Tuesday, June 5, 2007

जीतू भइया का नया दुलार.. और हमारी ख़ामख्‍वाह की झाड़-बहार!

मुम्‍बई में मुफलिसी और आवाराग़र्दी के अपने दिन (व वर्ष) गुजारते हुए गाड़ि‍यों के बनिस्‍बत गाड़ि‍यों से गंजी सड़कों की तरफ हमारा ध्‍यान ज्‍यादा जाता है. कुत्‍ता हड्डी की सोचकर सुखी होता होगा, हम ट्रैफिक की गंजन देखकर दु:खी होते रहते हैं.. कि इस तरह अंड़से-अंड़से सड़क और सड़क की गाड़ि‍यां तो कहीं नहीं ही जा रही हैं.. शहर की ज़ि‍न्‍दगी कहीं जा रही है तो कहां जा रही है. मगर चिंता का यह स्‍थायीभाव बीच-बीच में टूटता भी है.. अचानक किसी मोहिनी के आकर्षण में हम अपनी मुफलिसी से नफ़रत और शहर के जगर-मगर में संभावना भी देखने लगते हैं.. यह नशा थोड़ा आगे जाकर वास्‍तविकता के निर्मम दीवारों से भिड़कर- बेशक भरभराकर मुंह के बल गिर पड़े.. मगर जबतक जादू रहता है, हुज़ूर, हम किसी चिरकुट बच्‍चन से खुद को कम थोड़ी समझते हैं!..

आज जीतेंद्र चौधरी ने अपनी नई खरीदी टोयोटा फॉर्च्‍यूनर की झलक दिखलाकर एक बार फिर से हमारा दिमाग़ उलट दिया है.. हमको हमारे नशे की रौ में झोंक दिया है.. एक बार फिर हम अपनी मुफलिसी और आवाराग़र्दी से नफ़रत करते हुए शहर को संभावना की तरह देखने पर मजबूर हो गए हैं.. एक बार फिर अपने जंग लगे देह का धूल-ग़र्द झाड़ेंगे और मुरझाये, बेतरतीब ख़्वाबों पर हंटर फटकारते हुए उन्‍हें अपने पैरों पर खड़ा करने की ज़ि‍द करेंगे- कि बेटा, तिकड़म कर, चतुराई कर या रगड़ाई कर.. जो करना हो, कर, मगर हमारी आंखों के आगे एक टोयोटा फॉर्च्‍यूनर लाकर खड़ा कर!

मैं चार दिन बाद नशा के टूटने पर जानूंगा.. मगर आप शायद अभी जान रहे होंगे कि टोयोटा फॉर्च्‍यूनर अदाओं से देह भांजकर नहीं मिलती.. उसके लिए इस गरीब मुल्‍क़ में एक विशेष सामाजिक हैसियत और अच्‍छे-खासे फॉर्च्‍यून की दरकार होती है. हिंदी ब्‍लॉगर समाज में अभी भी ज्‍यादा ऐसे ही लोग हैं जिनके पास अपना नहीं दफ़्तर का कंप्‍यूटर और कनेक्‍शन है.. जो पीसी के बैठ जाने पर लैपटॉप में शिफ्ट नहीं हो जाते, कमेंट व पोस्‍ट न लिख पाने का मर्सिया गाने लगते हैं. पांच सौ लोगों के हिंदी ब्‍लॉगिये समाज में पसीना बहाने वाले ढेरों होंगे.. कुछ ने बुद्धि लहाकर सैंट्रो और ज़ेन भी जुगाड़ा होगा.. पर जीतेंद्र चौधरी वाली फॉर्च्‍यून शायद तीन से पांच लोगों के पास हो.. या शायद इस किस्‍मत के अकेले युवराज वही हों?..

बैंक में साढ़े तीन हज़ार की राशि के साथ आज सुबह तक हम सुखी ही थे.. माने भरम बना हुआ था कि ज़ि‍न्‍दगी जियेबल है.. मगर टोयोटा फॉर्च्‍यूनर की फोटो दिखलाकर जीतेंद्र चौधरी ने हमारी नंगी पीठ पर फिर से यथार्थ की गीली हंटर चटका दी है.. हमारे कान में सिर्फ़ अपनी नई कार की इंजिन का शोर भर नहीं भरा.. डिज़ाइनर बेल्‍ट, जूते व डिज़ाइनर फ्लैट्स, डिज़ाइनर सोसायटीज़- इन सबकी मदहोशी की आग में झोंककर हमें हमारे मामूलीपने में अकारण चौकन्‍ना कर दिया है.. तब से उद्वि‍ग्‍न बैठे हैं.. सेकेंड हैंड बाइक के पेट्रोल का सोचने की बजाय इस खुरपेंच में उलझे पड़े हैं कि हमारे पास ऐसा कौन-सा टोयोटा फॉर्च्‍यूनर है जिसकी फोटो प्रकाशित करके हम बकिया के चिठेरों को धराशायी कर दें!.. सेकेंड हैंड बाइक की फोटो कितने ब्‍लॉगर्स में ईर्ष्‍या भाव जगाएगी?.. या मोटे बकल वाला बेल्‍ट जो मेरी कमर को बांधने में असमर्थ होकर बेकार लटका पड़ा है?.. जीतेंद्र चौधरी ने फालतू एक इस्‍पाती डिज़ाइन की फ़ोटो चढ़ाकर हमें फालतू के एक नकारा बोध से भर दिया है.. और इसके तोड़ में अपने पास कोई वाजिब काट भी नहीं है.. करूं क्‍या, कुछ विदेशी चिल्‍लर की फ़ोटो चढ़ा दूं?.. या हंसती हुई विद्या बालन की फ़ोटो?.. सबको यह बताते हुए कि अभी कुछ ही घंटे पहले हमारी शादी हुई है?..

आपको कॉंम्‍प्‍लेक्‍स होगा न, जीतू भइया?

18 comments:

  1. सही है प्रभु सही है!!!
    इसीलिए मुन्ना भाई वही कहता है जो आज की पोस्ट में कहा है, लगता है आपने नहीं पढ़ा मुन्ना भाई मीट्स हिंदी ब्लागर भाग 1-2

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  2. सेल्फ लोथिंग से ज्यादा कुछ है इस लेख में जो मुझे नही दिखता?

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  3. हैं ई का कह रहे हैं भइया। उन्होंने तो फैमिली मेम्बर बताकर परिचय करवाया और आप महल्ला के जलनखोर चाची की तरह जल-भुन गये। देखा नहीं है ट्रक पर लिखा होता है--
    माँ की दुआ को देखकर परेशान हो
    खुदा तुझे भी देगा हैरान न हो

    दिल्ली की बस एक और बात लीखि देखी थी--आदमी अपने दुख से नहीं,दुसरे के सुख से ज्यादा दुखी होता है, लगता है आपके साथ यही बात लागु हो रही है.

    खुले मन से बधाइ दिजिए। कहाँ कॉम्पलेक्स में पड़ रहे हैं। गाड़ी कुवैती तेल से कुवैत में चलेगी आपकी बाइक के रास्ते में नहीं आय़ेगी।

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  4. काहे जीतू भैया को कोस रहे हैं. आप तो सैकेंड हैंड बाइक की फोटो तो लगा सकते हैं .. हम तो वो भी नहीं लगा सकते.अपना पीसी तो हम खरीद नहीं सकते पर कंपनी का लैपटोप लेके घूमते हैं और खुद को धन्य समझते हैं.वैसे एक बात बतायें अभी आपके शहर के एक बेकार से होटल में दाखिल हुए हैं. अभी उसी होटल में बैठे हैं और सोच रहे हैं कि आपका नम्बर होता तो आपसे कल एक बार बात कर लेते.थोड़ी सांत्वना दे देते..कि हम भी आपकी जमात में शामिल है और क्या पता कल हम साथ ही गम गलत कर रहे होते.खैर दिल बहलाने के लिये ख्वाब अच्छा है.

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  5. हमें आपसे पूरी सहानुभूती है। हमारी टोयोटा कैमरी की फोटो आप यहाँ देख सकते हैं :P।

    राग

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  6. परमोद भईया,
    आप विद्या भाभी के साथ हमारे यहां कब आ रहे हैं?

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  7. काकेश प्‍यारे, यह तो अच्‍छी बात नहीं है.. आप हमारे गड्ढों भरे शहर में लैपटॉप लिये चले भी आए और आने के पहले एक पोस्‍टकास्‍ट भी नहीं किया?.. हम ऐसे अज़ि‍ज़ न थे.. गाड़ीवाले न थे.. अभय को करते, भइया शशि सिंह को करते?.. कम से कम होटल के बाहर ही एक ब्‍लॉगर्स मीट करके उस बेकार से होटल को साकार करते?.. ऑल्‍ड मॉंक न सही, कोई सस्‍ती-सी सिगरेट पीकर ही ग़म ग़लत करते?.. अच्‍छा-खासा एक पोस्‍ट बनाने का मौका आपने हाथ से गंवा दिया?.. मेरा नंबर लेने के लिए indiaroad@gmail.com पर लिखिए.. वैसे इन दिनों शहर में बड़ी ही सड़ी हुई गर्मी है, तो ज़रा अपनी देह और मन का ख़्याल रखिएगा..

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  8. प्रमोदजी
    फार्चून एक नहीं, एक से ज्यादा आप खडी कर लेंगे। वक्त की करामात साथ हो, तो सब हो जायेगा। उसकी चिंता ना करें। पर आप जैसी लेखन शैली खड़ी करना किसी के बूते की बात नहीं है। किसी के भी नहीं, मतलब किसी के भी नहीं। यह बात मैं फुल गंभीरता से बहुत पढ़-लिखकर कह रहा हूं। कारें आयेंगी-जायेंगी, पर आपकी सूक्तियां रह जायेंगी। हम आपके लेखन के फैन हैं। उसे कार से कुंठित करके अगर आप उसे छोटा करते हैं, तो समझिये हम जैसे आपके प्रेमी भी बहुत छोटे हो जाते हैं। हम छोटे होने के लिए तैयार नहीं है।
    सादर
    आलोक पुराणिक

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  9. "सूखी रोटी खाय के जी भर देसी पी
    देख राई टोयेटा मत ललचावे जीव"

    ककेश भाइ और प्रमोद जी के लिये सुवचन
    बाबा फ़रीदी

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  10. भाइ नया ब्लोग है कैमरा भी नया दिख रहा है
    पर नई फ़ोटो कहा है

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  11. अरे भाया काहे हैरान परेशान हो रहे हो। ये तो हम कुवैत मे है, इसलिए इ वाली गाड़ी लिए, हम अगर इन्डिया मे होते तो टहल रहे होती कि मारुति 800/आल्टो वगरैहा में। इत्ता महंगा पेट्रोल हम गरीब आदमी के बस नही भई।

    टेन्शनियाओ नही, हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है, आप मोटरसाइकिल से कार पर पहुँचो, कार से ट्रक पर, ट्रक(कृपया उखड़ने से पहले मेरी ड्रीम वाली पोस्ट देखे, वो मिलेट्री ट्रक ही है) से हवाई जहाज पर। फिर हमको भी हवाई जहाज पर घुमवाओ।

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  12. तैयार रहना, कल हम भी अपनी वाली दिखायेंगे

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  13. गजब की लेखन शैली है..आनन्द आया..

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  14. भाई आलोक पुराणिक ने फ़ाइनल ओवर की फ़ाइनल बॉल पर छक्का मार कर हारे मैच को जिता दिया है सो अब कुछ लिखने को बनता नहीं है .

    पर जब कबीर याद आ जाएं तो कहे बिना नहीं रहना चाहिए :

    " चाह गई चिंता गई मनुआ बेपरवाह।
    जाको कछु नहिं चाहिए सो ही शहंशाह॥"

    शहंशाही मन-मिज़ाज से होती है . चीज़ें हैं चीज़ों का क्या . भवानी भाई की एक कविता है इस पर बहुत जबर्दस्त . कभी लिखूंगा .

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  15. आलोक जी एवं प्रियंकर जी की बात का मेरा भी समर्थन है.इस कथा को यही समाप्त किया जाय.

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  16. मुझसे पूछें तो विद्या बालन सही रहेगी, लेकिन मर्लिन मुनरो की पोशाक में। बल्कि... बिना पोशाक के भी चलेगी। वैसे सब लोगों का 'अपनी-अपनी' दिखाने का यह जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह ऐसे ही जारी रहा तो नारद का यह मंच पंसारियों की चौपाल बनकर रह जाएगा। एक अर्से से निर्मल-आनंद से वंचित हम सारे लोग इस सर्वव्यापी 'मल-आनंद' से कितने आनंदित होंगे?

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  17. Main ALOK JI aur PRIYANKAR JI se shamat hun poori tarah...

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