Saturday, June 16, 2007

चिरकुट प्रसाद का गद्यगान..

चिरकुट प्रसाद दुखी थे. चिरकुट नौकरी से जीवन नरक हो रहा हो जैसी कोई बात नहीं थी. दरअसल नौकरी के चिरकुट होने का तो चिरकुट प्रसाद को बोध भी नहीं था. नौकरी तो नौकरी होती है, अच्‍छी और चिरकुट क्‍या. साहब, साहब की वाईफ और उनके लॉन के गुलाब के पौधे पर बीच-बीच में पोयम लिखकर चिरकुट प्रसाद सुख में लहालोट भी हो लेते. साहब कभी कान खोदते हुए उन्‍हें कविजी बुला लें तो खुशी में चिरकुट प्रसाद की आंखें मुंद जातीं, फुदकने लगते. भय होता कहीं मदहोशी में गिर न पड़ें.. तो चिरकुट प्रसाद सुख की नदी में ही बूड़े हुए थे. मगर कभी-कभी जी करता कि एक डुबकी नदी से बाहर, सुख के सागर में भी लगा लें.. और सागर की तरफ रुख करते ही चारों ओर उनकी चिरकुटई का उजियारा फैलने लगता!..

अभी कल ही बात लीजिए.. दिल्‍ली से आए एक परिचित को चिरकुट प्रसाद ने उत्‍साह में अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं, और परिचित जो हैं एकदम उखड़कर इनको डांटने लगे- अबे, ये कविता है? कविता का जानते हो? ज़ि‍न्‍दगी में पढ़ी है कभी कविता?.. हटाओ सामने से नहीं तो अभी चप्‍पल निकाल के पीटने लगेंगे, सारा साहित्‍य पजामे से बहकर बाहर निकल जाएगा! चिरकुट प्रसाद की आत्‍मा रो रही थी, लेकिन ऊपर हंसते हुए बोले- परिचितजी आप कितना जोकिंग हैं! कि जोकफुल हैं? कि जोकियल कहना चाहिए?..

परिचित ने अबकी मर्तबा मुंह से नहीं लात से बात की.. खींचकर एक चिरकुट प्रसाद के कमर पर जमाई.. और चिरकुट प्रसाद मय अपने साहित्‍य के हास्‍य-चपल होने की जगह हास्‍यास्‍पद होकर सड़क के बाजू एक अधकटे ड्रम के खदकते कोलतार में गिरते-गिरते बचे!

देह को गिरने से बचाकर आत्‍मा और अपनी समझ को भी गिरने से बचा गए हैं- की चतुराई में खिले-लहलहाते चिरकुट प्रसाद घर लौटे तो पत्‍नी ने हाथ का साहित्‍य खींचकर बोरे पर सूखते अचार के मसाले पर फेंक दिया और गरजने लगीं.. साहित्‍य पर नहीं, सास पर गरज रही थीं. गुस्‍से में सॉस की शीशी तोड़ दी. चूंकि उनके पैर पर नहीं टूटी थी, चिरकुट प्रसाद के मन में कविता आकार लेने लगी. वही लिख रहे थे जब पत्‍नी ने पीछे से आकर एक और लात लगाई. कुर्सी से उछलकर चिरकुट प्रसाद मुंह के बल गिरते-गिरते बच गए, लेकिन इस बार चिरकुटई की साक्षात प्रतिमूर्ति हो रहे थे. पत्‍नी फटी आवाज़ में चीख़ीं कि फिर कविता लिखते देखा तो पेट में कलम घोंप दूंगी!..

हालांकि चिरकुट प्रसाद कलम से नहीं की-बोर्ड के की पर कविता जोड़ रहे थे लेकिन पत्‍नी की धमकी से मन मलिन और भाव मार्मिक होने लगे! आज तक पत्‍नी पीछे से आकर ही लात लगाती रही थी, पेट में कलम घोंपने की बात का ज़ि‍क्र नहीं किया था.. और पेट क्‍या, चिरकुट प्रसाद कहीं भी कलम घोंपवाना नहीं चाहते थे!.. मगर आज तक यह भी नहीं हुआ था कि रात के खाने के आधे घंटे पहले नियम से उन्‍होंने एक कविता की रचना नहीं की हो!.. रिकॉर्ड था. और चिरकुट प्रसाद अपना रिकॉर्ड नहीं तोड़ना चाहते थे.. मगर चूंकि चिरकुट थे, आसन्‍न मुसीबत का उन्‍होंने एक आसान रास्‍ता खोज निकाला.. कविता की बजाय, गद्य में समाज का प्रशस्ति-गान गाने लगे.. दीवार की धूल और ज़मीन की मिट्टी चूमने लगे!

अभी प्रशस्ति का गलत हिज्‍जा दुरुस्‍त भी नहीं किया था कि ऊपर चप्‍पलों की बारिश होने लगी.. और यह बीवी नहीं थी!.. वही सुदूर के परिचित थे जिन्‍होंने पहली लात लगाई थी.. और अब खोजते-खोजते घर के भीतर कंप्‍यूटर तक चले आए थे!..

कशमकश व तनाव की अजब संगते खिंचने लगी.. चप्‍पल व गालियों की बड़ी महीन जुगलबंदी सजने लगी! एक झलक लीजिए: आह्!.. ओह्?.. अरे!.. अच्‍छा?.. अबे!.. मानोगे नहीं?.. फिर लगाऊं एक?.. थानेदार!.. चमार!.. व्‍यापार?.. धक्‍का.. चोर!.. सीनाजोर?.. गली.. गाली?.. कहां?.. कौन?.. हाथ टूट रहा है, साले!..

हद है.. आपकी जानकारी के लिए साफ कर दें, ये सारी मार्मिक अभिव्‍यक्तियां साहित्‍य और समाज के चिंतार्थ प्रकट हो रही थीं.. ओर इसमें चिरकुट प्रसाद की आत्‍मा गहरे तक धंसी हुई थी, अलबत्‍ता चिरकुटई कहीं थी तो उन्‍हें नहीं दिख रही थी!..

3 comments:

  1. आज का आपका आत्मकथ्य बहुत सुंदर प्रसतुती रही है,मै इन आपके साथ हुये ढेर कांडो के बाद भी आपकी लगातार की बोर्ड पर चल रही उंगलियो को दाद देना चाहूंगा, :)

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  2. चिरकुट प्रसाद के बहाने यह कहीं आत्मस्वीकारोक्ति तो नहीं प्रभु!!

    ना जानें मुझें आपका लेखन पढ़कर ऐसा लगता है कि कहीं अंदर से बहुत बैचेन हैं आप, एक बैचेनी, एक असंतुष्टि अपने आप से अपने आसपास से।या कहें कि जैसे ही आप आंखे खोलते है, दिमाग जागता है, आपके अंदर कहीं कुछ खदबदाने सा लगता है और आपकी कलम बस चलने लगती है।

    मैं यह भी नहीं कह सकता कि उपरवाला आपकी यह बैचेनी बनाए रखे ताकि हमें आपके एक से एक लिखे को पढ़ने का मौका मिलता रहे।

    खैर! उपरवाला आपकी बैचेनी को तो ले ले पर आपका लिखा हमें ऐसे ही पढ़वाता रहे।

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  3. इस सर्वोत्‍कृष्‍ट आभासी गद्य का लौकिक रूप देखना हो तो यहां देखें। पता चल जाएगा प्रमोद जी ने कहां से माल उड़ाया है।

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