Friday, June 22, 2007

बंबईया बरसाती ब्‍लूज़..

इंटरनेट पर तो जो धूम-धड़क्‍का होगा सो होगा ही.. ब्‍लॉग पर भी ढेरों कशीदाकारी होगी. ऑडियो- और सीमित स्‍तर पर वीडियो का इस्‍तेमाल शुरू हो ही गया है. हिंदी में अभी उतना प्रचलन में नहीं है.. मगर हिंदी में अभी लोग ही कितना हैं, और हिंदी वैसे भी आगे चलने में कहां विश्‍वास करती है.. लेकिन धीरे-धीरे वह सारी अदायें, नखरे, सुरूर हिंदी में भी आएगा ही. हो सकता है ज्ञानदत्‍तजी दो सौवां पोस्‍ट ऑडियो पर नेहरुजी की आवाज़ की नकल में सुनावें. शुकुल पंडिजी भी लंबे-लंबे पोस्‍ट लिखने की बजाय, हो सकता है अगले वर्ष इसी समय- सीधे वीडियो छापना शुरू करें.. मोहल्‍ले के होनहार बच्‍चों की पल्‍टन उनकी सेवा में जुटी पड़ी हो.. उत्‍साह में सबकी बांछें व अंग-प्रत्‍यंग खिला पड़ रहा हो..

यूनुस मियां, देबाशीष, शशि सिंह और काकेश जैसे कल्‍पनाशील लोगों ने छोटी बैटरी वाले टॉर्च जलाने शुरू कर ही दिए हैं.. जल्‍दी ही वह बैटरी व रोशनी दोनों बड़ी होगी (हो सकता है आलोक पुराणिक जैसा व्‍यक्ति अख़बारों में फ़ोन करके उन्‍हें सीधे रिकॉर्डेड सीडी एक्‍सेप्‍ट करने का सजेशन देता फिरे.. अख़बार वाले लेते भी फिरें!).. सांवरे को उलाहना देनेवाली कविताएं मान्‍या काला चश्‍मा पहनकर वीडियो पर गा रही हो.. प्रत्‍यक्षा, बेजी, मसिजीवी सब.. क्‍या तो कचर-मचर का अद्भुत नज़ारा होगा! (अनामदास आप कब तक गुमनामदास बने रहिएगा? इरफ़ान मियां आलरेडी सोच रहे हैं कि किसी भी क़ीमत पर इस दौड़ में उन्‍हें सबसे आगे रहना है)..

ऐसा नहीं है कि मैं पुराना हूं, और इस सबके खिलाफ़ हूं. शशि सिंह के उम्र प्रकाशित कर देने के बाद पुराना तो हो ही गया हूं (ब्‍लॉग के फ़ोटो पर दिखते मेरे सफ़ेद बाल वास्‍तविक नहीं हैं, पेंटेट हैं.. शक़ हो तो ज्ञानोदय के नए अंक में हमारी सच्‍चाई पढ़ लें) लेकिन इसके खिलाफ़ नहीं.. भई, मैं तो वैसे भी सलीमा वाला आदमी हूं ऑडियो-वीडियो से कहां तक बचता चलूंगा.. मगर यह भी सच है कि शब्‍दों से विशेष स्‍नेह है, उनकी सत्‍ता सुसंगत और विवेकी लगती है.. लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि ऑडियो या वीडियो.. ओह्, इस ज़ि‍रह का भला कहीं अंत है..? एक पोस्‍ट में तो नहीं ही है! आनेवाले दिनों में इस पर बातें होती रहेंगी. दूसरों के साथ-साथ मैं भी कुछ राय रखूंगा ही..

लेकिन आज इस पर आज मुंह खोलने और बात छेड़ने की सीधी वजह यह है कि हमने अपने ब्‍लॉग के नीचे की तरफ एक विजिट डालकर प्‍लेयर पर कुछ गाने चढ़ाये हैं.. मामला जमा तो आगे कुछ अपनी पसंद की चीज़ों का खेल करते रहेंगे.. हिंदुस्‍तानी खेल शायद कम होगा.. उसके लिए यूनुस मियां हैं ही.. हम थोड़ा अ-हिन्‍दुस्‍तानी रंग घोलेंगे.. एक नज़र मार लीजिए.. एकदम नीचे की तरफ स्‍प्‍लै‍श कास्‍ट के स्‍टार्ट पर चटका लगाइए..

कुल सात ट्रैक्‍स हैं.. ब्‍लूज़ की अलग-अलग ध्‍वनियों का प्रतिनिधित्‍व करते.. ज्‍यादातर पिछली सदी के पांचवे दशक के पहले की रचनाएं हैं. पहली दो कृतियां चार्ली पारकर कीं, तीसरी पूर्वी यूरोप के फ्रांस में यायावरी में जीवन काटते ज़ांगो राइनहार्ट, फिर क्‍लैरिनेट के अनोखे जादूगर सिडनी बिशे, और अंत के दो ट्रैक माली के तोमानी दयाबते. इनमें से हरेक का संगीत ही नहीं, उनका निजी जीवन भी उतना ही मार्मिक रहा है..

थोड़ा सुनिए.. मज़ा न आए तो धीरे से निकल लीजिए.. और मज़ा आए तो हमसे कहिए.. ऐसे माल में हम सिर से पैर तक गंजे-बसे हैं!

(ऊपर चार्ली 'बर्ड' पारकर का एक तैलचित्र)

10 comments:

  1. अरे बापरे, आप तो हाई-टेक हो गये! आज से आपसे लाग-डांट बन्द. नये जमाने के अज़दक से कोई अहमक ही होगा जो पंजा लड़ाने की बेवकूफी करेगा.
    बाकी जरा सरल लिखा करें (आज तो सरल ही था!) जो बिना रिपीट पढ़े समझ में आ जाया करे. और वो इंट्रोवर्ट वाली छतरी फैंक दें नरीमन प्वाइण्ट पर.

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  2. ये क्या क्या अनजाने नाम फेंक दिये हैं आपने.. कृपया साथ में अनुवाद भी दीजिये..

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  3. मुबारक हो, आपने सही समय पर इसका आगाज किया है । विश्‍व संगीत दिवस पर । चलिये हमें विश्‍व संगीत से रूबरू कराते रहिये । इसे तसल्‍ली से सुनना बाक़ी है । संगीत के बारे में हम अपनी प्रतिक्रिया आज शाम तक देंगे ।

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  4. वाह!ये बढिया किया । यहाँ की गुम बरसात के पहले की गर्मी में भी जैज़ के ब्लूज़ ब्लू दे रहे हैं ।

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  5. का बात है प्रमोद जी, तबियत-उबियत तो ठीके है ना!! इत्ती सीधी सरल पोस्टवा जो लिखे हो!

    अब आप सुननें कहेंगे तो सुनना ही है ना!!

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  6. हम अपनी टॉर्च जलाये आगे बढ़ने की सोच ही रहे थे कि सामने से तेज लाइट वाले ट्रक की रोशनी सीधे आंखों में पड़ी.उस तेज रोशनी में आखें मिचमिचा गयी.आखें तो खुल ना सकी पर कानों में मधुर संगीत की स्वर लहरी गूंज उठी.हम आखों का गम भूल कानों के सुख में डूब गये.जब होश आया तो ट्रक कहीं दूर जा चुका था.हम सोचते रह गये कि अपनी टार्च फैंक कर तेज रोशनी वाली लाइट ले लें या फिर ट्रक का इंतजार करें..??

    अभी तो फिलहाल इंतजार ही कर रहे हैं.

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  7. क्या बात है प्रमोद, विश्‍व संगीत दिवस पर आपकी और यूनुसजी ने संगीत की छटा बिखेर दी है. और वैसे आपने भी संगीत परोसा है वो तो एक अलग ही दूनियां मे ले जाता है. पर यूनुस जी के बारे मे भी कहना होगा कि अच्छी और पारदर्शी आवाज़ के मालिक हैं. आपलोग ब्लाग को अच्छे संगीत से सराबोर कर दे कि अगर कोई झांम चल रहा हो ब्लाग, आपके संगीत ्को सुनकर हम सब भूल जांय...

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  8. शशि सिंहJune 22, 2007 at 4:30 PM

    हालांकि रिवांइड -फार्वड की सुविधा ऑडियो-विडियो को आगापीछा करके देखने-सुनने का सुख देते हैं मगर लिखित शब्दों से बने किसी खास वाक्य को बार-बार पढ़ने का अपना ही मज़ा है।

    मुझे लगता है कि इन तीनों के मेल से ज्यादा गुल खिलेंगे या फिर शायद हम अपने मूड के हिसाब से इनमें से किसी एक को चुने और बारी-बारी से सब पर हाथ साफ करते चलें।

    देखते हैं और कितनी गलियां छाननी बाकी हैं...

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  9. प्रमोद जी
    आपके चढ़ाए ट्रैक तसल्‍ली से सुनने के लिए रख छोड़े थे ।
    चार्ली पार्कर वाली पहली रचना सुन रहा हूं । ओह क्‍या चीज लाए हैं आप । यूं लग रहा है जैसे पहली माथेरान के पहाड़ों पर हल्‍की हल्‍की आलापी फुहार पड़ी और फिर बारिश ने अपना द्रुत शुरू किया । अद्भुत है पहले कट में गिटार का प्रयोग
    दूसरा कट चल रहा है । ये सेक्‍सोफोन है, मुझे इस ध्‍वनि से खास प्रेम है । भारत में इसे बजाने वालों में दो ही नाम याद आते हैं मनोहारी सिंह और सुरेश यादव । वैसे मेरे पास फॉस्‍टो पपेटी के सेक्‍सोफोन वादन का एक प्राचीन कैसेट है । जो मैंने फोर्ट की गलियों से लिया था । हालांकि मैं नहीं जानता कि ये फॉस्‍टो पपेटी कौन हैं । कभी जानने की कोशिश भी नहीं की ।

    तीसरा कट ज्‍यादा अच्‍छा नहीं लगा । बंद कर दिया है । क्‍यूं । कह नहीं सकता । बस जम नहीं रहा है ।

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  10. यूनुस, आपकी देरी.. या हमारी बेक़रारी ने.. सारा संवाद वैसे भी गुड़गोबर कर दिया. परसों चढ़ाए सारे ट्रैक्‍स वैसे भी मैं कल बदल चुका हूं.. सो आप जिसे चार्ली बर्ड पारकर समझ रहे हैं, वह दरअसल सर्बियन गोरान ब्रेगोविच है.. दूसरे नंबर पर जनाब आकर बिल्‍क हैं.. तीसरा जो आपको जमा नहीं, वो केनी बरेल, वेस मोंटगोमरी आदियों का जमावड़ा है. चौथा डॉन पुलेन व पांचवा ट्रैक सवूर्ना स्‍टेवेनसन की स्‍कॉटिश धुन है.. इस उलट-फेर के लिए माफ़ कीजिएगा.

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