी हालत खराब कर डाली है। संभालिए, इसमें आपकी अब तक की सबसे खराब रचना बनने की संभावना नजर आ रही है।

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  4. achha laga par jaisee ummed thi waisa nahi.. kuchh bhatkaaw , adhoorapan.. prwaah tooota sa tha..

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  5. समझ में नहीं आ रहा कि प्रत्यक्षा के पाले में खड़ा हो जाऊँ या चन्दू भाई से सहमत हो जाऊँ.. मार्मिक ज़रूर है.. पर शायद श्रीमती पॉल की कहानी अपनी सम्भावनाओं के बावजूद कहीं ना जाने.. बल्कि मध्यमवर्गीय सीमाओं में ही कै़द हो जाने पर ही चन्दू भाई ने इतना कड़ा स्वर अपना कर आपको गरियाया.. आप उसका बुरा न मानें और बात के तत्व को पकड़ लें..

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  6. बहुत पसंद आई.....शायद भाग दो को थोड़ा और अच्छा लिखने में आप समर्थ थे....थोड़ी जल्दबाजी में खत्म कर दी....किन्तु श्रीमती पॉल की मानसिकता की समझ वाकई काबिले तारीफ है।

    बधाई!!

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