बकरी की लेंड़ी..

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कैसी गुमसुम निर्दोष चुप्‍पे रही खड़ी
डोली, हिली-डुली हटी तो दीखी पड़ी
चोथा नहीं लोथा नहीं जी, लिटिल लेंड़ी
बकरी की लेंड़ी, जी, बकरी की

काम के न काज के लोक के न लाज के
व्‍यवहारहीन सारहीन भारहीन विचारहीन
जाने कैसा मद है याकि अपच का दस्‍त है
रहते-रहते नियम से पट पट पट बजाती है
आंगन दुआर कठवत परात सब्‍बे सजाती है
बकरी की लेंड़ी, जी, बकरी की

अजी कोई बात हुई ऐसा कोई करता है
सबका भरोसा भला ऐसे कहीं हरता है
नन्‍हकू नगीना नरमदा बताय रहे
लल्‍लन लालमोहन सबहीं सुझाय रहे
हमीं थे हंस दिये ज़ि‍द में झटक दिये
तिल का जबरिये ताड़ करो कहके फटक दिये
क्‍या थी ख़बर कि अचक्‍के चली आती है
गमछा दुशाला लिटिल लेंड़ी सजाती है

जिनको हिलगना हो हिलगें हिलाएं
छाती से साटें कि माथे मुकुट सजाएं
अजी, रहेगी तो वही बिवाय फटल एड़ी
लिटिल बकरी की लिटिल लिटिल लेंड़ी.

 
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अनामदास - June 14, 2007 2:49 AM

सुंदर, साधुवाद.
बहुत दिनों बाद ऐसी सुंदर रचना पढ़ी. मन प्रसन्न हो गया.

बकरी की लेंडी वैसे काफ़ी काम की होती है, उसे मेंगनी भी कहते हैं. उसे गाँव में लोग सुखाकर जलाते हैं, चारकोल की तरह कारगर होती है. वैसे गाय के गोबर से घिन आ जाए लेकिन सूखी लेंडी से बच्चे मज़े से खेलते हैं. इतना सात्विक और परपन्न उत्सर्जन दूसरा नहीं देखा है हमने. हमारे मुहल्ले में एक बाबाजी रहते थे जो दिन भर हवाबाण हरड़े चूसते थे और हम समझते थे कि उन्हें बकरी की लेंडी बहुत पसंद है. अच्छा है, मज़ा आया.

Anonymous - June 14, 2007 5:49 AM

अजी, रहेगी तो वही बिवाय फटल एड़ी
लिटिल बकरी की लिटिल लिटिल लेंड़ी.
ये आप आज अचानक क्या लिख बैठे,हम तो जरा रुक कर देख कए पक्का कर के हा भाई कुछ सम्झ मे आने लायक तो गलती से नही छाप दिया और चल देते थे
भाइ ऐसी कविताये ही झिलाय करो ना प्रमोद जी
जो सब कुछ कह भि जाये ,समझ मे भी आये,और कुछ कहा भी ना जाये

आलोक पुराणिक - June 14, 2007 8:06 AM

क्या कहने, लिटिल लेंड़ी में क्या अनुप्रास अलंकार साधा है प्रमोदजी। वाह, वाह।
आलोक पुराणिक

Nasiruddin - June 14, 2007 10:07 AM

प्रमोद जी, वो रचनाकार ही क्या जिसके पास कल्पना की ऊँचाई न हो। बकरी की लेंडी/मेंगनी का ऐसा भी इस्तेमाल हो सकता है, सोचा न था। वर्तमान माहौल के मुताबिक। अनामदास जी ने तो बचपन की गलियों में ले जाकर खडा कर दिया।

irfan - June 14, 2007 10:28 AM

अनामदासजी ने इस बहाने हर्रे के याद दिलाकर रचना को सचमुच पूर्णता प्रदान की है. बकरी की लेडी और हर्रे का चोली दामन का साथ है.दैनंदिन जीवन में लेंडी की उपयोगिता असंदिग्ध है.एक मुहावरा भी है 'बकरी दूध के साथ लेडी दे देती है'.यह शायद असहाय प्राणियों का सांकेतिक प्रतिरोध है. यहीं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता में भूख से लड्ने वाली बकरी का सौन्दर्य भी याद आता है. किसी को गान्धीजी की बकरी भी याद आई? या बिल्लेसुर?

Neelima - June 14, 2007 12:44 PM

आपकी कव्किता पढकर बिल्लेसुर बकरिहा की याद आ गई

Pratik - June 14, 2007 7:57 PM

वाह, बकरी के लेंड़ी का क्या अंतर्दृष्टिपूर्ण और काव्यमय वर्णन है। :)

अफ़लातून - June 14, 2007 10:08 PM

बच्चे बकरी की लेंडी से एक खेलते हैं 'पाचक-पाचक' । एक पैसे वाली पाचक की गोली , भाँग की माजोम से तनिक लघु किन्तु 'गाँधी की गाय: कितनी असहाय' की लेंडी के बिलकुल बराबर।
छिपकली की लेंड़ी से 'इलायची-इलायची' वाला खेल थोड़ा जोखिम भरा होता है ।
गदगद भए ।

Raviratlami - June 17, 2007 4:10 PM

किसी ने सच कहा है - जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे अजदक कवि :)

गोबर-लीद... इत्यादि पर भी कविता की मांग है अब.

एक पुराने, गुम हो चुके अजीज मित्र - पाठक जी की याद आई. वे शौचालय और पाखाना पुराण रस लेकर सुनाया करते थे और हम सभी पेट पकड़कर हँस हँस कर बेहाल!

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