Saturday, June 2, 2007

गुप्‍ता, मुक्‍ता और नुक़्ता

गुप्‍ता जी से मैं उधारी में सिगरेट लिया करता था. गुप्‍ता जी दिया भी करते थे. मगर रहते-रहते एक ऐसी स्थिति आ जाती कि मैं उधारी लेना चाहता, मगर लगता गुप्‍ता जी देना नहीं चाह रहे. थोड़े वक़्त तक असमंजस की स्थिति बनी रहती लेकिन जल्‍दी ही खत्‍म भी हो जाती.. गुप्‍ता जी की चुप्‍पी के टूटते ही.. उनके धारदार शब्‍दों के फूटते ही चारों तरफ सत्‍य का प्रकाश फैल जाता. गुप्‍ता जी कहते बीस साल के धंधे में उन्‍होंने ढेरों हरामी देखे हैं, लेकिन मुझ-सा नीच और परले दर्जे का पहली मरतबा देख रहे हैं! गुप्‍ता जी की नज़रों से मैं भी अपने को पहली मरतबा देख लेता.. और पाता कि मैं कितनी गहराई से वह सब समझ पा रहा हूं जिसे गुप्‍ता जी कह रहे हैं.. माने मसले की मेरे और गुप्‍ता जी के बीच एक स्‍पष्‍ट, सुदृढ़ समझ बन जाती.

जबकि मुक्‍ता के साथ उसके कहे को इतनी आसानी से समझ लेने जैसी स्थिति कभी बन नहीं पाई. हालांकि मुक्‍ता के साथ उधारी या पैसे का नहीं, विशुद्ध मुफ़्ति‍या रिश्‍ता था. कभी भी वह चिकन लॉलीपॉप, फ्राइड फ़ि‍श खोलकर सामने रख देती और खाने के लिए मुझसे ज़ि‍द करने लगती. मैं संकोच में मना कर देता तो ‘मैं बुरा मान गई हूं’ जैसा चेहरा बनाने लगती.. और उसे खुश करने के लिए जल्‍दी-जल्‍दी उन्‍हें हज़म कर लेता तो बेचारी का चेहरे का रंग फीक़ा पड़ जाता.. मेरी वजह से आज भूखी रह जाएगी मानो. साथ में फ़ि‍ल्‍म देखने की बात हो या किसी मॉल के बाहर टहलने की रात हो.. मुक्‍ता के चेहरे पर इतने सारे भाव आते और फिर चले भी जाते कि समझने में हमेशा दिक़्क़त होती कि मुझे ठीक-ठीक करना क्‍या है. जबकि गुप्‍ता जी की उधारी में शायद ही कभी इस तरह का असमंजस बना हो. गुप्‍ता जी पहेली नहीं थे. मगर मुक्‍ता थी- पहेली- और भी पता नहीं क्‍या-क्‍या.

अब उसी बार का क़ि‍स्‍सा सुनिए. रात के दसेक बजे होंगे.. मौसम की पहली बरसात का अलसाया सुहानापन.. हम एक सूनसान सड़क पर सूनी ख़ामोशी में अगल-बगल टहलते चले जा रहे थे.. कि अचानक इस बात से घबराकर कि मेरी चुप्‍पी का मुक्‍ता हमारे बीच बढ़ती दूरी का ग़लत मतलब न लगा ले, मैंने हल्‍के से उसके डाबर शिकाकाई सने केशों को चूम लिया.. और अभी होठों से होती नाक में तेल की महक गई भी नहीं थी कि गाल पर एक तमाचा पड़ा.. नैचुरली मुक्‍ता का ही था.. जो गाल पर तमाचा जड़ने के बाद ठंडी नहीं हुई बल्कि मेरे कंधे व छाती पर दोनों हाथों से मुक्कियां जड़ती रोने लगी कि वह हमेशा मुझे भाई समझती रही जबकि मेरे मन में इतना मैल और जाने क्‍या-क्‍या छिपा था!.. मैं सन्‍न् हो गया.. क्‍या कहता मुक्‍ता से? समझता तो कहता. गुप्‍ता जी को समझता था, मुक्‍ता को मैं कभी समझ नहीं सका!..

मुक्‍ता जैसे ही संबंध मेरे नुक़्ता के साथ भी रहे. संकोच, असमंजस और गहरे सुख और वैसी ही गहरी पीड़ा से भरे. फ़रमाइश, फ़रिश्‍ता और काफ़ि‍र लिखने में जैसा सुख मिलता, वह निश्‍चय ही सिर्फ फरमाइश, फरिश्‍ता और काफिर लिखने में कभी भी नहीं मिलता.. मगर दु:ख भी मिलते, और कभी-कभी बड़े गहरे मिलते.. और असमंजस तो हमेशा ही साथ रहता. खमीर, खरबूज, खवातीन और खंजर जैसे शब्‍दों को लिखने की बात के आते ही जाने तो मन कैसे हाय-हाय करने लगता.. हर तरफ नुक़्ते ही नुक़्ते ही दिखते.. और नुक़्ता हटा लो तो लगता एक-एक चीज़ ग़लत लिख गई है!.. गुप्‍ता जी को लेकर मन में कभी इतना कोहराम नहीं मचा.. मुक्‍ता के साथ भी ढेरों दिक़्क़तें आईं लेकिन ऐसी सूरते-हाल कभी नहीं हुई कि दायां पैर आगे रख देने के बाद बायां बढ़ाना एकदम-से नामुमक़ि‍न हो जाए.. मुक्‍ता के साथ देर-सबेर पैर आगे बढ़ ही जाते थे.. मगर नुक़्ता के साथ कुछ भी नहीं बढ़ता.. ग़लतियां बढ़ती हैं आत्‍मविश्‍वास तो नहीं ही बढ़ता.. मंज़र, बंज़र, खुराफ़ात, ज़ुमेरात, फ़जीहत सब तरफ़ मुझे नुक़्ते ही नुक़्ते दिखते हैं.. या फिर एकदम अंधेरा दिखता है..

असमंजस में हूं मेरे जीवन में गुप्‍ता, मुक्‍ता और नुक़्ता के सवाल पूरी तरह कब हल होंगे. मेरी ही वजह से गुप्‍ता जी ने आख़ि‍रकार अपनी दुकान बंद कर दी, मुक्‍ता ने चिकन लॉलीपाप खिलाने के लिए अब किसी मंगेश को चुन लिया है और नुक़्ता ने भी अपना ठिकाना कहीं और ही कर लिया है.. विश्‍वास न हो तो खुद देख लीजिए!

4 comments:

  1. आप हमेशा इन सब मामलो मे पीछे क्यो रह जाते हैं...शोध का विषय है इस पर भी लिखिये ऐसा क्यो है? और इसके पीछे कौन है?

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  2. क्या ख्होब लिखा है. इसी को ' नुक्ता चीं ' कहते है शायद ?
    अरविन्द चतुर्वेदी
    भारतीयम

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  3. चलिये आप लड़कियों वाले 'भैया' ना सही.. मुक्ता के भाई तो बन ही गये.. :)

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  4. ये शाश्वत किस्म के सवाल हैं हुज़ूर-ए-आला ! इनका जवाब कहीं मिलता है ? या इनका कोई ठीक-ठीक जवाब होता है ? और मान लो जवाब मिल गया तो ये ज़िंदगी जीने लायक रह जाएगी ?

    जिंदगी की खूबसूरती का एक बड़ा हिस्सा उसकी अपूर्णता और 'अनप्रिडिक्टेबिलिटी' की वजह से है .

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