Tuesday, June 26, 2007

किताबों का मर्सिया..

काली-सफ़ेद तस्‍वीरों से भरी एक महंगी किताब हाथ लगी है, उसी में खोया हुआ हूं. तस्‍वीरों वाली किताब के साथ फ़ायदा है कि उसमें तॉल्‍सतॉय और दॉस्‍तोव्‍स्‍की के पोथों की तरह हफ़्तों सिर नहीं मारना पड़ता. मन की बहक में जब जिधर से चाहें उलट-पुलट लें, विशेष फर्क़ नहीं पड़ता, और लोगों के देखने के साथ-साथ, मैं भी सुखी रहता हूं कि किताबों की संगत बनी हुई है.

पोस्‍ट-ग्‍लोबलाइज़्ड फेज़ में यह एक संकट तो है. कम से कम मैं तो महसूस करता ही हूं. बचपन, समाज का जो एक बोध प्री-ग्‍लोबलाइज़्ड दौर में हम चालीस-पार लोग लेकर बड़े हुए थे, उसे पोस्‍ट-ग्‍लोबलाइज़ेशन ने अपनी जगमग की चकमक में जैसे बेमतलब व हास्‍यास्‍पद बना दिया है. उसमें दूसरी ढेरों चीज़ों के अर्थहीन हो जाने की तरह एक भय यह भी है कि किताबों का अंतरंग आस्‍वाद छिन जाएगा. संभवत: उनकी संख्‍या बढ़ती रहे, पैकेजिंग, मार्केटिंग में नाटकीय इजाफ़ा हो; ढेरों लल्‍लू-टल्‍लुओं के लिए घर बैठे प्रकाशन खोलकर कंप्‍यूटर से किताब छाप लेना तक सहज-सुगम हो जाए- लेकिन अच्‍छी शराब की तरह किताबें जैसे पहले हमारी आत्‍मा में ताप भर देती थीं, अंतर्लोक को भव्‍यता में नहला डालती थीं, वह प्रभावी, ओवरह्वेल्मिंग एफ़ेक्‍ट किताबों की दुनिया से जैसे- लगता है, लुट गया है. बड़े से बड़ा लेखक भी आत्‍मविश्‍वास से अब यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी किताब महीनों लोगों का दिमाग जकड़े रही, उनके अवचेतन में तैरती रही. प्री-ग्‍लोबलाइज़्ड फेज़ की तरह अब अवचेतन को फ़ुरसत ही नहीं. दो हफ़्ते पुरानी फ़िल्म के पोस्टर बरसों से देखे जा रहे बासीपने में बदल जाते हैं. गाने ठीक से मुँह पर चढ़ते नहीं कि आलरेडी फ़ीके पड़ने लगते हैं. किताबों के बारे में सुन कर याद आता है कि हाँ, शायद हमने भी पढ़ा है. एक बड़ा-सा कारखाना है जो लगातार 'माल' फेंकता रहता है और विस्मृति उसे लीलती रहती है.

कहीं भी, और किसी में रमने-धंसने का उसे अवकाश नहीं. छवियों व इम्‍प्रेशंस की बीहड़ बहुलता में डिस्‍ट्रैक्‍शन ही उसका प्रभावी सुर है. सहेजकर हाथ में धरी तस्‍वीरों की आकर्षक किताब भी थोड़े समय में मन में अस्थिरता जगाने लगाती है. ठीक है, अच्‍छा है, देख लिए, अब? अब की अस्थिरता एक कंटिनुअस फांस है. मन एकाग्रचित्‍त होने की बजाय हर घड़ी दायें-बायें होता रहता है!

कार, लोन, बैंक, क्रेडिट कार्ड्स, घर व समाज की मांगों के बाह्य दबाव नहीं हैं जो मन का दुचित्‍तापन बुनते-गढ़ते रहते हैं. नहीं. सबसे ज्‍यादा वह खुद के भीतर खुद का डिसप्‍लेसमेंट है. खुद से अलगाव है. हमारी आत्‍मा में बाज़ार का धावा और वस्‍तुवाद की घेरेबंदी का चरम है.

काली-सफ़ेद तस्‍वीरों से भरी महंगी किताब देखते-पलटते अब मन उकता गया है. मन अब फिर कुछ नया चाहता है. कुछ भी. इस पोस्‍ट-ग्‍लोबलाइज़्ड दौर में बस उसका नया होना ही उसके अनोखेपन की गारंटी हो चलेगा. नहीं?..

आप इन दिनों क्‍या नया ट्राई कर रहे हैं?..

4 comments:

  1. किताबों के साथ बहुत बड़ी समस्या है..पढ़ते समय ऎसा अहसास देती है कि ये हमारी जिन्दगी और उसके आसपास की ही एक छवि है ..लेकिन समय की बहती धार में ...विस्मृति के आलोक में वह छवि धुल सी जाती है...फिर कभी वही पन्ने पलटाओ तो फिर सब नया सा लगता है..अब इस उलझन भरी दुनिया में क्या नया ट्राई करें ..सूचना के ओवरलोड ने किताबों के पढ़ने के रस को अब खतम कर दिया ..क्या करें...?? आपका मर्सिया भी वही कहानी है...

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  2. किताबों पर सोचते-लिखते हुए आप हमेशा उस बच्चे की तरह................लेकिन यह भी देखा जा............की.......ज़रूरत...............कराना.........भूलते रहते.......क्या यही सब के लिये.........कैसे-कैसे जतन करने के बाद एक किताब हाथ आई थी और दो पेज पढ्ते ही वरुण आ गया उसने जब देखा कि यह तो.............इसीलिये कोई अगर यह समझ्ता है कि अम...........

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  3. लगता है आपने बडे दिनों से कोई अच्छी किताब नही पढी , दो किताबें पढिये एक " संतरों वाली लड़की " और " धुल भरी जिन्दगी" फिर आपकी राय शायद बदल जाये

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  4. आप इन दिनों क्‍या नया ट्राई कर रहे हैं?..

    --यह प्रश्न अब कहाँ वेलिड रह गया. अब तो ऐसा हुआ कि आज क्या नया ट्राई कर रहे हैं. :)

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