Thursday, June 28, 2007

जातिवाचक संज्ञा की सहूलियत

लड़का घर से भागा हो ऐसी बात नहीं थी. घर से भागा होता तो तैयारी करके भागता. देह पर साफ़ कपड़े व जेब में चार पैसे होते. अजाने-अपरिचित संसार में फिर वह फूंक-फूंककर कदम रखता, सावधानी से आसपास को ताड़ने की कोशिश करता. मगर ऐसा कोई चौंकन्‍नापन उसके व्‍यवहार में नहीं था. बाहर से देखने पर यही लगता जैसे मेले में घूम रहा हो. दीदी, पारुल, बुनाकी यहीं नज़दीक कहीं हों, और उनकी एक आवाज़ पर वह भागा उनके साथ जा मिलेगा. मगर ऐसी बात नहीं थी. था वह भागा हुआ ही. घर से नहीं. ना ना. लेकिन उसके घिसे, पुराने चप्‍पल में फंसी उंगलियां धूल सनी थीं. भले इससे वह लापरवाह लगता दिखे. लापरवाह तो वह दिख ही रहा था. लेकिन पैरों की वह धूल सफर में ही बटोरी गई हो सकती थी. तो वह पैसेंजर ट्रेन के किसी डिब्‍बे से लटका यहां तक पहुंचा था? कि लोहे की पुरानी कोई खड़ख‍ड़ि‍या बस थी जो उसे यहां तक लेकर आई थी? शायद सवाल के जवाब में पूछने पर वह हैरानी से देखता, या फिर क्‍या मालूम शरारत में मुस्‍कराने लगता और उसके धुले, चमकते गाल पर गड्ढे पड़ जाते!

मगर मैं भी कैसी भोली बातें कर रहा हूं, जैसे स्‍वभाव ही इकलौती वजह हो जिसके असर में लड़का जवाब देने से कतराये! यह भी तो हो सकता है कि वह पूछनेवाले की ज़बान ही न समझे? इतने तक का उत्‍तर न दे सके कि उसका नाम क्‍या है? चुप और खोया-खोया दिमाग में गुनता रहे.. कि कौन व कैसे लोग हैं और क्‍या तो पूछ रहे हैं. क्‍यों पूछ रहे हैं?..

क्‍या सीधा-सीधा सवाल उतना ही सीधा होता है कि उसका सीधा जवाब दिया जा सके? क्‍या सीधा जवाब पाकर जवाब पानेवाले की जिज्ञासा शांत हो जाती है, या फिर उसके बाद नए व उलझे सवाल दिमाग में अपना सिर उठाना शुरू करते हैं? और फिर उन उलझे सवालों की चर्चा के बाद सब शांत, स्‍वच्‍छ और निर्मल हो जाता है?..

लड़का एक पेड़ के तने से ठिठोली करता भागकर एक दूसरे पेड़ को छू लेता है. मैं जिस तरह लड़के को नहीं पहचानता, उसी तरह इन पेड़ों को भी नहीं पहचानता. शहर में जिये जीवन की स्‍मृति में पेड़ों के नाम दर्ज़ हैं, पेड़ नहीं दर्ज़ हैं. महुआ, कदंब हैं? क्‍या पेड़ है ये? आपने देखा है इन पेड़ों को.. आप बता सकते हैं इनकी पहचान? या लड़के को लड़के की तरह इन पेड़ों को भी मैं बस पेड़ पुकारूं? हमारी सामूहिक अज्ञानता में इतना ज्ञान काफी होगा? सब तसल्‍ली कर सकेंगे? पेड़ कह दिया तो आप पेड़ समझ लो जैसे लड़का कह देने से लड़का समझ लिए. अछूत माने अछूत जैसे मुसलमान कहकर एक साथ सभी मुसलमानों को समझ लेने का संतोष हो जाए. जैसे सब ब्‍लॉगर्स एक हों और नाला, पुल, बाज़ार, गली कहीं भी एक-दूसरे को पाकर गला भेंटने को बेचैन होने लगें, और फ़ोन के कैमरे से सटर-सटर तस्‍वीरें उतार मीट की मीठी पोस्‍ट जब तक चढ़ा न लें, चैन न पाएं?

मैं यही सब ऊटपटांग सोच रहा था जब लड़के ने ऐसे ही अनायास मेरा शर्ट छूकर मुझसे अपना नाम कहा.

6 comments:

  1. प्रमोद भाइ एक दिन मे दो दो लिखोगे तो हम भाग कर आपके पासा जायेगे देखलेना कही मुश्किल मे पड जाओ चाहे तो सुरेश जी से (चिप्लूनकर)से राय ले लो.मना कर चुके है

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  2. पेड़ कह दिया तो आप पेड़ समझ लो जैसे लड़का कह देने से लड़का समझ लिए. अछूत माने अछूत जैसे मुसलमान कहकर एक साथ सभी मुसलमानों को समझ लेने का संतोष हो जाए. जैसे सब ब्‍लॉगर्स एक हों और नाला, पुल, बाज़ार, गली कहीं भी एक-दूसरे को पाकर गला भेंटने को बेचैन होने लगें, और फ़ोन के कैमरे से सटर-सटर तस्‍वीरें उतार मीट की मीठी पोस्‍ट जब तक चढ़ा न लें, चैन न पाएं?

    गहन.

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  3. इतनी अभिव्यक्ती????? इतनी सरल भषा में बस आप ही लिख सकते हैं. एक बार फ़िर [B]साष्टांग[/B] हूँ मै.

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  4. उस भागे हुये या न भागे हुये लडके का नाम न भी पता हो तो क्या , महुआ और कदंब के पेड को न भी जाने तो क्या , धूप में नहाई कोई स्मृति , विस्मृति के पार धुँधलाई सी दिख गई ।
    अंतिम पंक्ति संगीत के अंतिम बीट की तरह लगी ।

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  5. भाई वाह, तरावट आ गई. क्या कर रहे हैं आप ? अब लोगॊं को आपकी भाषा से भी कोई शिकायत भी नहीं हो रही....

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