Saturday, June 23, 2007

द नेम ड्रॉपर..

वह ऐसा क्‍यों करता था? और ऐसा नहीं कि वह ये पूर्णिमा के उजाले या अमावस्‍या की अंधियारे के असर में- एक ज़ुनूनी-मदहोशी, चोट खाये पागलपने में करता था.. नहीं!

बरसाती छींटों के बाद ‘ओ सजना, बरखा बहार आई..’, ‘रिमझिम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन..’ जैसे गाने वातावरण को अक्‍सर जैसे दिल छीलनेवाली बेचैनियों में नहलाने लगते हैं. जैसे एक ख़ास तरह का नीमउजाला, या नीमअंधेरा किसी सीरियल किलर को वहशी, दीवाना बनाकर, शिकार की खोज में, महानगरीय जगर-मगर के अंधेरों में पटक देती है- कुछ उसी तरह, एक माहौल विशेष में, हमारा वह ऐसा या वैसा करने लगता हो, जैसी बात नहीं थी. वह (चलिए उसे जयराज का एक कामचलाऊ नाम दे देते हैं) हमेशा ऐसा करता था! जयराज वॉज़ ऑल्‍वेज़ ड्रॉपिंग नेम्‍स.. ही वॉज़ अ नेम ड्रॉपर!

जयराज को बहुत दफे ध्‍यान भी न होता चर्चा किस विषय पर हो रही है.. सिर्फ़ इतना ध्‍यान रहता कि नेम ड्रॉप करना है. एक हड़बड़ी व तक़लीफ़ की छतरी-सी तनी रहती, और जयराज घात लगाए बेचैन कसमसाता रहता कि कब ज़ि‍रह में सेंघ लगाने का उसका मौका बने कि वह नाम चुवाकर चैन की सांस ले सके. ऐसे मौके के आने तक वह एकदम उखड़ा-उखड़ा टंगा रहता. बहुत बार कहवैये आवेश में बातचीत को कहीं से कहीं लिए जाते, और कोई उपयुक्‍त अवसर ही न बन पाता कि जयराज गांठ के संभाले हुए नेम्‍स ड्रॉप कर सके, तो ऐसे मौकों पर जयराज की सांस उखड़ जाती, दिल भन्‍ना उठता, और फिर कुंठा से भरा हुआ वह यार-दोस्‍तों को भर्र-भर्र ‘तिलकुट-चिरकुट’ जैसी गालियों से नवाजता मन की भंड़ास निकालता. लेकिन तब भी सच्‍चाई यही होती कि नेम ड्रॉपिंग का अगला उपयुक्‍त अवसर आने तक मन की भंड़ास निकलती नहीं!

बिना नेम ड्रॉप किये जयराज की आंखों के आगे अंधेरा छाया रहता. बच्‍चा रात को बिछावन गीला करने के बाद जैसे कुनमुनाने लगता है, जयराज नेम ड्रॉप करने के पहले वैसा ही कुछ कुनमुनाता अस्थिर व उद्वि‍ग्‍न बना रहता. शॉपेनआवर, कालिदास, गांधी, गुर्ज्‍येफ, मोदिल्‍यानी, त्रॉत्‍स्‍की, डॉन किहोते, लेर्मेंतोव, पास्‍काल, वॉल्‍तेयर उसके झोले में छटपटाते- बाहर चूने को आतुर आपस में पट्-पट् बजते होते. और वाजिब मौके की राह तकता वह तना-तना बैठा होता. काली चाय की बेस्‍वाद चुस्कियां लेता मरोड़ में इधर-उधर मरुड़ता होता. कभी ऊबकर तो कभी हारकर स्‍वास्‍थ्‍य की ज़ि‍रह में वॉल्‍टर बेन्‍यामिन को ठेल देता, तो कभी आधुनिक पर्यटन की चर्चा में पियेर पाऑलो पज़ोलिनी को पेल देता! ओह्, कैसा तो अनोखा वह नेम ड्रॉपर था!

मगर इसके बारे में ठीक-ठीक अभी भी जानकारी नहीं कि वह ऐसा क्‍यों करता था. अडिक्टिव था.. अडिक्टिव-कंपल्सिव था? मालूम नहीं! मगर आप एक मनोनुकूल माहौल तैयार कर दें, और फिर देखते, कैसे पलक झपकते में, वह बकरी की लेंड़ि‍यों की मानिंद नामों की लेंड़ सजा देता! एक बरती, आजमायी, बरसों की हासिल सिद्धहस्‍तता थी. उसके नाम चुवाने के साथ लोग आंख और मुंह खोल देते थे, फिर बगल में झुककर बगलें झांकने लगते थे. लेकिन कभी-कभी यह भी होता कि यह सधी सारंगी थोड़ा अनियंत्रित होकर फैल जाती.. बकरी की लेंड़ी की पट्-पट् की जगह- गाय के छेरने के कड़क-पड़ाक-ठां-डिड़ि‍क-ठेर्र का सुर प्रभावी सुर हो जाता.. और माहौल फिर तो एकदम ही बसाइन हो उठता.. लोग चौंकन्‍ना होकर जयराज को गालियां देने लगते.. तब उसे भी अंदाज़ हो जाता कि आज नेम ड्रॉपिंग थोड़ी ज्‍यादा हो गई.. ऐसे में जयराज गिरगिट की तरह रंग बदलकर एकदम मासूम बच्‍चे में बदल जाता.. जिम्‍मेदारी से बड़ों की बात सुनने लगता.. और अगली मर्तबा की आस में उदास होता रहता जब वह कायदे व करीने से बकरी की लेंड़ि‍यों की तरह नेम ड्रॉप कर सके!

9 comments:

  1. प्राप्त की आप के ज़रिये एक मंद मंद मुस्कान..

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  2. कौन है निशाने पर?

    आपका जसराज

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  3. हा-हा-हा, समझ गया कौन है ये नेम ड्रापर!

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  4. नेम ड्रापिंग के बारे में पहली बार गोविंद मिश्र के एक उपन्यास में पढ़ा था( यह भी नेम ड्रापिंग है क्या!)। आज यहां। अच्छा है। बहुत नेम ड्रापिंग की आज आपने। वैसे मैं समझ नहीं पाया कौन है यह नेमड्रापर। अविनाश अपनी समझ का खुलासा करें। :)

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  5. जयरजवा के छेरने के बारे में सफाई और दें,उन नामों से खुद को जोड़ता भी होगा , या नहीं ?

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  6. किसकी खींच रहें हैं प्रभु

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  7. हम भकुआ के मोनीटर निहार रहे हैं-कउन है ई नेम डरापरवा? अविनाश भाय, खाली आप ही समझियेगा? थोडा़ खुलासा करिए. न हो तो मेल से ही. बिना बूझे तअ मजे नहीं आयेगा.

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  8. इतनी चिरौरी हो रही है, अविनाश.. अब राज़ खोल ही डालो, बेटा? और चुप रहोगे, लोग समझेंगे, टीज़ कर रहे हो!

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  9. अच्‍छा, आप अच्‍छे-अच्‍छे? और हम खराब-खराब? बहुत समझदारी मत छांटिये। वैसे ही रोज़ दुश्‍मनी बढ़ा रहे हैं, अब इसमें आप तो हाथ न बंटाइए! राज़ को राज़ ही रहने दो...

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