Wednesday, June 13, 2007

आपकी गरमी में हरे हारे हुए..

तापमान रहने दीजिए कितना है जितना है भीषण है और हम सह रहे हैं. आंखों में आंच ताप उगलती हवा और चीकट, मुरझाये उमसभरे पल-छिन समूचा-समूचा दिन सह रहे हैं. पंखे के नीचे पानी के पीछे थोड़ी बयार एक अलसायी कोई फुहार दीवाना कर रही है, हम इस बेमतलब के दीवानेपन में बह रहे हैं.

यही है जो है एक छोटा-सा तो जीवन है बचपन का खदेड़ापन शिक्षा की व्‍यर्थता और समाज की अमानवीयताओं से सजा-गंजा, हज़ारों तक़लीफ़ों व लाखों शर्म में अड़ा-गड़ा ओह यह सिर. क्‍या तो सीखाया आपने और क्‍या-क्‍या जो सीखा हमने. कभी तो यह भी होता है, जनाब कि सोचते हैं सोचते हैं सोचते हैं और ज़बान से बात नहीं निकलती मन कैसा तो मरोड़ा रहता है रात नहीं निकलती. सोचते हैं आप आदमी हैं क्‍या हैं कैसा तो यह समय है और हमदम हमवतन हैं या कौन हैं जो तब से अंधेरे का अलौकिक आख्‍यान गा रहे हैं. भूखे को खाना नहीं गाने से जगा रहे हैं जो जगे हैं उन्‍हें पीटकर सुला रहे हैं. हृदय की मार्मिकता होती मन निश्‍छल निश्‍कलुष होता तो आप जान नहीं रहे हैं क्‍या-क्‍या तो हम कर गुजर गए होते, फूंक देते फुंक गए होते. कायरता और तहजीब में नहाये हुए लेकिन जो है भीड़ में सिर झुकाये खड़े हैं, कितना तो सहा अभी और सह रहे हैं.

आपके कहने की देर है, बोलिए तो हम वंदना भी गाएंगे. हंसेंगे तालियां बजाएंगे. या कहिए तो रो भी सकते हैं वह तो यूं भी बड़ा स्‍वाभाविक होगा. या फिर रेडियो पर बुलवा लीजिए कि अहा, कैसा तो सुहाना समय है और हुज़ूर की तो कहें ही क्‍या कभी ऐसा देखा न सुना. सब झुलसा ही तो है यहां वहां जाने कहां-कहां मगर हम हैं लस्‍त हैं लहक रहे हैं. यकीं न हो तो आइए देख लीजिए न कैसी चियराई चिलबिलाई मस्‍ती में महक रहे हैं.

8 comments:

  1. सही है। गरमी अब खतम ही होने को है।

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  2. 'मुक्त गद्य ' कविता के बहुत करीब - सा लगा । आभार ।

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  3. बड़ी सहज अभिव्यक्ति है मौसम के तकाजे की जीवंत अर्थों मे. यह आप सा लेखक ही कर सकता है.

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  4. शब्दों का का निर्बाध प्र्वाह.. मौसम के बहाने कही गयी बातें.. कई सवाल...सोचने को मज्बूर करते हैं.. आपसे यही उम्मीद रहती है.. बहुत अच्छा लगा पढना...

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  5. अच्छा लगा आपका ये मुक्त गद्य भी .. जीवन के बदलते मौसमों के बीच गरमी को भी याद कर लेना सुखद रहा.. गरमी शायद अभी खतम होने को नहीं है.. चलिये थोड़ा पानी में नहा लें...

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  6. सुनते थे कि सर्दियों का मौसम शायराना होता है । पर मुंबई की उमस भरी गर्मी ने आपको शायर बना दिया है साहब । अच्‍छा है भड़ास निकाल ली । पर ये तो कल की भड़ास थी आज क्‍या होगा । और हां मौसम विभाग का कहना है कि मुंबई में रविवार से बारिश होगी । आज से तो पानी में बीस प्रतिशत कटौती है । अब क्‍या धोईये क्‍या निचोडिये ओर क्‍या नहाईये । पसीने में तर रहिए और गाना गाईये पति पत्‍नी और वो की तर्ज पर । ठंडे ठंडे पसीने से नहाना चाहिये गाना आये या ना आई गाना चाहिये । भगवान ना करे कि आज लोड शेडिंग हो जाये आपके इलाक़े में ।

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  7. विपरीत परिस्थितियों में भी हँसने-हँसाने गुदगुदाने की कला आपसे सीखनी है।

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  8. बेहाल हैं, उमस और गरमी...कल तो वैसे भी गरमी कुछ ज्यादा ही हो गई थी :)

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