Monday, June 4, 2007

चैनल में हलचल

रहे उनींदे जा रहे हैं व्‍यस्‍त हैं. कितना तो काम है. माथा गंजा हुआ है खोपड़ी पकी हुई है. उन्‍होंने ये कहा है ये उनका नहीं इनका है. आपने इसको कैसे चढ़ा दिया मना किया था, अजी अक़ल है कि घास, कहा था छेड़ना नहीं फिर भी मल्लिका को हटा दिया. क्‍या-क्‍या तो उखड़ाव है जलते तावे वाला ताव है.

बहुत सारा भाव है. सब भाव खाए हुए हैं लैपटॉप सजाये हुए हैं. किसी को विचार सुनने, गुनने का धीरज नहीं. विचार अचार है. और अचार भी साभार है. ख़बर ख़ून, आतंक व बलवा है. उसी का जलवा है. बाकी फिर सब धंधा है कारोबार है. गाड़ी आ रही है जहाज उड़ रहे हैं. कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी नहा रहे हैं पैरिस घूम रहे हैं न्‍यूऑर्क गा रहे हैं. हरकत की करतब है करतब ही कला है.

पूछिए वह जो सुधड़ बाला तेजी से चली आ रही हैं इतना क्‍यों लड़ि‍‍या रही है. हाथ की पन्‍नी के शब्‍द किधर लिए जा रही हैं. बाज आए बख्‍शे बेचारे शब्‍दों को मगर कहां. गरदन टेढ़ी करके ज़रा मुस्‍कराएगी फिर धीमे-धीमे शब्‍दों को जाने किस सजावट में टांक इस मेज पर पटकेगी उस कंप्‍यूटर पर चढ़ायेगी. जन मन बुद्धिविहीन चैनल के अंधियारे टंकी में गिरायेगी.

तत्‍व और अर्थ नहीं केवल घर्र-घर्र कारखाना है. दिन भर की हाय-हाय का कुल जमा बसाइन पखाना है.

1 comment:

  1. भाईसाब
    पखाने का क्यों अपमान करते हैं, वह तो फिर भी शरीर को पोषण देकर अपना काम पूरा करके शराफ़त से निकल जाता है। सब उपमा सब अलंकार बेकार है, इनका उपाय तिरस्कार है।
    नमस्कार

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