Thursday, June 21, 2007

बीच खेल में..

काम से लौटती लड़की सोचती खोयी-सी उसके बाबत जो पीछे छोड़ आई अधूरा-अनसुलझा.
सोसायटी के अहाते में अधखेल अटक गया बच्‍चा ताज़्ज़ुब करता अभी तो कहीं घायल भी न हुआ फिर यह कैसी थकान क्या अंधेरा है.

दिन भर की टूट नहीं, लड़की है हारी मन से
बच्‍चा थककर ध्‍वस्‍त-निढाल अपनी ही मचलन से.

सामने पड़ने पर दोनों देखते हैं एक-दूसरे को. आंख मूंदने से पहले जैसे अलसाया देखता है सूरज आख़ि‍री बार दुनिया को.

लड़की व बच्‍चा जाते हैं दोनों अलग अपने रस्‍ते.
बच्‍चा हिलगता लंगड़ाता है लड़की जाती गुनगुनाती है तीन शब्‍द विलम्बित.

सोसायटी की सीढ़ि‍यों के नीमअंधेरे में डोलती कोई एक छाया
जलाती है शाम की पहली बत्‍ती.

8 comments:

  1. बहुत खूब बात कही है एक अलग अंदाज में. साधुवाद,

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  2. सामने पड़ने पर दोनों देखते हैं एक-दूसरे को. आंख मूंदने से पहले जैसे अलसाया देखता है सूरज आख़ि‍री बार दुनिया को.
    अच्छा लगा!

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  3. पसंद भी आया और समझ भी!!

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  4. गद्य, कविता और थियेटर का संगम है ये ।

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  5. Waah!! bahut khoob.. aur gahra.. kawita jaisa... khel kar thaka bachha.. kaam se lautati ladki.. shama ka dhalta sooraj..

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