Sunday, June 17, 2007

ठाकुर का कुंआ के गबरू होनहार बच्‍चे और पंडीजी..

मैंने ठाकुर का कुंआ कहानी नहीं पढ़ी है. पढ़ी भी होती तो क्‍या फ़र्क पड़ता, यहां ढेरों ‘चड्डी पहनकर फूल खिला है’ टाइप गबरू पढ़ाका बच्‍चे हैं, एक सुर में रेंकने लगते कि बहुत अपने को पढ़वैया मत लगाओ! फ़ारसी नहीं, हिंदी वाली कहानी लाओ!.. इन चड्डी पहने बच्‍चों से हिंदी, हिंदू किसी भी मसले पर बात करना वैसा ही है जैसे गोविंदा के मुंह से ‘डिस्‍कवरी ऑफ इंडिया’ की सूक्ष्‍म समीक्षा सुनना! हो सकता है इस पंक्ति तक पहुंचते ही तीन बालक अपनी कुर्सी पर खड़े भी हो गए हों- डिस्‍कवरी ऑफ इंडिया का अनुवाद कीजिए, सर? इन पंक्तियों के लिखे जाने के दरमियान- हो सकता है कोई बालक आज के पोस्‍ट पर अनामदास के लिखे के जवाब में यह पूछने के लिए उद्धत भी हो रहा हो कि ‘आर्गुमेंटेटिव इंडियन’ बोलकर आप कैसी छूट लेना चाह रहे हैं, साफ़ कीजिए, मास्‍साब? ज़ाहिर है ये होनहार बालक अमर्त्‍य सेन तो नहीं ही पढ़ेंगे, उनकी किताब का बैक कवर भी नहीं पढ़ेंगे.. मगर अपनी ज़हीन व महीन बुद्धि से आर्गुमेंट का बायां और दायां समझ-समझाकर- उसे खींचकर व फींचकर- रामलीला के गत्‍ते वाले पेड़ से टंगे आम व अमरूद खाकर हाय-हाय और आह्-ओह् का गान ज़रूर करने लगेंगे! वह हाथी वाली कहानी है न.. कि एक आदमी पैर छूकर.. तो दूसरा सूंड़ थामकर हाथी की पहचान व्‍याख्‍यायित कर रहा है? तो रामलीला के इस टूटी चौकियों वाले तिरपाल ढंके मंच पर बातचीत भी कुछ उसी शैली व स्‍तर पर चल रही है! ज्‍यादातर छौंड़ा मन इतने ही ज्ञानी हैं कि रामलीला से बाहर के किसी दूसरे किस्‍म के संवाद के बुलते ही फैलने लगते हैं.. तिलमिलाकर नाक व देह के अन्‍य स्‍थानों से धुंआ छोड़ने लगते हैं! इन्‍हें लगता है हिंदी को इनका अपूर्व दान व अनुदान इसीमें निहित है कि सारे संवाद रामलीला वाले स्‍तर पर ही चलें! कोई चवन्‍नी छाप नौटंकी से अलग किस्‍म के डायलॉग करे तो इनका सिर पिराने लगता है.. बात-बात में पानी और दूध पीने लगते हैं.. दस दफे चड्डी बदलते हैं मगर फिर भी चैन नहीं पड़ता! भारतीयता के होनहार सपूत व हिंदी का कल ज़मीन पर लोटकर बिलबिलाने लगते हैं कि हमारा रामलीला वाला डायलॉग लौटाओ- नहीं तो हम चड्डी में पेशाब कर देंगे?

मैंने ठाकुर का कुंआ से क्‍यों बात शुरू की थी? दरअसल गांव में एक कुंआ होता है और ठाकुर का ही होता है.. वहां वही पानी पीते हैं जिन्‍हें ठाकुर अपना पानी पीने और छूने लायक समझता है.. बाकी पानी नहीं पीते- ठाकुर के लठैतों की लाठी खाते हैं. लाठियां भांजनेवाले लठैत ही नहीं, लात और लाठियां खाते मलेच्‍छ, चमार, दुसाध भी हाथ जोड़े पंडीजी की तरफ देखते हैं.. और पंडीजी जो हैं मुस्‍कराकर ठाकुर की तरफ देखते हैं और वही जपते हैं जिससे आजतक रामलीला सार्थक होती चली आई है- कि प्रभो, न्‍यायमार्ग से विचलित होनेवालों की यही उचित व न्‍यायोचित दंड है!.. फिर पता नहीं पंडीजी गांठ में कितना छंटाक चावल और गुड़ बांधकर प्रभु की सेवा और अपना जीवन सार्थक करने लगते हैं!..

जानता हूं आप हंसिएगा.. बोलिएगा कितनी डेटेड कहानी है! साली, दुनिया कहां से कहां निकल गई और आप जो हो अभी तक मुरली-बजैया-किसन-कन्‍हैया गा रहे हो! मगर आपकी आत्‍मा हिंदी के आर्गुमेंटेटिव मर्मस्‍थलों को पहचानती है तो आप हसेंगे नहीं.. आपका मन उखड़ जाएगा, आंख से भर्र-भर्र आंसू छूटेंगे.. क्‍योंकि ताज़ा-ताज़ा आसमान छूने की हसरत पाल रहे- कमसकम हिंदी के आभासी लोक का- अग्र और पृष्‍ठ यही है! सिर से पैर तक रामलीला के भजन ही हैं.. बाकी जो है राम-राम है!..

नहीं, मैं नारद से निकलने की यह अरजी नहीं भेज रहा हूं.. वह साहस दो-चार दिन ठहरकर जुटाऊंगा.. फ़ि‍लहाल ढेर सारा पतनशील साहित्‍य रचने को मन कुलबुला रहा है.. सोचता हूं सबके सामने जाकर ठाकुर का कुंआ गंदा कर आऊं.. मगर पता नहीं क्‍यों वह भी दो कौड़ी के रामलीला वाला काम लग रहा है!..

रवीश कुमार, अनामदास के साथ-साथ आज अभय और प्रत्‍यक्षा ने भी अपनी बेचैनी दर्शायी है.. मजे़दार बात है सुबह से ये पोस्‍ट की गई हैं मगर अभी तक नारद पर नज़र नहीं आ रहीं.. हमारा पतनशील और रवीश का भूत पहुंच गया मगर ये समाज-सापेक्ष चिंताएं नहीं पहुंच पा रहीं.. इन पोस्‍टों के नारद पर न दिख पाने की ज़रूर ही कोई तकनीकी वजह ही होगी!.. ख़ैर, सबपर एक नज़र मार लीजिए.. फिर अपनी समझ व बुद्धि के अनुरूप सिर पीटिये.. या जाकर गबरू बच्‍चों की पीठ थपथपाइए.

13 comments:

  1. ई कहां कहां की कहानी उठा के ले आ रहे हैं..और विषय सब चूक गये हैं का.अब इस सन्दर्भ मे कुछ मत कहिये.... नहीं तो कहीं मुकदमा हो गया तो निपटाने के लिये अमरीका जाना पड़ सक्ता है जो आपसे कितना सपरेगा ई हमको पता है

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  2. प्रमोद जी एक बात बताइये क्या नारद ऐसा नही कर सकता कि सिर्फ़ फो्टो वाले ब्लाग का संचालन करे. फोटो अच्छी हुई तो वाह-वाह नही तो थू थू..कम से कम बहस से तो बच जाएंगे. कोई है जो इस आइडिया पर प्रकाश डाल सके.

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  3. फ़ि‍लहाल ढेर सारा पतनशील साहित्‍य रचने को मन कुलबुला रहा है..
    लिखिये ना हम है ना पंगे लेने को
    :)

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  4. येल्लो. मैं समझ रहा था कि कोई और मस्त चीज होगी. पर यह तो वही निकला - नारद-फारद/बैन-सैन/अभिव्यक्ति पर सेंसर की पट्टी छाप पोस्ट. यह मसाला टनों के भाव से लिखा जा रहा है. पता नहीं कब बन्द होगा!
    सांस खींच कर नजर घुमाइये और कोई और टॉपिक खोजिये. यह टॉपिक तो बासी पड़ गया है.

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  5. जब सबके घर मे मधुर शीतल जल उपलब्ध होने के बावजूद ठाकुर का कुंआ गंदा किये गये बिना चैन नही मिलता तब कुंये सफाई का ध्यान तो ठाकुर को रखना ही पड़ेगा।

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  6. हमारा तो मन चढ्ढी पहन के फूल खिले बालकों की पीठ ठोंकने का इसलिये कर रहा है कि इसी बहाने आपका ये शानदार समझशील साहित्य सामने आ रहा है। बहुत अच्छा लगा। मजा भी आया! आगे और इंतजार है!

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  7. वातावरण सो रहा था , अब आँख मलने लगा है
    फिर धीरे-धीरे यहाँ का मौसम बदलने लगा है
    - दुष्यन्त
    प्रिय अनूप के 'जरूरी' दुलरवा मान नहीं रहे , असहाय कर दिया है , मानो।

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  8. हम भी असमंजस में रहे, कई बार लेटे-बैठे और उसके बाद लगा कि बचपन में भी हम उसका विरोध करते थे जो बैट का मालिक होने के नाते क्रिकेट के नियम अपने हिसाब से रचने की कोशिश करता था.

    पतनशील साहित्य का नया उत्कर्ष है यह. व्यंजना, लक्षणा, रूपक, क्षेपक, मारक, मोहक सब है. चलिए लिख ही दिया आपने.

    वैसे ईस्वामी जी के विचार ज़रूर पढ़िएगा मेरी पोस्ट पर, उन्होंने आगे से विचार करने के लिए मना किया है.

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  9. इसीलिये आपने इतने घंटो बाद भी २ महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ रोक रखी हैं क्या :).

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  10. इ सबको पता है कि आप लाल चड्डी पहने हुए हैं, लेकिन अमेरिका ने उसको इतना चिथड़ा कर दिया है कि उसको किसी को दिखा भी नहीं सकते।

    खैर आपके लिखे में अचरज वाली कोई बात नाहीं है, खिसियानी बिली को खम्भा ही मिलता है नोचने के लिये।

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  11. केसरिया बालमाJune 17, 2007 at 7:46 PM

    अमां अनुनाद तुम कौन सी चड्ढी पहनते हो यार कि फटती ही नहीं? क्या अमरीका से इनाम के बतौर मिली है कि आच्छादित अंग चिथड़ा हो जाने पर भी उनका स्तवन किये जा रहे हो?

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  12. नारद ने लगता है कुछ लोगों के गले से जंज़ीर निकाल ली है. बडे खौरहे लग रहे हैं और ये चड्डी भी नही पहने हैं विचारों मे बड़ी बदबू है.... दूर रहियेगा.अबकी बार ये आए तो पकड़ के बधिया करा देंगे.दूबारा ऐसी नस्ल पैदा ही नही होगी...

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  13. मेरे बेनाम भाई,
    यहां कोई किसी को बधिया करने नहीं जा रहा.. वह काम वैसे भी बाहर के समाज में जिम्‍मेदारी से हो ही रही है. यहां तो बस शब्‍द ही हैं जिनका जोश ज़रा ज्‍यादा छलकने लगा है.. कुछ लोगों को मज़ा आ रहा होगा.. आप भी उसमें नहाने को छटपटा रहे हों. तो हमारी सलाह है बाहर की बरसात में थोड़ा भीगकर मन ठंडा करें..

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