Tuesday, June 19, 2007

आभासी लोक में जिसकी मुझे तलाश है..

आत्‍मा जुड़ा जाये, दिल खिल जाये ऐसे ढेरों अंतरंग अभिव्‍यक्तियों व अनगढ़ शब्‍दों, शब्‍द-श्रृंखलाओं की खोज, पुनर्विन्‍यास- मानकीय हिंदी जिनकी इजाज़त नहीं देता. उन इफ़रात, अनगिन बिम्‍बों की टोह, रचनाओं में गड्ड-मड्ड उन्‍हें सजाने-चिपकाने का मोह- परिपाटियों में पिटी संसारी सामाजिकता जिन तक पहुंचने, छूने व छापने की अनुमति नहीं देती. आह्, सच अमेज़िंग, फ़ैंटास्टिकली मार्वलस फ़न टू फिडल विद ब्‍लॉग! (अनामदास सुन रहे हैं? नशीले झाग में घुला, मन को उन्‍मत्‍त और दीवाना कर देनेवाला नगपुरिया गद्यगान आप कब कर रहे हैं?)..

एक ऐसी अंतरंग सामाजिकता जिसकी संगत में दिमाग़ जगा रहे.. मन बहका रहे. जहां खुलकर हंस सकें.. तो खुलकर उदास भी हो सकें.. और हंसना शर्म से आत्‍मा छिपाना व सिर गड़ाना न हो!.. थोड़े ऐसे मित्र मिल जाएं जिनका विवेक और चमकीला परतदारपन नित नए अचरज जगाए.. चौंकाए, गुदगुदाए.. मार्मिक व गजब के मीठे संगीत की तरह अंदर दूर तक कहीं तोड़ जाए.. और फिर एक नई बुनावट में जोड़ जाए?..

आभासी लोक में कितना तो चाहता हूं.. कितना कितना कितना तो चाहता हूं!

(प्रत्‍यक्षा के आज दाखिल पोस्‍ट आखिर है किस चीज़ की तलाश आपको? के असर में..)

6 comments:

  1. "दिल ढूढता है फ़िर वही फ़ुरसत के रात दिन"

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  2. ऎसा लोक तो आभासी ही हो सकता है यथार्थ से दूर , एक स्वप्नलोक..

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  3. आपकी पुरानी तस्‍वीर को देखकर अच्‍छा लगा और विवरण को पढ़कर कवींद्र रवींद्र की कविता ‘चित्‍त जेथार भयशून्‍य’ याद आ गयी । जहां ज्ञान मुक्‍त हो । जहां अभिव्‍यक्ति पर कोई पहरा ना हो.................हो प्रभु हे परमात्‍मा हमें उस स्‍वातंत्र्य स्‍वर्ग में जगाओ । काश हमारा और आपका ये सपना पूरा हो जाए । और वैसा हो जाए जैसा आपने लिखा है ।

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  4. कितना कितना चाहेंगे तो कुछ कुछ या बहुत कुछ तो मिल ही जायेगा ।

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  5. इच्छायें कभी-कभी मूर्खतापूर्ण भी होती हैं ,यह याद रखना होगा,शायद।

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  6. Aaj ki bhaag daud ki jindgai mein aise aabhaashi lok ki chaah kewal sapanaa hokar rah gayi hai.. bas dil chaahta rahta hai ki .. aise din aisee shaamen ho.. sukoon ho .. par miltaa kahaan hain sukoon aur kise hai fursat.. Bas thoda hai thode ki jaroorat hai..

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