Saturday, June 23, 2007

सरलता के विरोध में..

आख़ि‍र लोग सरलता का इतना बाजा क्‍यों पीटते रहते हैं? सरल होना आसान है? रोज़मर्रा के आपके जीवन में सरलता है?.. शायद होगी, मेरे में नहीं है. उसके आग्रह में हम आह भी नहीं भरते. अनामदास सरल हैं? अनामदास के लिखने में एक सफ़ाई है, तरल लिखाई है, सरल नहीं है. रवीश सीधा-सरल लिखता दिखते हैं- मगर उस सीधाई में काफी टेढ़ापन छिपा है. अभय के यहां, कह सकते हैं, एक सरलता है, लेकिन वह मन की एक विशेष निर्मलता से हासिल हुई है, उन्‍हें हुई है इसका यह मतलब नहीं आपके-हमारे हिस्‍से भी इतनी सरलता से चली आएगी.. या चली ही आएगी!

हमारे और अरमान हैं. सरलता की निर्मलता को प्राप्‍त होना उसमें नहीं है. जीवन में कभी हमने थोड़ी-बहुत पेंटिंग की थी. लैंडस्‍कैप कभी पेंट किया हो ऐसा याद नहीं पड़ता. रंगों व आकृतियों में लोगों की घसर-पसर कैप्‍चर करने का आग्रह ज्‍यादा रहता था. लेखनी में भी वह परतदारपना खोजते रहते हैं. बात से बात से बात का ताना-बाना. कहानी में कहानी. फोरग्राउंड के साथ सिर्फ़ बैकग्राउंड ही नहीं, बियोंड विज़ि‍बल के भी इमेज़ेस, इम्‍प्रेशंस. राम खुश था, और बकरी घास चर रही थी जैसे वाक्‍य हमने कभी लिखे भी हों तो ऐसे वाक्‍यों से अमूमन अपना काम नहीं ही चलता. सतह पर जीवन की गतिविधियां सरल दिखती हों, जीवन अक्‍सर सरल नहीं होता. फिर उस जीवन की चर्चा वाली लिखाई में सरलता का इतना आग्रह क्‍यों?

सरल या तो महाज्ञानियों की बातें होती हैं या फिर पटरे पर चाय पिलानेवाले छोकरे की. दो कप या तीन? सादा कि स्‍पेशल? खुल्‍ला देना, साब, चिल्‍लर का बौत तंगी है!.. मैं- मेरे समझदार, सुधी पाठक- आपको दोनों में से किसी श्रेणी में नहीं रखता. आजकल बच्‍चे तक तो सीधे-सरल होते नहीं, फिर मैं तो अब बच्‍चा भी नहीं रहा! आप भी नहीं हैं.. फिर सरलता का आपका इतना आग्रह कहां तक जायज़ है भला?..

नीचे स्‍प्‍लैश कास्‍ट के नए ट्रैक्‍स पर एक नज़र मारी या नहीं?..

12 comments:

  1. इतनी सरलता बहुत है। इससे ज्यादा का क्या काम?

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  2. प्राचीन सरलता के आयामों से जड़ीभूत सृजनकर्म जीवन की संलिष्ट सच्चाईयों का रहस्योद्घाटन नहीं कर पाता, अत रचनाकार को अपनी अंतरंग मार्मिकताओं पर कार्मिकताओं पर केंद्रित करना चाहिए। सरलता की चार्मिकताएं भले कुछ समय के लिए पाठकों की वार्मिकता हासिल करा ले, पर उससे लेखक अपने अंतर्जगत के साथ न्याय करता हुआ प्रतीत नहीं होता।
    समझेजी, मतलब यह है कि सरलता की ऐसी तैसी जो मन आवे ठोंकिये। और रहा सवाल समझने का बहुत लोग चीनी भाषा भी नहीं समझते, तो क्या चीनी भाषा बेकार हो लेती है। नहीं ना।

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  3. जैसे-जैसे यथार्थ जटिल होता जाता है, अभिव्यक्तियां भी सरल नहीं रहतीं. ये बात सरलार्थियों को बार-बार समझाई जाती है. एमएस सुब्बुलक्ष्मी का गायन समझ में नहीं आया और हिमेश रेशमिया जैसे भी हों समझ में आते हैं. सवाल ये है कि आस्वाद के लिये मौजूद सामग्री में आप तलाश क्या रहे हैं. प्राकृतिक होने की मांग हमॆं हल्का और खुला भले बनाती हो, पहुंचाती तो वो वहीं है जहां हम पत्ते पहनकर घूमा करते थे. कहा जाता है कि अगर आपको अंग्रेज़ी की कोई भी स्टैडर्ड डिक्शनरी पूरी तरह कंठस्थ हो जाये तो भी आप अंर्स्ट फ़िशर की नेसेसिटी ऑफ आर्ट को नहीं समझ सकते, या मुक्तिबोध के लेखन को समझने के लिये 'आपको हिन्दी आती है' इतना ही पर्याप्त नहीं होता. तो क्या सुब्बुलक्ष्मी के गायन से लुत्फ़अंदोज़ होने के लिये आपको तमिल या संस्कृत सीख्ननी होगी? इब्बार रब्बी की कविताएं समझ में आ जाती हैं, तो क्या उन्हें उपरोक्त प्राकृतिकता के ख़ाने में डाल कर सरल नाम देना होगा? यह सच है कि एक सरलता भी होती है लेकिन उसमे 'हमारी सरलता' और 'उनकी सरलता' का संदर्भ गुंथा हुआ है. अगर आप ब्लॉग जगत की किसी मांग से आहत होकर इस प्रश्न को उठा रहे हैं, जो कि लगता है कि उठा रहे हैं- तो शायद इन मित्रों को थोडी बहुत ट्रेनिंग देना भी हमारी ज़िम्मेदारी है. आप पहले भी इनका चुनाव चिन्ह ओमप्रकाश शर्मा बता चुके हैं और इन्हीं की समझ को करेस्पॉंड करती हुई झूम बराबर झूम वग़ैरह बनती हैं और ये 'समझ में नहीं आई' नहीं कहते.
    आलोकधंवा की एक कविता भेज रहा हूं, अगर पात्रता न हो इसे भी समझ में नहीं आई कहा जा सकता है. बल्कि पात्रता अमूर्त हो गया कहना चाहता हूं कि अगर आप लुटेरों के बाज़ार के शोर का हिस्सा हों तो इसे समझेंगे कैसे?



    < नदियां >

    इच्छामती और मेघना
    महानंदा
    रावी और झेलम
    गंगा गोदावरी
    नर्मदा और घाघरा
    नाम लेते हुए भी तकलीफ़ होती है

    उनसे उतनी ही मुलाक़ात होती है
    जितनी वे रास्ते में आ जाती हैं

    और उस समय भी दिमाग़
    कितना कम पास जा पाता है
    दिमाग तो भरा रहता है
    लुटेरों के बाज़ार के शोर से.
    ---------------------------

    वैसे अगर ऎक्टिविस्ट होने की सारी यादें हम मिटा देना चाहें तो ये लोग ओम भूर्भुवः स्व गाते सुनते और अखंड ज्योति पढ्ते हुए बढ हे रहे हैं बाबा रामदास सरल बाते कहते ही हैं कुछ और कठिन बातें गोमेद या नीलम पहनने से 'समझ'में आ जाएंगी अगर माता रानी की कृपा रही.

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  4. वैसे इरफ़ान जी, ओमप्रकाश शर्माओं के फैन्‍स से ज्‍यादा यह थोड़ी लाइनें आपको ज्‍यादा सम्‍बोधित थी.. हमें अपनी 'दुर्बोधता' पर आपके शिकायतों की ख़बर होती रही है.. तो अचानक आपका यह पालाबदल हमें थोड़े ताजुब्‍ब में डाल रहा है..

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  5. आप ग़लत समझे या मैं ही जटिल हो गया होऊंगा, मुझे आपकी 'दुर्बोधताओं' से नहीं बल्कि आपकी उच्छृंखलताओं से शिकायत है जो कि रहेगी. मेरा खयाल है ये बबुआ-गुलाल बनने का दबाव इन्हीं ओमप्रकाशीय पाठकजगत से क़रीबी बनाने के लिये आपको अपनाना पड्ता है, वरना आप तो ऎसे न थे.

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  6. महत्वपूर्ण बहस है, अतीत में कई बार हो चुकी है, हर बार बेनतीजा रही है, लेकिन इसे पढ़ना या इसमें किसी तरह शामिल होना हर बार अच्छा ही रहा है। अपने यहां विष्णु खरे और गोरख पांडे के बीच सरलता-जटिलता को लेकर चली बहस का उद्धरण अक्सर दिया जाता है, जिसमें विष्णु जी ने 'जटिलता के पक्ष में'और गोरख जी ने 'सरलता के पक्ष में' लिखा था। पूरे ब्योरे याद नहीं हैं लेकिन विष्णु खरे ने शायद सरलता के अतिशय आग्रह की आलोचना की थी, जिसके चलते रचनाकार कठिन स्थितियों का सामना करने की रचनात्मक चुनौती से कतराने लगते हैं। गोरख जी के जवाब में सारा जोर आम जनता पर था, जिसे साहित्य-संस्कृति से दूर रखने की साजिश जैसा कुछ उन्हें विष्णु खरे की प्रस्थापना में दिखाई पड़ा था। बाद में हम लोगों ने जनमत टीम के भीतर इसपर जो महीन कताई की थी, उसका अलिखित नतीजा यह निकला था कि सरलता और जटिलता को रूपगत समस्या के रूप में न लिया जाए। यानी बहुत मामूली चीज को भी जलेबी की तरह उलझाकर पेश किया जा सकता है- जैसा आग्रह कुछ साहित्यिक उपधाराओं में देखा भी जाता है- लेकिन इसे जीवन की जटिलता का प्रतिबिंबन कौन मानेगा? इसके विपरीत जटिल कथावस्तु को भी पकी समझ वाले लोग सरल अभिव्यक्तियों में ढाल देते हैं, लेकिन उन्हें सरलतावादी करार देकर उनपर उंगली उठाना गलत होगा। हम लोग, यानी रामजी राय, महेश्वर और उनके साथ लगे-बझे मैं और इरफान इस नतीजे पर पहुंचे थे कि असली चुनौती जीवन और यथार्थ के मुश्किल पहलुओं को समझने और उन्हें सरल से सरल रूप में ढालने की है, फिर चाहे यह सरलता के पक्ष में जाए या जटिलता के पक्ष में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तब से अबतक इस बारे में मेरी समझ सिर्फ इतनी बदली है कि कलात्मक जगत में रचना ही समझना है, और इससे इतर समझ की कोई भी परिभाषा बनाकर कोई चले तो कम से कम कला के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है। जहां तक इस मामले में इरफान और प्रमोद भाई के बीच शुरू हुई अवांतर बहस की बात है तो इसके संदर्भ अभी मेरी समझ में नहीं आ रहे हैं। रामजीत के किस्सों और संस्मरणों में खींचे गए शब्द चित्र मुझे भाषा की दुनिया में अनजाने इलाकों तक पहुंचने की जद्दोजहद मालूम पड़ते हैं। लोकप्रियतावाद के दबाव में अगर यह सब करना इतना ही आसान होता तो दुनिया आज ऐसी चीजों से भरी होती। हकीकतन ऐसा नहीं है और इस तरह का लेखन मनोहर श्याम जोशी के बाद हिंदी में सिर्फ और सिर्फ प्रमोद सिंह ही कर रहे हैं। हां, अगर यही प्रमोद सिंह का साध्य बन गया, भाषा की यह दुर्गम यात्रा उन्हें किसी बड़ी रचना में यथार्थ के ज्यादा गहरे पहलुओं तक पहुंचा पाने में असमर्थ रही तो इसपर मुझे अफसोस होगा।

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  7. आपकी बहस तो अच्छी चल रही है..थोड़ा संदर्भ बदल कर बात करें.तो क्या कभी आपने अपने क्रिकेट खिलाड़ी युवराज को फ़ील्डिग करते देखा है. उनके बारे मे एक खास बात बताऊ वो एक ऐसा खिलाड़ी हैजो आसान कैच भी कठिन बना के लेता हैऔर वहीं साउथ अफ़्रिका के जोन्टी रोड्स एक फ़ीलडर थे जो कठिन से कठिन कैच को वो आसान बना देते थे..अब आपकी समझ पर भी निर्भर करता है कि किसी भी खेल को आप समझना चाहते हैं या नही.अगर समझना चाहते है तो कठिन क्या और आसान क्या अंग्रेज़ी समझना चाहते है तो डिक्शनरी ले के बैठते हैं कि नही..

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  8. मिसेज पाल कहां हैं आजकल। बहुत दिनों हुए मुलाकात नहीं हुई।
    आलोक पुराणिक

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  9. भई आलोक, ज़रा मिसेज़ पॉल के जीवन के फ़ोन बिल्‍स का अंधेरा तो छंट जाए पहले..?

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  10. फ्रांसीसी कवि स्टेफ़ने मलारमे से मार्शल प्रॉस्ट (विशुद्ध नेमड्रॉपिंग, मैंने दोनों को ही ख़ास नहीं पढ़ा) ने इस बात का शिकवा किया कि उनकी कविताएँ बहुत जटिल होती हैं तो मलारमे ने लिखा कि अगर आपको आसान चीज़ें पढ़नी हैं तो अख़बार क्यों नहीं पढ़ते. :)

    बहरहाल, चर्चा रुचिकर है, जारी रखें.

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  11. V9 ! आपने अख़बार पढ्ने की बात अच्छी उठाई. किसी से पूछा गया आपको कौन सी बुक सबसे अच्छी लगती है? जवाब मिला चेक बुक.

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  12. कोई कहता है बड़ी मुश्किल है

    सरल

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