Friday, June 8, 2007

आप मुझे जानते हैं?..

वास्‍तविकता क्‍या है?.. क्‍या वह एक और इकहरी है.. वही जो सामने प्रत्‍यक्ष दिख रही है?.. या उससे परे न दिखते धुंधलके में छिपे ढेरों तत्‍वों के कुल समुच्‍चय से घुलमिल कर वास्‍तविकता अपनी पहचान पाती है?.. और तब भी कुछ समझने को छूटा रह ही जाता है?..

आप मुझे जानते हैं?.. कितना जान रहे हैं?.. कि मैं सामाजिक चिंता में सिर थामे दिन भर लरबराता रहता हूं?.. थोड़ी साहित्‍य व सिनेमा की दिलचस्‍पी रखता हूं.. बीच-बीच में व्‍यंग्‍य के नशे में टुन्नियाया रहता हूं.. भोजपुरी, बंगला, उड़ि‍या के प्रभाव में एक अजीब- अमानकीय, उल्‍टी-सीधी हिंदी लिखता हूं?.. यही जानते हैं न आप?.. कि इससे अलग कुछ और एंगल्‍स भी उभरते हैं?.. पैसे, जीवन, समझ का रोना.. मन की उदासी लिए शहर में भटकता मैं?.. लगभग ऐसा-वैसा ही कुछ, यही न?.. इससे एक वाजिब तस्‍वीर बन जाती है?.. बन जाता है मेरे आदमी का एक कमोबेश खाक़ा? अपने मानसिक फ्रेम में इस पहचान को फीड करके आप निश्चित हो लेते हैं?.. जान गए, पहचान लिए, धो दिया, खंगाल चुके, समझ लिए टाइप?..

यह समझ लेने की अदा आपकी नज़र में मुझी को छोटा नहीं बनाती.. खुद आपकी नज़रों में भी आपको छोटा बनायेगी. ऐसी समझाइयां कुछ वैसे ही बेमतलब हैं जैसे बाइस्‍कोप के गोल फांक से आठ तस्‍वीरें देखकर एक बच्‍चा भरम पाल ले कि वह दुनिया देख चुका. समझ चुका. बहुत बार ये भरम कुछ दूर तक सही भी होते हैं.. मगर उसके बाद बहुत दूर तक एक न समझ में आ रहा झीना-झीना अमूर्तन का मैदान होता है.. सिर्फ़ देखनेवाले की नज़र में ही नहीं.. जो जी रहा है खुद उसकी अनुभूति में भी.. बाज मर्तबा ऐसे मौक़े बनते हैं कि यह झीनापन साफ़ हो जाए.. तो बहुत दफे यह भी होता है कि इस धुंधलेपन को लिए-लिए ही हम यह संसार छोड़ देते हैं.

यह झीना धुंधलापन पिता, पुत्र, मित्र, पत्‍नी, परिचित, अपरिचित सबके जीवन में किसी न किसी रूप में उपस्थित रहता ही है.. कितना आपके और उनके लिए वह धीरे-धीरे उजाले में आए यह एक-दो नहीं, उन ढेरों कारकों के आपसी अंतर्संबंध पर निर्भर करता है जो एक व्‍यक्ति के आत्‍मज्ञान व संसार में उसके अवस्थित होने की मार्मिक समझ बनाते हैं. स्‍वयं उसके बारे में ही नहीं, उसके समूचे वृहत्‍तर कॉन्‍टेक्‍स्‍ट के स्‍थूल व गूढ़ रहस्‍यों को परत दर परत खोलते-समझवाते कितना सतह पर चले आते हैं, उसपर भी यह सफ़ाई निर्भर करती है.

ऐसे मौक़ों पर यह बात हमेशा मायने रखती है कि देखनेवाली की नज़र कितनी मार्मिक व हृदय कितना उदार है.. साथ ही दिखानेवाले की लेयरिंग कितनी गुंफित और पेंच कितने उलझे हैं.. कहने का मतलब जानने की ऐसी खोजी यात्राएं दिलचस्‍प तो हमेशा ही होती हैं.. मगर उसका स्‍वाद तब सचमुच अनूठा हो जाता है जब देखने और दिखानेवाले- दोनों ही तरफ के लोग पक्‍के गूदेदार आदमी हों!..

जीवन छोटा ज़रूर है.. मगर आदमी की गरिमा अभी भी थोड़ी बच रही है.. सोलह आने न सही दो कौड़ी तो बची ही है.. उस सघन-उलझे जीव के बारे में तड़फड़ राय बनाने की हड़बड़ झटपटी से बचिये.. आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ेंगे.. हां, अपनी समझ की थोड़ी भलाई ज़रूर करेंगे!.. मनुष्‍यता का मर्म ही महत्‍तर नहीं होगा, समय व समाज भी आपके इस देखने में गरिमा पाएगी.

9 comments:

  1. क्या आप मुझे जानते हैं के बाद अब क्या आप अपने आप को जानते हैं भी लिख डालिये । खुद अपने आप के बारे में राय बनाने की कम हडबडी नहीं रहती है क्या ?

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  2. आप मुझे जानते हैं जैसे अस्तित्ववादी सवाल उठाने के बाद आप मनुष्यता के रूढ अर्थों की बात करें ये कुछ जमता नहीं. वैसे कौन किसको जानता है इस दुनिया में. सब कुछ पारे की तरह तरल है यहां. भले ही हम सबकुछ स्थाई होने का भ्रम पाल लें. सेल्फ पिटी अकेले में तो अच्छी है सार्वजनिक तौर पर शायद नहीं. वैसे जो आपने लिखा है वैसी ही कुछ यंत्रणा में भी झेलना हूं. यंत्रणा से असहमति नहीं. लेकिन जिगर के ज़ख्मों को चौराहे पर दिखाने पर लोग आपको या मुझे भी भिखारी से ज़्यादा कुछ नहीं समझ सकते. अपने-अपने खोल में इतने मस्त हैं लोग कि उन्हें ज़्यादा कुछ जानने की ज़रूरत ही क्या है. सबकी परिभाषित किस्म की जिंदगी और नैतिकताएं इतनी बलवान हैं कि वर्चुवल डायलॉग भले ही संभव हो यथार्थ यहां किसी धर्म, परिवार या स्थापित एथिक्स की चाहरदीवारी में ही आपको कैद मिलेगा. इधर-उधर की हांकने के लिए माफ कीजिए. बाक़ी आप समझ गए होंगे, इसलिए दिमाग के दरवाजे अभी बंद हैं. कुछ दिनों तक हिमालय पर तपस्या करने जा रहा हूं लौटकर आपसे बात करूंगा.

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  3. मानवी अंतर्कथाएं बहुत गहरी हैं। लेकिन हर कोई इतनी परतों में, इतने परदों में घिरा है कि बाहर झांकने पर भी दूसरों को अपनी बनाई सीमाओं में ही देख पाता है। मुक्तिबोध ने बहुत पहले दरमियानी फासलों की बात की थी। मुझे लगता है कि हम अपने समय को समझ लें तो औरों से लेकर खुद को भी समझ सकते हैं।

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  4. खुद को जानना ही जब इतना कठिन है तो दूसरो को कैसे जाने ..और फिर ऊर्जा भी क्यों लगायें जानने की..!! एक व्यक्ति को कई एंगिल से देखा,जाना और परखा जा सकता है ..और हर व्यक्ति अपनी अपनी समझ और रुचि के हिसाब से किसी को जानता है तो फिर आप इतना व्यथित हो लरबरायें नहीं बस करते हैं रहें जो आपको अच्छा लगे ..बिना ये सोचे कि किसने जाना,कैसे जाना,कितना जाना... यहां हम किसी व्यक्ति को परखते भी नहीं वरन उसके विचार को परखते हैं...

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  5. Kya kisi ko poori tarah samjhanaa mumkin hai?????.. mujhe lagta hai ye dunika ka sabse naamumkin kaam hai.. insaan kisi aur ko to kya .. shayad khud ko bhi poori tarah nahi jaanata.. jitna bhi jaanane ki koshish kijiye.. ye naa khatam hone wali khoj hai.. har baar kuchh naya milega .. jab bhi koshish kijiye... ek baar kahin suna tha "Milenge har ek Aadmie mein kai ek aadmi...jab bhi kisi ko dekhan doobara jaroor dekhna.." Kai saal pahle suna tha .. aaj tak nhai bhool payi.. aur yahi sach hai maanati hun...khud ke liye bhi aur auron ke liye bhi

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  6. जितना मुझे समझ है उसके अनुसार आपकी इस पोस्ट के सूत्र आपकी उस पोस्ट पर हुयी एक टिप्पणी से जुड़े हैं जिसमें आपने जीतेंन्द्र की कार का जिक्र करते हुये अपनी हसरत का बयान किया था। बाकी अपने को ही समझने में आदमी जिंदगी गुजार देता है दूसरे को क्या समझेगा! मोटा-मोटी आइडिया लग जाता है। बस्स! :)

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  7. हम कभी किसी को जान ही कब पाते हैं?

    अपने बारे मे जानने का वक्त नही, तो सामने जो है उसे कैसे जानेंगे? अगर जान ही जायेंगे तो उसमे मुझमे फर्क ही नही बचेगा, जब तक हम एक दुसरे को नही जानते है, तब तक ही दो हैं।

    इसलिये किसी को जान पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन हैं, ऐसा मुझे लगता है, पर व्यवहारिक भाषा मे तो हम एक दुसरे को जानते ही हैं, पर सिर्फ अपने नजरिये से ना कि आपके नजरिये से।

    :)

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  8. मैं आपको नहीं जानती.....न खुद को....किसी को भी नहीं....कुछ राय बनाती हूँ और वो व्यक्तित्व बदल जाता है.....आज अभी मैं जो हूँ.....शायद ही अगले पल हूँ....कभी मैं बदल जाती हूँ...कभी वो जगह जहाँ मैं खड़ी हूँ.....फिर भी मैं एक उम्मीद पालती हूँ....जिस तरह समय मुझे बदल रहा है...आपको भी बदल रहा होगा....जिस दूरी पर आप मुझसे आज मिले हैं कल भी मिलेंगे...सकपका जाती हूँ जब यकायक यह दूरी अलग हो जाती है....पर दूरियाँ बदलती रहती है....ना मैं अब जैसी कभी और होऊँगी...ना आप...कैसे कहूँ मैं आपको जानती हूँ।

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