Wednesday, June 27, 2007

नया ज्ञानोदय की चिरकुटइयों के पक्ष में..

हिन्‍दी की एक राष्‍ट्रीय स्‍तर की पत्रिका है? नहीं है. जो हैं (दरअसल दो हैं) अंग्रेज़ी से अनुदित हैं, ख़बर पत्रिका हैं, और उनका हिन्‍दी के मनोलोक से बहुत सम्‍बन्‍ध नहीं है. अख़बारों का प्रसार बढ़ा है, बिक्री बढ़ी है (स्‍तरीयता नहीं बढ़ी है. मगर वह हिन्‍दी अख़बारों की गंभीर चिंता का शायद कभी विषय भी नहीं रहा!). पत्रिकाएं नहीं बढ़ी हैं. न जितनी थीं उससे बड़ी हुई हैं. हिन्‍दी की अपनी नाम गिनाने लायक ख़बर-विश्‍लेषण पत्रिका एक भी नहीं है. जो हैं, साहित्यिक हैं, और ज़ि‍न्‍दा बची हैं इसी में मुदित, मुग्‍ध व चकित होती रहती हैं कि क्‍या तो मैदान मार लिया. हर कोई अपनी पीठ ठोंक रहा है. बहुत अच्‍छी तस्‍वीर नहीं है. लेकिन ऐसी नयी भी नहीं है. पिछले बीसेक वर्ष में हिन्‍दी नीचे गई है, गर्व से अपनी उपलब्धियां गिनाए, इस पर गिनाने को शायद उसके पास एक भी चीज़ न होगी. एक बड़ी व क्रूर सच्‍चाई यह है कि आज़ादी के बाद, रधुवीर सहाय के संपादन में ‘दिनमान’ से अलग उसके स्‍तर का, पत्रकारिता का वैसा कीर्तिमान स्‍थापित करनेवाला हिन्‍दी के पास एक भी दूसरा पत्र नहीं.

पत्रकारिता से बाहर पुस्‍तकों की दुनिया में क्‍या नज़ारा है? जिन प्रकाशनों के शीर्षकों की थोड़ी शाख व इज़्ज़त थी- लोकभारती, राधाकृष्‍ण, राजकमल- अब सब एक परिवार के एकाधिकार में हैं, और पहले कब क्‍या छपा था के मोह व आह्लाद से बाहर आकर आज की वास्‍तविकता देखें तो जैसे टाइटल्‍स वहां छप रहे हैं, शर्म का विषय ज्‍यादा है, गर्व का कम. हिन्‍दी किताबों के विक्रेता सुखी व्‍यवसायी नहीं हैं. हिन्‍दी किताबें पाठकों के खरीद के आसरे प्रकाशकों के घर पैसे नहीं ला रहीं. नहीं, हिन्‍दी किताबों की खरीद-फ़रोख्‍त एक निहायत अमूर्तन के संसार में घटित होता है. सरकारी व पुस्‍तकालयों वाली खरीद में सेटिंग, जोड़-तोड़ आदि-इत्‍यादि के बाद भी पुस्‍तकों की छपाई संख्‍या है कितनी? हिन्‍दी का एक चर्चित व चर्चा में ‘बेस्‍टसेलर’ कितना छपता है? पांच हज़ार, छह हज़ार- आठ हज़ार? मैक्सिमम! यह है हिन्‍दी के बेस्‍टसेलर की सच्‍चाई. कविताओं की किताब दो हज़ार निकल गई तो कवि अपने को धन्‍य समझे.

इससे बाहर के संसार की क्‍या ख़बर है? लघु पत्रिकाओं की गुरिल्‍ला गतिविधियां हैं. एक हज़ार से पांच हज़ार वाले खेल हैं. ढेरों बंद होती रहती हैं, तो ढेरों शुरू भी हो जाती हैं. अंबेदकर व ग्‍लोबल-वॉर्मिंग पर रायपुर की पत्रिका में भले विमर्श न हो रहा हो, कविताओं व कहानियों का जगर-मगर गुलज़ार बना रहता है. बेगुसराय के कवि को कटिहार का पाठक जान लेता है, और गुना के कहानीकार को मुगलसराय की पाठिका पत्र लिखकर सूचित करती है कि कैसे वह उनकी रचना पढ़कर परम-चरम धन्‍य हुई!

इन लघुतम उद्यमों से ज़रा और ऊपर, थोड़ा ज्‍यादा प्रसार संख्‍या वाली दुनिया की तस्‍वीर गढ़ती ‘वागर्थ’, ‘तद्भव', ‘हंस’, ‘कथादेश’ और ‘नया ज्ञानोदय’ टाइप पत्रिकाएं हैं (ज्ञानरंजन का ‘पहल’ अलग परिस्थितियों में पैदा हुआ, व अपवाद है). साहित्यिक सुरापान किए भाई-बहिनी लोग जिसकी चर्चा से विशेष लड़ि‍याते रहते हैं. मैं पूछता हूं बहुत सर्कुलेशन है इनका? कितना सर्कुलेशन है? पच्‍चीस हज़ार? पचास हज़ार? एक लाख? शायद इनमें एक भी ऐसी पत्रिका नहीं जो इतनी संख्‍या में वितरित व बिक रही होगी! क्‍यों है ऐसा? चालीस करोड़ से ऊपर की आबादी वाले हिन्‍दी भाषी भूगोल में एक लाख की लघु साहित्यिकता पचाने का बूता नहीं?

नहीं है. वह माल ‘मनोहर कहानियां’, ‘सत्‍यकथा’, ‘सरिता’, ‘मुक्‍ता’ के प्रकाशक खा रहे हैं. हिन्‍दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के हिस्‍से वह नहीं आने वाला. क्‍यों नहीं आने वाला? क्‍योंकि इस तथाकथिक साहित्‍य का अपने समाज से कोई जीवंत संवाद नहीं. यह संवाद ज़माने से टूटा व छूटा हुआ है. वह संवाद कैसे बने या उसके बनने में क्‍या रूकावटें हैं इसकी कोई बड़ी व्‍यापक चिंता हिन्‍दी की सार्वजनिकता में दिखती है? नहीं, चार किताब छपवाये व तीन पुरस्‍कार पाये साहित्यिकगण अपने-अपने लघु संसार में सुखी, कृतार्थ जीवन जीते रहते हैं! जो सुखी नहीं हैं, वे इन सवालों की चिंता में नहीं, पुरस्‍कार न पाने के दुख में दुखी हो रहे हैं. सपना भी समाज नहीं, आनेवाले वर्षों में पुरस्‍कार पाकर धन्‍य हो लेने की वह अकुलाहट ही है.

तो यह तो है हिन्‍दी का सुहाना साहित्यिक संसार. अब मुझे ताजुब्‍ब इस बात पर होता है कि अगर कोई पत्रिका इस निहायत, उबाऊ परिदृश्‍य में थोड़ा रंग भरने, दो हज़ार और पाठक बटोरने के लिए- चिरकुटई के चार काम करे तो अचानक इस दुनिया में ऐसी हाय-तौबा क्‍यों मचने लगती है? कि ओह, ये क्‍या हो गया.. न पहले कभी देखा न सुना! जनाब, सच्‍चाई तो यह है कि आपने कुछ देखा ही नहीं है! देखने व पढ़ने और पाठ के आपके संस्‍कार ही नहीं हैं! बनी-बनायी परिपाटी व लीक से कोई चीज़ ज़रा-सी अलग हुई कि आपको पैर के नीचे गड्ढा व सिर्फ़ गड्ढा ही दिखता रहता है! हद है! महाराज, किसने कहा कि यह शास्‍त्रीय संगीत की बैठक है और सब वही राग गाएंगे जैसा आज तक राग के नाम पर आप समझते रहे थे? अलग गाना शुरू किए तो क्‍या करेंगे, अछूत घोषित कर देंगे? कमाल है, भई? आपको नहीं जमता तो आप रहिए महफ़ि‍ल से बाहर, जबरजस्‍ती नहीं है. महफ़ि‍ल रद्दी हुई तो यूं भी कुछ वक़्त के बाद लोग हाथ-फाथ झाड़ के उसे बेमतलब बना देंगे. लेकिन नहीं, गांव में कोई साइकिल चली आई तो आपका बताना ज़रूरी है कि साइकिल हो तो एटलस व हर्क्‍यूलिस ही हो.. बाकी की कोई है तो ज़रूर गड़बड़ी के उदेश्‍य से लाई गई है! माहौल गंदा करेगी! गांव का तौर-तरीका बिगाड़ देगी!

भर्र-भर्र की ज़ि‍रह चलने लगेगी कि नवलेखन ये अच्‍छा वाला है, सौदेश्‍य है, और वो वाला जो है वह तो सिर्फ़ अदा है. मैं तो कहता हूं, भइया, सब चिरकुट है, दो कौड़ी का है. आपके बिलासपुर व बेगुसराय से बाहर उसका कोई पुछवैया नहीं. बीस साल बाद तक भी आपका यह हिन्‍दी साहित्‍य बचा रहा तो देखिएगा, आपका नवलेखन आपको किस नाली में पड़ा मिलेगा!

इतना लहकने की ज़रूरत नहीं है. हिन्‍दी के इस अवसादी समय में कोई अगर थोड़ा बहकने को मचल रहा है तो बहक जाने दीजिए. कुछ पाठक बढ़ेंगे, हिन्‍दी का भला ही होगा. आपसे नहीं हो रहा. आज़ादी के बाद इतनी लंबी अवधि की आपकी साहित्‍यक अदाओं में नहीं ही हुआ. तो जिनसे, जिस-जिस तरह से- उल्‍टे-सीधे, नष्‍ट-भ्रष्‍ट जिन-जिन तरीकों से हो सकता है, हिन्‍दी की गाड़ी आगे चलने दीजिए. लंगी मत लगाइए.

मोहल्‍ले पर नया ज्ञानोदय विवाद के नाम पर छपी टिप्‍पणियों की प्रतिक्रिया में.

(ऊपर की तस्‍वीर रेडियोवाणी ब्‍लॉग से साभार)

7 comments:

  1. अज़दक भइया ऊपर की सब बातें सही हैं । पर कुछ से अपन सहमत नहीं । अगर आपको लगता है कि इन चिरकुटईयों से वाक़ई कुछ पाठक संख्‍या बढ़ जाएगी तो ये खुशफ़हमी है । ऐसा नहीं होने वाला । सच तो ये है कि आज हिंदी की ज्‍यादातर लघु पत्रिकाएं उन लोगों से चल रही हैं जो उनमें लिखते हैं । वही पांच सात हज़ार लोग जो बदल बदल कर सारी पत्रिकाओं में छपते रहते हैं । यही है हमारी साहित्यिक प्रगति । बीच में एकाध बुलबुला आता है जो समय के साथ पिचक जाता है । याद रखिए वक्‍त आने पर तो मनोहर कहानियां भी बंद हो जाती हैं । राजेंद्र यादव, ज्ञानरंजन और हरिनारायण के बाद क्‍या होगा उनकी पत्रिकाओं का । तथाकथित संपादक मंडल उसे चला पायेंगे उसी आबोताब के साथ । और संस्‍थानों की पत्रिकाओं का क्‍या होता है, ये हम और आप सभी जानते हैं । रवींद्र कालिया से पहले की और बाद की वागर्थ ही इसकी मिसाल है ।
    बॉटमलाइन---मैं हिंदी में बेस्‍ट सेलर पुस्‍तक और पत्रिका के ना होने की निराशा से भरा हूं । कल ही तो आपने छपे हुए शब्‍दों के संकट की बात कही थी ना, वो संकट शुरू हो चुका है । हम आजकल निर्मल वर्मा का ‘अंतिम अरण्‍य’ ट्राई कर रहे हैं । और वो घिसट घिसट के चल रहा है । पूरा हो पायेगा उम्‍मीद कम है ।

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  2. बहुत सही,पर कादम्बिनी का नाम भुल गये आप

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  3. जब से ये विवाद शुरु हुआ है तब से हम यही समझने की कोशिश में लगे रहे कि आखिर विवाद क्या है.. शायद ये वैसे ही होगा जैसे कि कोई नया व्यक्ति नारद विवाद के बीच में कूदे जबकि कोई राहुल का नाम भी न ले रहा हो.. ऐसी ही कुछ फटेहाल हालत में हमने स्वयं को पाया जब भी मोहल्ले पर छपे ऐसे किसी लेख का सर पैर समझने की कोशिश की.. भाई बोधि से पूछा उन्होने कुछ बताया.. कुछ समझा और कुछ नहीं.. फिर आज अविनाश और आपकी बातचीत देखी मोहल्ले पर.. फिर आप के कहने पर कुमार मुकुल का लेख पढ़ा..
    उसमें कुछ ऐसा भान हुआ कि संपादक महोदय अपने लेखकों का कुछ सनसनी खेज परिचय छाप रहे थे जिस पर भाई लोग नाराज़ हैं.. मेरा खयाल सिर्फ़ इतना सा है कि अगर उस परिचय में लेखक की भी रजामंदी है तो किसी को कोई आपत्ति क्यों होनी चाहिये.. और अगर लेखक दुखी है कि मेरे बारे में ये क्या छाप दिया सम्पादक जी.. ? तो ये सम्पादक का हरामीपना है (सम्पादक जी जिस आज़ादी का इस्तेमाल करते हुए अपने लेखक के बारे में जो मन चाहे छाप रहे हैं, मैं भी उसी प्रकार की अपनी आज़ादी का इस्तेमाल करते हुए भाषा को लोकप्रियता के दायरे में ला रहा हूँ, रवीन्द्र जी के समर्थक और यदि वे खुद पढ़े तो अन्यथा न लेंगे इस उम्मीद के साथ)
    बाकी सब हिन्दी की खलिहर दुनिया लट्ठमलट्ठा है.. बेबात का.. जब कि और भी ग़म है ज़माने में..

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  4. बहुत खूब। इस बात इंकार नहीं कि ठहरने का मतलब पीछे जाना है। कुमार मुकुल ने सिर्फ परिचय पचीसी की दास्तान लिखी थी। क्या आप शशिभूषण द्विवेदी से मिले हैं? अगर नहीं तो पहले उनसे मिलिए, फिर ज्ञानोदय में छपे उनके परिचय को सही बताइए। अगर तब भी आप उसे सही कहते हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना। जहां तक ओन बार वाले ससुर की जरूरत का सवाल है तो इसके सहायक संपादक और उसके मंडली के बारे में पता कीजिए। जितने भी पीने वाले लोग हैं, उन सबको ओन बार वाले ससुर की जरूरत है। हुर्रे, यह तीन महीने बाद आई होली है।
    इस पत्रिका में छपे परिचयों पर आपत्ति के बारे में सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि लगभग सभी से संपर्क करने की कोशिश की गई और दो या तीन लेखकों को छोड़ कर सबने निजी बातचीत में आपत्ति जताई।
    फिर मोहल्ले की एक टिप्पणी का हवाला दूं तो क्या उस महोदय के परिचय में यह भी छापा जाना चाहिए था कि वे मुसलमानों को कटुआ कह कर पुकारते हैं और उसके लिए उनकी मरम्मत हो चुकी है। हममें से कई लोगों की निजी जिंदगी की परतें पाखानों से भरी हैं जनाब। लेकिन बहुत सारे लोग अपने धवल चेहरे के साथ सम्मानित किए जा रहे हैं।
    प्रमोद जी कह कहना है कि कुमार मुकुल ने महज तालियां बटोरने के लिए ज्ञानोदय के परिचय पचीसी पर लिखा। तो क्यों ऐसा हुआ है कि कुमार मुकुल ने सिर्फ परिचयों पर एक समीक्षा लिखी थी और उसके बाद फोन पर उन्हें धमकी और गालियों का सिलसिला शुरू हो गया? क्या यह इसी सनसनीखेज और नई हिंदी की असलियत है?
    संस्कृतनिष्ठता, शुद्धता और शुचिता ने हिंदी की हत्या की थी, लेकिन अगर उसके बरक्स गालियों की हिंदी बननी है तो यकीन मानिए कि जिन बड़े साहित्यकारों का नाम जप कर हम खुद को महान बनाते फिर रहे हैं, हममें से ज्यादातर लोग उस लायक भी नहीं रह पाएंगे।
    नएपन का मतलब अगर नंगापन है तो लौटिए सभ्यता की शुरुआत की ओर। वहां आपको सबसे ज्यादा नयापन मिलेगा।

    अरविंद शेष.

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  5. बिल्कुल सही कहा अभय जी ने

    अरविंद

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  6. बढ़िया विश्लेषण है। कल कुछ ऐसे ही ख़्यालात मेरे दिमाग़ में भी तैर रहे थी। शायद ग़लती से आपके दिमाग़ से कोई कनेक्शन स्थापित हो गया था।

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  7. 'यहां हिन्दी बोलने पर जुर्माना है जी !स्कूलों का यह हाल है तो प्रगति क्या खाक होगी ?हिन्दीवाले कब सुधरेन्गे !

    http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/06/blog-post_27.html

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