Saturday, June 16, 2007

मुम्‍बई ब्‍लॉगर्स मीट: कुछ छूटे टूटे तार..

ब्‍लॉगर्स मीट पर आमंत्रित न होकर ढेरों लोग क्षुब्‍ध हो रहे हैं. सबसे पूछ-पूछकर हमारी जीभ दुखने लगी है कि हमारा नंबर किसने दिया?.. या यह बताते हुए कि गुरु, हमने ऑर्गनाइज़ नहीं किया था, आप कृपया यूनुस मियां को फ़ोन करके उन्‍हें गरियायें.. उन्‍हें वैसे भी गाली सुनने का बचपन से अभ्‍यास है.. मगर आधे घंटे बाद फिर वही क़ि‍स्‍सा!- हमको क्‍यों नहीं बुलाया?- हद है, यार! मैं बुलानेवाला कौन.. मीट-सीट तो क्‍या, अपने पास चाय-नाश्‍ता तक के इंतज़ाम की तो सेटिंग नहीं.. फिर जबरिया काहे मज़ाक बना रहे हो, प्‍यारे!.. पर कोई सुननेवाला नहीं. बड़ा गुस्‍सा आ रहा है उस पर जिस किसी ने भी हमारा नंबर लीक किया है. और किसने.. शशि सिंह ने ही किया होगा.. बड़ा ही नष्‍ट आदमी है, यार! करें क्‍या लेकिन.. शशिया का नवका मोबाइल सेट मार लें? कि पीछे पंगेबाज को छोड़ दें?..

सोचकर कन्‍फ्यूज़ हो रहे थे कि फिर फ़ोन आ गया. अनिल रघुराज का था. और नंबर शशि ने नहीं, हमारा ही दिया हुआ था. फ़ोन पर बरसने लगे. कहा, बड़े चिरकुट आदमी हो, बैठ गए, हमें ख़बर तक नहीं की? दो साल से दिमाग फटा जा रहा है कि सभा-अभा में कहीं भाषण दें, तुमने हाथ आया मौक़ा खींच लिया!.. मैं हूं-हूं करके उनका गुस्‍सा लेता रहा.. अब क्‍या बताता कि बैठकी तो संजय, शशि और अभय की थी, हमारा होना तो वहां अपेक्षित भी नहीं था.. पता चलने पर एक क्षण तो ऐसा भी आया कि मैंने खड़े होकर घोषणा की- अरे, जब मैं आमंत्रित ही नहीं हूं तो शायद चला ही जाऊं, मेरा रुकना नैतिक रूप से सही प्रतीत नहीं हो रहा!.. एकदम साहित्‍यकारों वाली अदा में तीर छोड़ा और मान-मनौव्‍वल के बाद साहित्‍यकारों की तरह मान भी गया.. लेकिन रघुराज को इन महीन तथ्‍यों को जानने की फ़ुरसत थोड़ी है! दो महीने से सुबह पांच बजे अखाड़ा जाकर और आधा सेर ताज़ा दूध पीकर दिमाग तेज़ करने की कसरत में लगे हुए हैं; उन्‍हें इन दिनों अपने सिवा हर कोई दो कौड़ी की समझ वाला आदमी लगता है. वही समझ दीखाकर एक बार फिर डांटे- हमको बुलाकर क्‍या फ़ायदा होता, इसका अंदाज़ करने की तो अक़ल रखते? दो मिनट में हम संजय लाल को पटरी पर कर देते, हां?..

मैंने मरी आवाज़ में प्रतिवाद किया- वही तो दिक़्क़त है, ठाकुर साहेब.. संजय लाल को लगता है वही पटरी पर हैं, बाकी बे-पटरी के हैं.. हमको भी आधे घंटे तक वह पटरी पर ही लाने की कोशिश करते रहे.. एकदम्‍मे डिमोरलाइजिंग, गोन केस है, सर!.. मगर संजय तक ने हमारी नहीं सुनी, तो रघुराज काहे सुनते? अपनी ठेले रहे, बर्र-बर्र, ठों-ठों.. एक हाथ में फ़ोन और दूसरे में मनोहर कहानियां लेकर हम थोड़ी देर टाईम पास करते रहे, फिर डिसकनेक्‍ट कर दिया..

सोच रहे थे पूरा मामला पंगेबाज को शिफ्ट कर दें कि तभी दूसरा फ़ोन आ गया. ये आयम विकास कुमार एंड दिज़ इज़ माई वर्ल्‍ड वाले विकास कुमार थे. मैं कहना चाह रहा था, दोस्‍त, अपने ही वर्ल्‍ड में रहो, हमारे वाले में बड़ा टेंशन है.. मगर हमें बिना कहने का मौका दिये ये फैलने लगे कि हमको नहीं बुलाया, एक चाय और दो समोसे बचा लिए, वो तो ठीक है, मगर हमारे ई-उपन्‍यास के बारे में किसी ने बात क्‍यों नहीं की? कविता-सविता से ही, अगर वह ऑपोज़ि‍ट सेक्‍स की संज्ञा न हो, हमें टेंशन होने लगता है, तो यहां तो मिस्‍टर डेवलपमेंट सीधे नॉभेल का बम खोल रहे थे.. हमने घबराकर रॉंग नंबर कहा और फ़ोन डिसकनेक्‍ट कर दिए..

मनोहर कहानियां की रुबीना की दर्दभरी दास्‍तां एकदम मनोहारी टर्न पर पहुंच ही रही थी कि फ़ोन फिर से टिन्‍न्-टिन्‍न् होने लगा. विकास के बाद अबकी विमल थे. हर चौथे दिन नया पोस्‍ट डालने की धमकी देते रहते हैं, मेरे यहां से बीस कुत्‍तों की तस्‍वीरें सीडी पर छापकर ले गए हैं कि हर पोस्‍ट एक कुत्‍ते की फ़ोटो के साथ छापूंगा!.. लेकिन फिर उन्‍हें संशय होने लगता है कि ऐसा न हो तैयारी से पोस्‍ट लिखें और वह रजिस्‍टर होने के पहले ही नारद पर बैन हो जाए! इसीलिए लिखना रूका हुआ है.. फ़ोन पर भी उनकी वही चिंता थी.. पूछा- बैन-वैन की बात की तुमने? क्राइटेरिया क्‍या है एटसेट्रा?.. मैं कुछ कहूं इसके पहले वही बड़बड़ाने लगे- यार, तुम्‍हारे यहां के कुत्‍ते सब, साले, बड़े शरीफ़ लगते हैं, टोटल अनयूजेबल हैं.. मैं अपने ब्‍लॉग को थोड़ा रियलिस्टिक लुक देना चाहता हूं.. समझ रहे हो?.. चाइना वाली हमारे पास पिंक, पर्पल, ब्‍लू ढेरों चड्डि‍यां हैं, उनकी फ़ोटो चढ़ा सकता हूं कि नहीं? या बिंदू, फरियाल, पद्मा खन्‍ना, हेलेन की कैबरे वाली फ़ोटो जो मैं सातवीं क्‍लास से कलेक्‍ट कर रहा हूं, वो? या एमएमएस वाला भी थोड़ा कलरफुल मटिरियल है, उसको चढ़ाने से ये अनूप-टनूप बुरा मान जाएंगे, क्‍या बोलते हो, परमोद?..

मैं बोल नहीं रहा था, मन ही मन अभय को गालियां दे रहा था.. जिसकी वजह से इन द फ़र्स्‍ट प्‍लेस यह सारा टंटा खड़ा हुआ!..

7 comments:

  1. हेलेन के कलेक्शन के कुछ फोटू ई-मेल करें। मैं एक्सचेंज आफर में मल्लिका सहरावत के ई-मेल कर दूंगा।
    आलोक पुराणिक

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  2. ये सब तो ठीक है परमोद भईईया, मगर कहीं आप मेरा नंबर लीक मत कर देना, वरना नींद हराम हो जायेगी । आप कहो तो जो ट्रीट चाहिये वो हम आपको दे दें । और हां शशिया का नवका मोबाईल मारने में कामियाब हो जाएं तो हमें बताईयेगा, फिफ्टी फिफ्टी कर लेंगे । आखिरी बात—लगता है कुछ तार अभी भी छूटे हुए हैं, वो सुलझा वुलझा कर कब चिपका रहे हैं ।

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  3. फाइनली
    बाबा को मिली दुकान ।
    उर्फ़
    ' डान किहोटे ' को मिला मैदान ।

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  4. अजी सर जी! प्रणाम स्वीकारें!
    उपन्यास तो सर का बतायें...खाली दिमाग सैतान का घर।
    बाक़ी दिमाग-असनिकावक कविता भी लिखे हैं हम कुछ, जरा हमरे ब्लोग्वा मे झाँक के देखिए तो सही। चिंता नही है...हमरे वर्ल्ड मे बड़ा आराम है....आवे जावे कि मनाही भी नाहीं है और ना ही कौनो निमंत्रण पत्र के जरूरत है।

    और अब भेद तो खुल ही गया आपका...कि मेरा नाम्बर्वा सहिये था।

    सब लोग सुन लीजिये.....अब कभी किसी के फ़ोन पे कोई कहे कि 'रांग नंबर है' तो समझ जायियेगा कि फोन कहॉ कनेक्ट हुआ है.

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  5. परमोद ने जो विमल के बारे में लिखा है उस पर मैने बैन लगा दिया है.निवेदन है इस पर कोई टिप्पणी ना कर अगर किया तो बैन माना जाएगा..

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  6. क्या अदा क्या जलवे तेरे पारो...ऐसा लिखते और ऐसे फोटू चिपकाते है कि चिपका ही लेते हैं। दिखने वाले सच और आभासी सच को झांक लेने की कला कोई आप से सीखें। मुंबई ब्ल़ॉगर्स मीट की दोनों लड़ियां मनभावन लगीं। हां, अपने सिवा हर किसी को दो कौड़ी का समझने के केमिकल लोचे का शिकार अरसे से हूं। कोई इलाज हो तो सुझाइए।

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  7. अज्दक जी अखिर मैंने आपको पहचान ही लिया ... ब्लोग्गिंग दिलों से दिलों को मिल रही है ... हो सके तो अपनी मेल चेक कीजियेगा

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