Monday, June 18, 2007

जासूस जसबीर और मिशन नारद..

मेज पर उचका बैठा कुख्‍यात, लंगोट-लथेड़ जासूस जसबीर सामने था.. और मैं पता नहीं क्‍यों, खुश होने की जगह टेंस हो रहा था.. पूछना कुछ चाह रहा था, बात मुंह से कुछ और निकली- अबे, जस्‍सी, तेरी फंडिंग कौन कर रहा है, यार?..

जसबीर न मेरा जस्‍सी है न अबे-तबे वाला यार.. मगर हवा में लातों की ऐसी बहार फैली हुई है कि ज़बान जब ज़रूरत न हो तब भी पतनशील हुई जाती है! ट्वीड और बोनेत्‍ती के इटैलियन शूज़ पहने आदमी तक के सामने अदब और तहजीब भूल रहा हूं!.. लेकिन जस्‍सी ने ज्‍यादा दुनिया और हमसे ज्‍यादा लातें देखी हैं.. हमारे कहे को दिल पर लेने की बजाय मुंह में सिगार डालकर धुंआ छोड़ने लगा. कहा- पूछोगे नहीं क्‍या ख़बर लाया हूं?..

मैं सकते और सिगार के असर में चुप रहा. शायद चुप रहने पर जसबीर मुझे एक सिगार ऑफर करे.. चलते-चलते शायद हज़ार-हज़ार के दस-बीस नोट भी? बेहतर हो मैं फंडिंग-संडिंग की जिज्ञासा में ज्‍यादा नाक न घुसेड़ूं, और जस्‍सी को जसबीर भ्रा कहके ही बुलाऊं! मगर, साली, ज़ि‍न्‍दगी ऐसी टेंशनियाई हुई है कि मुंह से क्‍या ख़बर है, जसबीर भ्रा की जगह ‘ब्रा’ निकल गया.. लेकिन अच्‍छा है बंदे ने बुरा नहीं माना.. आंख मारकर जेब से न्‍यूज़ निकालने लगा..

न्‍यूज़ के निकलने तक मैं बरबराता रहा- बड़ा गंदा हो रहा है सबकुछ लेकिन! धुरविरोधी के जाने का असर नहीं, मसिजीवी के चिट्ठाचर्चा को गालियां.. पंडित ने निर्मलानंद के सवाल का जवाब तक नहीं दिया? विदा होने के पहले ही उनके पोस्‍ट को नारद का एग्रीगेटर खा गया! प्रत्‍यक्षा भी प्रत्‍यक्ष जान गईं कि फेंस के उधर जाने का क्‍या मतलब है!.. यही मतलब है कि आप अपने को इतना छुईमुई न समझें, नारद आपको भी खा-चबा सकता है! बड़े-बड़े खेल हो रहे हैं, गुरु?.. आज अविनाश ने अपना विदा गीत लिखा है, पता नहीं वह भी नारद तक पहुंचेगा या भाई लोग रास्‍ते में ही लंगी देकर रोक लेंगे? नारद-नारद! पतनशीलता का चरम है, बॉस!..

जसबीर जॉनी हाथ की चिप्पियों को ऐसे पलटते रहे मानो मेरी चिंताओं के भभुआ इंटर कॉलेज के सलाना चुनाव वाले स्‍तर से दुखी हो रहे हों.. उम्‍मीद कर रहे हों कि मैं भी उन्‍हीं के ट्वीड और इटैलियन शूज़ वाले स्‍तर तक उठ जाऊं.. मैंने आह भरी और अपना गोल्‍ड फ्लैक जलाकर उनके सिगार के स्‍तर तक उठने के लिए छटपटाने लगा..

- ये हो क्‍या रहा है, गुरु? टोयोटा फॉर्च्‍यूनर और लैपटॉप वाले जीतू हैं कहां? इतने समय तक, घंटा, एयरबॉर्न हैं कि सारा डायलॉग ठप्‍प हो गया है?- उसी छटपटाहट में मैंने अपना सवाल किया! आगे- और ये शुकुल जी, नरसिंहा राव वाली अदायें क्‍यों खेल रहे हैं.. कि ओह, आप बड़े मार्मिक हैं, आह, मगर हम थोड़े धार्मिक हैं? माजरा क्‍या है, जस्‍सी?

मेरे इतना सवालों को ठेलने पर जसबीर जम्‍हाई लेने लगा.. तो मैंने सिगरेट का जलता सिरा मुंह में डालकर खुद को चुप कराया और अच्‍छे बच्‍चे की तरह जसबीर के जवाब पर कंसन्‍ट्रेट करने लगा.. आप भी कीजिए!

जसबीर जॉनी के खुलासे: जीतू हवा नहीं ज़मीन पर ही है.. कानपुर के आसपास ही है.. मैंने लास्‍ट देखा था तो चेहरे पर रूमाल डाले छोटेमल चाट भंडार के घटिया टिकिये खा रहे थे.. फ़ोन पर गुस्‍सा हो रहे थे कि दिल्‍ली में एनडीटीवी से इंटरव्‍यू वाला सारा खेल बिगाड़ दिया! मैंने पास जाकर कान में फुसफुसाया कि अविनाश अभी भी उन्‍हें लेने एयरपोर्ट जाएगा मगर फूलों के नहीं.. चिट्ठा-चिथड़ों के हार के साथ!..

इसी कन्‍फ्यूज़न में वह रवीश के ताज़ा पोस्‍टों पर टिप्‍पणी भी नहीं कर पा रहे कि जाने ऊंट टुमौरो किस करवट बैठे?.. मगर सबसे ज्‍यादा पंडित बौखलाए हुए हैं कि तुमने चाट के चक्‍कर में प्रत्‍यक्षा तक के कल का पोस्‍ट नारद से उड़वा दिया! संस्‍कृति और नारी सम्‍मान करते रहते हो? फिर प्रत्‍यक्षा मुसलिम भी नहीं!..

जीतू वाला रूमाल ले‍कर मैंने चेहरे का पसीना पोंछा.. फिर थोड़ा कांपते और कुछ हांफते हुए जस्‍सी को लपेटा- क्‍या बात करते हो, बॉस.. जीतू यहीं- माने कानपुर-धानपुर में ही है?..

- जीतू-देबू सब यहीं हैं.. जीतू एक फ़ोन की और देबू एक ई-मेल की दूरी पर..

- तो फिर? शुक्‍ला तो अंतत: ब्राह्मण ठहरे.. मगर ये लोग कोई स्‍टैंड क्‍यों नहीं ले रहे?

- क्‍या और कहां से स्‍टैंड लेंगे? जीतू ने मुझे पहले ही दिन कह दिया कि निर्मलानंद टाइप चिट्ठों के सवाल-जवाब वाली अपनी बुद्धि नहीं है! अपन यार, आओ, मिल बैठें हम दो और मॅकडावल टाइप आदमी हैं!.. ये सब पंडित जी हैंडल करें!.. तो कर रहे हैं पंडित जी.. अपनी बुद्धि और अहमदाबाद के हॉटलाईन से जैसा इंस्‍ट्रक्‍शन मिल रहा है, उसी में सुर मिलाकर हर जगह दो-दो पेज वाली टिप्‍पणी कर रहे हैं.. जिसमें बात कोई नहीं होती, सिर्फ़ यही दोहराया जाता है कि नारद की मूंछ नीची नहीं होगी!.. और देबू ठहरे बंगाली आदमी.. वह भी बनारस के.. ऐसी मारामारी में अखाड़े में उतरें इतना जवान में कलेजा नहीं..

- मगर नारद की मूंछ को लेकर इतना हाय-तौबा क्‍यों, जस्‍सी? नारद तो वैसे भी क्‍लीन शेव्‍ड था, यार?..

- अहमदाबाद पेटी-पुटी मॉब ने उसे मूंछे दे दी हैं.. और अब कनपुरिया पंडित को चैलेंज कर रहे हैं कि काटने का दम है तो काटके दिखाओ!

- तो?.. पंडित जी दम के चपेटे में आकर बेचारी प्रत्‍यक्षा तक जैसी पर का अत्‍याचार झेल रहे हैं?.. कुछ तो दम होगा, जस्‍सी?..

- तुमने अभी दुनिया देखी नहीं है, परमोद हिंग!.. अपने लिखे को एडिट करने का तो दम है नहीं, मूंछ काटने का दम कहां से लाएंगे?.. दिल्‍ली मीट के बहाने सारे मामले पर पानी डालने की कोशिश करेंगे.. और थोड़ा संभव हुआ तो अभी निर्मलानंद को गाली देनेवाला एक पोस्‍ट चढ़ाने की सोचेंगे.. मगर ज्‍यादा संभावना है कि एक ज़र्देवाला पान खाकर उस कड़वाहट के स्‍वाद को भी बस भूल जाने की ही कोशिश करें..

दुनिया बदलती जैसी दिखनी चाहिए, बदलनी तो किसी सूरत में नहीं चाहिए!

अधपियी सिगार टूटे एशट्रे में दबाकर जसबीर बसाइन बाथरूम की ओर बढ़ गया.. मैं न चाहते हुए भी गोल्‍ड फ्लैक फूं‍कता बड़ी-बड़ी चिंताओं में पड़ गया..

5 comments:

  1. प्रमोद भाई, ई बात ईमानदारी का नहीं है। आप इतना अच्छा-अच्छा फटाफट लिखे जा रहे हैं।
    एक हमारे बास हुआ करते थे। कडक चीफ सब एडिटर। उनका एक जुमला था, प्रतिभा दबाव में‍ ही खिलती है। पिछले चार दिनों में ब्लॉग में जितना की बोर्ड पीटा गया होगा, उतना शायद ही कभी पिटाई हुई होगी। पर चलिये इसी से लोगों की कल्पनाशीलता, संप्रेषण की ताकत का भी अंदाजा लग रहा है। शाम तक फिर तो नहीं आना पडेगा।

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  2. ए परमोद जी,
    सुबह सुबह न जाने किसका मुंह देख के उठे थे. कल निर्मल आनन्द नमस्कार कर दिया था. आज अविनाश ने अलविदा कह दिया,क्या ये सब ऐसे ही चलता रहेगा.. और जासूस जसबीर के होंठ से भी कर्नल रंजीत की तरह सीटी नही निकल रही... क्यो बाबू आप पर भी बैन लगेगा तभी जाएंगे.. नारद जी इस चिट्ठे पर भी बैन लगएं

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  3. kauvaa chalaa hans kee chaal!!!

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  4. कुछ तो मूँछ का मामला है.. फ़ुरसतिया जी ने भी मूँछ प्रकरण पर ढेर लिखा है.. आप ने भी तीन लाइनें दी हैं.. है क्या राज़ ये.. ? भाई जस्सी को बोलिये जरा पता करे..

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  5. हम देखिये पूरा पढ़ गये। न केवल पढ़ गये बल्कि हंसते भी रहे। पूरे दो बार खिलखिलाये भी। जबकि आप कल हमारी पोस्ट पढ़्ते पढ़ते सो गये। असल में आपका 'पोस्चरै' फ़ाल्टी है तो नींद तो आयेगा ही। वैसे आपका ये पतनशील साहित्य जिसे आप बड़े जतन से लिखते हैं बड़ा मजेदार होता जा रहा है। जस्सी से पूछिये ऐसा काहे बदे हो रहा है!

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