Sunday, June 10, 2007

ज्ञानहरण...

बहुत ज्ञान ठिल चुका.. हमारा ही ठेला हुआ है.. आस-पास इतना इकट्ठा हो गया है कि इच्‍छा हो रही है ब्‍लॉग का नाम बदलकर ज्ञानदान कर लें.. या ज्ञान पान चूना भंडार टाइप जैसा कुछ.. हद है!.. सच बताऊं, बड़ी शर्म महसूस हो रही है.. हमारे इस ज्ञान ठेलने के चक्‍कर में काकेश जैसा पहुंचा हुआ खिलाड़ी भी ‘दो रास्‍ते’ के बलराज साहनी वाली विनम्रता की मूर्ति होकर गलत दोहों के चक्‍कर में पड़ रहा है.. इक बंगला बने न्‍यारा बोलने की जगह ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी..’ जैसा गलत भजन गा रहा है.. हद है, काकेश, इस तरह ये चिठेरी दुनिया जाएगी कहां?.. फिर पुराणिक का कहना सही ही है कि जिंदगी छोटी है, बहुतों से मुलाकात के चक्‍कर में पड़े तो ऐसा न हो मुलाकाती भर होकर रह जाएं. सही है, आलोक, आपकी दीप्ति.. रह क्‍या जाएं, रह ही गए हैं! इतने वर्षों से इसी उलझन में पड़े हैं कि वह कौन आत्‍म व बाह्यजगत है जिसका ठीक-ठीक परिचय पाना है. पीठ पीछे दसियों साथियों ने इस बीच मकान और गाड़ी ठोंक लिया और हम जो हैं अभी तक अपने में उलझियाए हुए हैं.. क्‍या फ़ायदा ऐसे ज्ञान पान का?.. एचएसबीसी ने भी ऐसे किसी ज्ञान के डिपो‍ज़ि‍ट पर लोन दे सकने में असमर्थता जताई है.. रामजीत बाबू और बेबी की भी कोई खबर नहीं.. रवीश कुमार पतनशील साहित्‍य में हमारा हाथ बंटाने की बजाय खुद कविताई बांटने में पिले पड़े हैं.. बड़ा अंधेरा-अंधेरा-सा लग रहा है.. हद है!

छोड़ि‍ए, हटाइए ये सब.. रघुवीर सहाय की ‘सीढ़ि‍यों पर धूप’ में से इन पंक्तियों का आनंद लीजिए. ये खास तौर पर प्रियंकर भाई के लिए हैं जो इन दिनों हमारे ज्ञानदान से उखड़े हुए हैं. तो, लीजिए, प्रियंकर भाई, अर्ज़ है:

दिन यदि चले गए वैभव के
तृष्‍णा के तो नहीं गए
साधन सुख के गए हमारे
रचना के तो नहीं गए.
रघुवीर जी की ही एक और कविता है, ‘आत्‍महत्‍या के विरूद्ध’ से. ज्ञानदान नहीं है, ‘मेरा मींजा दिल’ है, आनंद लीजिए:

एक शोर में अगली सीट पे था
दुनिया का सबसे मीठा गाना
एक हाथ में मींजा दिल था मेरा
एक हाथ में था दिन का खाना.

इस डर से कि बस रुक जाएगी
आवाज जहां मैं दे दूंगा
मैं सुनता था. कोई छू ले कहीं
मेरी पीठ नहीं- आना जाना लोगों का
हंसना गन्‍धाना- सीने में भरे साबूदाना
दांतों की चमक सुथरी नाकें- वह रोज-रोज
इस रोज आज कल भी मुझ पर झुक जाएगी
सूखी लड़की. चेहरा चेहरे चेहरों के मुंह
गाढ़े गोरे पक्‍के खुश चुप. अनजाने बेमन मुस्‍काना

मोटे बुजदिल. घुप. शहरों के.
तब मैं समझा
वह अनिता थी
अनिता? वह सीधी सलोतरी अपनी अनिता थी
रोजाना
जब तेज हुई बस
मैंने अंग्रेजी में कहा
ला कबाना

कोई सुन न सका.
मेरी खुशहाली के दिन में
मुझसे दो आने ले न सका. मैं हो न सका
मैं सो न सका. मैं रो न सका. मैं पों न सका
पों क्‍या माने?

6 comments:

  1. बढ़िया कविता सुनाई, ये अपने फिराक साहब की ही है न, रघुवीर सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी।

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  2. सही है। लेकिन अपना ज्ञानदान जारी रखें! शरमायें नहीं!

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  3. अभिनव प्‍यारे, नहीं, रघुवीर सहाय व फ़ि‍राक गोरखपुरी दो अलग पहचानें व बहुत हद तक अलग दुनिया के लोग थे.. फ़ि‍राक साहब उर्दू के शायर थे और इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में मास्‍टरी की.. रघुवीर सहाय ने 'दिनमान' के ज़रिये हिंदी पत्रकारिता को नए मानदण्‍ड दिए, फिर कवि रूप जो है उसकी एक छोटी झलक आपने देखी ही..

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  4. अब जब पाठक बढ़ रहे है तो जारी रखे, ज्ञानदान :)

    पढ़ा कविता को छोड़ कर. कभी उसे भी हजम कर सकूंगा.

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  5. आशा है प्रियंकर भाई इस मस्त कविता का आनन्द लेंगे.. हम ने तो ले लिया..

    और जी आपकी फोटो.. वो भी मस्त है.. कुछ तो अदा है जनाब..

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  6. प्रमोद जी
    ब्लाग के सार्वजनिक वितरण प्रणाली की तरह आप हम सब लोगों को ज्ञान बांटते रहिये। मैं इस बीच अपने काम छोड़ कर कवि हो रहा हूं। ट्राई कर रहा हूं। आपके रहस्यमयी उपन्यासों में भी मजा आता है।
    हम सब ज्ञान गिल्ट से बचे रहें और अपने आप को सामान्य महान मान कर लिखते रहें। लिखने से दुनिया नहीं बदलेगी मगर दुनिया को कुछ पढ़ने के लिए तो मिलेगा। इसमें कोई संदेह

    वर्ना एक दिन आटो वाला घर लौट कर अपनी बीबी से कह देगा कि आज कल कुछ पढ़ने को नहीं रहा। उसके कहते ही इसकी ज़िम्मेदारी हमलोगों पर ही आएगी। और हमें शर्मिंदा होना पड़ सकता है। सो ज्ञान दान कैरी ऑन। बल्कि ज्ञान दान

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