Monday, June 11, 2007

नहीं समझने के पक्ष में...

अविनाश ने कल कहा ये ब्‍लॉगिंस-स्‍लॉगिंग के आन्‍तरिक ज़ि‍रहों में ज्‍यादा न उलझूं, देश-समाज की ऊंचाइयों वाले लेखन की तरफ उड़ निकलूं.. मैं एकदम उखड़ गया.. कहा, हद करते हो, यार! मैं यहां फंसा हुआ हूं और तुम्‍हें दिल्‍लगी सूझ रही है! बात क्‍या कर रहे हो.. उड़ने का हममें अरमान नहीं है?.. तुमने तो, ससुर, जनता और हमारे समय का वास्‍तविक प्रश्‍न वाला हल्‍ला मचाते हुए चुप्‍पे-चुप्‍पे घर भी खरीद लिया.. सेटिया लिए.. हम यहां सत्‍तर सवालों की मार्मिक गड़ही में गिरे हुए हैं और अनूप शुक्‍ला जैसे जिम्‍मेदार लोग स्‍माइली वाले कमेंट उछाल रहे हैं.. सहानुभूति तो कोई नहीं ही दे रहा है! प्रत्‍यक्षा से कहा तो वह कहती है आपके यहां एकनॉलेज नहीं होता, देकर फ़ायदा क्‍या?.. मान्‍या ही बेचारी अब तक इकलौती हमदर्द बनी हुई है (हमारा बस चलता तो रिलायंस से स्‍पॉन्‍सर करवा कर बेचारी दुलारी बच्‍ची को बेस्‍ट हमदर्द ऑन द ब्‍लॉग का एक अवॉर्ड तो दिलवा ही देते).. किनारा वो हमसे किए जा रहे हैं का गाना हम सुनाना चाह रहे थे, तो देख रहे हैं रघुराजजी ने पहले ही उसका रेकॅर्ड सुनाके ताली ले ली है! गर्मी पर हम उबलना चाह रहे थे तो वो काम भी रवीश ने फट से कविता एक ओर रख के निपटा लिया और हमसे बाजी मारके रिले रेस में आगे निकल चुके हैं! और हम हैं कि अभी तलक जान लें, समझ लें वाली ज़ि‍द पर अड़े हुए हैं.. क्‍या समझ क्‍या लेंगे? है क्‍या समझने को?..

पिछली दफा बाबूजी से मिले तो मुंह से धुंआ छोड़ते हुए फैलने लगे, बोले- दुनिया छोड़ के निकल जाएंगे लेकिन तुमको समझ नहीं सकेंगे! मुंह में च्‍युइंग गम घुमाते हुए मैंने जवाब दिया था, इट्स सेम स्‍टफ़ हियर, डैड.. वुडंट अंडरस्‍टैंड यू एवर, आईम टेलिंग यू! दो दिन पहले चार लोगों की संगत में अभय के यहां से निकलते हुए, लोगों के बीच शर्मिंदगी से बचने के लिए मैंने स्‍वामीजी के कान में फुसफुसाकर कहा, महाराज, दो सौ का नोट दीजिए, फटफटिया में तेल नहीं है.. तो अभय जी का जवाब सुनकर यही लगा कि हम उनको जानते नहीं, जानने की बस ग़लतफ़हमी ही थी. मुंह उतारे हम सी‍ढ़ि‍यां उतर आए, किसी भी क्षण गीली हो सकनेवाली आंखों को छिपाने के लिए रूमाल खोज रहे थे कि तबतक स्‍वामीजी ऊपर से भागे-भागे आए और हमारी जेब में कुछ हरा-सा चमकता खोंस दिया! हमारी अभी तक गीली न हो सकी आंखें अब गीली होने की बजाय फट गईं, और प्रकट में हमने कहा नहीं मगर मन में यही वाक्‍य दुहराया- स्‍वामी जी, हम आपको कभी समझ सकेंगे?

दो दिन पहले- स्‍वामी जी की ही कुटिया की बात है. दर्शन लेने अन्‍य भक्‍तों के साथ-साथ संजय बेंगाणी भी पहुंचे थे. अच्‍छे-भले स्‍वस्‍थ व प्रसन्‍न लग रहे थे.. और हमारे बगल में बैठे-बैठे लग रहे थे!.. मगर दस मिनट बाद जाकर जैसे ही उन्‍हें हमारी असली पहचान का पता चला, एकदम-से खड़े हो गए.. जोर-जोर से बताने लगे समझने में कितनी बड़ी भूल हुई थी!.. मैंने कहा ठीक है, ठीक है, बैठ जाइए.. इसमें शरमाने की बात नहीं है.. बीच-बीच में गलती हो ही जाती है.. हमारी तरह रोज तो नहीं हो रही?..

आज सुबह उठते ही मन में एक निर्दोष-सा ख़्याल आया.. कि चलकर पड़ोस का बैंक लूट आएं.. फिर लगा अकेले हमसे तो होने से रहा.. ऐसा न हो हम बैंक के बाहर ही इस जानलेवा गर्मी में धराशायी हो जाएं.. पड़ोस के मालवलकर साहब चाय पी रहे थे.. मैंने हंसते हुए बैंक वाले मामले में उनसे मदद की गुजारिश की!.. तो साहब का एकदम चेहरा उतर गया, बोले- आप एकदम समझ में नहीं आते हो.. कब मज़ाक कर रहे हो कब सीरियस हो?.. मैं सीरियस था लेकिन मालवलकर साहब को समझाने बैठकर क्‍यों भला गरीब आदमी की चाय खराब करता!.. फिर वह समझ ही जाते इसकी भी क्‍या गारंटी है.. आप ही ने इतना समझकर कौन हमें दार्जीलिंग या श्रीनगर के टुअर पर आमंत्रित कर लिया है?.. समझने-वमझने की बात बकवास है..

10 comments:

  1. संजय बेंगाणीJune 11, 2007 at 2:04 PM

    मगर हम समझ गये की आप हमें अपने वाहन से स्टेशन तक छोड़ने क्यों नहीं आये और हमे फटफटीयानूमा ओटो से जाना पड़ा, जिसका किराया शशिसिंह ने चुकाया वह बात अलग है. :)

    हमसे जो बाते हुई उसे गोल क्यों कर रहे है, साफ साफ लिखे हमने कैसे आपके चिट्ठे के लिए अनर्गल कहा :)

    आपका लिखा अब समझमें आने लगा है. पहले ही मुम्बई बुला लेते.

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  2. आप ई अविनाशजी के चक्कर में मत पड़िये। ये आपको इधर-उधर कर देंगे। अभयजी का आपको हालत पता होता तो आप पहले ही आंख गीली कर लेते। हमको आप जिम्मेदार कह दिये हमारा बोझ दुगुना हो गया। कारण एक तो इस बात को कोई सच नहीं मानेगा और अगर मान भी लिया कोई तो हमको सच्ची जिम्मेदार बनना पड़ेगा न! और इस सड़ेली गर्मी में कोई भी जिम्मेदारी निभाना बहुत मुश्किल काम है। बैंक लूटने की सोचने से भी ज्यादा कठिन। है कि नहीं!

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  3. Aap likhte achha hain .. par aisa kyun lagta hai ki aaj kal aapki saari post mein .. sirf khunnas ya bhadaas bharee hai.. ek tarah ka Ego.. aisa lag raha hai ki aap sabko kuchh samjhana chaah rahe hain.. aapki kalam ka wo saral, madhur prawaah gaayab hai.. naturality bhi nahi dikh rahi..ummeed hai agli post pahle jaisee hogi..
    waise mujhe award dilwaane ka shukriya... :)

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  4. मान्याजी की टिप्पणी पर हँस रहा हूँ, शनिवार की शाम याद आ गई.

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  5. Lagtaa hai samjhne mein kuch gadabd ho gayi.. ye post kisi wishesh sandarbh mein likhi gayi lagta h.. agyaanwash aisa kah diya ,.. I am really very sorry...

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  6. प्रमोद जी, बैंक लूटने की बात कीजिये. कब चलें?

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  7. अरे, मान्‍या, अवॉर्ड-सवार्ड पाना है या नहीं?.. इतनी मर्तबा मत बदलने से कंडिडेचर चला जाएगा.. ऐसी उलझनों को यूं भी सार्वजनिक नहीं करना चाहिए.. चुपके से हमें ईमेल करके मामला सलटा लेतीं?.. कल को ऐसा न हो कि मान्‍या को समझने-न समझने के बारे में भी हम पोस्‍ट लिखने पर मजबूर हो जाएं.. हद है?..

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  8. यह फोटू आपका है, सच्ची में। भई धक्का लगा, एक मस्त चकाचक, नौजवान चेहरा, दिल्ली वाला याद आया। भई बुढ़ा तो सभी रहे हैं, पर इत्ती स्पीड से क्यों। और जी लिखने-विखने में किसी की सलाह मत मानिये। जो मन आये, सो लिखिये। मन का लिखा ही ओरिजनल होता है। बाकी पब्लिक डिमांड का लेखन तो और लोग कर रहे हैं (इस खाकसार समेत)
    आलोक पुराणिक

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  9. प्‍यारे आलोक, यह फोटू सच्‍ची में हमारा है.. चलिए, आपने एक बार धक्‍का खाया, तक़लीफ़ की बात नहीं है.. उस मस्‍त, चकाचक नौजवान चेहरे के चक्‍कर में लड़कियां ज्‍यादा धक्‍का खाती रही हैं.. नतीजे में हम कितना खाते रहे होंगे, आप समझ सकते हैं.. नतीजे में टेंशन से बाल और सफेद होता रहा है.. तो धक्‍का खाते रहने व और-और बुढ़ाते रहने का एक क्रुएल सर्किल है, आई डोंट नो वेदर यू गेट द पिक्‍चर.. ?

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  10. Maine.. jo pahli comment mein likha tha .. wo maine aapki pichhli kuchh post mein mahsoos kar ke likha tha... aur wo sahi bhi hai.. haan par shayd particularly ye post..lagta h kisi wishessh sandarbh mein likhi gayi hai.. aisa mujhe Sanjay Bengani ji ki baaton se laga.. isiliye aine maafi maangi.. baaki post ke liye abhi bhi meri raay kayam hai.. aur jo lagta h use saarwjanik kahne mein kya harz hai.. ab shayad baat clear ho gayi hogi.. ab bhi nahi hui to aap sach mein post likh daaliyega... fir main kahungi Had hai..

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