Friday, June 15, 2007

इंगलिस सीख रहे हैं..

रामजीत राय का नैहर गई पत्‍नी बेबी को पत्र..


डारलिन, शिटहार्ट, छौ दिन बारह घंटा गुजर गया, तुम कौनो लेटरे नै पठा रही हो? कौन बात है? देह, मन, दिल, जिकर सब ठीक पोजीसन में है न, जी?.. ऊपर से जमाना भले धरमेंदर बूझे, भीतरे मन कइसा त डेरायल-डेरायल रहता है! संझा-सकालि मने मुकेस का गाना गोनगोनाते रहते हैं- दिल धरक-धरक के कह रहा है आ भी जा... तू हमको अउर ना सता.. एतना बिनती-गोजारिस करते हैं, रिकेस्‍ट पे रिकेस्‍ट मारते रहते हैं कि पूजा-आरती, बरत-उपबास से जादा इनपोरेंट-पबित्‍तर कारज है मन-देबता को लभ-लेटर पठाना.. लेकिन तुमको बुझइते नै है! आपका लभ-लेटर का अभाव में जिकर पीपल का पत्‍ता माफिक खरखराता रहता है, डारलिन.. अइसा दरद मत दो कि तुमरे पराननाथ का पराने छूट जाए?

मम्‍मीजी का एतना चिरौरी-बिनती किए, गोड़ दाबे, मुक्कियो मारे.. उनका मन रक्‍खे का बास्‍ते पहारी चढ के फूलदेबी का मंदिर में फूलो चरहाये.. लेकिन हमरा मोबाइल अबहीं तलक नै किनाया है! जबकि जयकिसन यादौ अउर बिसनाथ ए बीच कीन लिए हैं.. सेकिन हैंड वाला है लेकिन गरदन में टांगके सगरे घूमते रहते हैं अउर हमरा छाती पे सांप लोटाते रहते हैं! ए महीना का आखिर तलक हमरा मोबाइल नै किनाया त मम्‍मीयो जी से नफरत करने लगेंगे, सच्‍चो में!..

अउर ऊ पांड़े ससुर हैं कि बारह हजार का हरियर-हरियर पत्‍ता दाबके चुप्‍पे पटायल पड़ल है.. अबहीं तलक हमरा नवकरी का फरंट पर कौनो पोरगरेसिन नै हुआ है! रोज जाके चरन छूके असीस लेते हैं अउर रोज बभना वहिये मंतर छोड़ता है कि अभी ले नूज़ नै आया है!.. महीना भर इनका तिरिया चलित्‍तर देख लें फिर ऊ चप्‍पल-चप्‍पल पीटेंगे कि सब बभनई झर जाएगा!.. संकर जी का दरबार में भी न्‍याय नै है! हमको नवकरी दे रहे हैं न मोबाइल अउर ऊ जैकिसना छरछरा के घूम रहा है.. मउगी भी बड़ गोर अउर नमकीन पाइस है हरमखोर!..

पंड़वा के हिंया रोज-रोज चरन छू के अब मन घिन्‍नाता है लेकिन.. तुमरा पाती पाके करेजा सीतल होता त तुम पाती नहिंये भेज रही हो.. गालिप का सेर गाके गम बहाते रहते हैं- लगता नै है दिल मेरा उजरे दियार में.. अउर गाते-गाते बीच-बीच में पवने तीन रुपिया वाला टिकिस का मेटनी सो सलीमा देख आते हैं! अब का करें, डारलिन, घरे बइठे रहते हैं त तोहरा खयाल में करेजा में आगी जरने लगता है.. फिर पापाजी का लेच्‍चर अलग! त दरद भरा औंजाइन मन का सांति बास्‍ते सलीमा का अंधेरा में जाके तीन घंटा चैन पाते हैं. मगर दू दिन पहिले बड़ गडबड हो गया.. ‘क्रेझी लभ’ का माल-मसाला वाला फोटू देखके टिकिस लिए, सलीमा का अंदर घुसे.. घंटा भर निकल गया एक्‍को गो मसाला नै लउका.. इंटरभेल का रोसनी हुआ तो मन जइसे गोड़ का टूटही चप्‍पल.. अउर तबहीं बगल का कुरसी में, बूझो, किसको देखते हैं? बूझो, बूझो!.. पापाजी को!.. दिमागे संट हो गया! मुंहे खुल गया! आंखि तो खुलले था! पूछे तुम हिंया क्‍या कर रहे हो त जबाबे नै सूझा- घंटा बोलें का? अरबराके बोले इंगलिस सीखने बास्‍ते आये थे!.. अउर वहिंये सगरे पबलिक का सामने पापाजी हाथ छोड़ दिए!.. टाइम, सिचैसन का ई आदमी को सच्‍चो कब्‍बो खयाल नै रहता है! टोटल संधा खराब कर दिए! अउर तुम जो है कि लभ-लेटर नहिंये पठाई हो?..

कल पोखरी में नहाने गए थे त रमजतना बहुतै चोन्‍हा-चोन्‍हाके तुमरे गांव के परेम परकास का जिकिर कर रहा था.. बात का है?.. परकसवा मरा-सरा त नै न है, जी?

पल-छिन रात दिन तुमरा लभ-लेटर का वेटिन में..

तुम्‍हारा हिरदय सम्राट रामजीत

9 comments:

  1. आखें खोल देने वाला व्यंग.

    "दो बार रीड करना पडा, एनजायमेंट के लिये, तीसरी बार रीड कर रहा हूं फुल एक्साईटमेंट के लिये. लेकिन कमंट कर लू थर्ड "रीडींग" से पहले !"

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  2. भैया ! अजदख कौने धंकुट्टी के चाउंर खात हौ जब लिखत हौ बम्बई का पूरा चिठिया जगत डाक खाना हिलाई देवत हौ, तनि हमहु का बताई दौ !

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  3. शानधारम्
    आलोक पुराणिक

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  4. अंग्रेजी ससुरी कब समझ में आयी है?

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  5. बेबी राय को केहू बुलाइये...रामजितवा से अब रहा नही जा रहा... अब जादा दिन उ वहां रहेगी तो इ रामजितवा अपना सारा प्रेमपत्र प्रमोद्जी को भेज के अपने को समाज के सामने पूरा उघाड़ के रख देगा.और रामजीतवा को मालूम होता कि समाज मे उसका प्रेम पत्र खुला पन्ना के तरह घूमेगा और उस प्रेमपत्र पर समाज टिपियाता रहेगा और कहेगा बहुत खूब आंखे खोल देने वाला क्या व्यंग लिखा है तो सबसे पहले उ अपना ब्लाग खोलता और इ ससुर परमोद से कहता "तुमको हम इ लभलेटर कुमारी बेबी राय को देने कहा था और तुम चढा दिये अपने बिलाग पर, ई तुम अच्छा नहीं किया परमोद सिंग, अब तुम देखना हम भी अपना बिलाग खोलने जा रहा हूं और तुम्हारा चिट्ठा भी समाज के सामने खोल के ना रख दिये त मेरा नाम भी रामजीत राय नही. डरा गये का?

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  6. परमोद जी से अरज है कि रामजीतवा को नवकरी दिलाया जाए, बेबी राय से उनका पुनरमिलन कराया जाए, मोबाइल किना दिया जाए तो अच्छा रहेगा। बहुत परेसान है बेचारा, आप तो लेखक हैं, उसको कभीकभी खुस कर दिया किजिए।

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  7. हम जा रहा हं, पहले कौनो मांटेसरी की टीचरवा से दोस्ती करब ताकि ऊ हमका अंगरेजी सिखावे।

    मस्त है!!

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  8. अलख ! खोल दा पलक,दिखा दे दुनिया के झलक !

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  9. क्या रम जतना कोई साज़िश रचने जा रहा है ? या राम जीत राय के दोस्त फ़ुरफूरिया टाइम्स की ख़बर कही से पा गये हैं ? मुझे लगता है की फ़ुरफूरिया टाइम्स की ख़बर कही ना कही से उड़कर रम जतना के पास आ गयी है ... कही रम जतना राम जीत राय के मन की थाह ले रहा है अभी सिर्फ चोन्‍हा-चोन्‍हा ke

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