Saturday, June 9, 2007

चोट, गहराई व व्‍यावहारिकता

पिछले दिनों दो छोटे ऐसे अनुभव हुए जिसने मेरी एक पुरानी कमज़ोरी की ओर फिर से मेरा ध्‍यान आकृष्‍ट कराया; इसकी नसीहत दी कि राय बनाने की जल्‍दी व कुएं के मेंढक वाले व्यवहार में विशेष फर्क़ नहीं है. जीवन की वृहत्‍तरता से हमारा गहरा संवेदनात्‍मक लगाव है तो अपनी समझ बनाने की हड़बड़ी के विशिष्‍ट आचरण से हम सामनेवाले का कम, अपना व अपनी समझ का ज्‍यादा नुकसान करते रहते हैं. मन में कुछ यही सब चिंताएं उल्‍टे-सीधे तरीके से तैर रही थीं जिस पर कल मैंने यह छोटा-सा नोट लिखा. पांच प्रतिक्रियाएं आईं. प्रत्‍यक्षा का स्‍वर सादे चुहल का था (उसकी संक्षिप्‍तता में जितना मैं कह सकता हूं मुझे समझ में आया), तो संजीव की ‘बहुत सही!’ हमारी चिंता की कढ़ी में साथ खड़े होने की नमक की तरह थी. बकिया की तीनों टिप्‍पणियां ज्‍यादा मार्मिक और मन के गहरे, घनेरे अंधेरे पगडंडियों से होती-गुजरती बाहर आती हैं, और समाज को मार्मिकता में जी रहे लोगों की ‘समझने’ की चिंता का फिर एक दूसरा ही ताना-बाना हमारे सामने रखती हैं..

भूपेन के कहने में समझने की बनिस्‍बत समझने की कोशिशों के तहत खायी तक़लीफ़ों की कड़वाहट का स्‍वर ज्‍यादा है. शायद यह तक़लीफ़ का स्‍मरण ही है जो उनके कुछ अच्‍छा समझ लेने के साथ-साथ बुरे की स्‍मृति पर ‘ओवरलैप’ करती चलती है. वे कहते हैं, “..वैसे कौन किसको जानता है इस दुनिया में. सब कुछ पारे की तरह तरल है यहां. भले ही हम सबकुछ स्थाई होने का भ्रम पाल लें. सेल्फ पिटी अकेले में तो अच्छी है सार्वजनिक तौर पर शायद नहीं. वैसे जो आपने लिखा है वैसी ही कुछ यंत्रणा में भी झेलता हूं. यंत्रणा से असहमति नहीं. लेकिन जिगर के ज़ख्मों को चौराहे पर दिखाने पर लोग आपको या मुझे भी भिखारी से ज़्यादा कुछ नहीं समझ सकते. अपने-अपने खोल में इतने मस्त हैं लोग कि उन्हें ज़्यादा कुछ जानने की ज़रूरत ही क्या है. सबकी परिभाषित किस्म की जिंदगी और नैतिकताएं इतनी बलवान हैं कि वर्चुवल डायलॉग भले ही संभव हो यथार्थ यहां किसी धर्म, परिवार या स्थापित एथिक्स की चाहरदीवारी में ही आपको कैद मिलेगा. ”.. अनिल रघुराज की समझ को सुनिए.. और गुनिए, “मानवी अंतर्कथाएं बहुत गहरी हैं. लेकिन हर कोई इतनी परतों में, इतने परदों में घिरा है कि बाहर झांकने पर भी दूसरों को अपनी बनाई सीमाओं में ही देख पाता है. मुक्तिबोध ने बहुत पहले दरमियानी फासलों की बात की थी. मुझे लगता है कि हम अपने समय को समझ लें तो औरों से लेकर खुद को भी समझ सकते हैं.”

अब काकेश बाबू की समझ-सीख सुनिए. समाज को लेकर मार्मिक वह भी हैं.. लेकिन उनका कहना है जब अपना आत्‍मबोध ही ऐसा भारी रहस्‍यलोक बना हुआ है, फिर खामखा परायेपन के उलझावों पर सिर फोड़ने में समय ज़ाया क्‍यों करें. उनकी सीख प्रैगमैटिक है, “खुद को जानना ही जब इतना कठिन है तो दूसरो को कैसे जानें ..और फिर ऊर्जा भी क्यों लगायें जानने की..!! एक व्यक्ति को कई एंगिल से देखा, जाना और परखा जा सकता है ..और हर व्यक्ति अपनी अपनी समझ और रुचि के हिसाब से किसी को जानता है तो फिर आप इतना व्यथित हो लरबरायें नहीं, बस करते रहें जो आपको अच्छा लगे ..बिना ये सोचे कि किसने जाना, कैसे जाना, कितना जाना... ” काकेश का यह व्‍यवहारजन्‍य अर्जित जीवन-ज्ञान है. शायद आज के व्‍यावहारिक समय के सरवाइबल किट के लिए ज्‍यादा उपयोगी भी.

मगर मैं लरबराता हुआ अभी भी ‘समझने’ की उसकी व्‍यापकताओं में चिंता कर रहा हूं. ज्‍यादा-ज्‍यादा कर रहा हूं.. आप, स्‍वाभाविक है, अपनी समझ का निजी रास्‍ता चुनने को स्‍वतंत्र हैं!

3 comments:

  1. प्रमोदजी
    कोई खुद को ही कहां जान सकता है। मतलब यह बात आध्यात्मिक स्तर की नहीं कह रहा हूं। कई बार कई स्थितियों में हम खुद से एक नयी पहचान करते हैं। अपने ही को एक सिलसिले में देखें, तो एक के बाद एक नये व्यक्तित्व उभर कर आते हैं। निदा फाजली साहब के इस शेर में बहुत कुछ कहा गया है-हर आदमी में होते हैं, दसबीस आदमी
    जिसको भी देखना, कई बार देखना
    तो भईया एक एक बीस बीस को लिये घूम रहा है। कहां तक सबसे मुलाकात करो। जितनी हो जाये, बहुत है। न हो, तो भी ठीक है। जिंदगी छोटी है, बहूतों से मुलाकात की, तो मुलाकाती भर होकर रह जायेंगे। नहीं। वैसे इस विषय पर और चिंतन की जरुरत है। मैं धांसू बुद्धिजीवी हूं, सो पहले बोल देता हूं, फिर सोचता हूं। बाद में सोचकर बताऊंगा।

    ReplyDelete
  2. आप को ज्ञान या सलाह देने जितनी समझ नहीं है अपनी...पर जितनी अनुभव जन्य समझ है उसके ही द्वारा कहता हूँ कि इस प्रकार की परिस्थितियां कभी ना कभी सभी के जीवन में आती हैं ..जब खुद को पहचानने के लिये हम दूसरों की नजर से खुद को देखते हैं ..दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं या होंगे ये प्रश्न तब उत्पन्न होता है जब हम ये सोचते हैं कि "कौन हूँ मैं ?" ..ये जानने के लिये भी हम दूसरों से नहीं पूछ्ते कि वो क्या सोच रहे हैं खुद इस बात का निर्धारण करने लगते हैं कि वो क्या सोचते होंगे.. इस प्रश्न का उत्तर हम बाहर देखने की बजाय अपने अन्दर ही खोजें तो शायद मिल भी जाय लेकिन हम ऎसा तो करते ही नहीं हैं .. इस तलाश में बाहर जाते हैं कि शायद कोई उत्तर मिल जाये पर नहीं मिलता.. फिर या तो हम चकाचोंध में मूल प्रश्न को भूल जाते हैं या फिर निराश होकर बैठ जाते हैं... सुख की प्राप्ति होने पर दुखी होने के कारणों की पड़ताल करना कोई जरूरी नहीं समझता.. इसलिये मैं तो यही कहुंगा कि शांत चित्त होकर अपने अन्दर झांके तो आप पायेंगे कि सब कुछ कितना सुन्दर है और जो नहीं है उसे सुन्दर बनाया जा सकता है ... असुन्दर से सुन्दर बनने की यात्रा हमारे मन से प्रारम्भ होती है...

    " जाकी रही भावना जैसी ,प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी..."

    ReplyDelete
  3. प्रमोद जी आपको राय तो नहॊ दे सकता पर अपन तो एक पुरानी कहानी के प्रेमी है लगे हाथो आपको भी सुनाये देते है
    नदी मे एक साधु बार बार एक बिच्छू को उठा कर हाथ पर रख रहा था,बिच्छू बार बार काट कर बहाव मे गिर जाता, न साधु मानता था ना बिच्छू
    आखिर हम ने पूछा छोड क्यो नही देते महाराज जाने दो
    जवाब मिला उसका स्वभाव है डंक मारना,और मेरा उसे बचाना
    वो अपना काम कर रहा है मै अपना,मै उसके चक्कर मे अपना स्वभाव कैसे बदल लू

    ReplyDelete