Jun 19, 2007

शीतलता के आनंद..

पहली झड़ी के बाद गरमी वाली हवा बदल गई है. सुबह आंख खोलकर बाहर देखें तो मन शीतल होता है. मैं इस शीतलता का आनंद लेना चाहता हूं. फिर से किताबों और अपने संगीत की ओर लौटना चाहता हूं. एक चिरकुट विवाद के पीछे जो इतना समय व ऊर्जा जाती रही है, उसके लिए सबसे ज्‍यादा मैं खुद से क्षमाप्रार्थी हूं. नासिर मियां आपसे एक मर्तबा मिला हूं, आपकी बातों से बड़ा प्रभावित हुआ था, मगर यह जो भावुक वाद-विवाद का नाला खुल गया है, उससे माफ़ कीजिएगा- आपकी तक़लीफ़ समझ सकता हूं- लेकिन पर्सनली मुझे बड़ी कोफ़्त हो रही है. हमेशा होती रही है. फिर क्रांतिकारी क्‍या मैं आंदोलनकारी भी नहीं.. जीवनकारी होने की कोशिश करता हूं.. थोड़ी समझदारी से फ्लर्ट करता हूं.. लेकिन बीच-बीच में उसे लात भी लगाता रहता हूं.. तो आपकी भावुकता से लबरेज़ पोस्‍ट पर क्‍यों कहीं से क्षमायाचना नहीं हुई, इसका अब ताजुब्‍ब भले न हो- शर्म थोड़ी अब भी बची ही हुई है. मगर क्‍या कीजिएगा.. समाज अशिक्षित व असहिष्‍णु है.. तो ब्‍लॉग पर चढ़ाए चार पैरा कहां से सहनशीलता की गंगा बहाने लगेंगे! नहीं बहायेंगे! आप झूठे मुग़ालते मत पालिए.. और उसकी वजह से अपने.. और हमारे दुख मत बढ़ाइए! एक छोटे, देहाती टाइप चौपाल को हम कुछ ज़रूरत से ज्‍यादा ही भाव दे रहे हैं.. आपका काम मिसालें बनाना है, न कि इन दो कौड़ी के मिसालों से अपनी समझ कुंद करना?.. आप ढेरों अर्थपूर्ण काम कर सकते हैं, समाज व अपने ब्‍लॉग पर उसमें एनर्जी झोंकिए, ‘खुब लीखी’ व ‘गिदड़ भप्‍की’ जैसी लिखाई व मधु मुस्‍कानी समझ को दिल पर लेकर मन छोटा मत कीजिए!

मुझे सचमुच समझ में नहीं आ रहा कि आखिर ये असग़र वज़ाहत को नहीं पढ़नेवाले और ओमप्रकाश शर्माओं को पढ़कर इतरानेवाले हैं कौन जिन्‍हें हम इतना भाव दे रहे हैं? क्‍यों दे रहे हैं? इसीलिए दे रहे हैं कि इन्‍होंने एक दूकान खोली है जहां बीस वैसी ही ‘खुब लीखी’ पल्‍टन इकट्ठा होती है, जहां एक चिरकुट दूसरे चिरकुट के गरदन में हाथ डाले आह-आह और वाह-वाह करता है? हिंदी के आभासी लोक को पीटकर और फींचकर हम इतना ही छोटा कर देना चाहते हैं? नासिर मियां, हौसला रखिए कि हिंदी का आभासी लोक इस ‘छटांकी’ मानसिकता से- संख्‍या व स्‍वर दोनों में- थोड़ा बड़प्‍पन की तरफ बढ़ेगा. मैं भी इसी उम्‍मीद पर रोज़ की-बोर्ड की रगड़ाई करता हूं कि कल को पतनशील से अलग सृजनशील लेखनी करुंगा तो उसके भी बीस-तीस पढ़नेवाले मिलेंगे, ज्ञानदत्‍त जी की तरह हांफकर बुलके नहीं चुआवेंगे कि कांख-कांखकर पढ़ना पड़ता है! हिंदी की यह तुतलाती, देहाती मधु मुस्‍कानी दुनिया ही हिंदी की पहचान न बने, उसमें वैश्विक विवेक व सबलता का सामर्थ्‍य आए, आइए, हम इस दिशा में मेहनत करें. दो कौड़ी के रगड़ों व उनके सिरजनहारों के लेमनचूसी ज्ञान पर अपनी एनर्जी न ज़ाया करें!

रविजी समेत कुछ अन्‍य मित्रों का शुक्रगुज़ार हूं जिनकी लेखनी ने आज मन की खिन्‍नता पर थोड़ा पानी का छिड़काव किया. आप भी फ़ुरसत में एक नज़र मार लें: स्‍ट्राइसैंड प्रभाव, माफ़ करें ये धर्मयुद्ध नहीं है. धन्‍यवाद विनय, धन्‍यवाद समर. आप पढ़ि‍ए.. तब तक मैं ज़रा बाहर की शीतलता का आनंद लेकर आता हूं.

7 comments:

काकेश said...

हम तो सोचे कि कुछ शीतल मिलेगा..पर यहां भी अभी लू (हिन्दी वाला)के माफिक हवायें ही हैं..वैसे प्री मानसून की झलक तो दिखी है....कब शीतलता आयेगी और हम कुछ नये विषयों पर अपनी लेखनी चलायेंगे .... चलायेंगे ना ? हमारा जुनून तो अभी तक नहीं लौटा है.. मन ना निर्मल है ना आनंद ..!!

Pratyaksha said...

हिन्दी के इस आभासी दुनिया में किताबों और संगीत की शीतल फुहार बरसाईये । हम इंतज़ार में हैं ।

vimal verma said...

जो मंद मंद बयार बह रही है उसी से अब तक आप नहाए लग रहे है.. अरे थोड़ा बाल ऊल तो सूख जाने देते...अभी हम रेलबे अधिकारी जी के पास गया था(उनका नाम का पहला अश्चर टाइप नही हो पा रहा) जिस चीज़ को वो सड़ा समझते हैं उसी सड़े को उन्होने दोहरा दिया है ताज़गी तो वहां नही मिली पर उसी ताज़गी की कमी यहां भी खल रही है पर जो आपने विनय जी का लेख पढ्वाया है वो काबिले तारीफ है... समझिये कि उस लेख से आज का दिन तर गया.. अब कल मुलाकात होगी... जय हिन्द

अनुनाद सिंह said...

का हुआ कि एतन भड़के-भड़के से नजर आ रहे हैं। आप तो पतनशीले साहित्य में जमते हैं। काहे लिये ई ट्रेडिशनल ...

और हां; प्रमोद जी हमरे पिछले कमेन्टवा को अपने गुस्से की बलि मत चढ़ाइये। जरा आप भी सहनशीलता दिखाइये और उसे छाप दीजिये।

Sagar Chand Nahar said...

"खुब लिखी"
बड़ी खुशी हुई कि इसी बहाने ओमप्रकाशजी के चाहकों को भी याद तो किया। दरअसल बात क्या है कि ओमप्रकाशजी के उपन्यास दो रुपल्ली में किराये मिल जाते हैं, असगर वजाहतजी की किताबें थोड़ी महंगी मिलती है और हैदराबाद में इतनी आसानी से हिन्दी की किताबें नहीं मिलती। फिर भी थॊड़ा बजट बना रहे हैं वजाहतजी की किताबें खरीदने के लिये, क्यों कि इस विवाद के बाद उन्हें पढ़ने की बहुत इच्छा हो रही है।
तब तक आप पिछले साल यानि 24.06.2006 को परिचर्चा में मेरी और पंकज बैंगाणी की लिखी टिप्पणी यहाँ देखिये।

vimal verma said...

अरे ई अनुनाद्जी को एक नाद की ज़रुरत है बन्हिं के चारा वारा दे दीजिये. अनुनाद बाबू कुछ लिखते पढ्ते हों तो आपके ब्लाग पर आकर बतियाया जाय.ई का खिड़्की से झाक कर भाग जाते हो.बक्चोन्हर हो का ज़रा हमहुं से मुंहज़ोरी हो जाय.हर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र हट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट

Nasiruddin said...

आप झूठे मुग़ालते मत पालिए.. और उसकी वजह से अपने.. और हमारे दुख मत बढ़ाइए! एक छोटे, देहाती टाइप चौपाल को हम कुछ ज़रूरत से ज्‍यादा ही भाव दे रहे हैं..

आपकी बात एकदम सही है। प्रमोद जी, मैं यह पोस्ट कल नहीं देख पाया था। इस घटना से पहले मैं कभी भी किसी तरह के हस्तक्षेप में नहीं पड़ा था। हालांकि, एक दो साहब ने उकसाने की कोशिश ज़रूर की थी। यह मामला जिस तरह, जिन अल्फा़ज़ के साथ हुआ, वो मज़बूर कर गया। खै़र। आप बडे़ हैं और बड़ों को यह हक़ बनता है कि वह अपने तजु़र्बे का फ़ायदा, छोटों को दें। मैं आपकी सलाह पर चलने की पूरी कोशिश करूंगा। हर घटना कोई न कोई सीख देती है। इस घटना ने भी कई सीख दिये। यहां मुद्दों पर बात नहीं होती। तर्क का भी इस्तेमाल कम ही होता है। हां, टीका लगाकर स्माइली लगाने वालों की तादाद अच्छी खासी है। जो मज़े लेने में ज्य़ादा यक़ीन रखती है। कोशिश होगी कि आइंदा, मेरे व्यवहार से आपको तकलीफ़ न हो।