एक बच्‍चा खाली गुलेल लिए छटपटाया यहां से वहां अपनी खोज में बेकल है. रोककर उसके हाथ में चार कंकड़ रख दीजिए, फिर देखिए क्‍या उसका चेहरा खिल उठता है!.. इस बड़े व्‍यापक संसार में कंकड़ की एक भूमिका है. जैसे कहां-कहां की नकारा नामालुम, ग़ुमनाम सब चीज़ों की कुछ न कुछ, कभी न कभी भूमिका होती ही है, भले वह हमेशा प्रत्‍यक्ष, साफ़-साफ़ न दिखे. हमारी-आपकी भी है. होती है. एक ख़ास सुर, एक रवानी, एक थिरकन होती है जो हमें हमारी मार्मिकता में सबसे बेहतर ढंग से प्रकट करती है. बहुत बार हमारा यह विशिष्‍ट हमारा ख़ासमख़ास निजीपना आसानी से हमारी पहचान व पकड़ में आकर हमारे जीवन का सहज अंग हो लेता है.. तो बहुत बार ऐसा भी होता है कि हम अपना समूचा जीवन जी ले, और हमारे जीवन का जो यह ख़ास दुलर्भ विशिष्‍ट तत्‍व है, उसके बाहर आने, उसके अभिव्‍यक्‍त होने का मौका ही न बने.. या हम बना पाएं! बाहर आना दूर की बात हुई, उसकी सही शिनाख़्त करने तक की समझ खड़ी न कर सकें..

बाज मर्तबा यह भी होता है कि जीवन में ऐसी परिस्थिति नहीं बनती कि आदमी अपने मन का कर पाए. आजीविका के दबाव और मालिक की हुक़्मउदूली में जीवन के सबसे अच्‍छे वर्ष बीते जाते हैं. तो यह तो है ही कि हमारे विषम, गरीबी व परेशानियों में लदे वर्गीय समाज में किसको कितना खुलने, खुलकर खेलने व अपने मन का करने का मौका मिलता है- कदम-कदम पर उसकी सीमाएं बनी-खड़ी ही रहती हैं. परिवेश की व्‍यापकता व बाज़ार के विस्‍तार में बीच-बीच में उसका अपवाद भी बनता है. मगर यहां काम की असल चीज़ वह नहीं.. मुद्दा है इस समूचे परिदृश्‍य में आदमी को इसका कितना अहसास है कि वह उसका अपना ख़ास ठीक-ठीक है क्‍या. उसके पा जाने जितना ज़रूरी न हो मगर उसकी सही पहचान कर लेना भी आम समझवाले व्‍यक्ति की ही नहीं, कभी-कभी अच्‍छे-अच्‍छों तक की पकड़ में नहीं आ पाती. इसमें और उसमें लोग हाथ लगाये रहते हैं.. और वर्षों बाद एक दिन पता चलता है कि अपनी यह कैसी मज़ि‍ल बनाई.. सब ग़लत-सलत खड़ा कर लिया!.. मगर तब तक यूं भी बहुत देर हो चुकी होती है. मगर मैं फिर भी उन्‍हें भाग्‍यशाली ही कहूंगा.. कि हुज़ूर, पहचान तो हुई!.. भई, इस बड़े, जटिल, अबूझ संसार के जगर-मगर में अपनी मनोवांछित भूमिका ढूंढ़ निकालना हंसी-खेल है क्‍या!?..

संसार में ऐसे लोग पच्‍चानबे प्रतिशत से ज्‍यादा होंगे जो सायास-अनायास जिस भी वजह से अपने मन का काम नहीं करते, कर पा रहे. कर रहे हैं रो-गाकर बेमन से कर रहे हैं.. बकिया के दो प्रतिशत में ऐसे लोग होंगे जो अपना मन का न मिलने से कोई काम ही नहीं कर रहे.. निपट आवारापने में ज़ि‍न्‍दगी काट रहे हैं.. तो इससे एक तस्‍वीर बनती है न्‍यूनतम संख्‍या वाले उन चंद भाग्‍यशालियों की.. जिन्‍हें अपने समय व संसार में होने की समझ भर ही नहीं है, बल्कि वे ठीक-ठीक अपने तबीयत का भी कर पा रहे हैं..

हाथ में डाब, मट्ठे की शरबत या सुराही का पानी पीते हुए आज एक बार इस पर भी सोचिएगा.. आप आजीविका ढो रहे हैं.. या आपने अपने मन का काम खोज लिया है..

 
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अभय तिवारी - June 13, 2007 1:28 PM

हम ने आज भी सोचा.. आपके कहने पर भी सोचा..सालों से इसी चिंता में घुले जा रहे हैं.. लोग सोचते हैं बड़ा भाग्यवान है.. सब कुछ खा के भी मुटाता नहीं..पर बचपन से यही बीमारी है.. इरफ़ान ने इलाहाबाद में मेरे नाम के कुछ कार्ड बनाये थे.. पेशेवर चिंतक उपनाम दिया था.. बताइये.. कैसे कैसे असंवेदनशील मित्र हुए हैं हमारे..

पर सच यही है.. कि हम ना इधर के निकले ना उधर के.. न तो क़ायदे से नौकर ही हो पाये.. और ना अपने मन का कुछ कर पाये.. बस जिये जा रहे हैं..आवारागर्द भी हो जाते तो कुछ संतोष था.. बोधि भाई तो कहते हैं कि इसी तरह घर में घुस के बैठना है तो क्षेत्र संन्यास ही ले लो.. कम से कम वही एक उपलब्धि हो जायेगी जीवन में..

संजय बेंगाणी - June 13, 2007 2:08 PM

अपन अपने मन का काम करते है. भाग्यशाली है.

v9y - June 13, 2007 8:23 PM

"डाब, मट्ठे का शरबत, सुराही का पानी"

कीजिए तंज, उड़ाइए मजाक, जलाइए हमें. ये आप "कार दिखाने वालों" का गुस्सा हम पर क्यों निकाल रहे हैं, हुजूर. क्या फ़र्क़ है आपमें और उनमें. क्या आपको पता नहीं कि आपके कई पाठकों के लिए ये चीज़ें उतनी ही "वांछित-पर-अनअफ़ोर्डेबल" हैं?

Udan Tashtari - June 13, 2007 10:52 PM

प्रमोद जी

मुझे लगता है कि सब कुछ तो मन का नहीं हो पाता. कुछ समझौता करना होता है. शायद इसी समझौते को जिंदगी का नाम दिया गया है. कुछ खट्टा कुछ मीठा. अक्सर पसंदीदा स्थलों पर पहुँचने के लिये कठिन यात्रायें करनी होती हैं मगर वहाँ पहुँच कर जो सुकुन मिलता है उसके लिये हम यह समझौता भी कर लेते हैं.

तो जीवन में कभी आजीविका ढो भी रहे हों और साथ में सामजस्य बैठाकर मन पसंद रुचि का कार्य भी कर हो या आजीविका इसलिये ढो रहे हों कि शीघ्र ही रुचिकर कार्य करने योग्य हो जाऊँ, तब तो चलता है और यह निपट आवारापने से बेहतर ही होगा.

अब डाब, सुराही का पानी- तो सपने की बातें सी लगती हैं. आपने याद दिला दिया, बस्स!! वैसे स्कॉच उठाकर सोचा तो लगा तो कि मैने अपने मन का काम खोज लिया है. अब कब तक मन लगा रहता है रोज रोज वही करने में, यह देखने वाली बात होगी.

आपका लेखन जरुर हमेशा रुचिकर होता है. :)

मात्र मेरे विचार हैं अतः कतई अन्यथा न लें. :)

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