Monday, June 25, 2007

सिलुएट राइटिंग से एक साक्षात्‍कार..

एक मित्र ने नए-नए परिचय के स्‍नेह में हमें ज़मीन से उठाकर फुट भर ऊपर खड़ा कर दिया. हाथ पर तारीफ़ की मीठी गोलियां धरने लगे. हम हें-हें करके न सिर्फ़ उन्‍हें लेते रहे, उत्‍साह में आत्‍मा व जीभ के नीचे दाबे प्रेम से चुभलाने भी लगे. प्रत्‍यक्षा की तरह ऊबकाई में कुछ भी नहीं उगला. एक शब्‍द तक नहीं. मित्र ने भावुक होकर कहना शुरू किया हमारे लिखे में उन्‍हें सिलुएट राइटिंग की छायाएं दिख रही हैं. दो-तीन समशिल्‍पी बड़ी हस्तियों का नेम ड्रॉप करके मुझे आहिस्‍ता-आहिस्‍ता मीठी छुरी से ज़ि‍बह करते रहे. मैं गरदन आगे बढ़ाकर होता भी रहा. ओह्, इसी को मीठी मौत मरना कहते हैं?

इसके बाद मित्र अपने व्‍यस्‍त जीवन के काम-धाम में लौट गए. बझ गए. बिना काम का मैं- ख़ामख्‍वाह की उलझन में उलझा, उलझता रहा. बुनने की बजाय बस उधड़ता, और उधड़ता रहा. सिलुएट राइटिंग! कैन दैट बी ट्रू? एम आई रीयली सम लकी वन?..

तेज़ रोशनी में भी आंखों के आगे छायाओं के परदे तनने लगे. बंबई के गड्ढे और संजय दत्‍त, सलमानों की ज़बान भूल- मैं दिल्‍ली की बरसाती के दरवाज़े पर ताला चढ़ाकर जाने कब पहाड़ों की ओर निकल गया. मिस अनीता की संगत में कितनी सारी शेरी पी डाली, पुराने धूल चढ़े अलबम की काली-सफ़ेद तस्‍वीरें देखता रहा.

शाम की कुहरीली ख़ामोशी में फ़ायरप्‍लेस में हाथ तापते हुए मेजर नय्यर ने आगे झुक कर लोहे की छड़ी से आंच हिंड़ोरा, फिर असहज, कांपते स्‍वर में बोले- मौजूदा सभ्‍यता के बारे में आप क्‍या सोचते हैं? शायद मिस अनीता तब फिफ्थ स्‍टैंडर्ड में रही होंगी, तभी का वह पीला पड़ रहा फ़ोटो था जिसे देखते हुए मेरे होंठों पर एक फीक़ी मुस्‍कान फैल गई थी. थोड़ी ग्‍लानि हुई कि मैं मेजर की बातों पर ध्‍यान नहीं दे रहा था. आवाज़ में बेवजह की चहक भर मैंने मेजर से सवाल किया- डिड यू से एनीथिंग, सर?..

लेदर की पुरानी, कोनों पर कटती पेटी में ज्‍यादा सामान नहीं था. पेंग्विन का एक पुराना शॉपनआवर के लेखों का संकलन होगा, दद्दा की लिखी कुछ पुरानी कविताएं थीं जिन्‍हें वह जला देना चाहते थे, मगर मैं चुराकर अपने साथ लिए आया था. सस्‍ते होटल के वॉल पेपर को देखकर जब बेचैनी होने लगी तो मैं दरवाज़ा भेंड़कर बाहर निकल आया. कॉरीडोर में एक बुज़ूर्ग कपल हाथ में हाथ लिए, आपस में फुसफुसाता मेरी बगल से गुजरा. शायद औरत बाख़ की फिफ़्थ सिम्‍फ़नी की प्रशंसा में अपनी राय रख रही थी. इतने अकेलेपन में भी ढलती उम्र के दुलार ने मुझे जैसे हल्‍का कर दिया.

कॉर्डरॉय का जैकेट, पैरों में पुराना कैनवस जूता डाटे- व एक झीनी उदासी में नहाये आत्‍मा को जेब में छिपाये मैं प्राग, पैरिस या लंदन के किसी सस्‍ते बार के स्‍टूल पर बैठा हुआ था. बाहर जाने कब से बारिश हो रही थी. धुंध में छायाएं गुजरतीं और फिर सब कहीं एक सन्‍नाटा पसर जाता. बार में सात-आठ लोग थे मगर कोई किसी से बात नहीं कर रहा था. दसेक वर्ष पहले किसी सूने दोपहर देखी अंतोनियोनी की एक फि‍ल्‍म की याद हो आई. ला नोत्‍ते, शायद यही नाम था. हवा में घूंसा चलाते, एक-दूसरे को चींथते लोग. आनेवाले वर्षों में हमारी सभ्‍यता किधर का रुख करेगी, सोचना सचमुच तक़लीफ़देह है. वेट्रेस हाइनेकर का मग लिए सामने थी, मैंने अधमुंदी आंखों से उसका शुक्रिया अदा किया और बीयर के झाग में अपने दुखों को भूलने की कोशिश करने लगा. इतना सारा लिखने के बावजूद ये कैसा असंतोष है जो अंदर ही अंदर कुछ तोड़ता रहता है! एक लेखक आखिर अपनी कलम से क्‍या, कैसी अपेक्षाएं करता है? कितना जायज़ होती हैं उसके अंतर्मन की निष्‍पाप कामनाएं?..

कितनी सारी तो छायाएं थीं. कुछ ख़ामोशी से हवा में तैरती मेरे हाथ की उंगलियों पर आकर पसर गई थीं. मैं रेस्‍टलेस होने लगा, मानो छायाएं नहीं, मक्खियां हों.. और ज्‍यादा देर तक बैठा रहा तो कान और नाक पर भी आकर बैठने लगेंगी. और क्‍या मालूम तब वह मक्खियां न रहें, बालदार चूहों में बदल जाएं! मैं घबराकर खड़ा हो गया.

सिलुएट राइटिंग के लेखक को वहीं स्‍टूल पर गिलास (और मन) खाली करता छोड़ मैं मित्र की खोज में बाहर निकल आया. काफ़ी देर तक उनका नंबर आजमाता रहा. मगर शायद वह मेरी खीझ और झुंझलाहट ताड़ गए थे.. बार-बार की हमारी कोशिश के थोड़ी देर बाद बंदे ने अपना फ़ोन स्विच ऑफ़ कर दिया था!

5 comments:

  1. कहाँ ले जाकर मारा है, पेरिस या प्राग. चीड़ों पर चाँदनी में निर्मल वर्मा चेक होस्पोदा यानी पबों का सुंदर चित्रण करते हैं, बियर की झाग और मन में बुलबले भरी उदासी का भी. मित्र वहीं है, सात-आठ की भीड़ में, लगता है आपने बियर जल्दी जल्दी में थोड़ी ज्यादा पी ली इसलिए दिख नहीं रहा.

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  2. द नेम ड्रोपर के बाद आप के इस लेख का क्या मतलब है जिसमें आप ने खुद तमाम सारे नेम चुआ डाले?

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  3. किस किस दुनिया में ले जाते हैं आप.. बहुत सहज सरल दुनिया तो नहीं ही है.. और इसका चित्रण भी सहज सरल नहीं.. अपने समय की मुश्किलों का सामना करते हुए कठिन अनुभूतियों का अच्छा विवरण..

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  4. चूहों को भगा दीजिये तो निर्मल बाबू की आत्मा भी धन्य धन्य हो रही होगी । वैसे चीडों पर चाँदनी अभी पढ ही रही हूँ तो अनामदास जी की बात भी सत्यवचन लग रही है ।

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