Monday, June 25, 2007

मीठ मीठ नीमन नीमन..



मीठ मीठ नीमन नीमन हमरी सुगनिया
हाथ में खाजा अऊर ओंठ पे बुनिया
एहर आव, बबुनी, हो मोर मुनिया

लबर-झबर फराकी के डेढ़ गो फांकी
हरियर रिबना में चिरई के झांकी
टूटल चटाकी अऊर गोड़ में पांकी

न बोले के न चाले के
खाली मुंह में डाले के
गप्‍प गप्‍प दाबि के
चुपाइल जइसन पुरनिया
एहर आव, बबुनी, हो मोर मुनिया

मीठ मीठ नीमन नीमन हमरी सुगनिया.

3 comments:

  1. अइसन कविता पढ़ के त हमर मन हरिया गेलव।

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  2. "मन रे ! अनगावाल ऊ गितिया , तोहके गावे के पड़ी। चढ़िके अग्नि पंथ के रितिया ,मन बढ़ पेंग बढ़ावे के पड़ी"

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  3. क्या दृष्य ले आये ...... मीठी मुनिया खाजा और बुनिया ,हरियर रिबन और चिरई की झाँकी ! सचमुच मीठ मीठ नीमन !

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