संजय ने सब गलत-सलत लिखा है. कमल शर्मा और शशि सिंह से मिलने की बातों तक शायद सही भी हो, आगे का हाल मिथ्‍या है. मेरी तस्‍वीर भी गलत छापी है, अभय की तो गलत है ही. अभय वास्‍तव में पेंटल की तरह दिखते हैं, बेंगाणी असरानी की तरह, शशि सिंह राजेंदर नाथ की तरह.. और मैं जो है, नैचुरली, जॉर्ज़ क्‍लूनी की तरह दिखता हूं. इतने दिनों बाद जाकर एक बार फिर पता चला कि फ़ोटो फ़ोटो होता है, यथार्थ नहीं! अपनी गलत झांकी दिखाने के लिए मैं संजय पर दावा ठोंकने की भी सोच रहा हूं. इससे हो सकता है कोर्ट उनकी मल्‍टीमीडिया वाला दफ़्तर मेरे नाम कर दे और अब तक जो वो काट रहे थे उनकी जगह अब मैं नोट काटना शुरू कर दूं! बुरा आइडिया नहीं है.. फिर सुनीता शन्‍नू मुझे फ़ि‍ल्‍म प्रोड्यूसर बुलाएंगी तो मुझे बुरा भी नहीं लगेगा!.. एनीवे, इन सब बकवासी असाइड्स को साइड में रखकर आइए, मुम्‍बई ब्‍लॉगर्स मीट की रियलिस्टिक तस्‍वीर से रूबरू हों..

अखाड़े में संजय को पटकने के पहले, आइए, काकेश को निपटा लें. इस फ़ॉर्मल ब्‍लॉगर्स मीट के दो दिन पहले काकेश से इनफ़ॉर्मली, अंधेरी स्‍टेशन के किचिर-मिचिर से लगे एक सस्‍ते होटल के सस्‍ते-से लाउंज में- मुलाकात हुई थी. जगर-मगर ट्रैफिक वाली सड़क पर हैंडिल में हैलमेट फंसाकर बाइक पार्क करके- इसका पूरा रिस्‍क उठाते हुए कि मैं होटल के अंदर जाऊं, और बाहर टोल गाड़ी हमारी बाइक टोलिया कर निकल ले- मैं लाउंज के अंदर काकेश से भिड़ने की मानसिकता लिए पहुंचा, और अंदर पहुंचते वहां का दृश्‍य देखकर मेरे दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए. काकेश की दिमाग में तस्‍वीर कुछ राजा बाबू टाइप थी जो डिग्री कॉलेज के गेट के बाहर यार लोगों के गरदन में हाथ डाले लड़ि‍याते रहते व गेट के सामने से गुजरनेवाली लड़कियों के रिक्‍शों की ज़ि‍न्‍दगी हराम किए रहते हैं. यहां उसकी बजाय कोई डुप्‍लीकेट अपने को काकेश बताता बैठा था, और लड़कियों की रिक्‍शे की बजाय, जिम्‍मेदारी से अभय के प्रवचन सुनता हमें टेंशन दे रहा था! मैंने कहा यार, तुम तो बड़े बोरिंग निकले, असली काकेश कहां है? तो ये जनाब शराफ़त की झूठी हंसी दिखाकर बोलने लगे वही तो इतने वर्षों से खोज रहा हूं!..

दारू न मटन, कुछ भी हाथ नहीं आया.. कोई सनसनीखेज़ गॉसिप तक नहीं.. छूछे चाय से किसी तरह घंटा भर काटा.. अभय ऊटपटांग बातें करते रहे, काकेश शिष्‍यत्‍वभाव से सुनते रहे, मैं भयानक तरीके से बोर होता सब बर्दाश्‍त करता रहा.. और फिर उस रात नींद भी नहीं आई!.. तो इस तरह मिलना हुआ काकेश नामधारी एक झूठ और फ़रेबी तस्‍वीर से..

आगे का सुनिए. माने एक दिन आगे. यूनुस मियां का हमारे यहां मेल आता है- संजय शहर में आ रहे हैं, ब्‍लॉगर्स मीट करनी है टाइप बकवास. मैं यूनुस को कहता हूं, यार, तुमने ज्ञानदत्‍त जी का मीटवाला पोस्‍ट पढ़ा या नहीं?.. फिर?.. वैसे भी संजय और हम बात क्‍या करेंगे?.. सामने बैठकर एक-दूसरे को टेंशन देंगे.. तो इस मीट-सीट से मुझे दूर रखो, वैसे भी आजकल मैं दूसरे मीट की सोच रहा हूं! चूंकि मैं डांट-डांटकर बात कर रहा था, यूनुस मियां को जल्‍दी ही सारी बातें समझ आ गईं, और मैं एक खामख्‍वाह के टंटे में फंसने से बच गया..

मगर अभी चौबीस घंटे भी बीते नहीं थे कि फ़ोन पर अभय जी का न्‍यौता आया कि बड़ा मस्‍त पकवान सेट किये हैं, आधे घंटे में पहुंचिए. हम पहले ही पहुंचे तो पहुंचकर पकवान की सच्‍चाई खुली. गुस्‍सा तो बड़ा आया मगर पकवान न सही चाय-नाश्‍ते के मोह में ही अटके रहे. अटके हुए, मन ही मन अभय को गालियां बकते, संजय, शशि और यूनुस मियां की राह तकते रहे..

और जैसा स्‍वाभाविक था, संजय के भय में यूनुस मियां पहुंचने में देरी करते रहे, मगर अभय और मुझे सेट करने की नीयत से संजय और शशि वक़्त से पहले ही पहुंच गए. फिर झटका लगा. संजय गेरुआ वस्‍त्र की बजाय नॉर्मल शर्ट और काले बेल्‍ट से पैंट संभालते आए (मगर नोटों वाला केस साथ में था जिसे देखकर मन के पूर्वाग्रह को संतुष्टि मिली); फिर शशि सिंह की एक बड़ी गंदी आदत है- आपकी (यानी मेरी) आलोचना कर रहे हों तो भी जवान हंसते-हंसते बात करता रहता है- इस गंदी आदत पर मैं झिड़कने ही वाला था कि तब तक दूसरा झटका लगा! इसकी ख़बर लगते ही मेरा वास्‍तविक परिचय क्‍या है, संजय बेंगाणी खड़े हो गए! मुझे लगा पिस्‍तौल या बंदूक जैसी कोई चीज़ बाहर करेंगे मगर इसकी बजाय गुस्‍सा बाहर करने लगे!.. इतने प्‍यार से अपने ब्‍लॉग पर मैंने डानियेल क्‍लाउस और रॉबर्ट क्रंब का हेडर चढ़ाया है, उसे दो कौड़ी का बताकर नाक से धुंआ छोड़ने लगे.. कहा अज़दक देखते नहीं क्‍योंकि हेडर के विद्रूप से ही मन घिन्‍ना जाता है! मैं किस तरह का घिनाइन जीव हूं जो ऐसी चीज़ सजा रखी है?..

जोगलिखी पर संजय ने जो रिपोर्ट लिखी है वह सब ग़लत है कि भेजे में घुसने लायक लिखो तो आकर पढ़ें भी. ऐसी बात लिखी होती तो मैं तो तभी माफ़ी मांग लेता कि गुरु, भेजे में कभी-कभी तो अपने भी नहीं घुसता इसीलिए तो अनामदास से दोस्‍ती गांठ रहे हैं कि बात लिखने का गुर सीखकर लंदन वाली नौकरी (और वहीं की छोकरी!) सेट कर लें, मगर मन के ये मार्मिक दुख कह सकने का संजय ने कोई मौका ही नहीं दिया, हेडर की बात छेड़कर वैसे ही मेरा दिल तोड़ दिया था.. मगर उसके बाद मैंने बुद्धिमानी दिखाई. मोहल्‍ला और अविनाश की बात छेड़कर महफ़ि‍ल को रंगदार बना दिया. सब मिलकर अविनाश को गाली देने और सुखी होने लगे. अभय जी को इससे थोड़ी तक़लीफ़ होने लगी तो मैंने उनको डांटकर पेंटल कह दिया और वे एकदम चुप हो गए.

शशि ने फिर हंसते-हंसते चुपके से अपना नया मोबाइल सेट और अपने बच्‍चे की तस्‍वीर भी दिखा दी, और हंसते-हंसते मेरी भाषा का अच्‍छा मज़ाक उड़ाते रहे. मैं उनको डांटने की सोच ही रहा था कि संजय फिर पैसा बनाने के कुछ मज़ेदार टिप्‍स देने लगे.. और मैं सीरियस होकर सुनने लगा.. अभय भी अपना सारा स्‍वामित्‍व भूलकर डायरी में संजय के नोट्स लेने लगे..

बड़ा मज़ा आ रहा था लेकिन संजय की ट्रेन का वक़्त होने लगा सो पैसों का ज्ञानदान बीच में ही रोकना पड़ा.. संजय की विदाई हुई.. नीचे हैलमेट के अंदर मुंह छिपाये डरे-डरे-से यूनुस मियां खड़े मिले.. संजय के अस्‍सलाम वलेकुम कहने से यूनुस को गहरा धक्‍का पहुंचा, क्‍योंकि वह रास्‍ते भर प्रणाम वाला रिहर्सल करते रहे थे..

ख़ैर, संजय के जाने के बाद अभय ने दारु की सारी बोतलें बाहर निकाल लीं, और ठंडी-ठंडी चुस्‍की लेते हुए हमने ब्‍लॉग-स्‍लॉग के क़ि‍स्‍से एकदम दरकिनार कर दिया, और युनूस मियां से फ़ि‍ल्‍मी दुनिया की ढेरों रसीली कहानियां सुनीं.. एडल्‍ट टाइप कहानियां हैं आपको नहीं बता सकते.. या फिर नारद ज़रा और उदार हो जाए तो वह भी बताएंगे किसी दिन.. धीरज रखिए.. तब तक अज़दक आकर हमारा हेडर निहारते ठंडी-ठंडी सांसें भरा कीजिए!

(सबसे ऊपर मेरी असल, वास्‍तविक फ़ोटो; नीचे संजय अपने असल रूप मे.. अभय व शशि सिंह की तस्‍वीरें बहुत फूहड़ प्रतीत हो रही थीं इसलिए उन्‍हें चढ़ाकर हम अपने ब्‍लॉग का लुक गंदा नहीं करना चाहते.. )

 
This Post has 18 Comments Add your own!
काकेश - June 14, 2007 2:19 PM

असली बात कह सकने का साहस कुछ असली लोगों में ही होता है.. हम तो अभी तक उस क्लोन को खोज रहे हैं जो आपसे मिलकर आया.. वरना हम मिलते तो क्या रपट ना छापते...क्योकि हम तो ठीक वैसे ही हैं जैसा आपने समझा था ..यानि "राजा बाबू" टाइप..इसिलिये तो हिन्दू हित की बात कह भाषा के ढेरों बदतमीजियां करने के बाद भी नहीं सुधरते (साभार:अविनाश जी).. वो कौन था जो आपसे मिला... जब से अभय जी जगह जगह पर हमें "गंभीर और शालीन" बता कर हमारे "चरित्र हनन" कर रहें हैं तभी से हमारा माथा ठनका हुआ है ..अरे कुछ लोगों को तो हमारे व्यंग्यों पर से विश्वास तक उठ गया कि ऎसा गंभीर और शालीन आदमी भला क्या व्यंग्य लिखेगा. ? आप एक ठो फोटो उस नकली, फरेबी,झूठे काकेश की लगाइये तो..हम भी तो देखें कैसा दिखता है.... यहाँ कहीं मिलेगा तो पीटेंगे पकड़कर...आप तो बस फोटो लगाइये जल्दी से...

Pratik - June 14, 2007 2:27 PM

वाह! ब्लॉगर मीट का असली हाल पढ़कर अच्छा लगा। आपकी "ऑरीजिनल फ़ोटो" भी बढ़िया लगी, साथ ही संजय भाई की भी। :)

Jitendra Chaudhary - June 14, 2007 2:28 PM

अमां आज तो हमे सब कुछ समझ मे आया आपके ब्लॉग में सिवाय हैडर के, उसको लगे हाथों निबटा दो, अभी नही, पहले बोतलों वाला काम हो जाए तब।

आपका ये असरानी वाला डायलॉग याद रहेगा, हम भी देखेंगे दिल्ली मे, कैसा दिखता है संजय।

आप तो भई हमारे टाइप निकले, आइए कभी मिल बैठे दो दिवाने, कुछ आपकी सुने, कुछ अपनी कहें।

विकास कुमार - June 14, 2007 2:36 PM

हाय हाय! मैं भी तो मुम्बई मे ही रहता हूँ, कुछ दिन के लिए पुणे मे था नही तो मैं भी आप लोगों से मिलने का आनंद प्राप्त करना चाहता था।

अरुण - June 14, 2007 2:43 PM

पहली बार सही ढंग से किसी ब्लोगियाये हुए लोगो के मिलने की रपट पढने को मिली है,भाइ अब हम तो यही चाहेगे की ये जो चिल्लपॊ मची है दिल्ली मे ब्लोगियाये लोगो के मिलने की ,उसकी सही रिपोर्टिंग आपके द्वारा ही आये,इतनी ज्यादा साफ़ साफ़ और असली रिपोर्टिंग के लिये आपको इस साल का पुरुसकार भी मिलना चाहिये,
:)

अरुण - June 14, 2007 2:44 PM

बोतले सारी खाली मत करना हम भी आ रहे है अगले हफ़्ते मिलने,मिल कर करेगे,

dhurvirodhi - June 14, 2007 2:48 PM

परमोद भैय्या, हम जार्ज क्लूनी को तो नहीं जानते पर फोटू में तो आप हमें बिल्कुल मोतीलाल जैसे लग रहे हैं. आपने मुम्बई में ब्लागर मीट पका ली और हमें बताया ही नहीं. हमने तो पहले लिखा ही था कि हम भी गोरेगांव आरेरोड में रहते हैं. आजकल साईंबाबा काम्प्लेक्स के बजाय ग्रीनलान सेन्ट पायस कॉलेज के सामने पांचवे माले पर हैं. (घबराईयेगा नहीं, हमारी लिफ्ट काम करती है.)

कभी आप हमारे यहां अभय भाई, यूनुस मियां के साथ आईये. आपको मिस फाल्के से भी मिलाते हैं. (अब उनकी शादी हो चुकी है. किससे, अन्दाजा लगाईये जनाब...)

आपका
जे.एल.सोनारे उर्फ धुरविरोधी

संजय बेंगाणी - June 14, 2007 3:36 PM

आपने तो सारी पोल पट्टी खोल कर रख दी.
लाख समझाया की हमारी असली तस्वीर सार्वजनिक न करें, हम आपकी नहीं करेंगे.
हमने वादा निभाया, आपकी असली तस्वीर की जगह किसी ऐसे ही.. की तस्वीर लगा दी, मगर आपने तो हमारी असली तस्वीर ही...
कमाल हो गया एक ही मुलाकात में लिखना आ गया :) देखिये सब की समझ में आ रहा है :)

Shrish - June 14, 2007 3:40 PM

आपकी आज की पोस्ट समझ भी आई, अच्छी भी लगी और मजा भी आया।

आपका अंदाजे बयां पसंद आया। :)

Raviratlami - June 14, 2007 3:55 PM

ये है असल रपट! माने, अब तक करेले पर चाशनी चढ़ा कर रपटें दी जाती रही थीं. :)

अभय तिवारी - June 14, 2007 3:57 PM

आज से हमारी आपकी दोस्ती खतम.. न्यूनतम नैतिकता भी नहीं रह गई आप में.. थोड़ी तो लाज रखी होती..सत्तर के द्शक की हिन्दी फ़िल्मो से ही सीख लिया होता कि दोस्ती क्या होती है.. पर आप तो ब्लॉग पर छा जाने के मद में सब कुछ बेच खाये हैं.. सारी पोल पट्टी खोल दी.. इतने दिनों से अपनी इमेज बना रहे थे.. एक ही झटके में सब नष्ट हो गया.. आइये इधर कभी साईंबाबा की तरफ़..यहाँ के कुत्ते सब मेरे मित्र हो गये हैं आजकल.. आप की मोटर साइकिल को हाईवे तक दौड़वाऊँगा.. शू टॉमी शू..

vimal verma - June 14, 2007 4:02 PM

पहली बार आपकी तस्वीर ( ऊपर वाली)आपके ब्लाग पर देखी.पर ये साफ़ है कि बहुत लाग लपेट कर ये जो ब्लाग मीट जो आप लोगों ने किया है इसका स्वागत है.वैसे पैसा कमाया जाय और हंसते हंसते कैसे जीयें के अलावा और महत्वपूर्ण विषयों पर आपकी बात हुइ हो तो प्रकाश डालना था जैसे "बकरी की लेंड़ी" पर आपको कम से कम ज़्यादा बात करना चाहिये था. चलिये अब नही किया तो अगला एजेन्डा यही रखियेगा. समझे कि नही....

Sanjeet Tripathi - June 14, 2007 4:16 PM

जे हुई ना असली रपट!

Udan Tashtari - June 14, 2007 5:05 PM

वाह साहब, यह अंदाजे बयां पसंद आया. अभय भाई अगर सुन रहे हैं तो हम तो वो संजय के जाने के बाद वाली ब्लॉगर मीट में ही आयेंगे और हाँ, तब तक हमारे युनुस भाई भी किस्सा गोही के लिये पहुँच चुके होंगे. :)

शशी भाई हँसते हुए बात करते हैं, यह न सिर्फ़ उनकी फोटो से बल्कि ईमेल तक से साफ झलकता है. आपने कन्फर्म कर दिया.

बाकि हेडर इमेज का तो क्या कहें..बढ़िया तो है. :)

अच्छा विवरण रहा.

भाषा पर आपकी पकड़ काफी मजबूत है। लिखने की शैली भी जबर्दस्त। इसलिए किसी को न जानते हुए भी पूरी रपट पढ़ ली और मजा आ गया।

yunus - June 14, 2007 8:28 PM

मज़ा आ गया । मुझे मालूम था कि इस किस्‍से को सही सही आप ही लिख सकते हैं । काश के आपने वो रसीली कहानियां भी लिख दी होतीं । बहरहाल अगली बार मैं आपकी मोटरसायकिल पर मजबूरी में भी नहीं जाऊंगा । अभय ने कुत्‍ते जो छोड़ रखे हैं । ब्‍लॉगर का मीट खाने के‍ लिए । ब्‍लॉगर का मीट । मैं तो आज से ही शाकाहारी बन रहा हूं ।

अनूप शुक्ला - June 15, 2007 12:19 AM

ये सही किया। आपने खुलासा कर दिया वर्ना हम अंधेरे में बने रहते। अब उजाले में आंखें चौंधियायी हैं।

SHASHI SINGH - June 15, 2007 2:09 PM

आपने हमारे साथ दगा किया है... हमने आपसे वादा किया कि आपको हम अपनी कहानी में हिरो बनायेंगे। उम्मीद थी कि इस वादे में छूपे निवेदन को आप पढ़ पायेंगे मगर आपने तो सब गुड़-गोबर कर दिया... हमारी सुदर्शन तस्वीर पर आपके ब्लॉग की साज सज्जा भारी पड़ी। अभय भैया की धमकी तो आपको मिल ही चुकी है... अब मेरी भी सुन लीजिये, "एक हफ्ते तक रोज मैं आपको अपने साथ शाम के सात बजे विरार लोकल पर चढ़ाकर मीरा रोड ले जाऊंगा..." वहां ले जाकर क्या करूंगा? करना क्या है, बैठकर वे सारी कहानियां सुनूंगा जो आपने अपने ब्लॉग पर नारद के डर से नहीं छापीं है।

अपनी गंदी आदत से मजबुर हूं इसलिये ये स्माइली चिपका रहा हूं :)

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