Friday, June 29, 2007

छाते से बाहर आदमी..

बारिश के धुंधले अंधेरे में एक कमज़ोर को घेरकर छाता छीन लेना बायें हाथ का खेल होता. यूं भी तापस मइती चुहल और हरामीपने के पुराने खिलाड़ी थे. यही सोचकर वह बांस की गिल्लियों पर टंगे तिरपाल, काली पोलिथीन के आड़े-तिरछे मकड़जाल से बाहर गली के छप्‍प-छप्‍प के नंगेपने में कूदे आए. देह पर कांटों-सी बरसतीं बूंदों की चोट की ज़द में आते ही तापस ने जाना उनसे गलती हो गई है. छातेवाला कमज़ोर नहीं था. उससे बढ़कर गली अकेले की जगह छातेवालों से टपटपाती गंजी पड़ी थी. बारिश के कुहरीलेपन में एक छातेवाला दूसरे से छाता बचाता लयबद्ध क्रम में आ-जा रहे थे. धुंधला अंधियारा ऐसा कि समय का अंदाज़ करना असंभव. शायद दिन ढलकर अब सांझ हो रही थी. शायद ऊपर कोने के खंभे पर बिजली के लट्टू की टिमटिमाहट काफी देर पहले जल चुकने के बाद कोहरे के अंधेरे में नहाकर अब ऑलरेडी बेमतलब हो रही हो? तापस ने ऊपर खंभे की दिशा में देखने की कोशिश की लेकिन मोटी बरसाती बूंदों की मार ने उतनी ही तेजी से उनके देखने को निरर्थक भी बना दिया.

बीच गली बरसात में भींजते हुए तापस को अचानक अपनी समूची रणनीति- रोज़-रोज़ के अपने भागदौड़ की यह नाटकीयता- निहायत हास्‍यास्‍पद लगी. एक छोटे दायरे की सुरक्षा प्रदान करता क्‍या छाता कोई इतनी बड़ी चीज़ थी? नहीं. सोचने का मौका बनते ही तापस और कितने तो सवालों की चिंता में दीवाना होने लगते. छाते का लेकिन पहले कभी उनको ख़्याल भी न आता. आंखों पर काला चश्‍मा चढ़ाये वह तेज़ धूप को चीरते हुए निकल जाते. सूरज की दिशा में पादकर फिर उन्‍हें लगता उन्‍होंने धूप को जीत लिया है. तेज़ बरसाती थपेड़ों में भी वह ऐसे ही दौड़कर गंतव्‍य तक पहुंच जाते. भीगे बालों का पानी पीछे उछालकर, पंजे से धुले चेहरे को पोंछकर धीमे-धीमे मुस्‍कराते हुए वह दुनिया भर के छातेवालों को उसी नज़र से देखते जैसे वेस्‍टर्न फ़ि‍ल्‍म के अंत में घुड़सवार नायक क्षितिज की तरफ दौड़ लगाने के पहले पीछे छोड़ रही दुनिया को आख़ि‍री बार मेलंकॅली से देखता है.

मगर देह और कपड़ों से भर्र-भर्र चूते पानी के अहसास में अब तापस का हीरोपना घुस गया है! वह दुनिया की ओर देख नहीं रहे, जेब के गीले टैबलेट्स व अवश्‍यसंभावी सर्दी की संभावना पर सोचकर कातर हो रहे हैं.

कंटीले बौछारों के बेसहारेपन में अचानक तापस ने पलटकर पीछे देखा. शायद किसी ने उन्‍हें आवाज़ दी थी. या सनसनाती हवा में नाम गूंजा ऐसा बस उन्‍हें भरम हुआ था. जैसे खंभे पर बिजली के लट्टू के जलने या गली में कमज़ोर छातेवाले को अकेले पा लेने का भरम?..

तापस के जीवन में इन दिनों जिस एक छतरी की सुरक्षा प्रचुर मात्रा में है, वह यही भरम है. भरम के इसी घोड़े पर सवार तापस दिन में रात और रात में दिन की गड्ड-मड्ड सवारी करते रहते हैं. अतीत से लल्‍ली को चुराकर बरसाती फिसलन की सीढ़ि‍यां हंसते हुए पार कर जाते हैं. रजनीगंधा की महक फैलाकर सीलन भरे अंधेरे कमरे को दूधिया उजाले में भरकर एकदम-से भावुक होने लगते हैं.

रात के तीन बजे लल्‍ली को उठाकर तापस कविता पढ़ने लगे. लल्‍ली ने आंचल चेहरे तक खींचकर कहा- एकदम पागल हो, अभी सो रही हूं न.. बच्‍चे साथ में हैं, क्‍या करते हो? तो तापस हुमसकर आंचल के नीचे चेहरा कर लिए, और दांत के काटे से लल्‍ली को तब तक दिक् करते रहे जब तक वह खीझकर इन्‍हें थप्‍पड़ मारकर, हारी उठ कर बैठ नहीं गई!

सलिल चौधुरी की धुन गुनगुनाते हुए स्‍टोव पर दो कप चाय तैयार करने के बाद ख़्याल आया कि आसपास लल्‍ली या कोई भी नहीं.. सूने कमरे में वह नितांत अकेले हैं, और रेंगनी पर सूखने को डाली लल्‍ली की फूलदार सूती की साड़ी नहीं, उनका सस्‍ता गमछा है जो रह-रहकर कांप रहा है.

बारिश में नहाया एक साइकिल सवार तापस मइती को छूता गुजर गया. रिक्‍शे के तिरपाल के संकरेपने में खुद को समेटे-सहेजे पीछे बारिश में तैरता चला जाता एक लघु परिवार. स्‍त्री के माथे की बड़ी लाल बिंदी पानी में घुलकर फैल गई थी. भौं के नीचे बड़ी विस्मित आंखें. गोद में टंगा-अटका एक बच्‍चा. स्‍त्री के स्‍वामी ने चेहरे पर बांह फैलाकर खीझ की झिड़क में कहा- आरे, लाल्‍ली, देखछो ना कि? सब गीला हो रहा है तुम्‍हारी तरफ! अतो बार बॅला जाय किंतु कखोनो बुझो ना!

क्‍या कुहरीले अंधेरे में तैरती गुजरी वह सचमुच लल्‍ली ही थी? मगर लल्‍ली कैसे हो सकती है? यहां कैसे हो सकती है जब वह काठगोदाम में रहती है? फिर पलटकर थप्‍पड़ जमाने की जगह चुपचाप स्‍वामी की बात झेलनेवाली लल्‍ली के बारे में किसी ने सुना है कभी?.. हमशक़्ल होना लल्‍ली होना नहीं!

टपटपाती सड़क पर देर तक तापस मइती के पैर भटकते रहे. देर तक उनके कपड़ों व आत्‍मा से पानी टपक-टपक कर गली की तक़लीफ़ों पर बजता रहा. या शायद यह भी तापस का भरम ही था. शायद उस दिन वास्‍तविक तौर पर नहीं, बरसात का अंदेशा मात्र था. याकि तापस मइती उस दिन घर से बाहर निकले ही न थे.

एक संभावना यह भी है कि लल्‍ली जैसी कोई स्‍त्री इस दुनिया में कभी हुई ही नहीं. छाते के अभाव वाली बात तो निरी कपोल कल्‍पना है..

5 comments:

  1. सच है.बारिश की बूँदें कितनी ही यादें शरीर के अन्दर इनफ़्यूज़ कर देती हैं. एक पूरा महाकाव्य. सराहनीय रचना.

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना लगी..गहरी भावनाये है..

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  3. ये खामोशियां...ये तनहाइयां...कुछ देखे-सुने बंगाली क्लीशे सा है...ध्यान नहीं आता कहां। ऐसी ही एक खयाली लल्ली बहुकुचर्चित कुणाल सिंह की कहानी 'सनातन बाबू का दांपत्य' में भी आई है लेकिन प्रमाणित है कि उसे किसी बंगाली फिल्म से प्रेमपूर्वक उठा लिया गया है। आपका माहौल ज्यादा सघन है लेकिन बात इससे आगे जा सकती थी...

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  4. सही है !! बारिश मे झीसी के बारे मे ही सोच कर आदमी दीवाना हुआ जाता है. ऐसे ही किसी पल खो जाने पर ना जाने क्या क्या चीज़ें आदमी गुनने लगता है.बढिया चीज़ उकेर कर लाय हैं. भई हमें तो रचना पसन्द आई.

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  5. सही कहते हैं, चंदू.. बात बहुत आगे जा सकती थी, गांठदार व महीन भी हो सकती थी.. मगर यह भी सही है कि इन दिनों सब 'पोस्‍ट' की ज़रूरतों के अनुरूप ढलता चलता है.. थोड़ा हास्‍यास्‍पद है, मगर फिलहाल है ऐसा ही..

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