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Jun 30, 2007

सुकुमारी प्‍यारी हिन्‍दी की सुहानी सवारी..



कभी हड़बड़ाकर चीखता था कोई
या कहीं मौत की ख़बर आती थी
वर्ना शांति थी ऋषि-गुनीजन थे
पर्वत-कंदराओं के गहरे सोफों में धंसे
जिलेबी खाते गुदगुदियाते आशीर्वचन देते
ऊंघते सुनते लोग या इकबारगी
चौंकते जग जाते फुसफुसाने लगते
रांची का कोई पत्र अचानक रीतिकाल
रोने लगता, दिल्‍ली जाकर छपवा लेता
नई प्रगतिशीलता के सात सौ पोस्‍टर
अख़बार के चौथे पृष्‍ठ पर जो चौदह पंक्तियों की
टिल्‍ली ख़बर बनकर उसी दिन बासी हो जाती
अलबत्‍ता बहाना बन लेता उत्‍साही कार्यकर्ता
जश्‍न मना लेते थोड़े पी लेते कुछ लुढ़क जाते
फिर अगली बैठक तक तसल्‍ली बन जाती
मज़े में खींच लेते चादर सोये रहते लम्‍बी.

कुछ आवारा थे बेचारे थे कि समाज में हारे थे
हाथ-पैर फेंककर बुन रहे थे रात
जिसकी करनी थी उन्‍हें टेढ़ी-उलझी बात
शब्‍द टटोलते अंधेरे में अभिव्‍यक्तियां जो अभी तक
बरती नहीं गईं, चिन्‍ताएं चूने के पीछे ढकी दबी रहीं
आंसू जो रोया नहीं गया, टपटपाती बजती बरसाती
रात में कोई घायल घोड़ा दीवानगी में भागता रहे जैसे
जंगल में मदहोश गोली दाग़कर गिरा न दिया जाए जब तक.

ज्‍यादा काम से घर लौट रहे थे थके थे
साहित्‍य व समाज पपड़ि‍यों की तरह झरकर
गिर रही थी उनके चेहरों से, नहीं थी कोई
कविता या कवि का ध्‍यान अवचेतन में
टुकड़ों में किसी सस्‍ते गाने की याद या
कटोरी भर रसेदार तरकारी का स्‍वाद
टीवी का टुकड़ा बीवी का मुखड़ा
सपने में सपना कहीं
अनछपी रचना का छपना
चौंधियाई नींद खुलने पर फिर अदा थी
सुखसागर के तकिये पर हिन्‍दी का दुख था
अचक्‍के में तीन बार नागार्जुन और
दो मर्तबा त्रिलोचन का मुख था
कचर-मचर शब्‍दों से गंजी सत्रह पत्रिकाएं थीं
मगन शंभु शास्‍त्री, गौरीनाथ व सीताकांत थे
धंधा था फंदा था छुक-छुक की झांकी थी
हिन्‍दी की हरर्र-हरर्र सुहानी सवारी थी
कितना हारी थी फिर भी सुकुमारी-प्‍यारी थी.

8 कमेंट:

अनुनाद सिंह said...

अच्छा रो लेते हैं। पर कभी-कभार समाधान भी सोचने की कोशिश करिये।

ALOK PURANIK said...

धांसू

अरुण said...

वाह मजा आ गया,आप की कवितानुमा लेख,या लेख नुमा कविता,(इस पर अभी विवाद है,निश्चित होते ही बताय जायेगा)और ये समझ मे भी तुरंत आ गई
:)

चंद्रभूषण said...

कहां चली रे सवारी
मैं वारी रे वारी...
अंग लचक मिरदंग बज्यो है
वाह-वाह को सोर मच्यो है
रच-रच कच-कच
भच-भच भारी-भारी
वा पे आलू-चना प्यारी-प्यारी
ओ जी, दृस्य अनोखा देख-देख
भई कानी आंख रतनारी
ओ हां जी हिंदी की सवारी
मैं वारी रे वारी...

अभय तिवारी said...

सटीक तस्वीर है.. कवित्त है..करुण दृश्य है.. पर कहीं आनन्द है..

Pratyaksha said...

ऐसे तीखे कटाक्षों का क्या मतलब ? इतने गंभीर मसले पर ऐसी ठिठोली ? हद है ।

अफ़लातून said...

"ए री दैय्या ,लचक-लचक चलत मोहन
आवे,मन भावे
अधर-अधर मधुर-मधुर
मुख से बंसी बजावे दैय्या ।"

अनामदास said...

बहुत सुंदर, जय हो, हमने तो आपका वाला और उसके चंद्रभूषण जी वाला झूम झूम के गाया. अनुनाद जी कह रहे हैं समाधान खोजिए, इसका समाधान भाषा में नहीं समाज में है. ख़ैर, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी..फिर कभी